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करमा झारखंड के आदिवासियों की प्रकृति में आस्था का सांस्कृतिक पर्व है

करमा झारखंड के आदिवासियों की प्रकृति में आस्था का सांस्कृतिक पर्व है
September 07
09:26 2019

इनसाईट ऑनलाइन न्यूज़ से पीके की रिपोर्ट

करम या करमा पर्व झारखंड के आदिवासियों और मूलवासियों का सांस्कृतिक लोकपर्व है। यह पर्व फसलों और वृक्षों की पूजा का पर्व है। करमा पर्व में आपको यहाँ की संस्कृति और लोक नृत्य का आनन्द भरपूर देखने को मिलता है।

आदिवासियों के पारंपरिक परिधान लाल पाढ़ की सफेद रंग की साड़ियाँ पहने लड़कियाँ जगह-जगह लोक नृत्य करते नजर आती हैं। भादों माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को यह पर्व पूरे राज्य में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है जबकि इस पर्व की तैयारियां महीनों पहले शुरू हो जाती हैं और पूजा पाठ एकादशी के पहले सात दिनों तक चलता है।

झारखंड में करमा कृषि और प्रकृति से भी जुड़ा पर्व है, जिसे झारखंड के सभी समुदाय हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। करमा नृत्य को नई फसल आने की खुशी में लोग नाच गाकर मनाते हैं। इस पर्व को भाई-बहन के निश्छल प्यार के रूप में भी जाना जाता है। इस तरह यह यह रिश्तो से जुड़ा हुआ पर्व है।

रक्षाबंधन जैसे भाई बहनों के बीच रिश्तों की रक्षा की बात कहते हैं वैसे हीे यहाँ करमा पर्व में बहनें व्रत रखकर भाई की रक्षा का संकल्प लेती हैं। पारम्परिक परिधान पहनकर कई दिन पहले से ही नाचना गाना शुरू कर देते हैं। यहाँ की बहने भाइयों की रक्षा के लिए संकल्प लेती हैं।

झारखंड में हर जगह करमा पर्व मनाया जा रहा है। प्रकृति और भाई-बहन की निकटता का यह पर्व ये सन्देश देता है कि यहाँ की हरियाली और पेड़-पौधे इसलिए हरे-भरे हैं क्योंकि यहाँ के लोग प्रकृति की पूजा करते हैं। इनके देवता ईंट के बनाए किसी मन्दिर या घर में कैद नहीं होते बल्कि खुले आसमान में पहाड़ों में रहते हैं।

झारखंडी संस्कृति के लोग प्रकृति की पूजा करते हैं। इनके हर पर्व की तिथियाँ, मन्त्र सबकुछ इनके अपने होते हैं। जिसमे करमा पर्व सबसे बड़ा पर्व है। इस पर्व पर लोग पेड़ की पूजा करते हैं कुछ लोग नये पौधे लगाते हैं। मिलजुल कर मनाने वाला यह पर्व पर्यावरण के साथ-साथ रिश्तों को भी मजबूती देता है। लोग एक साथ नाचते गाते पूजा करते हैं। सात दिन पहले करमा पूजा की शुरू हो जाती है।

सात दिन पहले कुंवारी लड़कियां अपने गाँव में नदी, पोखर या तालाब के घाट पर जाती है। वहां बांस की टोकरी में मिट्टी लेकर कुर्थी, गेहूं, चना और धान के बीज बोती हैं। टोकरियों को बीच में इकट्टा रखकर सभी सहेलियाँ एक दूसरे का हाथ पकड़कर चारों ओर उल्लास में गीत गाती हुई नाचती हैं। यहीं बीज अंकुरित होने की प्रक्रिया शुरु हो जाती है।

इन टोकरियों को घर लौटकर एक स्थान पर रख देती हैं। करम त्योहार के एकादशी तक हल्दी मिले जल के छींटों से टोकरी को सुबह शाम नियमित रूप से सींचती हैं और हर शाम गांव की सखी-सहेलियां एक साथ घर के आंगन में टोकरी को रखकर एक-दूसरे की कमर पकड़े नाचती गाती हैं। चारों ओर परिक्रमा भी करती हैं।

सात दिनों में बीज अंकुरित हो जाते हैं जो एकादशी के दिन करमा पूजा प्रयुक्त में होते हैं। इन अंकुरित पौधों को यहाँ जावा कहते हैं। झारखंड के शहर-शहर, गांव-गांव करमा पर्व के आजोयन की धूम मची है।

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