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नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर के बहाने भाजपा से अपनी बात कैसे मनवा ली

नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर के बहाने भाजपा से अपनी बात कैसे मनवा ली
January 02
09:35 2020

इनसाइट ऑनलाइन न्यूज़ टीम

  • नीतीश की चाणक्य नीति से घबराई भाजपा ने बिहार में टेके घुटने
  • बिहार की राजनीति में भाजपा, जदयू गठबंधन में पेंच

इस साल देश में दो राज्यों में चुनाव होने हैं। पहला अगले महीने दिल्ली में और दूसरा साल के आख़िरी तीन महीने में किसी समय बिहार में। बिहार में गठबंधन का सवाल हैं नीतीश कुमार ने साफ़ कर दिया हैं कि वो भाजपा के साथ मिलकर लड़ेंगे। लेकिन अपनी पार्टी के एक नेता प्रशांत किशोर के माध्यम से उन्होंने ये भी संदेश दे दिया हैं कि वो भाजपा से अधिक सीटें चाहते हैं ।

लेकिन सवाल हैं कि नीतीश को ये बात प्रशांत किशोर के माध्यम से क्यो कहने की आवश्यकता पड़ी। नीतीश को मालूम था कि प्रशांत के मुँह से कोई बात निकलेगी तो भाजपा की तरफ़ से तीखा हमला होगा। जैसा हुआ भी और ये हमला उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी सहित सभी भजपा नेताओं ने किया, लेकिन प्रशांत किशोर पर हमला करने के चक्कर में सीटों की माँग जो उठायी उसको किसी ने ख़ारिज नहीं किया।


बिहार भाजपा ने एक तरफ़ से साफ़ कर दिया कि नीतीश की माँग को मानना उनके आलाकमान के ऊपर हैं और अगर वो मान जाये तो उन्हें क्या दिक्कत हो सकती हैं। लेकिन सबने दोहराया कि चुनाव नीतीश के नेतृत्व में ही लड़ेंगे।

लेकिन अधिक सीटों की माँग के पीछे नीतीश की आख़िर क्या मजबूरी है क्योंकि अभी तक तो लोग यही मानकर चल रहे थे कि जिस प्रकार से मात्र दो सांसद रहने के बावजूद भाजपा ने उनका सम्मान रखते हुए लोकसभा चुनाव के दौरान 70 सीटों पर समझौता किया था। इसके बदले में विधानसभा चुनाव में नीतीश ने जैसा लालू यादव की राजद के साथ पिछले विधानसभा चुनाव में 101-101 सीटों पर समझौता किया था वैसा ही कुछ होगा।

नीतीश के समर्थक कहते हैं कि अगर वो आज ज़्यादा सीटें माँग रहे हैं तो उसके पीछे का तर्क यही राजद और जदयू के साथ बराबरी बराबरी का समझौता है क्योंकि जब भी उन्होंने बराबरी का समझौता किया सहयोगियों के उम्मीदवारों को तो उनका आधारभूत वोट ट्रांसफर हो जाता था लेकिन सहयोगियों के वोट में उनके उम्मीदवारों के पक्ष में ट्रांसफर नहीं होता था और यह कटु अनुभव ऐसा है जिसके बाद नीतीश कुमार ने ठानी है कि वो अब अपने सहयोगियों से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ेंगे।

किसको मालूम है कि बिहार की राजनीति का जो एक कटु सत्य है कि ढाल कोई भी हो सकता है और उसी की बनेगी सरकार जिसका नेतृत्व उनका चेहरा और उनका दल करेगा क्योंकि पिछले 14 वर्षों के शासन के दौरान अपने कामों के बदौलत नीतीश कुमार ने जो एक नया वोट बैंक तैयार किया है वो सबसे कारगर और निर्णायक वोट बैंक है, जिसको कोई भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।

झारखण्ड में सहयोगी दलों से दूरी बनाने पर भाजपा की लुटिया डूबने से सबक लेकर बिहार में घबराई भाजपा सहयोगी दलों से किसी प्रकार के मतभेद से कर रही है परहेज।

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