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अभिनेता राजकपूर ने समाज सुधारक फिल्मों का नायाब तोहफा आवाम को समर्पित किया

अभिनेता राजकपूर ने समाज सुधारक फिल्मों का नायाब तोहफा आवाम को समर्पित किया
June 04
09:32 2019

प्रशांत कुमार

शोमैन के नाम से मशहूर बेमिशाल, बेजोड़ अभिनेता राजकपूर को अपने सिने करियर में अभूतपूर्व मानसम्मान से नवाजा गया और वर्ष 1971 में राजकपूर को पद्मभूषण पुरस्कार और वर्ष 1987 में हिंदी फिल्म जगत के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। बतौर अभिनेता उन्हें दो बार, बतौर निर्देशक उन्हें चार बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

Raj Kapoor-5

राजकपूर द्वारा निर्मित फिल्मों के गीत और कहानियों में समाजिक सुधार एवं जागरूकता की खुशबू और झलक हमेशा भरपूर होती थी और आज के दौर में भी उनकी फिल्मों को देखने और चाहने वालों की बड़ी जमात है।

उनकी मशहूर फिल्मों में श्री 420 भारत के साथ-साथ रशिया के माॅस्को शहर में लगभग एक वर्ष तक बाॅक्स ऑफिस  में हिट रही। श्री 420 में राजकपूर ने जहां राष्ट्रीय भक्ति का संदेश आम लोगों तक पहुंचाया वहीं सहकारिता आंदोलन की तस्वीर जो आम आदमी की तकदीर को नया रूप दे सकती है उसको भी इस फिल्म में दर्शाया। ईमानदारी की परिभाषा को स्थापित किया तथा काले धंधे करने वालों को भी बेनकाब किया और उनका समाजिक बहिष्कार हो उसके प्रति आमजनों को जागरूक किया।

श्री 420 के गीत बहुत मशहूर हैं. और आज भी उनकी प्रासंगिकता है। जिसमें एक गीत… मेरा जूता है जापानी, जो राष्ट्र भक्ति का भरपूर संदेश देता है। चाहे एक समान्य भारतीय की आर्थिक स्थिति कैसी भी हो पर देश के प्रति उसको निष्ठावान बनाता है। गीत के बोल हैं……

मेरा जूता है जापानी
ये पतलून इंगलिश्तानी
सर पे लाल टोपी रूसी
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी
मेरा जूता है जापानी
ये पतलून इंगलिश्तानी
सर पे लाल टोपी रूसी
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी।
बढ़ते जाए हम सैलानी
जैसे एक दरिया तूफानी
सर पे लाल टोपी रूसी
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी
मेरा जूता है जापानी ये
पतलून इंगलिश्तानी
सर पे लाल टोपी रूसी
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी
मेरा जूता है जापानी
सूरत है जानी पहचानी
दुनिया वालों को हैरानी
सर पे लाल टोपी
रूसी फिर भी दिल है
हिन्दुस्तानी मेरा जूता है
जापानी ये पतलून इंगलिश्तानी
सर पे लाल टोपी
रूसी फिर भी दिल है
हिन्दुस्तानी मेरा जूता है जापानी।

राजकपूर की एक दूसरी बहुचर्चित फिल्म बाॅबी ने आर्थिक और सामाजिक विषमता को भेदते हुये नवजवान पीढ़ी के दृढ एवं सच्ची मोहब्बत का आईना समाज को दिखाया। जो हर युग में समाज के लिए दशा-दिशा के लिए आवश्यक है। आज के परिपेक्ष्य में वो इस प्रकार का नजरिया समाज में समता मूलक साबित हो सकता है। इस फिल्म में अंतर्जातीय एवं अंतर्धामिक को प्यार करने वालोें द्वारा तोड़ने का बेमिशाल उदाहरण है। बाॅबी के बहुचर्चित गीतों में एक गीत…..

ना चाहूं सोना चाँदी
ना चाहूं हीरा मोती
यह मेरे किस काम के
ना मांगू बंगला बाड़ी
ना मांगू घोड़ा गाड़ी
यह तो हैं बस नाम के
देती है दिल दे, बदले में दिल के
देती है दिल दे, बदले में दिल के
दे दे दे देदे देदे साहिबा
प्यार में सौदा नही
दे दे दे देदे देदे साहिबा
प्यार में सौदा नही
ना चाहूं सोना चाँदी
ना चाहूं हीरा मोती
यह मेरे किस काम के
ना मांगू बंगला बाड़ी
ना मांगू घोड़ा गाड़ी
यह तो हैं बस नाम के
देता है दिल दे, बदले में दिल के
देता है दिल दे, बदले में दिल के
दे दे दे देदे दे रे साहिबा
प्यार में सौदा नही
दे दे दे देदे दे रे साहिबा
प्यार में सौदा नही
ना जानू मुल्ला काजी
ना जानू काबा काशी
मैं तो हूँ प्रेम प्यासा रे
मेरे सपनों की रानी
होगी तुमको हैरानी
मैं तो तेरा दीवाना रे
देती है दिल दे, बदले में दिल के
देती है दिल दे, बदले में दिल के
दे दे दे देदे देदे साहिबा
प्यार में सौदा नही
दे दे दे देदे देदे साहिबा
प्यार में सौदा नही
प्यार में सौदा नही

उनकी एक और मशहूर फिल्म है जिस देश में गंगा बहती है। उसमें डाकुओं को जिसे आज के समय में आतंकवादी कहा जाता है कैसे प्यार से जीत कर मुख्य धारा से जोडा़ जाये इसकी मिसाल इस फिल्म के गीतोें और कहानी में झलकती है। दोनों फिल्मों में कलाकारों ने राजकपूर के निर्देशन में उम्दा कलाकारी दिखाई और इन दोनों फिल्मों को दर्शकों ने हाथों हाथ ले लिया।
फिल्म जिस देश में गंगा बहती है का यह गीत ‘है आग हमारे सीने में‘ आतंकवादी प्रवृति पर विराम लगाने के लिए भरपूर संदेश देता है…

है आग हमारे सीने में, हम आग से खेलते आते हैं
टकराते हैं जो इस ताकत से, वो मिट्टी में मिल जाते हैं
तुमसे तो पतंगा अच्छा है, जो हँसते हुए जल जाता है
वो प्यार में मिट तो जाता है, पर नाम अमर कर जाता है
हम भी हैं, तुम भी हो, दोनों हैं आमने-सामने
देख लो क्या असर कर दिया प्यार के नाम ने
हम गाते-गरजते सागर हैं, कोई हमको बाँध नहीं पाया
हम मौज में जब भी लहराए, सारा जग डर से थर्राया
हम छोटी-सी वो बूँद सही, है सीप ने जिसको अपनाया
खारा पानी कोई पी न सका, एक प्यार का मोती काम आया
हम भी हैं, तुम भी हो
किस फूल पे मरती है दुनिया, है कौनसा फल सबसे मीठा?
नैनों से जो नैना टकराए, तो कौन हारा और कौन जीता?
ये दिल का कंवल सबसे सुंदर, मेहनत का फल सबसे मीठा
इस प्यार की बाजी में हँसकर जो दिल हारा वो सब जीता
हम भी हैं, तुम भी हो ३
इतना-सा जिगर, इतना-सा है दिल, क्या बात बड़ी करने आए
क्या पैदा होगी आग अगर, पत्थर से ना पत्थर टकराए
नन्हा-सा ये दिल आँखों में न हो तो पल में अँधेरा हो जाए
इतन-सा ये दिल तू दे-दे अगर, सारा जग तेरा हो जाए
हम भी हैं, तुम भी हो 
जाने कैसी ये मौजें अनजानी
दिल में आईं जैसे याद पुरानी
ले लिया दिल मेरा, आज की रंगभरी शाम ने
हम भी हैं, तुम भी हो 
तुमने मुझको समझा था बेगाना
लेकिन तुमको मैंने ही पहचाना
मिल गईं मंजिलें, राह-सी खुल गई सामने
हम भी हैं, तुम भी हो 
तू जो कह दे, मैं तेरी हो जाऊँ
खोई-खोई आँखों में खो जाऊँ
तुमने ये क्या किया, लोग दिल को लगे थामने
देख लो क्या असर कर दिया प्यार के नाम ने
हम भी हैं, तुम भी हो, दोनों हैं आमने-सामने

श्री 420 फिल्म में राजकपूर ने भारत वर्ष के उस वर्तमान समय में सहकारिता आंदोलन का एक नायाब उदाहरण पेश किया और सहकारिता आंदोलन कैसे आमजनों के लिए और गरीबों के लिए मिसाल बन सकता है उस वक्त सहकारिता आंदोलन की बुनियाद देश में रखी जा रही थी। कई क्षेत्रों में जैसे-अमूय प्रोडक्ट आदि में काफी कामयाब हुई है।

Raymond

उसी समय गरीबों के लिए घर और ठिकानें की बात सहकारिता आंदोलन के द्वारा राजकपूर ने पेश की। जिसकी अहमियत आज के समय में सभी सरकारों की नजर में महत्वपूर्ण है। श्री 420 एक सामाजिक क्रांतिकारी फिल्म रही।

राजकपूर की फिल्मों की सबसे खास बात उसकी कहानी होती थी वे हमारे समाज के अलग.अलग विषयों को दिखाते थे। जैसे श्री ४२० में जमाखोरी का मामला था। सत्यम शिवम सुंदरम में निम्न जाति का मसला दिखाया गाया था। प्रेम रोग में विधवाओं की स्थिति को बहुत ही संवेदनशील ढंग से पेश किया गया था।

आज के युग में सामाजिक सुधार, जागरूकता एवं चेतना का संदेश देने वाली फिल्मों के निर्माण एवं निर्देशन का भारी अभाव है। राजकपूर जैसे महान समाज सुधारक और दूर दृष्टि वाले निर्माता-निर्देशक की फिल्मों की आज भी प्रासंगिकता है। समाज सुधारक एवं क्रांतिकारी फिल्मों के निर्माण की आज और भी अधिक आवश्यकता है। जिसकी भरपाई आज के निर्माता निर्देशकों को पूरी करनी चाहिए।

2 जून 1988 को अस्थमा में जटिलता का आने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

 

भाग-1

 

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