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डा. राम मनोहर लोहिया, प्रखर राष्ट्रवादी नेता विश्व नागरिकता के पक्षधर थे

डा. राम मनोहर लोहिया, प्रखर राष्ट्रवादी नेता विश्व नागरिकता के पक्षधर थे
October 12
09:26 2019
  • स्वतंत्रता के बाद गैरकांग्रेसवाद के जनक रहे हैं लोहिया

इनसाइट ऑनलाइन न्यूज़ डेस्क

हद -हद करते सब गया,

बेहद गया ना कोय

बेहद के मैदान मे,

रहा कबीरा सोय।।

राम मनोहर लोहिया! ना घर ,ना ठिकाना, ना रिश्तेदार, ना परिवार, ना बैक खाता ,ना दुनिया मंे कही एक ईच जमीन , ऐसा एक शख्स 23 मार्च 1910 को पैदा हुये और कालरात्रि के दिन 12 अक्टूबर 1967 को अपने पीछे लाखो गरीब,पिछडे ,दलित कार्यकर्ताओं को रोते -बिलखते छोड दुनिया को अलविदा कर गये।

सारी दुनिया मे घूमकर विश्व-सरकार की स्थापना,नर -नारी समानता,मनुष्यो के बीच जाति -पाँति ,रंग के आधार पर पैदा की गयी विषमता को समाप्त कर नये समाज निर्माण का अप्रतिम योद्धा, भारत -पाक महासंघ बनाकर 1947 मे बँटवारे के दंश को समाप्त करने,गोवा -मुक्ति, नेपाल की राणाशाही को समाप्त कर लोकशाही की स्थापना, उतर-पूरव फ्रान्टियर एजेंसी को समाप्त कर एक राज्य उर्वशियम बाद मे भारत सरकार ने उसे अरूणाचल कर दिया) का सृजन ,गैर-कांग्रेसवाद को लाकर सता के एकाधिकार वाद एवं वंशानुगत राज की समाप्ति करने वाला महान शख्स लोहिया ही तो थे।

देश की राजनीति में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और स्वतंत्रता के बाद ऐसे कई नेता हुए जिन्होंने अपने दम पर शासन का रुख बदल दिया जिनमें से एक राममनोहर लोहिया भी थे।

स्वतंत्र भारत की राजनीति और चिंतन धारा पर जिन गिने-चुने लोगों के व्यक्तित्व का गहरा असर हुआ है, उनमें डॉ. राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण प्रमुख रहे हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के आखिरी दौर में दोनों की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण रही है।

अगर जयप्रकाश नारायण ने देश की राजनीति को स्वतंत्रता के बाद बदला तो वहीं राम मनोहर लोहिया ने देश की राजनीति में भावी बदलाव की बयार आजादी से पहले ही ला दी थी। अपनी प्रखर देशभक्ति और तेजस्वी समाजवादी विचारों के कारण वह अपने समर्थकों के साथ ही अपने विरोधियों के मध्य भी अपार सम्मान हासिल किया।

राम मनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को फैजाबाद में हुआ था। उनके पिताजी हीरालाल पेशे से अध्यापक व हृदय से सच्चे राष्ट्रभक्त थे। उनके पिताजी गांधीजी के अनुयायी थे। जब वे गांधीजी से मिलने जाते तो राम मनोहर को भी अपने साथ ले जाया करते थे।

इसके कारण गांधीजी के विराट व्यक्तित्व का उन पर गहरा असर हुआ। पिताजी के साथ 1918 में अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार शामिल हुए। बनारस से इंटरमीडिएट और कोलकता से स्नातक तक की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए लंदन के स्थान पर बर्लिन का चुनाव किया था।

वहीं जाकर उन्होंने मात्र तीन माह में जर्मन भाषा पर अपनी मजबूत पकड़ बनाकर अपने प्रोफेसर जोम्बार्ट को चकित कर दिया। उन्होंने अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि केवल दो वर्षों में ही प्राप्त कर ली। जर्मनी में चार साल व्यतीत करके, डॉ. लोहिया स्वदेश लौटे और किसी सुविधापूर्ण जीवन के स्थान पर जंग-ए-आजादी के लिए अपनी जिंदगी समर्पित कर दी।

1933 में मद्रास पहुंचने पर लोहिया गांधीजी के साथ मिलकर देश को आजाद कराने की लड़ाई में शामिल हो गए। इसमें उन्होंने विधिवत रूप से समाजवादी आंदोलन की भावी रूपरेखा पेश की। सन् 1935 में उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे पंडित नेहरू ने लोहिया को कांग्रेस का महासचिव नियुक्त किया।

बाद में अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने भारत छोडो़ आंदोलन का ऐलान किया जिसमें उन्होंने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और संघर्ष के नए शिखरों को छूआ। जयप्रकाश नारायण और डॉ. लोहिया हजारीबाग जेल से फरार हुए और भूमिगत रहकर आंदोलन का शानदार नेतृत्व किया। लेकिन अंत में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और फिर 1946 में उनकी रिहाई हुई।

डॉ. लोहिया मानव की स्थापना के पक्षधर समाजवादी थे। वह समाजवादी भी इस अर्थ में थे कि, समाज ही उनका कार्यक्षेत्र था और वह अपने कार्यक्षेत्र को जनमंगल की अनुभूतियों से महकाना चाहते थे। वह चाहते थे कि व्यक्ति-व्यक्ति के बीच कोई भेद, कोई दुराव और कोई दीवार न रहे। सब जन समान हो, सब जन का मंगल हो।

उन्होंने सदा ही विश्व-नागरिकता का सपना देखा था। वह मानव-मात्र को किसी देश का नहीं बल्कि विश्व का नागरिक मानते थे। जनता को वह जनतंत्र का निर्णायक मानते थे। डॉ. लोहिया अक्सर यह कहा करते थे कि उन पर केवल ढाई आदमियों का प्रभाव रहा, एक मार्क्स का, दूसरे गांधी का और आधा जवाहरलाल नेहरू का।

1946-47 के वर्ष लोहिया की जिंदगी के अत्यंत निर्णायक वर्ष रहे। आजादी के समय उनके और पंडित जवाहर लाल नेहरु में कई मतभेद पैदा हो गए थे, जिसकी वजह से दोनों के रास्ते अलग हो गए। बाद के दिनों में 12 अक्टूबर 1967 को लोहिया का 57 वर्ष की आयु में देहांत हो गया।

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