अर्चना सोरेंग का, प्रकृति-आधारित समाधानों में, आदिवासी युवाओं के हितों पर ज़ोर

​भारत की युवा जलवायु कार्यकर्ता अर्चना सोरेंग ने सचेत किया है कि जलवायु परिवर्तन का मुक़ाबलेा करने में, प्रकृति-आधारित समाधान अपनाये जाते समय आदिवासी समुदायों और युवाओं के हितों का ध्यान रखा जाना होगा, और प्रकृति व आमजन के लिये, न्याय व कल्याण को प्राथमिकता देनी होगी. पर्यावरण पर यूएन महासचिव के युवा सलाहकारों के समूह में शामिल अर्चना सोरेंग ने, गुरुवार को आयोजित जलवायु शिखर बैठक के दौरान एक सत्र को सम्बोधित करते हुए कहा कि आदिवासी जन, केवलप्रकृति का हिस्सा भर नहीं हैं, बल्कि प्रकृति ही हैं.

जलवायु कार्रवाई पर महासचिव के युवा सलाहकार समूह में शामिल भारतीय जलवायु कार्यकर्ता अर्चना सोरेंग ओडिषा राज्य के सुन्दरगढ़ ज़िले से हैं.
खड़िया जनजाति की अर्चना सोरेंग क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तरों पर विभिन्न युवा संगठनों के साथ काम करते हुए आदिवासी समुदायों के पारम्परिक ज्ञान और प्रथाओं को संरक्षित करके, उन्हें बढ़ावा देने में काफ़ी सक्रियता से भाग लेती रही हैं.
अमेरिका ने 22 अप्रैल को जलवायु नेतृत्व शिखर बैठक बुलाई जिसमें संयुक्त राष्ट्र ने भी शिरकत की है. अर्चना सोरेंग ने इस बैठक के दौरान प्रकृति-आधारित समाधानों पर एक सत्र को सम्बोधित करते हुए युवाओं की भूमिका पर बल दिया.
“दुनिया भर में युवजन, जलवायु न्याय के लिये हो रहे आन्दोलन के अग्रिम मोर्चे पर डटे हैं और वैश्विक, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर विकास के बजाय, प्रकृति के स्वास्थ्य की पैरवी कर रहे हैं.
“चाहे सड़क पर या फिर निर्णय-निर्धारक स्थलों पर, हम अगुवाई कर रहे हैं और पेरिस जलवायु समझौते व टिकाऊ विकास के लक्ष्य हासिल करने के लिये अपने नेताओं की जवाबदेही तय कर रहे हैं.”
उन्होंने कहा कि युवजन, शिक्षा, प्रौद्योगिकी, विज्ञान, क़ानून, कला, संगीत, सहित अनेक अन्य क्षेत्रों में अपने कौशल, हुनर से बदलाव लाते हुए जलवायु कार्रवाई में योगदान कर रहे हैं.
मगर, प्रकृति-आधारित समाधानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की युवाओं की क्षमताओं के बावजूद, युवाओं को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

UNFCCCसंयुक्त राष्ट्र, जलवायु परिवर्तन से मुक़ाबला करने के लिये प्रकृति-आधारित समाधानों को बढ़ावा दे रहा है.

युवा नेतृत्व की पुकार
युवा जलवायु कार्यकर्ता अर्चना सोरेंग ने अपने सम्बोधन में चार अहम बिन्दुओं पर ध्यान दिये जाने का उल्लेख किया:
– प्रकृति-आधारित समाधानों को अपनाते समय, युवजन के संरक्षण और अर्थपूर्ण नेतृत्व को प्राथमिकता दी जानी होगी, और युवाओं के लिये रोज़गार सृजित करने होंगे.
– आदिवासी समुदाय के नज़रिये को समाहित करते हुए, जन-शिक्षा प्रयासों को प्रकृति-आधारित समाधानों के केन्द्र में रखना होगा.
– प्रकृति-आधारित समाधानों में आदिवासी युवाओं के पारम्परिक ज्ञान और परिपाटियों को समर्थन देते हुए, वन-आधारित आजीविकाओं को बढ़ावा देना होगा.
– वंचित व आदिवासी समुदाय के युवाओं को ध्यान में रखते हुए, अनुकूलन, सहनक्षमता प्रयासों में निवेश करना होगा और प्रतिवर्ष एक अरब डॉलर के जलवायु वित्तपोषण के वादे को पूरा करना होगा.
आदिवासी समुदायों की आवाज़
अर्चना सोंरेग ने क्षोभ जताते हुए कहा कि दुनिया भर में अनेक जलवायु कार्यकर्ताओं को मानवाधिकार हनन और प्रणालीगत नस्लवाद का सामना करना पड़ा है, जिसे रोका जाना होगा.
उन्होंने कहा कि एक युवा आदिवासी महिला के तौर पर वो मानती हैं कि, “हम केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि हम प्रकृति हैं.”
“प्रकृति हमारी पहचान, संस्कृति, भाषा और परम्परा का स्रोत है.”
भारतीय जलवायु कार्यकर्ता के मुताबिक़, भूमि, वन और क्षेत्रों पर आदिवासी अधिकारों को पहचाने जाने और लागू करने से, प्रकृति-आधारित समाधानों को, असरदार बनाया जा सकता है.
उन्होंने आगाह करते हुए कहा कि जलवायु व प्रकृति आधारित नीतियों में, आदिवासी, पारम्परिक और स्थानीय समुदायों की पूर्व व सही जानकारी पर आधारित सहमति आवश्यक है.      , ​भारत की युवा जलवायु कार्यकर्ता अर्चना सोरेंग ने सचेत किया है कि जलवायु परिवर्तन का मुक़ाबलेा करने में, प्रकृति-आधारित समाधान अपनाये जाते समय आदिवासी समुदायों और युवाओं के हितों का ध्यान रखा जाना होगा, और प्रकृति व आमजन के लिये, न्याय व कल्याण को प्राथमिकता देनी होगी. पर्यावरण पर यूएन महासचिव के युवा सलाहकारों के समूह में शामिल अर्चना सोरेंग ने, गुरुवार को आयोजित जलवायु शिखर बैठक के दौरान एक सत्र को सम्बोधित करते हुए कहा कि आदिवासी जन, केवलप्रकृति का हिस्सा भर नहीं हैं, बल्कि प्रकृति ही हैं.

जलवायु कार्रवाई पर महासचिव के युवा सलाहकार समूह में शामिल भारतीय जलवायु कार्यकर्ता अर्चना सोरेंग ओडिषा राज्य के सुन्दरगढ़ ज़िले से हैं.

खड़िया जनजाति की अर्चना सोरेंग क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तरों पर विभिन्न युवा संगठनों के साथ काम करते हुए आदिवासी समुदायों के पारम्परिक ज्ञान और प्रथाओं को संरक्षित करके, उन्हें बढ़ावा देने में काफ़ी सक्रियता से भाग लेती रही हैं.

अमेरिका ने 22 अप्रैल को जलवायु नेतृत्व शिखर बैठक बुलाई जिसमें संयुक्त राष्ट्र ने भी शिरकत की है. अर्चना सोरेंग ने इस बैठक के दौरान प्रकृति-आधारित समाधानों पर एक सत्र को सम्बोधित करते हुए युवाओं की भूमिका पर बल दिया.

“दुनिया भर में युवजन, जलवायु न्याय के लिये हो रहे आन्दोलन के अग्रिम मोर्चे पर डटे हैं और वैश्विक, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर विकास के बजाय, प्रकृति के स्वास्थ्य की पैरवी कर रहे हैं.

“चाहे सड़क पर या फिर निर्णय-निर्धारक स्थलों पर, हम अगुवाई कर रहे हैं और पेरिस जलवायु समझौते व टिकाऊ विकास के लक्ष्य हासिल करने के लिये अपने नेताओं की जवाबदेही तय कर रहे हैं.”

उन्होंने कहा कि युवजन, शिक्षा, प्रौद्योगिकी, विज्ञान, क़ानून, कला, संगीत, सहित अनेक अन्य क्षेत्रों में अपने कौशल, हुनर से बदलाव लाते हुए जलवायु कार्रवाई में योगदान कर रहे हैं.

मगर, प्रकृति-आधारित समाधानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की युवाओं की क्षमताओं के बावजूद, युवाओं को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.


UNFCCC
संयुक्त राष्ट्र, जलवायु परिवर्तन से मुक़ाबला करने के लिये प्रकृति-आधारित समाधानों को बढ़ावा दे रहा है.

युवा नेतृत्व की पुकार

युवा जलवायु कार्यकर्ता अर्चना सोरेंग ने अपने सम्बोधन में चार अहम बिन्दुओं पर ध्यान दिये जाने का उल्लेख किया:

– प्रकृति-आधारित समाधानों को अपनाते समय, युवजन के संरक्षण और अर्थपूर्ण नेतृत्व को प्राथमिकता दी जानी होगी, और युवाओं के लिये रोज़गार सृजित करने होंगे.

– आदिवासी समुदाय के नज़रिये को समाहित करते हुए, जन-शिक्षा प्रयासों को प्रकृति-आधारित समाधानों के केन्द्र में रखना होगा.

– प्रकृति-आधारित समाधानों में आदिवासी युवाओं के पारम्परिक ज्ञान और परिपाटियों को समर्थन देते हुए, वन-आधारित आजीविकाओं को बढ़ावा देना होगा.

– वंचित व आदिवासी समुदाय के युवाओं को ध्यान में रखते हुए, अनुकूलन, सहनक्षमता प्रयासों में निवेश करना होगा और प्रतिवर्ष एक अरब डॉलर के जलवायु वित्तपोषण के वादे को पूरा करना होगा.

आदिवासी समुदायों की आवाज़

अर्चना सोंरेग ने क्षोभ जताते हुए कहा कि दुनिया भर में अनेक जलवायु कार्यकर्ताओं को मानवाधिकार हनन और प्रणालीगत नस्लवाद का सामना करना पड़ा है, जिसे रोका जाना होगा.

उन्होंने कहा कि एक युवा आदिवासी महिला के तौर पर वो मानती हैं कि, “हम केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि हम प्रकृति हैं.”

“प्रकृति हमारी पहचान, संस्कृति, भाषा और परम्परा का स्रोत है.”

भारतीय जलवायु कार्यकर्ता के मुताबिक़, भूमि, वन और क्षेत्रों पर आदिवासी अधिकारों को पहचाने जाने और लागू करने से, प्रकृति-आधारित समाधानों को, असरदार बनाया जा सकता है.

उन्होंने आगाह करते हुए कहा कि जलवायु व प्रकृति आधारित नीतियों में, आदिवासी, पारम्परिक और स्थानीय समुदायों की पूर्व व सही जानकारी पर आधारित सहमति आवश्यक है.      

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