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श्री करतारपुर साहिब: जहां बहता है आस्था का समंदर

श्री करतारपुर साहिब: जहां बहता है आस्था का समंदर
November 05
08:54 2019

कुसुम चोपड़ा झा

पाकिस्तान के नारोवाल में स्थित श्री करतारपुर साहिब गुरुद्वारा जिसे अगर सिखों का मक्का कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। हर सिख श्रद्धालु अपने जीवन में कम से कम एक बार यहां जरूर जाना चाहता है।

श्री करतारपुर साहिब का नाम आते ही याद आती है पहली पातशाही श्री गुरू नानक देव जी की। भारतीय सीमा से महज 3 किलोमीटर दूर स्थित इस ऐतिहासिक स्थान का सिखों के साथ वही रिश्ता है, जैसे शरीर के साथ आत्मा का। गुरुजी ने अपने जीवन के अंतिम 17 साल इसी धरती पर बिताए और लोगों को एक होने का संदेश दिया।

करतारपुर साहिब में ही गुरू साहिब ने सिख धर्म की स्थापना की। उन्होंने रावी नदी के किनारे सिखों के लिए ये नगर बसाया और ‘नाम जपो, किरत करो और वंड छको’ (मेहनत करो, परमात्मा का नाम लो और बांटकर खाओ) का उपदेश दिया। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद से सिख श्रद्धालुओं को श्री करतारपुर साहिब जाने के लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया और पाकिस्तान की ओर से लगाई गई ढेरों पाबंदियों का सामना करना पड़ता था।

लेकिन अब जब पाकिस्तान ने इस कॉरिडोर को खोलने का फैसला लिया तो बिना पासपोर्ट-वीजा के दर्शन उपलब्ध होने से श्रद्धालुओं का उत्साह तो बस देखते ही बनता है। इससे पहले भारत के लोग डेरा बाबा नानक से दूरबीन के जरिये गुरुद्वारा साहिब के दर्शन करते थे।

अपनी चार उदासियों के बाद गुरु नानक देव जी 1522 में करतारपुर साहिब में बस गए थे। उनके माता-पिता का देहांत भी इसी स्थान पर हुआ था। करतारपुर साहिब में उन्होंने अपने जीवन के आखिरी 17 साल बिताए और यहीं पर 22 सितम्बर 1539 ईस्वी को वे ज्योति ज्योत में समा गए। करतारपुर साहिब गुरुद्वारा के अंदर एक कुआं है। माना जाता है कि यह कुआं श्री गुरु नानक देव जी के समय से ही है। जिसे लेकर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है।

कहा जाता है कि सबसे पहले लंगर की शुरुआत भी यहीं से ही हुई थी। नानक देव जी के यहां जो भी आता था, वे उसे बिना भोजन किए जाने नहीं देते थे। बताया जाता है कि करतारपुर के आसपास के गांवों के मुसलमान भाई गुरुद्वारे के लंगर के लिए दान देते हैं। कहते हैं कि जब गुरू साहिब यहां ज्योति ज्योत में समा गए थे तो उनका पार्थिव शरीर लुप्त हो गया था।

गुरु साहिब की देह किसी को नहीं मिली। उसके स्थान पर एक चादर मिली। गुरु जी के शिष्यों में हिंदू और मुसलमान दोनों थे। इसलिए आधी चादर मुसलमानों ने ले ली और आधी हिंन्दुओं ने। हिन्दुओं ने हिंदू रीति-रिवाज के मुताबिक चादर का अंतिम संस्कार किया और मुसलमानों ने चादर को दफनाकर गुरू साहिब को अंतिम विदाई दी। इसीलिए गुरुद्वारा साहिब में समाधि और कब्र दोनों अब भी मौजूद हैं। समाधि गुरुद्वारे के अंदर है और कब्र बाहर है।

एक नजर गुरु नानक देव जी के जीवन पर भी

श्री गुरू नानक देव जी को श्रद्धापूर्वक नानक, नानक देव जी, बाबा नानक और नानकशाह के नामों से भी जाना जाता है। गुरु नानक देव जी ऐसे व्यक्तित्व के स्वामी थे, जो खुद में एक बहुत बड़े दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्म सुधारक, समाज सुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु थे।

इनका जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी नामक गांव, जिसका नाम आगे चलकर ननकाना पड़ गया में कार्तिक पूर्णिमा को एक खत्री परिवार में हुआ। कुछ विद्वान उनकी जन्मतिथि 15 अप्रैल, 1469 मानते हैं, परंतु उनका जन्म दिवस हर साल कार्तिक पूर्णिमा वाले दिन ही मनाया जाता है। जो अक्टूबर-नवम्बर में दीपावली के करीब 15 दिन बाद पड़ता है।

उनके पिता का नाम मेहता कालू और माता का नाम तृप्ता देवी था। उनकी एक बहन बेबे नानकी थीं। गुरू साहिब बचपन से ही प्रखर बुद्धि के स्वामी थे। लड़कपन से ही वे सांसारिक मोहमाया के प्रति काफी उदासीन रहा करते थे। पढ़ने-लिखने में उनकी दिलचस्पी नहीं थी। इसलिए जल्दी ही विद्यालय से नाता टूट गया। उसके बाद तो उनका सारा समय आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत होने लगा। उनके बाल्यकाल में कई चमत्कारिक घटनाएं घटीं जिन्हें देखकर लोग उन्हें दिव्य शख्सियत मानने लगे।
सोलह वर्ष की आयु में बाबाजी का विवाह पंजाब के गुरदासपुर जिले के तहत पड़ने वाले लाखौकी गांव की रहने वाली कन्या सुलक्खनी से हुआ। दोनों को दो पुत्र श्रीचंद और लखमीदास हुए। बेटों के जन्म के बाद बाबा नानक अपने परिवार का भार ससुर पर छोड़कर अपने चार साथियों मरदाना, लहना, बाला और रामदास के साथ तीर्थयात्रा पर निकल पड़े।

गुरु साहिब चारों दिशाओं में घूम-घूमकर लोगों को उपदेश देने लगे। 1521 ईस्वी तक उन्होंने चार यात्राएं की। जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य स्थान शामिल थे। इन यात्राओं को पंजाबी में (उदासियों) के नाम से जाना जाता है। गुरू नानक देव जी मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं रखते थे। उन्होंने हमेशा ही रूढ़ियों और कुसंस्कारों का विरोध किया।
नानक जी के अनुसार ईश्वर कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे अंदर ही है। उनके इन्हीं विचारों से नाराज तत्कालीन शासक इब्राहिम लोदी ने उन्हें कैद तक कर लिया था। बाद में पानीपत की लड़ाई में इब्राहिम लोदी हार गया और राज्य बाबर के हाथों में आ गया। तब उन्हें उस कैद से मुक्ति मिली।

जीवन के अंतिम दिनों में गुरू साहिब की ख्याति बहुत ज्यादा बढ़ चुकी थी। अपने परिवार के साथ मिलकर वे मानवता की सेवा में समय व्यतीत करने लगे। उन्होंने करतारपुर नाम से एक नगर बसाया, जो अब पाकिस्तान के नारोवाल जिले में स्थित है।

बाबा नानक बहुत ही अच्छे सूफी कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से प्यार दर्शाते हुए जो अभिव्यक्ति की, वह बेहद अनूठी और निराली है। उनकी भाषा बहता नीर थी जिसमें फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली और अरबी के शब्द समा गए थे।

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