अफ़ग़ानिस्तान: एक बिटिया को जन्म देने वाली माँ की उम्मीदें और डर…

अफ़ग़ानिस्तान में, एक माँ, निकट भविष्य में, इस दुनिया में क़दम रखने वाली अपनी बेटी की, एक ऐसे देश में, उम्मीदों और डर के बारे में बात कर रही हैं जहाँ एक लड़की को जन्म देना, आशीर्वाद समझने के बजाय, एक अभिशाप भी समझा जा सकता है. देश के, पुरुष प्रधान समाज में, अक्सर महिलाएँ और लड़कियाँ, पुरुषों के हाथों, बुरे बर्ताव और प्रताड़ना का सामना करती हैं, लड़कों को, लड़कियों की तुलना में ज़्यादा पसन्द किया जाता है और उन्हें ज़्यादा अहमियत दी जाती है.

आरिफ़ा उमीद, अफ़ग़ानिस्तान में, यूनीसेफ़ के लिये काम करती हैं. ये एक ऐसा देश है जहाँ, हर तीन में से एक लड़की का विवाह, 18 वर्ष की उम्र पूरी होने से पहले कर दिया जाता है, और 15 वर्ष से कम उम्र की केवल 19 प्रतिशत महिलाएँ ही साक्षर हैं यानि पढ़ना-लिखना जानती हैं.
आरिफ़ा उमीद ने, अपने पेट में बढ़ रही बच्ची के लिये ये ख़त लिखा है…
“मेरी प्यारी बिटिया, मैं अभी तुमसे नहीं मिली हूँ, लेकिन मैं पहले से ही जानती हूँ कि तुम बहुत सुन्दर हो – तुम्हारी काली आँखें हैं, मुस्कुराहट से खिला चेहरा, बहुत मुलायम और नाज़ुक, भूरे बाल और स्वर्णिम दिल. मैंने, अपनी पूरी ज़िन्दगी, तुम्हें पाने के सपने देखे हैं.
मैं, बेसब्री के साथ, अपने-दिन रात गिन रही हूँ कि मुझे कब मौक़ा मिलेगा, तुम्हें अपनी बाँहों में भरकर, छाती से लगाकर, बेतहाशा प्यार करने का, दिल भरकर. अभी तुम, सिर्फ़ सात महीने की हो और मैं तुम्हारा हिलना-डुलना अनुभव कर सकती हूँ. ‘नटखट बिटिया’, मैं मन ही मन, मुस्कुराती हूँ.
क्या तुम जानती हो, जब तुम्हारा वजूद मेरे पेट में शुरू भी नहीं हुआ था, मैं, तुम्हारे भाइयों के लिये कपड़े ख़रीदने के लिये गई थी और बाज़ार में, मैंने नन्हीं बच्ची की एक पोशाक देखी? मैं वहाँ कुछ देर के लिये ठिठकी और ख़ुदा से, तुम्हें मेरी झोली में डालने की दुआ माँगी. पता है, फिर क्या हुआ? मैंने वो पोशाक ख़रीद ली. मैं जानती थी कि मेरी अगली सन्तान एक लड़की ही होगी. मैं, तुम्हें ये पोशाक पहने हुए देखने के लिये, उतावली हो रही हूँ. तुम इन कपड़ों में, एकदम, अफ़ग़ान राजकुमारी लगोगी.

© UNICEF/Omid Fazelअफ़ग़ानिस्तान में, एक तिहाई लड़कियों की शादी, उनकी उम्र 18 वर्ष पूरी होने से पहले ही कर दी जाती है.

लेकिन, तुम्हें पाने के लिये उतावलेपन और मेरी तमाम ख़ुशी के बावजूद, मैं, इस देश में, तुम्हारे और तुम्हारे भविष्य को लेकर फिक्रमन्द भी हूँ. मैं अफ़ग़ान लड़कियों के बारे में मायूसी वाली और दुख भरी कहानियाँ सुनती हूँ, लेकिन मैं ये भी देखती हूँ कि वो कितनी बहादुर हैं, इसलिये डरने की कोई ज़रूरत नहीं है.
तुम भी मज़बूत और बहादुर होगी.
हम, एक साथ मिलकर, और भी ज़्यादा महिलाओं को अपने सपने पूरे करने और अपनी क्षमताओं को बाहर लाने में मदद करेंगे. तुम्हारे लिये मेरा यही सपना है.
अफ़ग़ान माँ की तकलीफ़ें लड़कियों के लिये, अफ़ग़ानिस्तान एक मुश्किल हालात वाली जगह है.
सिर्फ़ दो महीने पहले ही, मैं, एक ऐसी माँ को देखकर रोई थी, जिसने, अभी-अभी एक लड़की को जन्म दिया था. उस बच्ची के पिता ने, अपनी पत्नी की ज़िन्दगी इसलिये ख़त्म कर दी, क्योंकि उसने एक लड़की को पैदा किया था. वो अपनी बच्ची को लेकर फ़रार हो गया. मैं वो तकलीफ़ और डर, भुला नहीं पा रही हूँ, जिनसे उस माँ को गुज़रना पड़ा है.
उस माँ ने अपनी बेटी को जन्म देते हुए, दिल दहला देने वाली तकलीफ़ सहन की थी – मैं जानती-समझती हूँ कि किसी महिला के लिये बच्चे को जन्म देना कितना मुश्किल और तकलीफ़ भरा अनुभव है, और वो भी अपने घर पर, किसी स्वास्थ्य सुविधा के बिना.
और, इतनी तकलीफ़ सहन करने व बच्ची को जन्म देने के बाद, वो माँ, अपने शौहर और सम्बन्धियों की मुबारकबाद का इन्तज़ार कर रही थी. इसके बदले, उसे क्या मिला? उसके शौहर ने, ख़ुद अपने हाथों से ही, उस माँ की ज़िन्दगी ख़त्म कर दी. किसी को नहीं मालूम, वो बच्ची कहाँ है? जीवित भी है या नहीं? ये सोचकर मेरा दिल बैठा जा रहा है कि माँ का दूध मिले बिना, वो बच्ची कैसे जी रही होगी. क्या, उसके पिता को उसकी कोई फ़िक्र भी है, या फिर उसने अपनी बच्ची को बेच ही दिया हो?
मैं ख़ुदा का शुक्र अदा करती हूँ कि हमारे हालात कुछ अलग हैं. तुम्हारे पिता, तुम्हें चाहते हैं, बिल्कुल वैसे ही, जैसे मुझे भी तुम प्यारी हो. और तुम्हारे भाई भी तुम्हें प्यार करते हैं. हम सभी, एक साथ मिलकर, तुम्हारी हिफ़ाज़त करेंगे.
जब मैं, तुम्हारे पिता के साथ मिलकर, सोनोग्राम कराने के लिये गई तो, डॉक्टर ने मुझसे पूछा, ‘तुम्हे क्या चाहिये? लड़का या लड़की’?
मैंने कहा, ‘मुझे बिटिया चाहिये’.
डॉक्टर ने कहा, ‘क्या आप जानती हैं कि आप ऐसी पहली माँ हैं, जिसे मैंने ये कहते सुना है कि उसे एक बिटिया चाहिये’? उसके बाद, डॉक्टर ने मुझे बताया कि मुझसे पहले जो महिला वहाँ आई थी, वो काफ़ी दूरदराज़ वाले इलाक़े से आई थी. उस महिला ने डॉक्टर से कहा था कि इस बार अगर उसने एक लड़की को जन्म दिया तो, उसका शौहर, उसे त्याग देगा और किसी अन्य महिला के साथ शादी कर लेगा.
देश में सौभाग्यशाली शिशु और माँ
मेरी नन्ही बिटिया, मैं जानती हूँ कि हम अफ़ग़ानिस्तान में, सबसे ज़्यादा सौभाग्यशाली शिशु और माँ हैं. और मैं, ये बात भी तुम्हारे ध्याम ने लाना चाहती हूँ कि तुम्हारे लिये हालात, मेरे हालात की तुलना में, कहीं बेहतर होंगे, बिल्कुल इसी तरह, जिस तरह मेरी माँ की तुलना में, मेरे लिये, हालात कुछ बेहतर थे.
जब मेरी माँ ने मुझे जन्म दिया था, तो उस समय परिवार में ग़रीबी थी. यहाँ तक कि हमारे पास, हमारा अपना घर भी नहीं था. जब मेरी माँ, विश्वविद्यालयी शिक्षा में, दूसरे वर्ष में थीं, तुम्हारे मामा का जन्म हुआ था.
मेरी माँ की तमाम कड़ी मेहनत और सपनों के बावजूद, वो अपनि शिक्षा जारी नहीं रख सकीं. उन्होंने अपने बच्चों को पालने-पोसने और सहारा देने के लिये, अपनी पूरी ज़िन्दगी क़ुर्बान कर दी.
कुछ वर्ष बाद, मैंने अपनी माँ का शुक्रिया अदा करने का एक रास्ता खोजा.
जब मैं, अपनी यूनिवर्सिटी शिक्षा के दूसरे साल में थी, तो मैंने, क़रीब महीने भर की तलाश के बाद, उनके दस्तावेज़, उच्च शिक्षा मन्त्रालय और उनकी युनिवर्सिटी से हासिल किये. फिर, मैंने, मन्त्रालय से इजाज़त माँगी कि मेरी माँ को एक निजी यूनिवर्सिटी में शिक्षा हासिल करने की अनुमति दी जाए. मैंने, नई यूनिवर्सिटी में पंजीकरण के दस्तावेज़, उन्हें, माँ दिवस, पर तोहफ़े में भेंट किये.

© UNICEF/Frank Dejoअफ़ग़ानिस्तान में, 15 वर्ष से कम उम्र की कुल लड़कियों में, केवल 20 प्रतिशत ही साक्षर हैं.

मुझे याद है, उनकी आँखें भर आईं और साथ ही, उनके चेहरे पर मुस्कुराहट भी खिल उठी. 
उन्होंने यूनिवर्सिटी की शिक्षा जारी रखी, और दो वर्, बाद, डिप्लोमा हासिल किया. मैं, तुम्हें बयान नहीं कर सकती कि, मुझे ये देखकर कितना गर्व महसूस हुआ था. उस दिन, वो, दुनिया में, सबसे प्रसन्न महिला थीं.
तो, मेरी प्यारी बच्ची, तुम्हारी नानी, तुम्हारी उम्मीद की डोर है और बदलाव में, भरोसे की भी. हर दिन, उनकी तरह की, अफ़ग़ान महिलाएँ, अपने सपने पूरे करने के लिये, तमाम अड़चनों और मुश्किल हालात के ख़िलाफ़ जंग लड़ती हैं. वो एक दूसरे को ताक़त देती हैं, हाथ में हाथ लेकर, क़दम से क़दम मिलाकर.
तुम भी ये परम्परा निभाओगी, उसी तरह, जैसा मैंने किया. एक साथ मिलकर, हम, और भी ज़्यादा महिलाओं को उनके सपने पूरे करने और अपने अन्दर छुपी सम्भावनाओं को फलने-फूलने में मदद करेंगे.
तुम्हारे लिये, मेरा ये सपना है. और जैसे, मैंने अपनी माँ के सपने को हक़ीक़त में बदला, मेरा ख़याल है, तुम भी मेरा सपना साकार करोगी.
जब रात को तुम, मेरे अन्दर हलचल मचाकर मुझे सोने नहीं देती, तो मैं कई चीज़ों के बारे में सोचती हूँ. मैं ख़ुदा से एक ऐसे भविष्य के लिये दुआ करती हूँ जहाँ महिलाओं और पुरुषों को बराबर अधिकार हासिल हों; और सुखद व शान्तिपूर्ण हालात हों, ताकि मैं तुम्हें, तालीम के लिये, किसी डर के बिना, स्कूल भेज सूकँ.
मैं तुम्हारी अच्छी सेहत और प्रसन्नता के लिये दुआ करती हूँ. उससे भी ज़्यादा, मैं दुआ करती हूँ कि तुम मज़बूत और साहसी बनो.
और तुम बनोगी भी, क्योंकि तुम्हें मेरे कन्धों का सहारा होगा, मेरी प्यारी बिटिया.
बहुत प्यार के साथ, तुम्हारी माँ, आरिफ़ा”., अफ़ग़ानिस्तान में, एक माँ, निकट भविष्य में, इस दुनिया में क़दम रखने वाली अपनी बेटी की, एक ऐसे देश में, उम्मीदों और डर के बारे में बात कर रही हैं जहाँ एक लड़की को जन्म देना, आशीर्वाद समझने के बजाय, एक अभिशाप भी समझा जा सकता है. देश के, पुरुष प्रधान समाज में, अक्सर महिलाएँ और लड़कियाँ, पुरुषों के हाथों, बुरे बर्ताव और प्रताड़ना का सामना करती हैं, लड़कों को, लड़कियों की तुलना में ज़्यादा पसन्द किया जाता है और उन्हें ज़्यादा अहमियत दी जाती है.

आरिफ़ा उमीद, अफ़ग़ानिस्तान में, यूनीसेफ़ के लिये काम करती हैं. ये एक ऐसा देश है जहाँ, हर तीन में से एक लड़की का विवाह, 18 वर्ष की उम्र पूरी होने से पहले कर दिया जाता है, और 15 वर्ष से कम उम्र की केवल 19 प्रतिशत महिलाएँ ही साक्षर हैं यानि पढ़ना-लिखना जानती हैं.

आरिफ़ा उमीद ने, अपने पेट में बढ़ रही बच्ची के लिये ये ख़त लिखा है…

“मेरी प्यारी बिटिया, मैं अभी तुमसे नहीं मिली हूँ, लेकिन मैं पहले से ही जानती हूँ कि तुम बहुत सुन्दर हो – तुम्हारी काली आँखें हैं, मुस्कुराहट से खिला चेहरा, बहुत मुलायम और नाज़ुक, भूरे बाल और स्वर्णिम दिल. मैंने, अपनी पूरी ज़िन्दगी, तुम्हें पाने के सपने देखे हैं.

मैं, बेसब्री के साथ, अपने-दिन रात गिन रही हूँ कि मुझे कब मौक़ा मिलेगा, तुम्हें अपनी बाँहों में भरकर, छाती से लगाकर, बेतहाशा प्यार करने का, दिल भरकर. अभी तुम, सिर्फ़ सात महीने की हो और मैं तुम्हारा हिलना-डुलना अनुभव कर सकती हूँ. ‘नटखट बिटिया’, मैं मन ही मन, मुस्कुराती हूँ.

क्या तुम जानती हो, जब तुम्हारा वजूद मेरे पेट में शुरू भी नहीं हुआ था, मैं, तुम्हारे भाइयों के लिये कपड़े ख़रीदने के लिये गई थी और बाज़ार में, मैंने नन्हीं बच्ची की एक पोशाक देखी? मैं वहाँ कुछ देर के लिये ठिठकी और ख़ुदा से, तुम्हें मेरी झोली में डालने की दुआ माँगी. पता है, फिर क्या हुआ? मैंने वो पोशाक ख़रीद ली. मैं जानती थी कि मेरी अगली सन्तान एक लड़की ही होगी. मैं, तुम्हें ये पोशाक पहने हुए देखने के लिये, उतावली हो रही हूँ. तुम इन कपड़ों में, एकदम, अफ़ग़ान राजकुमारी लगोगी.


© UNICEF/Omid Fazel
अफ़ग़ानिस्तान में, एक तिहाई लड़कियों की शादी, उनकी उम्र 18 वर्ष पूरी होने से पहले ही कर दी जाती है.

लेकिन, तुम्हें पाने के लिये उतावलेपन और मेरी तमाम ख़ुशी के बावजूद, मैं, इस देश में, तुम्हारे और तुम्हारे भविष्य को लेकर फिक्रमन्द भी हूँ. मैं अफ़ग़ान लड़कियों के बारे में मायूसी वाली और दुख भरी कहानियाँ सुनती हूँ, लेकिन मैं ये भी देखती हूँ कि वो कितनी बहादुर हैं, इसलिये डरने की कोई ज़रूरत नहीं है.

तुम भी मज़बूत और बहादुर होगी.

हम, एक साथ मिलकर, और भी ज़्यादा महिलाओं को अपने सपने पूरे करने और अपनी क्षमताओं को बाहर लाने में मदद करेंगे. तुम्हारे लिये मेरा यही सपना है.
अफ़ग़ान माँ की तकलीफ़ें लड़कियों के लिये, अफ़ग़ानिस्तान एक मुश्किल हालात वाली जगह है.

सिर्फ़ दो महीने पहले ही, मैं, एक ऐसी माँ को देखकर रोई थी, जिसने, अभी-अभी एक लड़की को जन्म दिया था. उस बच्ची के पिता ने, अपनी पत्नी की ज़िन्दगी इसलिये ख़त्म कर दी, क्योंकि उसने एक लड़की को पैदा किया था. वो अपनी बच्ची को लेकर फ़रार हो गया. मैं वो तकलीफ़ और डर, भुला नहीं पा रही हूँ, जिनसे उस माँ को गुज़रना पड़ा है.

उस माँ ने अपनी बेटी को जन्म देते हुए, दिल दहला देने वाली तकलीफ़ सहन की थी – मैं जानती-समझती हूँ कि किसी महिला के लिये बच्चे को जन्म देना कितना मुश्किल और तकलीफ़ भरा अनुभव है, और वो भी अपने घर पर, किसी स्वास्थ्य सुविधा के बिना.

और, इतनी तकलीफ़ सहन करने व बच्ची को जन्म देने के बाद, वो माँ, अपने शौहर और सम्बन्धियों की मुबारकबाद का इन्तज़ार कर रही थी. इसके बदले, उसे क्या मिला? उसके शौहर ने, ख़ुद अपने हाथों से ही, उस माँ की ज़िन्दगी ख़त्म कर दी. किसी को नहीं मालूम, वो बच्ची कहाँ है? जीवित भी है या नहीं? ये सोचकर मेरा दिल बैठा जा रहा है कि माँ का दूध मिले बिना, वो बच्ची कैसे जी रही होगी. क्या, उसके पिता को उसकी कोई फ़िक्र भी है, या फिर उसने अपनी बच्ची को बेच ही दिया हो?

मैं ख़ुदा का शुक्र अदा करती हूँ कि हमारे हालात कुछ अलग हैं. तुम्हारे पिता, तुम्हें चाहते हैं, बिल्कुल वैसे ही, जैसे मुझे भी तुम प्यारी हो. और तुम्हारे भाई भी तुम्हें प्यार करते हैं. हम सभी, एक साथ मिलकर, तुम्हारी हिफ़ाज़त करेंगे.

जब मैं, तुम्हारे पिता के साथ मिलकर, सोनोग्राम कराने के लिये गई तो, डॉक्टर ने मुझसे पूछा, ‘तुम्हे क्या चाहिये? लड़का या लड़की’?

मैंने कहा, ‘मुझे बिटिया चाहिये’.

डॉक्टर ने कहा, ‘क्या आप जानती हैं कि आप ऐसी पहली माँ हैं, जिसे मैंने ये कहते सुना है कि उसे एक बिटिया चाहिये’? उसके बाद, डॉक्टर ने मुझे बताया कि मुझसे पहले जो महिला वहाँ आई थी, वो काफ़ी दूरदराज़ वाले इलाक़े से आई थी. उस महिला ने डॉक्टर से कहा था कि इस बार अगर उसने एक लड़की को जन्म दिया तो, उसका शौहर, उसे त्याग देगा और किसी अन्य महिला के साथ शादी कर लेगा.

देश में सौभाग्यशाली शिशु और माँ

मेरी नन्ही बिटिया, मैं जानती हूँ कि हम अफ़ग़ानिस्तान में, सबसे ज़्यादा सौभाग्यशाली शिशु और माँ हैं. और मैं, ये बात भी तुम्हारे ध्याम ने लाना चाहती हूँ कि तुम्हारे लिये हालात, मेरे हालात की तुलना में, कहीं बेहतर होंगे, बिल्कुल इसी तरह, जिस तरह मेरी माँ की तुलना में, मेरे लिये, हालात कुछ बेहतर थे.

जब मेरी माँ ने मुझे जन्म दिया था, तो उस समय परिवार में ग़रीबी थी. यहाँ तक कि हमारे पास, हमारा अपना घर भी नहीं था. जब मेरी माँ, विश्वविद्यालयी शिक्षा में, दूसरे वर्ष में थीं, तुम्हारे मामा का जन्म हुआ था.

मेरी माँ की तमाम कड़ी मेहनत और सपनों के बावजूद, वो अपनि शिक्षा जारी नहीं रख सकीं. उन्होंने अपने बच्चों को पालने-पोसने और सहारा देने के लिये, अपनी पूरी ज़िन्दगी क़ुर्बान कर दी.

कुछ वर्ष बाद, मैंने अपनी माँ का शुक्रिया अदा करने का एक रास्ता खोजा.

जब मैं, अपनी यूनिवर्सिटी शिक्षा के दूसरे साल में थी, तो मैंने, क़रीब महीने भर की तलाश के बाद, उनके दस्तावेज़, उच्च शिक्षा मन्त्रालय और उनकी युनिवर्सिटी से हासिल किये. फिर, मैंने, मन्त्रालय से इजाज़त माँगी कि मेरी माँ को एक निजी यूनिवर्सिटी में शिक्षा हासिल करने की अनुमति दी जाए. मैंने, नई यूनिवर्सिटी में पंजीकरण के दस्तावेज़, उन्हें, माँ दिवस, पर तोहफ़े में भेंट किये.


© UNICEF/Frank Dejo
अफ़ग़ानिस्तान में, 15 वर्ष से कम उम्र की कुल लड़कियों में, केवल 20 प्रतिशत ही साक्षर हैं.

मुझे याद है, उनकी आँखें भर आईं और साथ ही, उनके चेहरे पर मुस्कुराहट भी खिल उठी. 

उन्होंने यूनिवर्सिटी की शिक्षा जारी रखी, और दो वर्, बाद, डिप्लोमा हासिल किया. मैं, तुम्हें बयान नहीं कर सकती कि, मुझे ये देखकर कितना गर्व महसूस हुआ था. उस दिन, वो, दुनिया में, सबसे प्रसन्न महिला थीं.

तो, मेरी प्यारी बच्ची, तुम्हारी नानी, तुम्हारी उम्मीद की डोर है और बदलाव में, भरोसे की भी. हर दिन, उनकी तरह की, अफ़ग़ान महिलाएँ, अपने सपने पूरे करने के लिये, तमाम अड़चनों और मुश्किल हालात के ख़िलाफ़ जंग लड़ती हैं. वो एक दूसरे को ताक़त देती हैं, हाथ में हाथ लेकर, क़दम से क़दम मिलाकर.

तुम भी ये परम्परा निभाओगी, उसी तरह, जैसा मैंने किया. एक साथ मिलकर, हम, और भी ज़्यादा महिलाओं को उनके सपने पूरे करने और अपने अन्दर छुपी सम्भावनाओं को फलने-फूलने में मदद करेंगे.

तुम्हारे लिये, मेरा ये सपना है. और जैसे, मैंने अपनी माँ के सपने को हक़ीक़त में बदला, मेरा ख़याल है, तुम भी मेरा सपना साकार करोगी.

जब रात को तुम, मेरे अन्दर हलचल मचाकर मुझे सोने नहीं देती, तो मैं कई चीज़ों के बारे में सोचती हूँ. मैं ख़ुदा से एक ऐसे भविष्य के लिये दुआ करती हूँ जहाँ महिलाओं और पुरुषों को बराबर अधिकार हासिल हों; और सुखद व शान्तिपूर्ण हालात हों, ताकि मैं तुम्हें, तालीम के लिये, किसी डर के बिना, स्कूल भेज सूकँ.

मैं तुम्हारी अच्छी सेहत और प्रसन्नता के लिये दुआ करती हूँ. उससे भी ज़्यादा, मैं दुआ करती हूँ कि तुम मज़बूत और साहसी बनो.

और तुम बनोगी भी, क्योंकि तुम्हें मेरे कन्धों का सहारा होगा, मेरी प्यारी बिटिया.

बहुत प्यार के साथ, तुम्हारी माँ, आरिफ़ा”.

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