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झारखंड विधानसभा चुनाव: ये चुनाव नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे

झारखंड विधानसभा चुनाव: ये चुनाव नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे
December 02
08:12 2019
  • समीक्षा : मुख्यमंत्री की सीट पर प्रधानमंत्री की संभावित चुनावी सभा बता रही राजनीति के रंग-ढंग

श्याम किशोर चौबे

रांची: आधुनिक भारत में यह भाजपा काल है। खासकर मोदी-शाह की जोड़ी ने प्रजातांत्रिक राजनीति की चाल-ढाल में युगांतरकारी परिवर्तन ला दिया है। ऐसे ही काल में झारखंड विधानसभा का चुनाव होना यहां के निवासियों के लिए एक अलग अनुभव तो है ही, सियासी दलों और उनके नेताओं के लिए भी बहुत कुछ वैसा ही है।

खबर है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जमशेदपुर में चुनावी सभा करने वाले हैं। जमशेदपुर मुख्यमंत्री का चुनाव क्षेत्र है। ऐसे में यह भी कहा जा सकता है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व चुनावों को बहुत गंभीरता से लेता है। दूसरा पक्ष कुछ और भी कह सकता है। ऐसे ही अभी हाल ही में भाजपा प्रमुख ने जब कहा कि आजसू उनका मित्र दल है, जो चुनाव बाद पुनः साथ आ जाएगा।

आजसू को लगा कि वह राज्य की 81 में से 52 सीटों पर लड़ रही है। ऐन चुनाव के वक्त भाजपा प्रमुख का कथन उसके लिए डैमेजिंग है। शायद इसीलिए डैमेज कंट्रोल करते हुए दूसरे ही दिन उधर से बयान आ गया कि चुनाव बाद का निर्णय चुनाव बाद लेंगे।

फिलहाल उसने भाजपा के राधाकृष्ण किशोर, ताला मरांडी, कांग्रेस के प्रदीप बलमुचू, बसपा के कुशवाहा शिवपूजन मेहता जैसे नेताओं को एडजस्ट कर रखा है। उसका सीना खुद ही 56 इंच का हुआ जा रहा है। अभी वह किसकी सुनेगी?

राजधानी रांची में नगर निगम ने अतिक्रमण अधिनियम के तहत कतिपय दुकानदारों का फाइन काटा तो एक मंत्री महोदय ने फाइन की रसीदें फाड़कर अद्भुत साहस दिखाया। सरकारी दस्तावेज फाड़ना कोई हंसी-दिलग्गी तो है नहीं। यह अलग बात है कि सार्वजनिक तौर पर वे यह स्वीकार नहीं कर रहे लेकिन कौन नहीं जानता कि राजधानी में अतिक्रमण किसकी शह पर जड़ें जमाये हुए है।

औद्योगिक राजधानी जमशेदपुर की बात करें तो वहां अनधिकृत शताधिक बस्तियों की गूंज-अनुगूंज चुनाव के वक्त कुछ ज्यादा ही सुनाई पड़ने लगती है। कल तक मंत्री रहे एक राजनेता को शायद इसी कारण इनमें से 86 बस्तियों में अपना भविष्य नजर आ रहा है। कोयला नगरी धनबाद कोयले के अवैध व्यापार के लिए अपनी पहचान बना चुका है।

इसका अपना एक अलग चुनावी रिश्ता है। इसलिए बहुचर्चित सिंह मेंशन से जुड़ीं दो गोतनियां आपस में ही चुनावी रार मचा रही हैं तो इसका महत्व समझा जा सकता है। 19 साल में ही तीन मुख्यमंत्री और एक मंत्री दे चुकी उपराजधानी दुमका की स्वास्थ्य समस्याएं चुनावों में बस प्रतिष्ठा का विषय बनकर ही रह जाने का भी मतलब है।

राजनीतिक विरासतों के लिए मशहूर डालटनगंज का हाल यह कि उसके कतिपय बूथों तक जाने में कभी मंत्री का तमगा ओढ़ने वाले प्रत्याशी तक को न केवल रिवाल्वर निकाल लेना पड़ता है, अपितु अपनी फरियाद सुनाने के लिए धरने का सहारा लेना पड़ता है।

ये परिस्थितियां बता रही हैं कि चुनाव कितना विकट होता है। जिगर साहब होते तो अपने शेर का रूख मोड़कर शायद यही कहते, ‘ये चुनाव नहीं आसां, इतना ही समझ लीजे। इक वोट का दरिया है और डूब के जाना है।’ कल ही तो जिन 13 सीटोें पर वोटिंग हुई, 2014 के सापेक्ष उसका परसेंटेज दो स्थलों पर माइनस में गया, जबकि शेष 11 सीटों पर पारा चढ़ गया।

चूंकि छह महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में इन 13 विधानसभा सीटों में से महज एक पर कांग्रेस बढ़त पा सकी थी, शेष पर भाजपा राज था, इसलिए अब इन दोनों की कौन कहे आजसू, बसपा, जेवीएम आदि-आदि के संग-संग निर्दलीय भी गोते लगा रहे हैं कि उनके पाले क्या पड़ा। जिगर साहब के शेर को नये रंग में पढ़िए तो पता चल जाएगा।

हटिया विधानसभा सीट जीतना भाजपा के लिए है चुनौती
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