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श्रीमद् भगवद् गीता में तत्व ज्ञान (ब्रह्म ज्ञान)

श्रीमद् भगवद् गीता में तत्व ज्ञान (ब्रह्म ज्ञान)
March 16
08:07 2020
तूँ ही निरंकार

भगवद्गीता के तत्वज्ञान पर आधारित जो श्लोक है, उसके भाव को प्रस्तुत करने का एकमात्र उद्देश्य जिज्ञासुओं को इसका मार्ग दर्शन कराना है। जिस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए मनुष्य जन्म मिला है, इन श्लोकों में श्री कृष्ण जी के सर्वोच्च ज्ञान की गहराई को समझने का संदेश है।

अध्याय-3 : श्लोक 17, 18 एवं 31

श्लोक 17: यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्य न विद्यते।।
अन्वयः- यः तु आत्म-रतिः एव स्यात् आत्म-तृप्तः च मानवः।
आत्मनि एव च सन्तुष्टः तस्य कार्यम् न विद्यते।।

अर्थः- जो मनुष्य आत्मिक आनन्द मे ही रहता है, स्वयं प्रकाशित तथा केवल अपने में संतुष्ट रहता है। उसको कर्म बंधन नहीं बांधते हैं।

भावार्थः- जो मनुष्य इस परम पिता परमात्मा से योग कर लेते हैं, जुड़ जाते हैं। जिनके पास यह प्रकाश, यह रोशनी है, जिससे उसकी आत्मा प्रकाशित है, परमात्मा का साक्षात्कार हो चुका है, वे हर क्षण आत्मिक आनन्द का अनुभव करते हें। वह फिर पूर्णतया संतुष्ट रहते हैं कि जिस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मानव जन्म मिला है, वह लक्ष्य पूरा हो गया। फिर वे हर परिस्थिति में संतुष्ट और आनन्दित रहते हैं।

उनके हृदय में कर्मों के फल का कोई बंधन नहीं रह जाता। उनके वे कर्म बिना किसी कामना के निष्काम कर्म होते है। अपने कर्मों के बंधन से वे मुक्त होते हैं।

श्लोक 18: नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यापाश्रयः।।

अन्वयः- न एव तस्य कृतेन अर्थः न अकृतेन इह कश्चन।
न च अस्य सर्वभूतेषु कश्चित् अर्थ व्यापाश्रयः।।

अर्थः- उसका इस संसार में निश्चय ही न तो कार्य करने से और न हीं कार्य न करने से कोई प्रयोजन होता है और न उसको समस्त जीवों में आश्रित होने की आवश्यकता होती है।

भावार्थः-जो प्रभु परमात्मा से साक्षात्कार कर लेता है, उसे किसी और के आश्रय की आवश्यकता नहीं होती। प्रभु परमात्मा हर पल उसके साथ है, यह एहसास उसे सदा रहता है। उसके कर्म करने और कर्म न करने की कोई महत्ता नहीं रह जाती। ऐसा तत्ववेता ज्ञानी कर्म करने का प्रयास करता है। अगर कर्म हो गया तो भी वह संतुष्ट है और अगर कर्म नहीं हो सका, तो भी उसे कोई अंतर नहीं पड़ता। वह ऐसी अवस्था तक पहुंच जाता है।

जैसे श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को ज्ञान देने से पहले, विराट स्वरूप दिखाने से पहले, कहा कि अगर तुम जीत गए तो राज्य का सुख भोगेगे, और अगर न जीत पाए तो वीरगति को प्राप्त हो जाओगे और सम्मान पाओगे। परन्तु युद्ध न करके न तुम्हें राज्य मिलेगा और न ही सम्मान। तुम तिरस्कार के पात्र बनोगे।

इसलिए कर्म का फल जो भी हो ज्ञानी पुरूष केवल कर्म करने की ओर अग्रसर रहते हैं।

श्लोक 31ः- ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः।।

अन्वयः- ये मे मतम् इदम् नित्यम् अनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धा-वन्तः अनसूयन्तः मुच्यन्ते ते अपि कर्मभिः।।

अर्थः- जो प्राणी मेरे आदेशों का बिना ईष्या के श्रद्धा और भक्ति से नित्य पालन करते हैं, वे भी कर्म बंधन से मुक्त हो जाते हैं।

भावार्थः- यहाॅं श्री कृष्ण जी बता रहे हैं कि प्राणी जो भी कर्म करता है, वह उससे लिप्त रहता है। मैंने ये अच्छे कर्म किए अब आगे और अच्छे कर्म करूंगा। ये मुझसे बुरे कर्म हो गए, उन्हें नेक कर्म करके सुधार करूं। वह अच्छे और बुरे कर्म के बंधन से मुक्त नहीं हो पाता और परमात्मा की प्राप्ति की तरफ उसका कोई प्रयास नहीं होता।

इस श्लोक में श्री कृष्ण जी बता रहे हैं कि जो भक्ति के साथ मेरे आदेशों के अनुसार सदैव कर्म करते हैं। अपनी मन और बुद्धि से नहीं, जैसा मैंने कहा है वैसा कर्म करते हैं। वे कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। उनके वे कर्म निर्लेप हो जाते हैं।

जारी.अगला भाग 7 दिनों बाद

कृपा पात्र
चम्पा भाटिया
राॅंची।
9334424508

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