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‘दया धर्म का मूल है’: बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

‘दया धर्म का मूल है’: बाबा हरदेव सिंह जी महाराज
February 13
08:35 2020

भक्त-महापुरुष एक सत्य का आधार लेकर जीवन की यात्रा तय करते हैं। प्रेम, विनम्रता, विशालता, सहनशीलता, सब्र, संतोष और मिठास आदि को अहमियत देते हैं। सत्संग में कहने वाले भी आनंद ले रहे थे क्योंकि दोनों ने एक ही आधार लिया है। दोनों का ही भाव एक जैसा है। वाकई यही पहलू जीवन में महत्ता रखते हैं। वरना हमारे जीवन को कोई अहमियत नहीं मिलती। उस आदमी को धरती के ऊपर बोझ, जिंदादरगौर कह दिया जाता है, जो इन दिव्य गुणों से युक्त न होकर जीवन जीता है।

प्रेम नहीं है ह्रदय में, जैसे अंग्रेजी में वो कहावत दास अक्सर कहता है- का If you cease to love, you cease to live. Loving is living. The true meaning of life is living. Life, wich full of love, compassion, for one and all. compassion अंग्रेजी में कहते हैं दया को। कहते हैं कि- दया धर्म का मूल है।

Compassion is the base of religion and if there is no compassion what short of religions are prevailing all over. (धर्म का आधार दया है। यदि दया ही नहीं तो कौन-सा धर्म?) ये ऐसे दिव्य गुण हैं, जिनको भक्त-पहापुरुष-संतजन अहमियत देते हैं। साथ ही लाखों-करोड़ों लोग ऐसे भी इस धरती पर बसते हैं जो इन पहलुओं को जीवन में कोई स्थान नहीं देते। न दया, न करुणा, न प्रेम, न स्रेह, न शिालता, न सहनशीलता, सरी दीवारें खड़ी की र्हुइं, आदमी के द्वारा परमात्मा की तरफ से नहीं।

परमात्मा ने यह जो सारी रखना की है वो Diversity (अनेकता) के रूप में की है अवश्य लेकिन इसका मतलब यह हरगिज नहीं कि परमात्मा चाहता है कि दीवारें खड़ी हों। मालिक अगर चाहता तो (एकरूपता) में रचना कर सकता था। अनेकता तो खूबसूरती के रूप में है। मालिक ने ऐसी-ऐसी रचनाएं की हैं जो काफी भिन्न हैं।

इंसानों का ही अगर वजूद ले लें तो एक की शक्ल दूसरे से नहीं मिलती है। कई बार Resemblence (समानता) हो जाती है। कहते हैं कि मिलती है शक्ल। सामने से मिल जाती है लेकिन पता चलता है कि- नहीं, नाक की बनावट में थेड़ा सा अंतर है। किसी की आवाज नहीं मिलेगी। एक इंसान के वजूद को ही देख लें। इसके साथों के निशान बिल्कुल अगल इसलिए कोई भी Crime (अपराध) होता है तो Investigation Agencies (जांच एजेंसियां) ढूंढ रही होती हैं कि उंगलियों के निशान मिलें। ताज्जुब होता है कि परमात्मा ने कितनी Diversity (विभिन्नता) रखी हुई है। शक्लो-सूरत, चाल, उंगलियों के निशान नहीं मिलते हैं।

यहां तक कि शरीर की गंध तक नहीं मिलती है। कोई भी Crime (अपराध) होता है तो कहते हैं कि Snifferred Dogs (खोजी कुत्ते) सूंघकर ही उस दिशा की तरफ बढ़ निकलते हैं जिस तरफ ब्तपउम (अपराध) करने वालो गया होता है, यह तो केवल इंसानों की बात हो रही है। चैरासी लाख योनियों में से मितनी ही जल में जन्म लेती हैं, जीती हैं और वहीं मर-खप जाती हैं। कितने ही प्रकार के जीव-जंतु मालिक की रख्ना में हैं। धरती भी एक जैसी नहीं बनाई। बनाने को हर जगह पहाड़ ही पहाड़ बना देता लेकिन कुछ पहाड़ बना डाले, कहीं समुद्र बना डाले, कहीं रेगिस्तानी इलाके बना डाले तो कितनी भिन्नताएं हैं। इस लिहाज से Diversity (विभिन्नता) बहुत अहमियत रखती है।

इसकी अपनी ही खूबसूरती है। लेकिन संकुचित, अंधकार में डूबे हुए मन अपनी करतूतों, सोचों, सुदगर्जियों, अज्ञानताओं के कारण इसको अभिशाप का रूप देते आये हैं। एक Race (सुशोभित) और X Blessings (आशीर्वाद) को Curse (अभिशाप) का रूप दे देते हैं। इसी Diversity (विभिन्नता) को हम देखते हैं तो कितने प्रकार के पहरावे हैं, भाषाएं हैं।

पिछले महीने जो यात्रा (16 जनवरी 2011) दिल्ली से आरंभ हुई, उसमें ग्वालियर, भोपाल, देवास और फिर महाराष्टकृ का धुलिया और मुंबई नगर गए जहां मराठी भाषा बोली जाती है। वहां से गये तो गोवा में कोंकणी भाषा। वहां से आगे गये तो कारवाड़ जो कर्नाटक में है और आगे मंगलौर वहां कन्नड़ भाषा। वहां से गये तो मदुरै, तंजावुर और चेन्नई जहां तमिल भाषा। वहां से गये भीमाराव, जो गोदावरी का इलाका है, जो आंध्र प्रदेश में पड़ता है। वहां तेलुगु भाषा में मताम सत्संग हुआ। आगे विशाखापत्तनम से होते हुए भुवनेश्वर (उड़ीसा) से होते हुए कोलकाता पहुंचना। पूरी एक महीने की यात्रा। 16 फरवरी को दिल्ली लौटना। पूरी यात्रा में मितने पहरावे, भिन्न-भिन्न भाषाएं।

हम संसार की तरफ देखते हैं तो वहां भी कहीं स्पैनिश, कहीं लैटिन, कहीं Dutch (डच), कहीं जर्मन। कितनी ही भाषाएं तमाम मुल्कों में हमें सुनने को मिलती हैं। हिंदुस्तान में भी कहते हैं कि 20 कोस के बाद भाषा बदल जाती है। कहने का भाव है कि भिन्नताएं तो अनेकों हैं लेकिन जरूरत है बीच में धागे की, जो भिन्न-भिन्न फूलों को पिरों डाले। जो एकता की हम बात करते हैं, अनेकता में एकता (Unity in Diverstiy) ।

समरूपता अथव एकरूपता किसी प्रकार भी संभव नहीं है। धर्म और मजहब वाले जुल्मों-सितम करके यही रास्ता अख्तियार करते आये हैं कि Uniformity (एकरूपता) लानी है। जैसा पहरावा हम पहनते हैं ये भी पहनें नहीं तो मौत के घाट उतार देंगे। जिस तरफ रूख करके हम इबादत कर रहे हैं ये भी उसी तरफ रूख कर लें। जिस दिन को, जिस गुरु पीर-पैगम्बर को हम पावन, पूज्य मानते हैं ये भी उसी को मानें।

जो भोजन हम करते हैं बाकी भी वही करें। इंसान ऐसे एकरूपता लाने की कोशिशें करते आये हैं। वहीं बात कि एक खूबसूरती थी, अनेकता के रूप में। उसको अभिशाप बना डाला अभी संकीर्णता, अज्ञानता और सुदगर्जियों के कारण। नहीं समझे गुरु- पीर-पैगम्बरों के संदेशों को क्योंकि अज्ञानता और अपनी सुदगर्जियों हैं। अपनी ही Interpretations (व्याख्या) देकर इंसान और इंसान के मध्य दीवारें खड़ी कर दीं।

ताजमहल, जो विश्व भर में प्रेम का प्रतीक माना जाता है। वो शायर की बात भी दास ने दोहराई जिसके बारे में कहा गया-

इक शहनशा ने बनवाके हसीं ताजमहल,
सारी दुनिया को मुहब्बत की निशानी दी है।

लेकिन अन्य स्थान पर शायर ने इस तरफ से भी कह डाला कि-

इक शहनशा ने बनवाके हसीं ताजमहल,
हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मजाक।

सोचने की बात यह है कि शाहजहां को जब यह इमारत बनवाने का ध्यान आया तो क्या उसके मन में यह ध्यान था कि मैं इसे बनाकर गरीबों का मजाक उड़ाऊं? नहीं वह तो केवल प्रेम से ही प्रेरित हुआ। दूसरी तरफ । Approach ½ F Vision (दृष्टि) नकारात्मक थी इसलिए कहा गया है- जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। जिस रंग की ऐनक हम पहन लेते हैं वही रंग सर्वत्र देखते हैं।

मालिक ने तो धरती बनाई है। इतने Planets (ग्रह-उपग्रह) हैं, इतने Solar Sysrems (सौर ग्रह-उपग्रह) इतने Galaxies (आकाषगंगाएं) और धरती का ऐसा Unique (अनूठा) स्वरूप मालिक ने बनाया। कितने रंग, कितने सुंदर धरती को रूप दिया। उस लिहाज से देखें तो मालिक ने धरती को स्वर्ग बनाई है। इंसानों की अज्ञानताओं और संकीर्णताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी इसको नर्क बनाने में, इसलिए हम कह देते हें कि यह मोहल्ला नर्क बन गया है, इससे तो Shift (स्थानान्तरण) कर लें। इस मुल्क में पलायन कर लें। ऐसा कहना पड़ता है। मजबूर हो जाते हैं।

धरती को स्वर्ग मालिक की तरफ से तो बनाया गया लेकिन महापुरुषों गुरु-पीर-पैगम्बरों का महत्व क्या? उनका महत्व और काम यही है कि इंसान ऐसी दृष्टि को प्राप्त करे और देखे, जो भेद वाली दृष्टि नहीं है।

अभेदता के भाव से युक्त होकर वो इस संसार में विचरण करे तभी धरती स्वर्ग बन सकती है। इस धरती को जन्नत बनाने के लिए महापुरुषों की मति, महापुरुषों की शिक्षाएं अपनाने की जरूरत है। अगर वाकई इसको अपना लिया जाये, जैसे पिछले 30 वर्ष से ह पंक्ति दास होहरा रहा है कि हम महापुरुषों को तो मानते हैं पहापुरुषों की नहीं मानते। हम हजरत मोहम्मद साहब को मानते हैं उनकी शिक्षाओं को नहीं मानते। हम राम जी को मानते हैं राम जी की नहीं मानते।

हम श्री गुरु नानक देव जी को मानते हैं उनकी नहीं मानते। को और की में जमीन-आसमान की अंतर है। को मानना यानि कि श्रद्धा, आस्था, जन्मदिन, उनके जन्मस्थल, पूजा स्थल बना डाले। बंदगी-इबादत कर डाली। महापुरुषों को मानने में तो कोई कसर नहीं, लेकिन गिनने बैठ जायें कि महापुरुषों की शिक्षाएं कितनी मानते हैं तो बहुत मुश्किल जो जाता है।

वो चंद ही हैं, जो धरती के लिए वरदान हैं। गुरु-पीर-पैगम्बरों को मानने के साथ-साथ उनकी शिक्षाओं को भी मान रहे हैं। अगर हजरत मुहम्मद साहब या ईसा मसीह की तो मान रहे हैं तो अगर उन्होंने कहा कि Love thy neibour (अपने पड़ोसी से प्रेम करो) Love ist god (परमेश्वर प्रेम है) अगर यह कहा गया है कि- I did not know, how to worship till I knew how to love (मैं तक तब पूजा करना नहीं जानता जब तक कि प्रेम करना नहीं जानता)। ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय, किस पैगम्बर ने नफरत का पाठ पढ़ाया? किसी ने भी नहीं। अगर यह पाठ पढ़ लिया गया तो सोचें कि किसने पढ़ाया? वह सज्जन तो हो नहीं सकता जिसने मुझे नफरत का पाठ पढ़ाया। इतना सा भी अगर हम सोचने को तैयार नही तो हमारी अक्ल आखिर कहां चली गई है? इतना साभी हम सोचने को तैयार नहीं और भागते जा रहे हैं। लड़ते-मरते-मराते चले जा रहे हैं।

क्या यही है पैगम्बरों का पढ़ाया पाठ? वहां तो कहा गया है-

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय।

पोथियां पढ़-पढ़कर हमने सोच लिया कि हम पंडित हो गये, मौलवी हो गये, बंदगी-इबादत वाले हो गये, ऊंचे कुल वाले हो गये। कहते हैं कि ऊंचे कुल का जन्मया करनी ऊंच ना होय।

कबीर जी कहते हैं कि पोथियां पढ़-पढ़ के हार गये लेकिन पंडित न बन पाये। पंडित वो बन गया, जिसने ढाई अक्षर प्रेम के पढ़ लिया। उसने पोथियां नहीं पढ़ी। उसका स्वभाव बन गया है प्रेम करना। वह किसी से नफरत नहीं करता है। जिन्होंने पोथियां तो पढ़ डालीं लेकिन मन में जहर भरे हुए हैं-यह दूसरी मौम वाला, यह दूसरे मजहब वाला, दूसरी जाति वाला।

इनको पंडित कहें या उनको पंडित कहें, जिन्होंने एक भी धर्मग्रंथ नहीं पढ़ा लेकिन प्रेम करना जानते हें। यही तो समझने की बात है। इन परिभाषाओं के ऊपर अगर खरे नहीं उतरे तो वही कसौटी जो सोने को परख देती है। अगर सोना नहीं है तो वो भी कसौटी ने बता देना है अगर सोना है तो भी कसौटी ने बता देना।

जो परिभाषाएं हैं सभी इनके ऊपर पर खरे उतरें, यानि कि यह दर्शायें कि वाकई ये भक्त हैं। ये प्रेम करना जानते हैं, पगड़ी या टोपी का नाम लेकर लड़ते-झगड़ते नहीं हैं। ये करद करते हैं इस अनेकता की और मिल-जुलकर रहना जानते हैं। चाहते हैं कि सभी मिल-जुलकर रहें।

जिसको हम मानव एकता कहते हैं Universal Brotherhood कहते हैं। कुछ वर्ष पहले जब नया वर्ष आया तो मिशन की तरफ से जो Greeting Carda (बधाई कार्ड) छापे गये, उन पर एक Slogan (आदर्श वाक्य) लिखा गया- Peace, not pieces. (शांति, टुकड़े नहीं) यही नारा चलता आ रहा है और यही मकसद हर गुरु-तीर-पैगम्बर के रहे हैं। शांति तभी संभव है जब एक Common factor, universasl truth (अटल सत्य) परमात्मा का बोध हो जाता है। आज भी आपने अनेकों महापुरुषों के वचन सुने और यहां की मेयर साहिबा ने भी इन्हीें उसूलों के ऊपर आधारित, अपने भाव रखे। मिशन के संदेश को उन्होंने भली भांति जाना, समझा।

उसी का जिक्र किया, अटल सत्य जिसको हम कहते हें। एक धागे को अगर बच में नहीं लायेंगे तो फिर तो बिखराव ही है। फिर तो कभी भी हम उस अवस्था तक नहीं पहुंच पायेंगे, जिस अवस्था एक पहुंचने के कारण हमारा भी उद्धार हो जाये। संतों-महात्माओं की भावनाएं हमेषा से इसी के ऊपर आधारित रही हैं। इसी का प्रचार-प्रसार करने वाले हमरे सच्चे हितैषी होते हैं, जो एक तरफ हमें अग्रसर करते हैं।

महापुरुष कहते हैं कि ब्रह्मज्ञानियों का संग कर लें, ऐसी संगति कर लें ताकि हमारा उद्धार हो जाये। ऊंची समझ हमें हासिल हो जाये ।तब हमारा कल्याण हो जायेगा, लोक और परलोक दोनों ही संवर जायेंगे। वरना गर उनके हाथों हम लग गये जो प्यार का पाठ पढ़ाने की बजाय नफरत की भाषा हमें सिखा रहे हैं, उनसे क्या हमारे बचाव होंगे या यह धरती स्वर्ग बन जायेगी या मुल्क मजबूत हो जायेगा? यह हरगिज संभव नहीं है। शायर का वही शेअर कि-

अहले दानिश को इसी बात की हैरानी है।
शहर कागज का है, शोलों की निगेहबानी है।।

कागज का शहर हो और शोलों की निगेहबानीहो तो श्ले ही जला डालेंगे, कागज के शरीर को जो दानिशमंद होते हैं, सज्जन होते हैं, सूझवान होते हैं ऐसी दशा को देखकर पीड़ा होती है उनके मन में कि आखिर ये धर्म और मजहब वाले खुद शोले बने हुए हैं तो ये क्या गिनेहबानी करेंगे। चोर और कुत्ता मिल गये तो पहरा किसका होय?

यह बात समझने वाली है इसलिए कहा है कि धर्मग्रंथों को पढ़े तो आंखें खोलकर पढ़ें, दिमाग को खोलकर पढ़ें, आंखें मूूंदकर न चलते जायें। अवश्य मालिक ने हमें सोचने-समझने की ताकत दी है, जो अन्य योनियों को उतनी नहीं दी है जितनी कि इंसानों को दी है। फिर भी इंसान बार-बार कदम-कदम पर नादानी करता जा रहा है।

यह बहुत अजीब सी बात महसूस होती है। यही बहुत भारी पड़ जाती है, इंसान के लिए कि जो बात समझने वाली है, उसी को नहीं समझा इसलिए इंसान इस बात को समझें और वाकई उस मार्ग पर चल निकलें, जो मानवता का है, प्रेम का है। यह प्रेम कोई लैला-मजनूं या हीर-रांझा की बात नहीं। ताजमहल बनवाने के पीछे प्यार की बात नहीं। यह प्यार है- मानव का मानव के प्रति हर किसी के प्रति। यह प्यार हर ह्दय में घर कर जाये। रोम-रोम में रच जाये। कहते हैं-

प्रेम प्याला जो पिये सीस दक्षिणा दे,
लोभी सीस न दे सके नाम प्रेम का ले।

यह ऐसी धारा कि-

प्रेम -प्रेम हर कोई कहे, प्रेम न जाने कोय,
आठ पहर बहता रहे प्रेम कहाये सोय।

प्रेम की गंगा बहाते चलो, यह बचपन से हम सुनते आ रहे हैं कि प्रेम की गंगा बहानी है। अगर मालिक प्रभु को ही हम प्रेममय कह रहे हैं। परमात्मा अगर प्रेम का स्वरूप है तो उसकी अंश आत्मा क्यों न प्रेम का स्वरूप बने। यही तो गुरु-पीर-पैगम्बर की देन कि इंसानों के आगे से अज्ञानता का पर्दा हटाया। उसको अपने असली वजूद में लाकर खड़ा कर दिया, जो प्रभु की अंश के रूप में, केवल डिवाइन है, जैसे अंग्रेजी में वो पंक्ति दास अक्सर कहता है कि- are not human beings, having diving experience but rather we are diving beings having human experience यह नहीं कि हम एक इंसा हैं, जो कुछ Divine Experience  (दिव्य अनुभव) ले रहे हैं Rether we are basically divine beings (बल्कि मूलतः हम दिव्य हैं) क्योंकि यह Divinity (दिव्यता) परमात्मा का अंश है।

परमात्मा दिव्य है, तो इसका अंश हम भी Divine (दिव्य) हैं, लेकिन ऊपर यह अज्ञानता का पर्दा है जैसे दास वो मिसाल अक्सर देता है कि यह जो बाहर वैर-वास्ते हमें देखने को मिलते हैं, ये शैतानी चालें जो हमें देखने को मिलती हैं तो ये इस तरह से हैं, जैसे एक बल्ब हो, उसमें लाइट हो लेकिन उसी बल्ब के ऊपर हम काले रंग का कपड़ा लपेट दें। कपड़ा लपेट दिया तो बाहर अंधकार ही अंधकार। इसी उदाहरण को ले लें कि वाकई हम आत्मा के रूप में परमात्मा का अंश हैं जोे कि क्पअपदम (दिव्य) है। पूरा अंधकार अज्ञानता के आवरण के कारण है। हम दिव्य हैं लेकिन दिव्यता हमारे कर्मों से झलक नहीं रही है। इस आवरण को, परदे को हटाने की जरूरत है। मूल रूप में जो हमारा असली अस्तित्व है, उसको सामने लाने की जरूरत है।

जिन संतों-महात्माओं का हम जिक्र करते हैं, वो वहीं हैं जो अपने असली रूप में स्थित हो गये थे। वो चाहे करीबर जी, चाहे बुल्ले शाह जी, चाहे शबरी, चाहे हनुमान जी चाहे वो कोई भी थे। ये वो ही हैं, जिन्होंने महक ही महक चारों तरफ बिखेरी। आज तक वो महक कायक है। आज जीने वालों को भी यही बात समझनी है। तमाम हील-हुज्जतों को, दलीलों को एक तरफ करना है।

कल भी दास ने जिक्र किया कि तमाम पैगम्बरों के सामने हील-हुज्जत करने वाले रहे हैं। फरिश्ते तक भी यह भूल कर बैठे। जब खुदा ने इंसान का वजूद बनाया तो यह खाक का पुतला बनाया। फरिश्तों को कहा कि यह मैंने अपना स्वरूप बनाया, इसको सजदा करो। सब फरिश्तों ने हुकम बजाया लेकिन एक फरिश्ता ऐसा भी था जो यह कहने लगा कि इसको आपने खाक से बनाया और मुझे आतिश से बनाया, मैं क्या इसके सामने नतमस्तक होऊं? उसका नतीजा कि-

मारा गया इबलीस एक सजदा न करने से,
हजारों बरस सजदे में सर मारा तो क्या मारा।

हजारों वर्ष अगर फरिश्ता के आगे नतमस्तक होता रहा लेकिन खुदा ने जिसके आगे नतमस्तक होने को कहा, उसके आगे नतमस्तक न हुआ तो वो हजारों सदजे बेकार चले गये। कितने हुज्जत करने वाले, जैसे एक बच्चा कहे कि मेरी मूंछें हो जायें। बुजुर्ग कहने लगे कि अभी तू छोटा है, थोड़ी उम्र बढ़ने दे मूंछें हो जायेंगी।

नहीं, बताओ मुझे ढंग कि जल्दी मूंछें हो जायें… तो बुजुर्ग कहने लगे कि एक ही तरीका है जिससे जल्दी मूंछें हो जायेंगी। शहद ले ले और अपनी नाक के नीचे होंठ के ऊपर, जहां मूंछें होती हैं, वहां लगा ले। रात को लगा ले, सुबह उठेगा, मूंछें हो जायेंगी। बच्चे ने शहद लगा लिया। रात बीत गई, सुबह उठा। आइने के सामने देखा कि मूंछें आ गई। हैरान हो गया, काली-काली मूंछें कमाल हो गया। लेकिन नींद से पूरी तरह उठा तो कुछ हरकत नजर आई।

कहने लगा कि ये मूंछ के बाल हिल क्यों रहे हैं। वास्तव में वो बाल नहीं थे, वो काली चींटियां थीं, क्योंकि शहद की मिठास के कारण वो रात भर उसके उस होंठ के ऊपर आकर इकट्ठा हो गई थीं। जेसे हुज्जत करने वालों के साथ और क्या किया जा सकता है? ये दलीलें और हुज्जतें भी कारण बन जाती हैं कि इंसान पिछड़ जाता है। कोई पीछे न रह जाये इसका पार-उतारा हो जाये, यही यत्न महापुरुष-संतजन सदैव से करते आये हैं। सब उभर जायें उस अवस्था से, जो डुबोने का कारण बनती है। सब उस अवस्था में आ जायें जो पार उतरने वाली अवस्था है।

उत्तर प्रदेश का प्रांतीय संत समागम, जो कि यहां आगरा में हुआ है, जो कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का मिला-जुला स्वरूप है, जैसे कि अभी दो दिनों के बाद समस्तीपुर में जो समागम है वो बिहार और झारखंड का मिलाजुला रूप है। इसी मकसद से समागम का आयोजन आगरा नगर में हुआ है। इस समागम का सुंदर रूप बना जिसमें अनेकों प्रकार के सहयोग मिले, प्रशासन का भी जिक्र हुुआ। शहर के और भी अनेकों सज्जनों ने शुद्ध भावनाओं से युक्त होकर योगदान दिये। इसी प्रकार आप सब भी लाखों की संख्या में यहां उपस्थित हुए और इस स्थान को सुंदर रूप दिया, सुंदर रूप, केवल शामियाने और लाइटों की लड़ियों के कारण नहीं कहा जा रहा है। सुदर रूप भावनाओं के सुंदर होने के कारण, प्रेम के कारण श्रद्धा-भक्ति के कारण है। यही तो असली सुंदरता है।

इस सुंदरता को आगे और फैलाव देने के लिए यही प्रार्थना कि सबको दातार तौफीक दे, सबको शक्ति बख्शे ताकि यही सुंदरता धरती के हर कोने में स्थापित होती जाये ताकि हर प्रांत, हर शहर-कस्बे, हर मुल्क वाले चैन के साथ रहें। हर इंसान अपने जीवन का सबसे बड़ा मकसद पूरा करे-आत्मा का नाता परमात्मा से जोड़कर। अपने रूप् को असल में जानकर परलोक भी सुहेला कर लें लोक भी संवार लें।

दास और अधिक शब्दों का सहारा न लेता हुआ आपसे इजाजत चाहेगा। समागम के आयोजन में प्रबंधक महापुरुषों ने भी भरपूर मेहनत की और सेवादल के नौजवानों-अधिकारियों ने भी भरपूर मेहनत की। इस तरह हर तरफ से योगदान दिये गये। इस उपकार के लिए सब और भी योगदान देते चले जायें ताकि अंधकार मिटता जाये और रोशनी स्थापित होती चली जाये।

-बाबा हरदेव सिंह जी महाराज का यह प्रवचन 06 मार्च 2011 रविवार को आगरा में आयोजित दो दिवसीय वार्षिक संत-समागम के दूसरे दिन हुआ था।
प्रस्तुति: सविता चैधरी

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