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अलगाववादियों ने कश्मीर में मीडिया को हथियार बना रखा था:एनयूजे-आई

अलगाववादियों ने कश्मीर में मीडिया को हथियार बना रखा था:एनयूजे-आई
October 09
17:27 2019

नयी दिल्ली, 09 अक्टूबर (वार्ता) “आतंकवादियों, अलगाववादियों और पाकिस्तानी मीडिया ने अभिव्यक्ति की आजादी, पत्रकारिता और पत्रकारों के नाम पर कश्मीर में भारत विरोधी तथ्यों को हवा देने का काम किया। फेक न्यूज और सोशल मीडिया को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर ऐसे तत्वों ने भारत की एकता-अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरा पैदा किया।” यह तथ्य नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स-इंडिया (एनयूजे-आई) की तथ्यान्वेषी दल की रिपोर्ट में सामने आए हैं।
कश्मीर से लौटे एनयूजे-आई के प्रतिनिधिमंडल ने अपनी रिपोर्ट “कश्मीर का मीडिया: तथ्यों के आईने में” भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति चंद्रमौली कुमार प्रसाद को सौंपी, जिसमें कहा गया है कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद अखबारों में भी आम कश्मीरियों के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास एवं मौलिक ढांचे से जुड़े मुद्दों पर लेख और समाचार नजर आ रहे हैं। करीब तीन दशकों में पहली बार आम कश्मीरी के मुद्दे समाचारों में प्रमुखता पा रहे हैं। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कश्मीर घाटी में मीडिया के एक बड़े वर्ग की संपादकीय नीतियां और भूमिका निरंतर सवालों के घेरे में रही हैं और इसकी वजह वे परिस्थितियां रही हैं जो आतंकवादियों, अलगाववादियों और पाकिस्तानी मीडिया के चलते पैदा हुईं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्व तथा हाल में प्रकाशित खबरों तथा इनकी पड़ताल के आधार पर यह बात भी उभरकर सामने आ रही है कि आतंकवादियों, अलगाववादियों और पाकिस्तानी मीडिया ने अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर, पत्रकारिता और पत्रकारों के नाम पर कश्मीर में आतंकवाद, अलगाववाद और भारत-विरोधी तथ्यों को हवा देने का काम किया। फेक न्यूज और सोशल मीडिया को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर ऐसे तत्वों ने भारत की एकता-अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरा पैदा किया।
एनयूजे-आई ने मांग की कि कश्मीर में पत्रकारों को श्रीनगर में पत्रकारिता करने के पूर्ण सुरक्षित अवसर प्रदान किए जायें। भारत के अन्य शहरों से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों, मीडिया संस्थाओं को श्रीनगर एवं कश्मीर में अपने कार्यालय खोलने के लिए सुरक्षा एवं सुविधा प्रदान की जाये। प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों में वरिष्ठ पत्रकार हितेश शंकर, एनयूजे आई के राष्ट्रीय महासचिव मनोज वर्मा, राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष राकेश आर्य, दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अनुराग पुनैठा, दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के महासचिव सचिन बुधौलिया, एनयूजे आई के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हर्षवर्धन त्रिपाठी और दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष आलोक गोस्वामी शामिल थे।
एनयूजे-आई के छह सदस्य प्रतिनिधिमंडल ने 10 से 15 सितंबर 2019 के मध्य जम्मू-कश्मीर का दौरा किया था। इस दौरान किसी भी प्रकार की स्थापित राय से आगे बढ़ते हुए कश्मीर के मीडिया और पत्रकारों की स्थिति को समझने का प्रयास किया गया और वहां के मीडिया के संबंध में एक अध्ययन रिपोर्ट तैयार की गयी।
प्रतिनिधिमंडल ने घाटी से प्रकाशित अखबारों अन्य मीडिया माध्यमों की स्थिति-उपस्थिति, निष्पक्षता जानने के लिए पाठकों, दर्शकों, श्रोताओं अखबार विक्रेताओं से बात तो की ही, श्रीनगर स्थित प्रेस क्लब का दौरा भी किया। वहां मौजूद पत्रकारों के अलावा अलग-अलग स्तर पर विभिन्न मीडियाकर्मियों और संपादकों से बातचीत कर कश्मीरी मीडिया के विभिन्न पहलुओं को जानने और समझने की कोशिश इस दल द्वारा की गई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि श्रीनगर में इंटरनेट और मोबाइल पर पाबंदी से मीडिया भी प्रभावित हुआ है। मीडिया के काम करने के लिए सरकार की ओर से एक मीडिया सेंटर स्थापित किया गया ताकि पत्रकार अपना काम कर सकें। कुछ पत्रकार संगठनों ने इंटरनेट पर पाबंदी को मुद्दा बनाने की कोशिश की। मीडिया की स्वतंत्रता का एनयूजे-आई समर्थन करता है पर संगठन का यह भी स्पष्ट तौर पर मानना रहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की एकता अखंडता के सामने मीडिया की स्वतंत्रता की भी अपनी मर्यादा है। दोनों ही स्तर पर संतुलन जरूरी है। अपने दौरे पर प्रतिनिधिमंडल ने पाया कि श्रीनगर में किसी भी प्रकार की कोई पांबदी मीडिया पर नहीं है।
रिपोर्ट के अनुसार, समाचार पत्र रोजना प्रकाशित होते हैं। मीडिया पर अलगाववादियों और आतंकवाद का भय अधिक दिखा। दिल्ली और अन्य शहरों से प्रकाशित होने वाले कई प्रमुख समाचार पत्रों के कार्यालय श्रीनगर में नहीं है और गैर कश्मीरी पत्रकार भी नहीं हैं। गैर-कश्मीरी पत्रकारों को श्रीनगर में काम करने नहीं दिया जाता। गैर-कश्मीरी पत्रकारों के साथ प्रशासनिक स्तर पर भी भेदभाव किया जाता है। प्रशासन में और मीडिया के एक तंत्र में अलगाववादी और स्थानीय राजनीतिक दलों के समर्थकों की घुसपैठ ने भी कश्मीरी मीडिया की स्वतंत्रता पर सवालिया निशान लगा रखा है।
कश्मीर मीडिया और पत्रकारों और पत्रकारिता की बेहतरी के लिए एनयूजे आई ने अपनी इस रिपोर्ट के जरिये मांग की कि आतंकवाद और अलगाववादी पोषित पत्रकारिता पर कठोरता के साथ अंकुश लगाया जाये। जाति और समुदाय के नाम पर कश्मीर में पत्रकारों की मान्यता में भेदभाव समाप्त हो इसके लिए कदम उठाये जायें। जम्मू कश्मीर सहित सीमावर्ती राज्यों और क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों एवं मीडियाकर्मियों को बेहतर वेतन, पेंशन और सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी बीमा और सुविधाएं दी जायें। जांच के नाम पर सुरक्षा बलों द्वारा पत्रकारों को बिना वजह परेशान न किया जाये। गैर कश्मीरी पत्रकारों को भी श्रीनगर में पत्रकारिता करने के पूर्ण सुरक्षित अवसर प्रदान किये जायें। भारत के अन्य शहरों से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों, मीडिया संस्थाओं को श्रीनगर एवं कश्मीर में अपने कार्यालय खोलने के लिए सुरक्षा तथा सुविधाएं प्रदान की जाये।
सुरेश.श्रवण
वार्ता

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