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गोगोई के मनोनयन का रोना क्यों

गोगोई के मनोनयन का रोना क्यों
March 23
09:18 2020
  • क्या कांग्रेस ने चीफजस्टिस रंगनाथ मिश्र को अपनी पार्टी से राज्यसभा नहीं भेजा, जिन्होंने सिख विरोधी दंगों में कांग्रेसियों को कथित रूप से बचाया?

देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने शेम- शेम के नारे और वाक आउट के बीच राज्यसभा की सदस्यता की शपथ लेली है। उन्हें बतौर राज्यसभा सदस्य राष्ट्रपति ने नियुक्त किया है। राष्ट्रपति ऐसे नामीगिरामी एक दर्जन लोगों को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत कर सकते हैं। जाहिर है राष्ट्रपति उन्हें ही मनोनीत करते हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री चाहते हैं। यानी राज्यसभा में मनोनयन के योग्य वही होता है, जो प्रधानमंत्री या सरकार के प्रतिनिश्ठावान हो। इसी आधार पर रंजन गोगोई पर यह आरोप चस्पां करने की कोशीश की जार ही है उन्होंने मुख्य न्यायाधीष रहते हुए सरकार के पक्ष में डंडीमारी होगी।

गोगोई ने चीफ जस्टिस के रूप में सरकार या भाजपा का पक्ष इरादतन लिया या नहीं यह चर्चा का विषय हो सकता है। लेकिन यदि कांग्रेसी , सेक्युलरिज्म के सूरमा या अन्य लोग यह आरोप लगा रहे हैं कि गोगोई का मनोनयन रामजन्मभूमि मामले में उनके नेतृत्व वाले पीठ द्वारा दिये गये निर्णय का पुरस्कार है। उन पर सरकार की पक्षधरता के दूसरे आरोप भी लग रहे हैं। कांग्रेसी तो राफेल सौदे में भी गोगोई की भूमिका की आलोचना करते हुए उन पर टूट पड़े हैं।

इसलिए अच्छा होता यदि गोगोई साहब राश्ट्रपति का प्रस्ताव विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर देते। इससे उनकी प्रतिष्ठा पर खरोंच नहीं आती।

याद कीजिए जब मुख्यन्यायाधीश बनने से पहले गोगोई ने अपने तीन साथी न्यायाधीशों के साथ तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र को इंगित करते हुए प्रेस कांफ्रेंस की थी। इससे पूरे देश में यह संदेह पसरा था कि मुख्य न्यायाधीश सरकार के इशारे पर मुकदमों की सुनवाई का बंटवारा कर रहे हैं और सरकार को बचा रहे हैं।

इससे उत्साहित कांग्रेस और विपक्ष के कुछ सांसदों ने दीपक मिश्र के खिलाफ महाभियोग का नोटिस तक दे दिया था।

इसके बाद यह धारणा भी बनी थी कि गोगोई बिना किसी दबाव के काम करने वाले जजहैं। उनके राज्यसभा सदस्य बनने से यह धारणा टूटी है। उनका सम्मान कम हुआहै। हालांकि उनका कहना है कि जब वे सदन में अपनी बात रखेंगे, तो

वे लोग भी तालियां बजायेंगे, जो शेम-शेम के नारे लगा रहे थे। हो सकता है कि ऐसा ही हो, लेकिन सचतो यही है कि-

रहिमन फाटे दूध कोए मथे न माखन होय

कांग्रेस और नैतिकता

अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस को गोगोई के मनोनयन के विरोध का नैतिक अधिकार है? नहीं हरगिज नहीं, क्योंकि कांग्रेसियों ने अपने लंबे शासनकाल में किसी किसी भी धतकर्म से गुरेज नहीं किया है। उन्होंने हर संवैधानिक, लोकतांत्रिक संस्था के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति का समय-समय पर अपने हिसाब से बेजा इस्तेमाल किया है और उसे उपकृत या पुरस्कृत किया है।

चीफजस्टिस रंगनाथ मिश्र

क्या कांग्रेस ने चीफजस्टिस रंगनाथ मिश्र को अपनी पार्टी से राज्यसभा नहीं भेजा, जिन्होंने सिख विरोधी दंगों में कांग्रेसियों को कथित रूप से बचाया?

क्या बिहार में सहकारिता घोटाले में जगन्नाथ मिश्र और तपेश्वर सिंह को बचाने वाले बहरूल इस्लाम को राज्यसभा नहीं भेजा गया था ?

बहरूल इस्लाम

दरअसल न्यायमूर्तियों को उपकृत करने का महान कार्य तो पंडित नेहरू ने शुरू कर दिया था। उन्होंने ने ही जस्टिस एम. सी. छागला को अमेरिका का राजदूत बना कर भेजा था। उसके बाद से अबतक सेवानिवृत्त जजों की संसद में धमाकेदार इंट्री होती रही है। वे उपराष्ट्रपति से लेकर राज्यपाल तक की भूमिका निभा चुके हैं। हाल ही में केरल के राज्यपाल पद सेरिटायर हुए सदाशिवम भी चीफजस्टिस थे और उन्हें मोदी सरकार ने ही नियुक्त किया था। तब चिल्लपों नहीं मची, क्योंकि उनके समय में नाजुक मुद्दों पर सुनवाई नहीं हुई थी।

सदाशिवम

झारखंड में भी दो सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज मुख्य सूचना आयुक्त बन चुके हैं। इसलिए कांग्रेंस यदि गोगोई के मनोनयन को लेकर बहस में उतरी तो भाजपा उसे नंगा कर देगी। वैसे भी सेवानिवृत्ति के बाद न्याय के मंदिर के ये देवता किसी न किसी ठौर की तलाश में रहते हैं। किसी आयोग में, किसी न्यायाधिकरण में, आरबिटेशन में या कहीं और ये अपनी गोटी फिट करने में लगे रहते हैं। यहां तक कि निर्वाचन आयुक्त तक कांग्रेंस की कृपा से राज्यपाल तथा केंद्रीय मंत्री के रूप में अपनी भूमिकाएं निभा चुके हैं। आपातकाल के पहले तो इंदिरा गांधी ने कमिटेड ज्युडिशियरी कानारा दिया था और तीन वरीय न्यायाधीशों को सुपर सीड करते हुए ए. एन. रे को चीफ जस्टिस बना दिया गया था, ताकि इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पलटा जा सके, जिसमें इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध करार दिया गया था।

इसलिए गोगोई मामले में कांग्रेस चुप ही रहे तो अच्छा होगा, अन्यथा बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी।

इंदिरा गांधी और जस्टिस ए. एन. रे

अब लौटते हैं जनाब गोगोई की नैतिक तापर। गोगोई कटघरे में तब खड़़ा होंगे, जब उनसे उच्चनैतिक आदर्शों के पालन की उम्मीद की जाय। क्या ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए ? क्या गोगोई कोई मलूकदास हैं, जिन्होंने संतन को कहा सीकरी सो काम कह कर मुगल दरबार में कोर्नश बजाने से इनकार कर दिया था ? क्या गोगोई तुलसीदास हैं, जिन्होंने अपने मित्र रहीम खान खाना के आग्रह पर भी अकबर की मनसबदारी नामंजूर कर दी थी ?

रहीम खान खाना और अकबर

गोगोई कोई गायत्री पीठ के प्रणव पांड्या भी नहीं हैं, जिन्हों ने मोदी सरकार के (राष्ट्रपति) द्वारा राज्यसभा में मनोनयन का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। दरअसल हमलोग जरूरत से ज्यादा नैतिकता के आग्रही होग ये हैं। वह भी ऐसे समय मेंजब लोकतंत्र के सभी चारो खंभे हिल रहे हैं। इन्हें लोभ, मोह, लिप्सा की दीमकें चाट रही हैं। राज्यसभा जाने के लिए कैसे-कैसे धनपशु कैसी-कैसी तिकड़म कर रहे हैं। विधायक तोड़़े खरीदे जार हे हैं। पार्टी प्रमुखों की जेबें भारी की जार ही हैं। लोकसभा के टिकट के लिए क्या कुछ नहीं होता है।

प्रणव पांड्या

अलग-अलग क्षेत्रों के शूरवीरों और नैतिक आख्यानकर्ताओं ने राज्यसभा में जाने के लिए जो कुछ किया है, उसके बाद भी क्या वे हमें नैतिकता का पाठ पढ़ाने लायक रह गये हैं ? दरअसल युग धर्म बदल गया है। खोटे सिक्के, खोटे लोग, खोटे काम, खोटे विचारों का प्रभाव बढ़ा है। सबको देखा एक्के लेखा। फिर रंजन गोगोई से नैतिक मूल्यों, आदर्शों की रक्षा की क्यों उम्मीद करें, जिनके खून में ही राजनीति है। आखिर उनके पिता भी तो कांग्रेस नेता थे और कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे। तभी तो गोगोई कह रहे हैं कि राश्ट्रपति ने उन्हें सम्मान दिया है, पुरस्कार नहीं और सम्मान लेने में हर्ज क्या है। दरअसल मौका परस्ती भी एक वायरस है और इसके खिलाफ जनता कर्कफू तो छोड़िए, जनाक्रोश पैदा करने का साहस किसी भी नेता या पार्टी में नहीं है और जनता को मौका पांच साल बाद मिलता है और वह भी सीमित विकल्प के साथ।

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