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झारखण्ड के वीर बुधु भगत अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते हुए 1932 में शहीद हुए

झारखण्ड के वीर बुधु भगत अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते हुए 1932 में शहीद हुए
October 01
08:06 2019

लरका  विद्रोह के नायक थे वीर बुधु भगत

संजय कृष्ण

सिलागाई अमर शहीद बुधु भगत का गांव हैं। गांव जाने के दो रास्ते हैं। एक चान्हो होते हुए। चान्हो से गांव की दूरी दस किमी हैए लेकिन रास्ता बहुत खराब है। यह गांव चान्हो प्रखंड में ही पड़ता है। एक दूसरा रास्ता बेड़ो से तुको और यहां से एक रास्ता सिलागाई की ओर जाता है। यह रास्ता ठीक है और 25 किमी दूरी तय कर इस गांव में पहुंच सकते हैं। तुको से सड़क सिलागाई जाती हैए वह कोलतार की है। थोड़ी संकरी भी।

वीर बुधु भगत कोई सामान्य योद्धा नहीं थे। इस सुदूर गांव से उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध तब छेड़ा थाए जब कहीं तथाकथित पहली स्वतंत्रता आंदोलन की 1857 की क्रांति बहुत दूर थी।

यानी 1831.1832 में। जब इस गांव में जाएंगे और भर रास्ते आस.पास का प्राकृतिक नजारा आपकी आंखों को सुकून बख्शता है तो आपके दिमाग में यह जरूर बात आएगी कि इतना दूरण्ण्ण्इस सुदूर गांव से 180 साल पहले क्रांति की एक ज्वाला उठी थीए जिसे इतिहास में लरका विद्रोह के नाम से दर्ज किया गया।

यह गांव आज भी गांव की तरह है। सड़कें जरूर बन गई हैं। स्कूल जो आठवीं तक थाए दसवीं तक हो गया है। स्कूल के पास ही एक पार्क बन गया और यहीं पर हर साल जयंती व पुण्यतिथि पर मेला लगता है। बुधु भगत की आठवीं पीढ़ी की हुलस देवी कहती हैं गांव में करीब सात हजार की आबादी है।

उरांव, मुस्लिम, महतो, ग्वाल आदि जातियां यहां रहती हैं। इसी परिवार की अंजू देवी पूर्व मुखिया रह चुकी हैं। कहती हैंए अब भी परिवार के लोग खेती.बारी पर ही निर्भर हैं। परिवार बड़ा हो गया है। घर आज भी मिट्टी के ही हैं। कल्याण विभाग ने जरूर आंगन में सोलर ऊर्जा का एक पोल लगा दिया हैए जिससे रात का अंधेरा छंटता है।

परिवार के वरिष्ठ सदस्य रामदेनी भगत कहते हैं कि हम आठवीं पीढ़ी के हैं और 18 परिवार हैं। इस गांव को शहीद गांव का दर्जा दिया गया हैए लेकिन सुविधा और विकास के नाम पर केवल घोषणाएं ही हुई हैं। गांव के बाहर उनके नाम पर पार्क हैए लेकिन उसकी हालत भी ठीक नहीं। पार्क के ऊपर एक जंगल है।

एक पाहन हमें उस जंगल में ले जाते हैं और कुछ छोटे.बड़े पत्थरों का एक टीला है और उसमें एक बड़ा साल होल हैए जिसमें पानी था। पाहन बताते हैं कि यहां हमेशा पानी रहता है।

बुधु भगत यहीं आकर बैठते थे। पाहन यह भी कहते हैं पहले यहां 24 घंटे पानी निकलता थाए लेकिन अब कभी.कभी। पानी कहां से आता हैए किसी को पता नहीं। गांव के लोग इसे वीर पानी कहते हैं। इस पहाड़ पर एक शेड बना है। औरए अक्सर इस ऊंचे जंगल में शेड के पास जुआ खेलते हुए कुछ नवयुवक मिल जाएंगे।

सिलागाई की खास बात यह है कि इसे शहीद गांव का दर्जा दिया गयाए बाकी सुविधा कुछ नहीं। यहां एक आंगनबाड़ी केंद्र हैए जिसे आदर्श बनाने की कोशिश की गई है।

इसकी दीवार पर एक सूचना है.मद.शहीद ग्राम विकास योजना अन्तर्गत 2017.18। योजना का नाम रू चान्हो प्रखंड के शिलागांई में आंगनबाड़ी केंद्र के समीप शौचालयए चारदीवारी स्टैचू एवं सुंदरीकरण कार्य। प्राक्कलित राशि.7ए19ए 420। शौचालय का दरवाजा टूट चुका है।

स्टैचू का बेस भी टूट चुका है। ले.देके एक चारदीवारी बची है। आंगनबाड़ी केंद्र के सामने ही चार जलमीनार बने हैंए जहां पानी ही नहीं आता।

वीर बुधु परिवार की सदस्य व पूर्व मुखिया अंजू देवी कहती हैं इसे शहीद गांव का दर्जा दिया गयाए लेकिन सुविधा कुछ नहीं। आंगनबाड़ी केंद्र भी केवल नाम का है। यहां सात लाख का काम हुआए लेकिन देखिए। लगता है कि इसमें सात लाख खर्च हुआ है। गांव की की कहानी आप सुन लिए। अब वीर बुधु भगत की कहानी भी जानिए।

वीर बुधु भगत का जन्म रांची जिले के सिलागाई गांव में 17 फरवरीए 1792 ईण् में हुआ था और 14 फरवरीए सन् 1832 ईण् में ये शहीद हो गए। यानी फरवरी में ही जन्म और फरवरी में ही शहीद।

डॉ महेश भगत एक दंतकथा बताते हैं कि जब अंग्रेजों से जब वीर बुधु युद्ध कर रहे थे तो उनका तीर उनके आंगन में गिरा व सिर घर में। धड़ भी गांव के बाहर एक टुंगरी पर। इसलिएए जहां सिर गिराए वहां पिंड बनाकर आज भी पूजा होती है।

वीर बुधु भगत 1831.1832 के श्लरका विद्रोह्य के नायक रहे। बुधु बचपन से ही जमींदारों और अंग्रेजी सेना की क्रूरता देख रहे थे। तैयार फसल जमींदार ले जाते और गांव के गरीब भूख रह जाते। बालक बुधु भगत कोयल नदी के किनारे बैठ इस क्रूरता के निजात के बारे में सोचते रहते। फिर तीर.तलवार चलाने में निपुणता प्राप्त की और फिर युद्ध छेड़ दिया।

अपने दल को गुरिल्ला युद्ध में दक्ष बनाया। इसके बाद अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंक दिया। अंततरू अंग्रेज सरकार ने बुधु भगत को पकडऩे के लिए कैप्टन इंपे को भेजा। 14 फरवरी 1832 ईण् को बुधु और उनके साथियों को कैप्टन इंपे ने घेर लिया। कैप्टन ने गोली चलाने का आदेश दे दिया।

अंतत: बुधु भगत अपने सैकड़ों साथियों के साथ शहीद हो गए। अब गांव में जयंती व शहीद दिवस पर मेला लगता है। नेता जाते हैंए घोषणा करते हैं। इसी तरह की एक घोषणा पिछले साल सीएम ने किया था कि उनके पैतृक घर के फर्श पर टाइल्स बिछवा देंगे।

घर वालों ने कहाए साहेबए भला मिट्टी के घर में टाइल्स कहां शोभा देगी। पहले घर तो पक्का का बनवा दीजिए। परिवार के सदस्य साल भर से इसका इंतजार कर रहे हैं। हांए विकास के नाम पर गांव की सड़क जरूर पक्की हो गई है

वीर बुधु भगत का पैतृक घरए आठवीं पीढी।

आंगनबाडी में लगी बुधु भगत की संगमरमर की प्रतिमा

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