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स्वतंत्र भारत में दलित-चेतना के संवाहक बने काशी राम

स्वतंत्र भारत में दलित-चेतना के संवाहक बने काशी राम
October 11
10:35 2019

मायावती को सौंपी विरासत : भाग-01

धर्मराज राय 

आसमान में जिस प्रकार खगोलीय पिंडो के रूप में विभिन्न श्रेणी के धुमकेतुओं का अकस्मात, प्रकटीकरण होता है जिनमें से कोई एक विशेष चर्चित होकर खगोल विज्ञानियों को चैंका देता है ठीक उसी प्रकार किसी भी देश के समाज और राजनीति में धुमकेतु की तरह एक विशेष चर्चित मानव-धुमकेतु का भी उद्भव होता है जो अपने विचार और सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता से तूफान की तरह प्रभावी हो जाता है।

भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था में भले ही उदारता पूर्वक सभी वर्णों को सम्मानपूर्वक समान हक प्राप्त होने का दावा किया जाता हो, लेकिन इतिहास गवाह है कि यह पूरी तरह सत्य नहीं है।

तब से अब तक जिस तरह के प्रमाण मिलते हैं, समाज में दलितों को पूर्ण न्याय कभी प्राप्त नहीं हुआ। ऐसी श्रेणी के लोग विषमता पूर्वक जीवन जीने को कल भी और आज भी बाध्य रहे हैं।

ऐसे ही लोगों के जीवन में सुधार और समान हक प्राप्त करने के नाम पर कोई व्यक्तित्व अकस्मात प्रकट होता है जो समाज और राजनीति में चमत्कारी परिवर्तन का प्रभाव उत्पन्न कर देता है।

भारतीय राजनीति में 1980 के दशक में दलित राजनीति में एक चमत्कारी पुरूष काशी राम का उद्भव आज भी कम चर्चित नहीं है। काशी राम भले आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी राजनीतिक शिष्या सुश्री मायावती की ही दलित राजनीति मंे आज भी मुहर लगती है और चलती भी है। हालांकि बसपा में कांशीराम-मायावती के बीच में इतने वर्षों बाद भी अंत तक कोई तीसरा चेहरा प्रभावी नहीं हो सका है।

काशी राम के प्रति दलित समाज से इतर के लोग उन्हें पूरी तरह अतिवादी जातिवादी बताकर घोर आलोचना करते रहे। उन्हें फासिस्ट भी कहते रहे। लेकिन काशी राम के समर्थकों ने उनमें भीमराव अम्बेदकर की तरह एक परिवर्तनकारी युग-पुरूष को देखा। तब की मीडिया में शामिल लोग भी बंटे हुए थे।

कोई उन्हें पूरी तरह एक युग-पुरूष के रूप में स्वीकार कर यह स्थापित करने में प्रयासरत था कि काशी राम की राजनीति स्थायी परिवर्तन लाने में समर्थ साबित होगी, तो एक वर्ग काशी राम की राजनीति को पानी का बुलबुला मान रहा था समय के साथ बिला जायेगा। काशी राम का राजनीतिक दल ‘बहुजन समाज पार्टी (बसपा)’ समझौतावादी होकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह बनाने के बजाय क्षेत्रीय पार्टी ही बनी रहेगी।

दलितों की महात्वाकांक्षा पूरी करने के बजाय यह पार्टी एक व्यक्ति की महात्वाकांक्षा को स्थायी करने का मंच बन जायेगी। सच पूछा जाये तो आज ‘बसपा’ की वास्तविक राजनीतिक स्थिति पूर्वानुमान के अनुसार पूर्णतः समझौतावादी हो चुकी है और उसकी शीर्ष मंडली में दलितों के अधिकार की आड़ में ब्राह्मण सहित कोई भी वर्ण त्याज्य और दुश्मन नहीं है।

देश की राजनीति का ऐतिहासिक अवलोकन करने पर यह स्पष्ट है कि काशी राम का उदय एक धुमकेतु की तरह ही 1988 में हुए इलाहाबाद लोकसभा उपचुनाव के दौरान हुआ था। तब बोफर्स घोटाले की चर्चा थी जिसमें राजीव गांधी पर छींटे पड़े थे।

राजीव गांधी के विरूद्ध बगावत करते हुए रक्षामंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पद से इस्तीफा देकर लोकसभा की सदस्यता से भी त्याग पत्र दे दिया था। इसी कारण इलाहाबाद लोकसभा सीट पर उपचुनाव हो रहा था जिसमें विश्वनाथ प्रताप सिंह पुनः उपचुनाव लड़ रहे थे।

जबकि एक वर्ष बाद ही आम चुनाव प्रतीक्षित था। इलाहाबाद लोकसभा सीट का उपचुनाव बोफर्स घोटाले के मुद्दे पर होने के कारण ऐतिहासिक बन गया था। श्री सिंह के विरूद्ध कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र सुनील शास्त्री को अपना उम्मीदवार खड़ा किया था।

गौरतलब है कि इसी उपचुनाव में काशी राम अपनी सर्वथा नयी पार्टी ‘बहुजन समाज पार्टी’ को लेकर चुनाव मैदान में उम्मीदवार के रूप में खड़े हुए। उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न ‘नीला हाथी’ था। काशी राम के मुख्य एजेन्डे में दलित राजनीति ही शामिल थी। हालांकि वह इस उपचुनाव में चर्चित होकर भी पराजित रहे। तब ‘हरिजन’ शब्द ही प्रचलित था जो बाद में काशी राम के कारण ही ‘दलित’ शब्द के रूप में प्रचारित हुआ।

इलाहाबाद उपचुनाव के दौरान 54 वर्षीय काशी राम ने भारत की कुल जनसंख्या में शामिल हरिजनों, पिछड़ी जातियों और मुस्लिम बिरादरी को एकजुट करने और ब्राह्मणों तथा ठाकुरों के सामाजिक-राजनीतिक वर्चस्व पर चोट करने के लिए बड़ा ही आकर्षक नारा दिया था-वोट हमारा, राज तुम्हारा, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।’

इलाहाबाद उपचुनाव में उनके चुनाव अभियान ने धूम मचा दी थी। वह देश भर में तभी चर्चित हो गए। उनकी संगठन क्षमता और शेष जातियों का एकजुट समर्थन परिलक्षित हो रहा था लेकिन उच्ची जाति के विरूद्ध तीखी और हिंसक बयानबाजी के बावजूद काशी राम पराजित रहे।

तब विश्वनाथ प्रताप सिंह विजयी हुए और बाद में अगले चुनाव में भी सफल होकर वह प्रधानमंत्री पद पर भी आरूढ़ हुए। इलाहाबाद उपचुनाव में काशी राम को 70 हजार वोट मिले थे, लेकिन हार कर भी तूफानी काशी राम का राजनीतिक लक्ष्य पूरा हो गया। इसके बाद काशी राम ने कभी चुनाव नहीं लड़ा।

इसी दौर में सुश्री मायावती एक सच्ची शिष्या के रूप में उनके सम्पर्क में आयी, जिसपर काशी राम ने पूरा भरोसा करते हुए चुनावी राजनीति की बागडोर उनपर ही सौंप दी। आज मायावती अपने दिवंगत गुरू काशी राम की राजनीतिक-सामाजिक विरासत को क्षमता भर संभाल रही है और दलीय राजनीति में कमजोर नहीं है।

काशी राम ने सुश्री मायावती की आई.ए.एस बनने की महात्वाकांक्षा को दरकिनार करते हुए तब कहा था कि मैं तुम्हें वह बना दूंगा, जिसके आगे-पीछे आई ए एस नाचेंगे। यह बात स्वयं सुश्री मायावती ने ही कभी किसी पत्रकार के साथ बातचीत मंे बतायी थी।

गौरतलब है कि सुश्री मायावती राजनीति की माहिर खिलाड़ी बन चुकी है। मुख्यमंत्री पद को भी सुशोभित किया। मौका मिलने पर उनकी पार्टी कांग्रेस, सपा और भाजपा के साथ भी गठबंधन कर सत्ता की हकदार बनी रहीं।

जारी……………

झारखण्ड के वीर बुधु भगत अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते हुए 1932 में शहीद हुए

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