Online News Channel

News

अध्यात्म महाविज्ञानियों ने सुलझा लिया है ब्रह्मांड का रहस्य

अध्यात्म महाविज्ञानियों ने सुलझा लिया है ब्रह्मांड का रहस्य
September 26
09:17 2018

इनसाइट ऑनलाइन न्यूज़

अध्यात्म-विज्ञान योग-साधना के माध्यम से अलौकिक ब्रह्मांड में प्रवेश कर उसे ही सत्य और शाश्वत बताता है। आधुनिक आधिभौतिक विज्ञानियों के ज्ञान से परे ऐसे योगियों की प्रतिष्ठा बनी रही है जिन्होंने सृष्टि के रहस्य को सप्रमाण उद्घाटित किया है।

वस्तुतः आध्यात्मिक वांग्मय अलौकिक और अद्भुत सृष्टि के रहस्यों को उजागर करने के प्रयास और परिणाम से युक्त शास्त्र हैं। इन अध्यात्म-शास्त्रों में मानव-शरीर की बड़ी महिमा वर्णित है। आधुनिक-विज्ञानी और सामान्य लोग बिना अध्ययन के उक्त विचार को अतिश्योक्ति पूर्ण मानकर टाल देते हैं जबकि ऐसी बात नहीं है। आध्यात्मिक-साधक, जो पूर्णता प्राप्त कर संत कहलाते हैं, मानव तन की सार्थकता को स्वीकार करते हैं।

अध्यात्म महाविज्ञानियों ने सुलझा लिया है ब्रह्मांड का रहस्य

परमसंत रामकृष्ण परमहंस जी महाराज के शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने भी स्वीकार किया है कि मानव मस्तिष्क ज्ञान का अक्षय भंडार और अछोर पुस्तकालय है।मस्तिष्क अधिष्ठित मन में असीम शक्ति छिपी हुई है। ज्ञान-विज्ञान का एकमात्र केन्द्र मानव का मन ही है। जिस किसी ने भी अपने जिस किसी अद्भुत कार्य से संसार के लोगों को चमत्कृत किया है, वह उसकी मानसिक एकाग्रता का ही परिणाम रहा है।

मानसिक एकाग्रता के प्राप्त हो जाने पर समस्त ज्ञान-विज्ञान अपने आप सिमट-सिमट कर मस्तिष्क में संग्रहित होने लग जाते हैं। ज्ञान संकलिनी तंत्रमें भी उल्लिखित है कि देह में ही सभी विद्याएं, सभी देवता और सब तीर्थ विद्यमान हैं। ये केवल गुरु वाक्य से प्राप्त किये जा सकते हैंः-

देहस्थाः सर्वविद्याश्ध देहस्थाः सर्वदेवताः।
देहस्थाः सर्वतीर्थानि गुरुवाक्येन लभ्यते।।

ब्रह्मांड पुराणोत्तर गीतामें भी कहा गया है कि नवछिद्र-विशिष्ट शरीर से ज्ञान-विज्ञानादि निरन्तर निःसृत होते रहते हैं-नवछिद्रान्वित देहाः स्नुवत्ते जालिका इव।’’

संत दरिया साहब (बिहारी) का भी दृढ़ शब्दों में कहना है कि शरीर से कुुछ भी अलग नहीं है। सब कुछ शरीर के अन्दर है किन्तु बिना युक्ति के कुछ नहीं पाया जा सकता है। वह कहते हैं-सब कुछ तुम्हारे पास है, तुमसे अलग कुछ भी नहीं है। संसार में मनुष्य का शरीर अनुपम हैः-

दरिया तन से नहीं जुदा, सब किछु तन के माहिं।
योग जुगुत से पाइये, बिना जुगुति किछु नाहि।।
सब तोहि पास जुदा कछु नाहीं। मानुष तन अनुपम जग माहीं।।

संत कबीर साहब भी इस मानव तन को अपार समुद्र बताते हुए कहते हैं कि जो इस काया रूपी समुद्र में डुबकी लगाता है, वही ज्ञान रूपी अनमोल रत्न प्राप्त करने में सफल होता हैः-

कबीर काया समुन्द है, अन्त न पावै कोय।
मिरतक होइ के जो रहै, मानिक लावै सोय।।

संतों ने इस मनुष्यदेह को शास्त्रीय भाषा में समान्यतः पिंड कहा है और बाह्य जगत को ब्रह्मांड। पंच महाभूतों या पांच तत्वों-आकाश, वायु, अग्नि, जल और मिट्टी-से शरीर बना हुआ है। ब्रह्मांड भी इन्हीं पांच तत्वों से निर्मित है। यही नहीं जिस तरह शरीर के स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण और कैवल्य-ये पांच मंडल हैं उसी तरह यह ब्रह्मांड भी इन्हीं पांच तत्वों से निर्मित है। यही नहीं जिस तरह शरीर के स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण और कैवल्य-ये पांच मंडल हैं उसी तरह यह ब्रह्मांड भी इन पांच मंडलों से भरपूर है। वराहोपनिषद् में भी कहा गया है-पंच महाभूतात्म को देहः पंचमण्डलपूरितः।

अध्यात्म महाविज्ञानियों ने सुलझा लिया है ब्रह्मांड का रहस्य

शरीर के जिस मण्डल में जब रहते हैं, ब्रह्मांड के भी उसी मण्डल में तब रहते हैं। जिस तरह स्थूल शरीर में रहकर स्थूल संसार में विचरण करते हैं और अपेक्षित व्यवहार भी करते हैं, उसी तरह सूक्ष्म शरीर में रहकर सूक्ष्म ब्रह्मांड की सैर और संभावित व्यवहार किए जा सकते हैं। पिंड और ब्रह्मांड में एक ही सार-तत्व अर्थात् परमात्मा व्यापक है। प्रमाण स्वरूप संत कहते हैं-

  • पिण्ड ब्रह्मांड पूरन पुरूष, अवगत रमता राम। संत गरीब दास
  • घट और मठ, ब्रह्मांड सब एक है, भटकि कै मरत संसार सारा। संत पलटू साहब
  • जोई ब्रह्मांड सोइ पिंडअंतर कछु अहइ नहीं महर्षिमेंहीं पदावली, 65वां पद

इस तरह पिंड और ब्रह्मांड-सत्त्व, रज और तम-इन त्रयगुणों के कार्य क्षेत्र से बाहर नहीं है। जो कुछ ब्रह्मांड में है, वही सब पिण्ड में भी अवस्थित है – ‘‘यत् पिण्डे तद् ब्रह्मांडे।’’ इसलिए पिण्ड ब्रह्मांड का लघु रूप कहा जाता है। स्वामी विवेकानन्द ने भी अपने सत्य ज्ञान के आधार पर कहा है कि हममें से हर मनुष्य मानो, क्षुद्र ब्रह्मांड है और सम्पूर्ण जगत विश्व ब्रह्मांड यानी बड़ा ब्रह्मांड है।

 जो कुछ व्यक्ति में हो रहा है वही समष्टि में भी होता है-यथा पिण्डे तथा ब्रह्मांडे’’ (विवेकानन्द साहित्य)। शिव संहिता में भी कहा गया है कि बाहर में जो कुछ है, वह सब शरीर में भी है, शरीर को ब्रह्मांड भी कहते हैं-‘‘ ब्रह्मांड संज्ञ के देहे यथा देहं व्यवस्थितः।

मेहश्रृंगे सुधारश्मिर्बहिरष्ट कलायुतः।।’’

साधारण तौर पर यह देखा ही जा रहा है कि यह शरीर रूपी पिण्ड ब्रह्मांड के अन्दर ही है, लेकिन इस बात की जानकारी सभी लोगों को नहीं है कि पिण्ड में भी ब्रह्मांड है। ज्ञान-संकलिनी तंत्र में लिखा गया है कि देह में अर्थात पिण्ड में सम्पूर्ण ब्रह्मांड है- ब्रह्मांडलक्षणं सर्व देह मध्ये व्यवस्थितम्।’’

संत कबीर साहब ने इस पिण्ड की बून्द से और ब्रह्मांड की समुंद (समुद्र) से तुलना करते हुए कहा है कि इस बात को तो सभी जानते हैं कि बून्द समुद्र में समाई हुई है, लेकिन इस अद्भुत बात को बिरले ही लोग जानते हैं कि बून्द में समुद्र समाया हुआ है-‘‘बून्द समानी समुंद में यह जानै सब कोय। समुंद समाना बून्द में, बूझै बिरला कोय।

यही नहीं गुरुनानक साहब भी कबीर के अनुभव ज्ञान का समर्थन करते हुए कहते हैं-सागर महि बून्द, बून्द महि सागरू कवणु बुझै विधि जाणै।अर्थात इस विचित्र बात को कौन समझे और किस विधि से जाने कि समुद्र में बून्द है और बून्द में समुद्र है।
संत दरिया साहब भी कहते हैं कि मनुष्य का हृदय अगम्य और अपार समुद्र है। तुम सबमें हो और सब तुममें है, इस रहस्य को कोई संत ही जानते हैं-

दरिया दिल दरियाव है, अगर अपार बेअन्त।
सभ में तोहि तोहि में सभे, जानु मरम कोई संत।।

विनय पत्रिकामें गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है कि योगी अपने हृदय में सम्पूर्ण ब्रह्मांड को देखता है-सकल दृष्य निज उदर मेलि, सोवइ निद्रा तजि जोगी।’’ रामचरित मानस के उत्तरकांड में श्री काक-भुशुण्डि ने भी गरुड़ से श्रीराम के मुख में प्रविष्ट होने पर सम्पूर्ण ब्रह्मांड की लीलाओं और दृश्यों को देखने की कथा सुनायी है।

 महर्षि मेंहीं पदावली में भी दर्ज है-एक बिन्दुता दुर्बीन हो, दुर्बीन क्या करे। पिण्ड में ब्रह्मांड दरस हो, बाहर में क्या घिरे।चूूंकि ब्रह्मांड (बाहरी जगत) में जो कुछ भी दिखता है वह सब शरीर के अंदर भी दिखता है। इसलिए शरीर के जिस भाग में सारा बाह्य ब्रह्मांड दरसता है, उसे भी संतों ने ब्रह्मांड कहा है।

संतों ने शरीर के अन्दर ब्रह्मांड का स्थान आंखों के ऊपर मस्तक में बताया है और आंखों के नीचे के स्थान को ही विशेष करके पिण्ड की संज्ञा दी है। आंखों की पलकें बंद करने पर घोर अंधकार दिखाई पड़ता है। इस अंधकार का पिण्ड तक ही अस्तित्व है। साधना-विशेष के द्वारा जब मस्तक में प्रवेश किया जाता है तब चेतनवृत्ति पिण्डी अंधकार की सीमा को पार कर प्रकाश और शब्द-देश ब्रह्मांड में पहुंच जाती है-

‘‘छाड़ि पिण्ड तम देश महाई। ज्योति देश ब्रह्मांड में जाई।’’

गुरु-युक्ति से दशम द्वार खुल जाने पर पिण्ड का अंधकार नीचे छूट जाता है और साधक की पैठ ब्रह्मांड में हो जाती है। वहां उसे प्रकाश मिलता है और ज्योति के अनेक चमत्कार को लखता है। एक संत ने कहा है-

गुरु भेद देवै सार, खुलै बंद दशम द्वार,
हो ब्रह्मांड में पैसार।
छूटै पिण्ड अंधकार, लखो ज्योति चमत्कार, यह गुरु से ही उपकार।।

गुरु के उपकार से अध्यात्म-पथ का राही साधना-श्रम का अवलंबन लेकर पिण्ड से ब्रह्मांड में प्रवेश करता है और फिर चलते-चलते परम पद प्राप्त करता है। मानव तन का लक्ष्य भी है चरैवेति-चैरवेति।

धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मना रहे पर्युषण पर्व, अनन्त चतुर्दशी को होगा समापन

Home Essentials
Abhushan
Sri Alankar
Raymond

About Author

admin_news

admin_news

Related Articles

0 Comments

No Comments Yet!

There are no comments at the moment, do you want to add one?

Write a comment

Write a Comment

Subscribe to Our Newsletter

LATEST ARTICLES

    Google Cloud expands partnership with Palo Alto Networks

Google Cloud expands partnership with Palo Alto Networks

0 comment Read Full Article