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लॉकडाउन और शहर से गांव पलायन

लॉकडाउन और शहर से गांव पलायन
June 01
12:56 2020
जितेंद्र कुमार

भारत गांवों का देश है‌। अपना गांव साधन- संसाधनों से परिपूर्ण था और आज भी है। सामान्य गांव से लेकर सुदूर बीहड़ गांवों तक पर्याप्त जीवन उपयोगी और आजीविका के सारे तंत्र विद्यमान है। चाहे कृषि का क्षेत्र हो, पशुपालन हो, वन उत्पाद, जड़ी बूटियों के खजाने, फल-फूल उत्पादन के साथ-साथ लोहारगिरी ,बढ़ईगिरी जैसे कुटीर उद्योग व रोजगारपरक आधारित अपना गांव स्वावलंबी स्वाभिमानी है‌। हम सब जानते हैं कि कभी गांव के कच्चे संसाधनों से बनी वस्तुओं के उपभोक्ता भी गांव ही था । न गांव की वस्तुएं बाहर जाती थी न बाहर की वस्तुएं गांव आती थी। हां, गांव के कुछ विशेष वस्तुओं की मांग बाहर में भले होती थी जो आज भी जारी है।

कालांतर में ऐसा परिवर्तन हुआ कि गांव के संसाधनों को दबा दिया गया और झूठे प्रचार प्रसार से विदेशी कंपनियों की वस्तुओं का गांव में बोलबाला हो गया। बड़ी आसानी से और तुरंत बाहरी वस्तुओं का गांव उपभोक्ता बन गया। इस तरह से शहरों के निर्मित दैनिक उपयोगी वस्तुओं का गांव आदि हो गया और धीरे-धीरे गांव के निर्मित सामान फीके पड़ गए। गांव का कुटीर उद्योग,रोजगार बंद हुआ तो गांव के लोग शहर की ओर पलायन करने लगे ।

देखते-देखते शहर, मेट्रो सिटी बन गया और गांव वीरान- सा हो चला। जंगल की आग की तरह लोग गांव से शहरों की ओर निकल पड़े। कुछ तो उच्च शिक्षा के नाम पर , कुछ नौकरी- पेशा, व्यवसाय के लिए शहर जा बसे है। इसी तरह गांव के कौशलहीन लोग रोजी-रोटी के लिए शहर की झुग्गी- झोपड़ियां व फुटपाथ को रैन- बसेरा बना डाले‌‌। इस प्रकार के परिवर्तन को हम ऐसे कह सकते हैं कि उच्च वर्गों का शहर स्थानांतरण हो गया और गांव के मजदूर,श्रमिकों का शहर पलायन हो गया।

आज सबके लिए गांव मेहमान घर हो गया है। अब तो गांव आने के लिए लोग पर्व- त्यौहार, विवाह आदि अवसरों पर भी बड़ी मुश्किल से समय निकाल पाते हैं। खैर, परिवर्तन संसार का नियम है । समय गुजरता रहता है और लोग परिस्थितियों में ढल जाते हैं। आज भी गांव जीवित है और शहर भी चकाचौंध रोशनी में हुंकार भर रहा है।

धीरे-धीरे समय गुजरता है। कई विपदाएं, संकट की घड़ी, छोटी-छोटी बीमारियों से आदमी ग्रसित भी होता है और फिर उबरते रहता है। मगर जब असाध्य रोग महामारी का रूप ले लेता है तो व्यक्ति को अपनी जड़ों का स्मरण होने लगता है। किसी भी तरह लोग अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहते हैं । आज चारों तरफ कोरोना महामारी से हाहाकार मचा हुआ है। पूरे देश में लॉकडाउन हो गया । स्वाभाविक रूप से सबसे ज्यादा शहरों, महानगरों के लोग हताहत हैं‌। कल-कारखाने, व्यवसाय, दुकान, बाजार,यातायात सब बंद पड़े हैं।

जिसके कारण सारे काम- धंधे , रोजगार , आमदनी ठप हो गए हैं। ऐसी स्थिति में रोज कमाने-खाने वालों की समस्या भयावह हो गई है। हफ्ता-दस दिन नहीं बल्कि महीनों तक बैठकर पूरे परिवार के लिए दो समय का भोजन जुटाना असंभव हो गया। दूर-दूर तक कहीं से भी सहयोग की संभावनाएं अदृश्य थी।

आज परिवर्तन रुपी समय का घोड़ा फिर करवट बदला है। आज जब शहर स्वार्थी बन गया तो लोग शहर से गांव पलायन करने लगे। गांव तो अपनी जननी जन्मभूमि है । बच्चा तंगहाल में हो, फटेहाल की स्थिति में हो और मां की ओर जब दौड़ कर आता है तो हमेशा की तरह मां बाहें फैलाए तैयार होती है। इसी तरह से बच्चा मां की आंचल में आते ही दुनिया के सारे सुख- आनंद पा लेता है। आज ऐसे ही गांव भी दामन फैलाकर खड़ा है। लाखों लोग शहर से गांव की ओर निकल पड़े हैं। सबको विश्वास है कि गांव मां की तरह है। वह भूखे मरने नहीं देगी, उसे भागने के लिए मजबूर नहीं करेगी।

मेरा गांव- मेरा देश के स्वप्न को मिलकर साकार करने का एक अवसर आया है। फिर से गांव के संसाधनों को अपनी मेहनत से जीवंत करना है। शहरों को संवारने में दिन-रात एक करने वाले श्रमिक बंधुओं का जत्था गांव पहुंच चुका है । अब गांव को संवार कर रहेंगे । कृषि- बागवानी को लेकर फिर से हरित क्रांति लाएंगे। पशुपालन कर स्वेत क्रांति लाएंगे । फिर से लोहार की भांती और हथौड़े चलेंगे । सागवान और महुआ की लकड़ियों से नक्काशीदार चौखट- दरवाजे बनेंगे। गांव-गांव में जड़ी बूटियों, आयुर्वेद वाले वैद्य तैयार होंगे। वन उत्पाद को शहरों का बाजार उपलब्ध कराएंगे । शहरों से वापस लौटे कौशलपूर्ण श्रमिक- शिल्पकार एक बात ठान कर चलें हैं कि गांव-गांव को विकसित करेंगे । इस हृदयविदारक पलायन को एक बड़ा अवसर के रूप में सब देख रहे हैं।

गांधी जी का सपना पूर्ण करने के लिए गांववासी कमर कस लिए है । चाहे भिन्न-भिन्न प्रकार के हस्तकला, घरेलू कुटीर उद्योग हो अथवा विभिन्न हथकरघा , खादी ग्रामोद्योग हो, अब गांव निर्मित वस्तुओं को विश्वव्यापी बनाना है । फिर से गांव आत्मनिर्भर बनेगा । आज देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के शब्द लोकल को वोकल बनाने का संकल्प को पूर्ण करना है। इसके लिए गांव पलायन कर चुके श्रमिक तैयार है।

लेखक, प्रांत संगठन मंत्री, सेवा भारती, झारखंड
संपर्क नं. 7488337963

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