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झारखंड विधानसभा चुनाव 2019: अल्पसंख्यक मतों की बिखरने और बंटने की संभावना ?

झारखंड विधानसभा चुनाव 2019: अल्पसंख्यक मतों की बिखरने और बंटने की संभावना ?
November 07
10:16 2019
  • अल्संख्यक मतों के बिखरने से कांग्रेस जेएमएम, जेवीएम जैसे दलों को भारी नुकसान!

इनसाइट ऑनलाइन न्यूज़ से कुमार की रिपोर्ट

झारखंड विधानसभा चुनाव में लगभग 28-30 विधानसभा क्षेत्रों में अल्पसंख्यक मतों का विशेष प्रभाव है। भरोसे के इस मत को बटोरने के लिए सभी प्रमुख धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियों में होड़ मच जाती है।

पूर्व में अनुभव है कि अल्पसंख्यक मत एक मुश्त भाजपा के विरूद्ध उस सशक्त पार्टी के उम्मीदवार को जाते थे जो भाजपा को शिकस्त देने में भारी लगते थे।

हालांकि झारखंड 2019 के विधानसभा चुनाव में अल्पसंख्यक मतों के अलग-अलग क्षेत्रों और अलग-अलग उम्मीदवारों के अनुसार बंटने की संभावना दिखती नजर आ रही है।

अल्पसंख्यक समुदाय के क्रिश्चियन मतदाताओं के मत क्रिश्चियन बहुल क्षेत्र में किसी एक दल के पक्ष में एक मुश्त होने की संभावना क्षीण नजर आती है। देखा जाये तो गुमला, खूंटी,लोहरदगा एवं रांची जिले में क्रिश्चियन मतों की काफी संख्या है। क्रिश्चियन मतों के विखरने का जो पार्टियां कारण बनेगी उनमें से एक प्रमुख पार्टी झापा है जिसका संचालन एनोस एक्का कर रहे हैं जो सिमडेगा और खूंटी जिले की कुल चार सीट से चुनाव लड़ेगी।

इन्हीें क्षेत्रों से तथा गुमला जिला के कुछ क्षेत्रों से एक नई पार्टी जो सेनेगल के नाम से जानी जाती है और जिसका संचालन क्रिश्चियन समाज के रोमन कैथोलिक बिरादरी के लोग करते हैं, भी अपने उम्मीदवार खड़े करेगी ऐसी संभावना है। झारखंड में क्रिश्चियन धर्म के अनुयायी मुख्यतः रोमन कैथोलिक चर्च, जीईएल चर्च एवं सीएनआई चर्च से ही संबद्ध हैं। ईनसाईट आॅनलाईन न्यूज अनुसार इनके अनुयायी मतदान के मामले में एकमत हैं और इनका झुकाव कांग्रेस, जेएमएम गठबंधन की ओर दिखता है।

बावजूद इसके एनोस एक्का की झापा और सेनेगल पार्टी कुछ मतों को प्रभावित करती है तो क्रिश्चियन बहुल सीटों पर भी भाजपा को ही लाभ होगा। सिमडेगा विधानसभा क्षेत्र में क्रिश्चियन समुदाय के अधिकतम उम्मीदवार चुनाव मैदान में हरदम कूद पड़ते हैं और वहां भाजपा जीतती है जो दलीय राजनीति के बीच एक ज्वलंत उदाहरण है।

क्रिश्चियन बनाम आरएसएस, हिंदू संगठन, सरकार

आरएसएस और हिंदू संगठन जो धर्म परिवर्तन को रोकने के अभियान में सरकार के सहयोग से बहुत सक्रिय हैं। नतीजन आदिवासी समाज काफी दूर तक दो खेमे क्रिश्चियन धर्म और सरना धर्म में बंट गया है।
आदिवासी समाज की कुल आबादी झारखंड में लगभग 26 प्रतिशत है जिसमें सरना आदिवासियों की संख्या लगभग 23 प्रतिशत है वहीं क्रिश्यिचन धर्म मानने वाले आदिवासियों की संख्या 03 प्रतिशत है।
हाल के चुनावों में देखा गया है कि अलग-अलग क्षेत्रों के अनुसार लगभग 60-65 प्रतिशत तक सरना आदिवासियों का मत भाजपा के पक्ष में जाता है।
यह भी कारण है कि ईसाई धर्म के मतों के लिए भाजपा बहुत चिंतित नहीं रहती है।

मुस्लिम धर्मावलंबियों को भाजपा सरकार की हज हाउस जैसी विशेष सुविधाएं और मतों का रूख

झारखंड में संपन्न पूर्व चुनावों में मुस्लिम मतदाता धर्म निरपेक्ष पार्टियों जैसे- कांग्रेस, जेएमएम, जेवीएम एवं वामपंथी दलों के पक्ष में एक मुश्त मतदान उम्मीदवार एवं क्षेत्र के आधार पर करते रहे हैं। वर्तमान में ऐसी स्थिति बनने की संभावना क्षीण नजर आ रही है।

चर्चा है कि लगभग 20-25 सीटों पर ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन अपने उम्मीदवार देगी। ऐसी स्थिति में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के मतों के विभाजन की संभावना नजर आती है।

कांग्रेस, जेएमएम सहित झारखंड की सभी धर्मनिरपेक्ष पार्टियां ओवैसी की पार्टी द्वारा झारखंड में चुनाव लड़ने की चर्चा से क्षुब्ध हैं और उनका मानना है कि ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवारों के मैदान में रहने से भाजपा को सीधा लाभ मिलेगा।
कई खेमों में चर्चा है कि ओवैसी की पार्टी को झारखंड में चुनाव लड़ाने का काम भाजपा ही कर रही है।

अल्पसंख्यकों में मुस्लिम समुदाय के कुछ वामपंथियों को भी भारी संख्या में मिलते हैं जिसका एक उदाहरण झारखंड की रामगढ़ विधानसभा सीट है। ऐसी अन्य सीटों पर भी वामपंथी दल और दूसरे छोटे दल मुस्लिम मतदाताओं में सेंध मारने में कामयाब होते हैं। इसका नुकसान कांग्रेस, जेएमएम और अन्य धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के सशक्त उम्मीदवारों को होता है जिनका सीधा मुकाबला भाजपा से होता है।

अभी भाजपा के प्रति भी कुछ अल्पसंख्यक मतों का झुकाव साफ नजर आता है। चूंकि भाजपा ने अपने पांच साल के कार्यकाल में इनको राजधानी रांची में एक आलीशान हज हाउस दिया है। साथ ही रिसलदार बाबा परिसर में विश्राम गृह का निर्माण भी किया है तथा कई शैक्षणिक संस्थानों को भी सुविधा प्रदान की है।

बहरहाल अल्पसंख्यक मतों का विभिन्न दलों के बीच में बंटना और एक मुश्त किसी दल को नहीं मिलना स्वभाविक रूप से भाजपा को ही लाभ पहुंचायेगा।

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