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कामनाओं से रहित मानव जीवन ईश्वर की सच्ची उपासना है

कामनाओं से रहित मानव जीवन ईश्वर की सच्ची उपासना है
October 03
10:01 2019

-चाह गई, चिन्ता मिटी, मनुुवां बेपरवाह।

जिनको कछू न चाहिए, सोई शाहंशाह।।

इनसाइट ऑनलाइन न्यूज़ डेस्क 

मनुष्य जीवन में विनम्रता का बहुत महत्व है। मनोविज्ञानी भी इस तथ्य पर मुहर लगाते हुए मानते हैं कि यदि दैनन्दिन जीवन में तनाव से मुक्त रहना है तो विनम्रता का गुण विकसित करना लाभदायक होता है। वस्तुतः विनम्रता के साथ मधुर वचन बोलने का गुण भी जुड़ जाता है।

हमारे सामने लाख समस्याएं उलझन के साथ खड़ी हो गईं हों, परन्तु धैर्य के साथ विनम्रतापूर्वक मूर्ख और कठोर दुश्मन का सामना किया जाए तो विजय अंततः स्वयं को ही मिलती है। वस्तुतः अनुभव सिद्ध पुरूषों ने संसारिक जीवन में अनुपालन के लिए इसे आवश्यक बताया हैं। लेकिन मानव जीवन का उद्देश्य महज इतनी छोटी सीमा में समाहित नहीं है।

अध्यात्म विज्ञानियों का कहना है कि जन्म और मृत्यु का रहस्य भी मानव सहित समस्त जीव जन्तुओं के साथ जुड़ा हुआ है। उन्नत योनि में शरीर धारण करने वाला मनुष्य जन्म लेकर महज मृत्यु का वरण करने के लिए ही नहीं है बल्कि उसका उद्देश्य उस परम शक्ति का साक्षात्कार कर लेना है जिसके बाद इस जगत में न बार-बार जन्म लेना पड़े और न मृत्यु का बार-बार वरण करना पड़े।

अध्यात्म विज्ञानी स्वीकार करते हैं कि इस सृष्टि के मालिक ईश्वर की उपासना मानव जीवन का परम कत्र्तव्य है। संसारी जीवन के साथ ईश्वर की उपासना में भी विनम्रता की जरूरत होती है। विनम्रता जीवन की पूंजी है। ईश्वर भक्ति में तीन बातों की प्रधानता होती है जिनमें स्तुति, प्रार्थना और उपासना का स्थान है। कहा गया है कि जीवन में कभी न कभी कोई हमारा उपकार भी करता है। यदि हम उसका प्रति उपकार नहीं कर सकते तो उसका गुणगान तो कर ही सकते हैं।

यही तथ्य ईश्वर के उपकार से जुड़ा हैं। परम शक्ति ईश्वर जीवन भर हमारे लिए उपकार करता है। ईश्वर के अनन्त उपकार का क्या कभी बदला चुकाया जा सकता है? नहीं। इसलिए उसका यशोगान करना चाहिए। इसी को स्तुति कहते हैं। इससे ईश्वर के प्रति हमारी आस्था बढ़ती है। इससे ईश्वर की महिमा और विभूति का ज्ञान प्राप्त होता है। अपने को ईश्वर की ओर ले जाने का यह प्रथम चरण है। अनुपम साधन है।

स्तुति गान के बाद प्रार्थना का महत्व है। प्रार्थना का अर्थ है नम्रता पूर्वक कुछ मांग। बिना मांग के इस संसार में कोई नहीं है। लेकिन संत इससे परे होते हैं। कबीर ने कहा भी है

चाह गई, चिन्ता मिटी, मनुुवां बेपरवाह।

जिनको कछू न चाहिए, सोई शाहंशाह।।

लेकिन साधारण जन के मन में स्वाभाविक ही मांग बनी रहती है। सन्तान, धन-धान्य और संसार में सम्मान प्राप्त करने की कामना सामान्य लोगों में होती ही हैं। परन्तु संत कहते हैं कि अंततः ये कामनाएं मन को मलिन ही करनेवाली होती हैं। इसलिए ऐसी कामनाओं से विरत रहना ही मानव जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। असली उद्देश्य तो ईश्वर लाभ की कामना हैं। तुलसीदास कहते हैंः-

जो सुख सुरपुर नरक गेह वन, आवत बिनहि बुलाये।

तेहि सुख कहं नर जतन करत बहु, समुझत नहि समुझाये।।

जो सांसारिक सुख स्वाभाविक ही आने-जाने वाले हैं, उनके लिए कष्ट उठाने, विपति झेलने, झगड़ा करने से क्या लाभ है। संसार की चीजों के उपार्जन में दुख, उनके संरक्षण में दुख और उनके विनष्ट हो जाने पर तो आदमी महान दुख का अनुभव करता है। इस कारण ऐसी माया की मांग बुद्धिमान जन करते ही नहीं है।

संत कहते हैं कि ऐसी मांग होनी चाहिए, जिसको प्राप्त कर लेने पर सदा के लिए अन्य किसी प्रकार की मांग छूट जाए। तब असल में ईश्वर से ईश्वर को ही मांगना चाहिए, जिसके प्राप्त होने से कुछ भी अप्राप्त नहीं रह जाता है।

ईश्वर को पुकारने के लिए की गई प्रार्थना वस्तुतः वाणी का विषय नहीं बल्कि हृदय की पुकार है। जो कोई शुद्ध अंतःकरण से ईश्वर को पुकारते हैं, ईश्वर उनकी अवश्य सुनते हैं। ऐसा आश्वासन सभी संतों ने हमें दिया है।

स्तुति और प्रार्थना के बाद उपासना जरूरी है। इसका अर्थ ही होता है परमप्रभु परमात्मा के निकट आसन। यह ईश्वर प्राप्ति के लिए की जाने वाली साधना में शामिल है। संतों ने ईश्वर साधना के लिए भी सरल उपाय बताये हैं जिसके कई चरण हैं।

यदि ऐसी साधना संसार में हीं रहकर बिना घर बार छोड़े और पवित्र आजीविका अर्जन करते हुए की जाये तो परमात्म लाभ के साथ इहलोक का जीवन भी सुखमय होगा। ऐसा संतजन आर्शीवाद देते हैं।

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