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वट वृक्ष प्रकृति से ताल-मेल बिठाने में निभाते है महत्वपूर्ण भूमिका

वट वृक्ष प्रकृति से ताल-मेल बिठाने में निभाते है महत्वपूर्ण भूमिका
May 21
21:31 2020

बस्ती 21 मई (वार्ता) भारतीय समाज वट वृक्ष का आदर करता है। इसके पीछे भले ही धार्मिक मान्यताएं हों, लेकिन उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण का ही जान पड़ता है। पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्राचीन काल से ही पूर्वज जागरूक और सक्रिय रहे है यही कारण है कि वृक्षों को धार्मिक आस्था से जोड़ कर त्यौहार और व्रत रहने की परम्परा है। पूर्वजो द्वारा वृक्षों के पूजा के साथ ही साथ उनका संरक्षण प्राथमिकता से किया जाता था। देश में वट सावित्री व्रत अखण्ड सौभाग्य के लिए महिलाओं द्वारा मनाया जाता है।

इस साल वट सवित्रि व्रत शुक्रवार 22 मई के दिन है। भारतीय जनमानस में व्रत और त्योहार की विशेष महत्ता है। देशभर में धार्मिक और वैज्ञानिक कारणों से व्रत और त्योहार मनाये जाते है। प्राचीनकाल से भारत वर्ष में प्रत्येक माह कोई न कोई व्रत त्योहार मनाया जाता है। उसी में से एक वट सावित्री व्रत अखण्ड सौभाग्य तथा पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा के लिए मनाया जाता है। वट सावित्री व्रत धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से अमावस्या तक उत्तर भारत में और ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में इन्हीं तिथियों में वट सावित्री व्रत दक्षिण भारत में मनाया जाता है।

जेठ की अमावस्या पर बरगद की पूजा होती आ रही है। वट वृक्ष के नीचे ही सावित्री को अपना सुहाग वापस मिला था। इस पूजा का महत्व जीवन चक्र से जुड़ चुका है। यदि धरती को बचाना है तो बरगद व पीपल के अधिक से अधिक वृक्ष लगाने होंगे। कहावत है कि पीपल में ब्रह्म देव व बरगद में भगवान भैरों का निवास रहता है। इसलिए देवताओं का वास मानकर वृक्षों की पूजा की जाती है। धर्मग्रंथों में भी उल्लेख मिलता है कि पीपल के पत्तों में देवी देवता वास करते हैं। इसे ऋषि, मुनियों की दूरदृष्टि ही कहेंगे कि उन्हें आने वाले समय की परेशानियां पता थीं। शायद इसी के चलते उन्होंने इन वृक्षों को धार्मिक महत्व से जोड़ दिया, ताकि ये संरक्षित रहें।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी पीपल व बरगद के वृक्ष अन्य की अपेक्षा सर्वाधिक ऑक्सीजन देते हैं। बारिश में दोनों ही वृक्ष अपनी जड़ों से वर्षा का जल भी सर्वाधिक संरक्षित करते हैं। न चेते तो बन जाएगा रेगिस्तान

वट वृक्ष प्रकृति से ताल-मेल बिठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। मौजूदा समय में पर्यावरण को लेकर पूरा देश चिंतित है। वास्तव में देखा जाए तो पिछले 60 से भी ज्यादा सालों में देश की आजादी के बाद पेड़ तो लगे किन्तु वे पेड़ नहीं लगे जो वास्तव में पर्यावरण के लिए आवश्यक हैं। वनों के कटाव में बढ़ती जनसंख्या का भी महत्वपूर्ण योगदान है। इससे पर्यावरण प्रदूषण, प्राकृतिक और जैविक असंतुलन बढ़ा है, जिससे पृथ्वी पर प्राणी-मात्र के अस्तित्व का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। भारत में वृक्षो को धार्मिक आस्था से जोड़ कर त्यौहार और व्रत रहने की परम्परा है। यह व्रत भी इसी मान्यता के तहत मनाया जाता है।

वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष जिसका अर्थ है बरगद का पेड़, का खास महत्व होता है। इस पेड़ में लटकी हुई शाखाओं को सावित्री देवी का रूप माना जाता है। वहीं पुराणों के अनुसार बरगद के पेड़ में त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास भी माना जाता है। इसलिए कहते हैं कि इस पेड़ की पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस वृक्ष को देव वृक्ष माना जाता है वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा जी का, तने में भगवान विष्णु का तथा डालियों एवं पत्तियों में भगवान शिव का निवास कहा जाता है। इसके साथ ही अक्षय वट वृक्ष के पत्ते पर ही भगवान श्रीकृष्ण ने मार्कंडेय ऋषि को दर्शन दिए थे यह अक्षय वट वृक्ष प्रयाग में गंगा तट पर वेणीमाधव के निकट स्थित है।

सौभाग्यवती महिलाएं अपने अखण्ड सौभाग्य के लिए आस्था और विश्वास के साथ व्रत रहकर पूजा अर्चना करती है। वट वृक्ष प्राणवायु आक्सीजन प्रदान करने के प्रमुख और महत्वपूर्ण स्रोत है। वट वृक्ष को पृथ्वी का संरक्षक भी कहा जाता है।वट वृक्ष की औसत उम्र 150 से भी अधिक होती है वट वृक्ष पंक्षियो और जन्तुओ को आश्रय प्रदान करता है धार्मिक आस्था के अनुसार वट वृक्ष के जड़ मे व्रहम्मा,तने मे विष्णु और पत्तो पर शिव का वास होता है।

पर्यावरण संरक्षण के वृक्ष सबसे उपयुक्त सहायक है वृक्ष मृदा-निर्माण,संरक्षण,जैविक उर्वरा-वृद्वि,जीवधारियो के लिए वायुमण्डल मे सही वायु मिश्रण वृद्वि के साथ ही उसे स्वच्छता प्रदान करते रहने एंव भूजल भण्डारण की वृद्व मे सहायक होने की भूमिका का निर्वाह करते है।वट वृक्ष की तो विशेष महत्ता है।

वट वृक्ष द्वारा दिन-रात प्राण वायु आक्सीजन प्रदान किया करते है वट वृक्ष प्रकृति से ताल-मेल बिठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग में भगवान श्रीराम एवं द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पेड़ों की पूजा करने के उदाहरण मिलते है। वनस्पति विज्ञान की रिपोर्ट के अनुसार यदि बरगद के वृक्ष न हों तो ग्रीष्म ऋतु में जीवन में काफी कठिनाई होगी।

श्रीमद् भागवत के दशम स्कन्ध के 18वें अध्याय के अनुसार कंस का दूत प्रबला सुर गोकुल को भष्म करने के लिए इसी ज्येष्ठ मास में भेष बदल कर आया था। श्रीकृष्ण ग्वालबालों के संग खेल रहे थे। श्री कृष्ण उसे पहचान लेते है और वे अपने साथियों के साथ जिस पेड़ की मदद लेते है वह बरगद का पेड़ था जिसका नाम भानडीह था। श्रीकृष्ण की रक्षा इसी बरगद की पेड़ ने किया था। वनस्पति विज्ञान की एक रिसर्च के अनुसार सूर्य की उष्मा का 27 प्रतिशत हिस्सा बरगद का वृक्ष अवशेषित कर उसमें अपनी नमी मिलाकर उसे पुनः आकाश में लौटा देता है। जिससे बादल बनता है और वर्षा होती है।

त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने बनवास के दौरान भारद्वाज ऋषि के आश्रम में गये थे, उनकी विश्राम की व्यवस्था वट वृक्ष के नीचे किया गया था। दूसरे दिन प्रातः भारद्वाज ऋषि ने भगवान श्रीराम को यमुना की पूजा के साथ ही साथ बरगद की पूजा करके आशीर्वाद लेने का उपदेश दिया था। बाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड के 5वें सर्ग में सीता जी ने भी श्याम वट की प्रार्थना करके जंगल के प्रतिकूल आधातों से रक्षा की याचना किया था। आयुर्वेद के अनुसार वट वृक्ष का औषधीय महत्व है।

इस वर्ष सावित्री व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या तदनुसार 22 मई को वट साबित्री व्रत महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए रखेगी। इस व्रत में ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिन का उपवास रखा जाता है कुछ स्थानों पर मात्र एक दिन अमावस्या को ही उपवास होता है। इस दिन सूर्योदय प्रातः 5.19 बजे और अमावस्या रात्रि 1.30 बजे तक है। यह व्रत साबित्री द्वारा अपने पति को पुनः जीवित करने की स्मृति के रूप रखा जाता है।

मान्यताओं के अनुसार अक्षय वट वृक्ष के पत्ते पर ही भगवान श्रीकृष्ण ने प्रलयकाल में मारकण्डेय ऋषि को दर्शन दिया था। यह अक्षय वट वृक्ष प्रयाग में गंगा तट पर वेणीमाधव के निकट स्थित है। वट वृक्ष की पूजा दीर्घायु अखंड सौभाग्य, अक्षय उन्नति आदि के लिए किया जाता है। धर्मशास्त्र के अनुसार त्रयोदशी के दिन त्रिदिवसीय व्रत का संकल्प लेकर सौभाग्यवती महिलाओं को यह व्रत आरंभ करना चाहिए। यदि तीन दिन व्रत करने का सामथ्र्य ना हो तो त्रयोदशी के दिन एक भुक्त व्रत, चर्तुदशी को अयाचित व्रत और अमावस्या को उपवास करना चाहिए।ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन उपवास के साथ ही वट सावित्री की व्रत कथा सुनने से सौभाग्यवती स्त्रियों का सौभाग्य अखंड होता है तथा उनकी मनोकामना पूर्ण होती है।

(वार्ता)

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Bhusan kumar

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