आपबीती: ‘एकजुटता और करुणा भाव से मिलेगी कोविड-19 पर कामयाबी’

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) के भारत कार्यालय में जल,साफ़-सफ़ाई और स्वच्छता (WASH) विभाग में सीनियर प्रोग्राम एसोसिएट के पद पर कार्यरत, जैसिण्डा मैथ्यू ने कोविड-19 महामारी के दौरान अपने व्यक्तिगत अनुभव को साझा किया है. उन्होंने अपने एक ब्लॉग में कहा कि जिस तरह लोग एक-दूसरे की मदद के लिये आगे आ रहे हैं, वो भरोसा जगाता है कि हम इस वायरस पर विजय हासिल करने में कामयाब होंगे…

“हर दिन हमारे टेलिविज़न की स्क्रीन, अस्पतालों में मची अफ़रा-तफ़री की तस्वीरों से भरी है.
अस्पताल में जगह या किसी अपने के लिये ऑक्सीजन की प्रतीक्षा करने वालों की लम्बी कतारें लगी हुई हैं. जैसे-जैसे कोविड-19 के नए मामले बढ़ रहे हैं, ख़तरा हमारे घरों, परिवार के सदस्यों, सहकर्मियों, मित्रों और पड़ोसियों के क़रीब पहुँच चुका है.
मैं इस समय इतना असहाय महसूस कर रही हूँ. आईसीयू बेड और ऑक्सीजन सिलेण्डर की तलाश कर रहे अपने दोस्तों और सहकर्मियों की कोई मदद ना कर पाने की लाचारी. पूरी स्थिति ही भयावह है, और त्रासदीपूर्ण ढँग से जानी-पहचानी भी.
मुझे आज भी फ़रवरी 2020 का वो दिन याद है जब एक दोपहर मेरा फ़ोन बजा. दूसरी ओर, मेरी 75 वर्षीय सास थीं, जो कह रही थीं कि उन्हें साँस लेने में कठिनाई हो रही है.
मेरा दिल धक सा रह गया.
मुझे पता था कि मुझे जल्दी से जल्दी उनके पास जाना होगा, लेकिन दक्षिण भारत का तटीय शहर विशाखापत्तनम, मुम्बई से लगभग 1,400 किलोमीटर दूर था, जहाँ मैं काम करती हूँ.
उस समय कोविड-19 शब्द सभी के जीवन पर हावी होना शुरू नहीं हुआ था, इसके बारे में सिर्फ़ बात होनी शुरू ही हुई थी. ऐसे में मेरे मन में यही प्रश्न उठ रहा था कि आख़िर यह बीमारी मेरे देश, मेरे शहर और इस तरह मेरे परिवार तक किस तरह पहुँच गई.
हालाँकि, मैं जब घर के लिये निकली, तब भी दिल यह मान नहीं रहा था कि यह कोविड-19 हो सकता है.
वो यात्रा शायद मेरे जीवन की सबसे थकावट भरी यात्रा रही होगी. बाक़ी का समय अस्पतालों और कई तरह के परीक्षणों और दवाओं की जद्दोजहद में बीता. यह पहली बार था जब इस बीमारी की कड़वी सच्चाई से हमारा सामना हुआ. 
उस समय, मास्क पहनना शुरू ही हुआ था और लोग वास्तव में इसे गम्भीरता से नहीं ले रहे थे. अपनी सास के आस-पास मास्क पहनने की हिदायत देती डॉक्टर की आवाज, आज भी मेरे कानों में गूँजती है.
समर्पित देखभाल, उपचार और मेरी सास की मज़बूत संकल्प शक्ति ने उन्हें कोरोनावायरस को हराकर ठीक होने में मदद की. यह एक बहुत बड़ी राहत थी, और मैं फिर मुम्बई में अपने ड्यूटी स्टेशन पर लौट आई.
मैं प्रोटोकॉल के अनुरूप यहाँ 14 दिनों के लिये घर पर ही रही.
लेकिन किसने सोचा था कि घर पर बिताये वो 14 दिन, महीनों में तब्दील हो जाएँगे. 24 मार्च 2020 को राष्ट्रीय तालाबन्दी की घोषणा की गई.
कोई नहीं जानता था कि आगे क्या होगा. कॉलेज जाने वाले मेरे बच्चे, अपनी परीक्षा के बारे में चिन्तित थे; मेरे पति और मैं चिन्तित थे कि हम घर से काम किस तरह करेंगे.

© UNICEF/Vinay Panjwaniभारत में, अप्रैल महीने में, कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर देखी गई है जिसने ख़ासी तबाही मचा दी.

साथ ही, चिन्ता थी, हज़ारों मील दूर बैठे अपने माता-पिता की कि वो कैसे इन परिस्थितियों में अपना ध्यान रखेंगे.
प्रवासी मज़दूरों की पीड़ा
इन चिन्ताओं के बीच, पैदल घर लौटते प्रवासी मज़दूरों की तस्वीरें – शायद ये प्रारम्भिक संकेत थे कि यह महामारी कितने परिवारों के लिये पूरी तरह से विनाशकारी साबित होगी.
टीवी पर लाखों प्रवासी श्रमिकों की तस्वीरे भरी पड़ी थीं. घण्टों, यहाँ तक कि कई-कई दिनों तक, अपने बच्चों के साथ, कपड़े की थैलियों में अपना सामान लेकर, चिलचिलाती गर्मी में कम पानी के साथ, अक्सर नंगे पांव घर लौटते मज़दूर की तस्वीरें!
ये अनौपचारिक प्रवासी श्रमिक बड़े शहर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं: घरों का निर्माण, खाना बनाना, भोजन पहुँचाना, सैलून में बाल काटना, ऑटोमोबाइल उद्योग में काम करना, प्लम्बिंग करना, समाचार पत्र बाँटने सहित अन्य काम.
लेकिन तालाबन्दी की घोषणा के साथ, कम्पनियों ने अपने दरवाज़ें बन्द कर दिए और इनमें से कई प्रवासियों ने अपने घरों और गाँव लौटना ही सही समझा, क्योंकि उनके पास आजीविका चलाने का कोई विकल्प नहीं था.
घर जाने के लिये संघर्ष कर रहे लोगों की इन तस्वीरों ने बड़ा असर किया और मेरी अपनी चुनौतियों को समझने में मदद की.
मैं उस समय आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम से जुड़ी थी. तो मैंने अपने पर्यवेक्षक से मुझे उस योजना में शामिल करने को कहा, जो उन्होंने प्रवासी श्रमिकों को गरिमा के साथ घर पहुँचाने के मक़सद से बनाई थी.
यह महीनों के उस बेहद थकाने वाले, लेकिन संतोषजजनक काम की शुरूआत थी, जिसके बीच मैं बच्चों की देखभाल, खाना बनाने, साफ़-सफ़ाई और अन्य घर के काम संभालने की परिवार की अपेक्षाओं के साथ-साथ, काम के नए माहौल (और उन सभी जूम मीटिंग्स!) की चुनौतियों से भी निपटती रही.
हालाँकि, उस समय मैंने व्यंजन बनाने, बोर्ड गेम खेलने जैसे शौक पूरे कर, अधिक समय परिवार के साथ बिताने का आनंद लिया, लेकिन फिर भी मैं कभी भी 2020 में वापस नहीं जाना चाहूँगी.
कोविड-19 की छाया चारों ओर थी. दिल में डर व्याप्त था. मैं हर किसी की आवाज़ में चिन्ता और तनाव महसूस कर सकती थी. हर कोई ख़ुद को समझाने की कोशिश कर रहा था कि सबकुछ जल्दी ही सामान्य हो जाएगा.
लेकिन आख़िर कब? हम सभी एक-दूसरे के लिये सकारात्मक और मज़बूत बने रहने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे थे. यही वजह थी कि यूनीसेफ़ इण्डिया के कर्मचारियों को जोड़ने के लिये हमने एक समाचार पत्र “रे ऑफ़ होप” भी शुरू किया.
2020 में इसके लगभग 20 संस्करण भी प्रकाशित हुए और जनवरी 2021 तक लगने लगा कि हमारे जीवन का सबसे ख़राब वर्ष अब बीत चुका है.

© UNICEF/Biju Boroभारत के पूर्वोत्तर गुवाहाटी शहर में कोविड-19 का टीका लगवाती महिला.

2021 की दूसरी लहर
लेकिन 2021 मानो मुझे ग़लत साबित करने का इन्तज़ार कर रहा था.
इस वर्ष, जैसे-जैसे मामले फिर बढ़े हैं, मैंने हर चीज़ पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है. क्यों हो रहा है? हमने क्या गलत किया? भगवान हमें इस तरह से सज़ा क्यों देना चाहता है?
बहुत कठिन होता हर एक दिन किसी न किसी जान-पहचान के व्यक्ति की मौत की ख़बर सुनना. लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से केवल यही हो रहा है.
लेकिन हिम्मत अभी भी बनी है तो केवल सभी को एक-दूसरे की मदद के लिये एक साथ आते देखकर.
अनजान लोगों की मदद के लिये एक अतिरिक्त कॉल करने के लिये मुस्तैद, ज़रूरत पड़ने पर ऑक्सीजन सिलेण्डर दिलाने के लिये मीलों का सफ़र तय करते दोस्तों की कहानियाँ, अपने से कम उम्र के व्यक्ति के लिये अस्पताल का अपना बिस्तर छोड़ देने वाले बुज़ुर्ग की कहानी, घर पर मरीज़ों के लिये खाना बनाने वाले लोगों की कहानी, और साथ मिलकर सुविधाओं के बारे में जानकारी प्रदान करने वाले युवाओं की कहानियाँ.
करुणा और दयालुता की इतनी कहानियाँ हैं, जोकि एक बार फिर मानवता में विश्वास जगाती हैं, हम ज़रूर कामयाब होंगे और एक साथ मिलकर इस पर विजय हासिल करेंगे.”
यह ब्लॉग पहले यहाँ प्रकाशित हुआ., संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) के भारत कार्यालय में जल,साफ़-सफ़ाई और स्वच्छता (WASH) विभाग में सीनियर प्रोग्राम एसोसिएट के पद पर कार्यरत, जैसिण्डा मैथ्यू ने कोविड-19 महामारी के दौरान अपने व्यक्तिगत अनुभव को साझा किया है. उन्होंने अपने एक ब्लॉग में कहा कि जिस तरह लोग एक-दूसरे की मदद के लिये आगे आ रहे हैं, वो भरोसा जगाता है कि हम इस वायरस पर विजय हासिल करने में कामयाब होंगे…

“हर दिन हमारे टेलिविज़न की स्क्रीन, अस्पतालों में मची अफ़रा-तफ़री की तस्वीरों से भरी है.

अस्पताल में जगह या किसी अपने के लिये ऑक्सीजन की प्रतीक्षा करने वालों की लम्बी कतारें लगी हुई हैं. जैसे-जैसे कोविड-19 के नए मामले बढ़ रहे हैं, ख़तरा हमारे घरों, परिवार के सदस्यों, सहकर्मियों, मित्रों और पड़ोसियों के क़रीब पहुँच चुका है.

मैं इस समय इतना असहाय महसूस कर रही हूँ. आईसीयू बेड और ऑक्सीजन सिलेण्डर की तलाश कर रहे अपने दोस्तों और सहकर्मियों की कोई मदद ना कर पाने की लाचारी. पूरी स्थिति ही भयावह है, और त्रासदीपूर्ण ढँग से जानी-पहचानी भी.

मुझे आज भी फ़रवरी 2020 का वो दिन याद है जब एक दोपहर मेरा फ़ोन बजा. दूसरी ओर, मेरी 75 वर्षीय सास थीं, जो कह रही थीं कि उन्हें साँस लेने में कठिनाई हो रही है.

मेरा दिल धक सा रह गया.

मुझे पता था कि मुझे जल्दी से जल्दी उनके पास जाना होगा, लेकिन दक्षिण भारत का तटीय शहर विशाखापत्तनम, मुम्बई से लगभग 1,400 किलोमीटर दूर था, जहाँ मैं काम करती हूँ.

उस समय कोविड-19 शब्द सभी के जीवन पर हावी होना शुरू नहीं हुआ था, इसके बारे में सिर्फ़ बात होनी शुरू ही हुई थी. ऐसे में मेरे मन में यही प्रश्न उठ रहा था कि आख़िर यह बीमारी मेरे देश, मेरे शहर और इस तरह मेरे परिवार तक किस तरह पहुँच गई.

हालाँकि, मैं जब घर के लिये निकली, तब भी दिल यह मान नहीं रहा था कि यह कोविड-19 हो सकता है.

वो यात्रा शायद मेरे जीवन की सबसे थकावट भरी यात्रा रही होगी. बाक़ी का समय अस्पतालों और कई तरह के परीक्षणों और दवाओं की जद्दोजहद में बीता. यह पहली बार था जब इस बीमारी की कड़वी सच्चाई से हमारा सामना हुआ. 

उस समय, मास्क पहनना शुरू ही हुआ था और लोग वास्तव में इसे गम्भीरता से नहीं ले रहे थे. अपनी सास के आस-पास मास्क पहनने की हिदायत देती डॉक्टर की आवाज, आज भी मेरे कानों में गूँजती है.

समर्पित देखभाल, उपचार और मेरी सास की मज़बूत संकल्प शक्ति ने उन्हें कोरोनावायरस को हराकर ठीक होने में मदद की. यह एक बहुत बड़ी राहत थी, और मैं फिर मुम्बई में अपने ड्यूटी स्टेशन पर लौट आई.

मैं प्रोटोकॉल के अनुरूप यहाँ 14 दिनों के लिये घर पर ही रही.

लेकिन किसने सोचा था कि घर पर बिताये वो 14 दिन, महीनों में तब्दील हो जाएँगे. 24 मार्च 2020 को राष्ट्रीय तालाबन्दी की घोषणा की गई.

कोई नहीं जानता था कि आगे क्या होगा. कॉलेज जाने वाले मेरे बच्चे, अपनी परीक्षा के बारे में चिन्तित थे; मेरे पति और मैं चिन्तित थे कि हम घर से काम किस तरह करेंगे.

© UNICEF/Vinay Panjwani
भारत में, अप्रैल महीने में, कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर देखी गई है जिसने ख़ासी तबाही मचा दी.

साथ ही, चिन्ता थी, हज़ारों मील दूर बैठे अपने माता-पिता की कि वो कैसे इन परिस्थितियों में अपना ध्यान रखेंगे.

प्रवासी मज़दूरों की पीड़ा

इन चिन्ताओं के बीच, पैदल घर लौटते प्रवासी मज़दूरों की तस्वीरें – शायद ये प्रारम्भिक संकेत थे कि यह महामारी कितने परिवारों के लिये पूरी तरह से विनाशकारी साबित होगी.

टीवी पर लाखों प्रवासी श्रमिकों की तस्वीरे भरी पड़ी थीं. घण्टों, यहाँ तक कि कई-कई दिनों तक, अपने बच्चों के साथ, कपड़े की थैलियों में अपना सामान लेकर, चिलचिलाती गर्मी में कम पानी के साथ, अक्सर नंगे पांव घर लौटते मज़दूर की तस्वीरें!

ये अनौपचारिक प्रवासी श्रमिक बड़े शहर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं: घरों का निर्माण, खाना बनाना, भोजन पहुँचाना, सैलून में बाल काटना, ऑटोमोबाइल उद्योग में काम करना, प्लम्बिंग करना, समाचार पत्र बाँटने सहित अन्य काम.

लेकिन तालाबन्दी की घोषणा के साथ, कम्पनियों ने अपने दरवाज़ें बन्द कर दिए और इनमें से कई प्रवासियों ने अपने घरों और गाँव लौटना ही सही समझा, क्योंकि उनके पास आजीविका चलाने का कोई विकल्प नहीं था.

घर जाने के लिये संघर्ष कर रहे लोगों की इन तस्वीरों ने बड़ा असर किया और मेरी अपनी चुनौतियों को समझने में मदद की.

मैं उस समय आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम से जुड़ी थी. तो मैंने अपने पर्यवेक्षक से मुझे उस योजना में शामिल करने को कहा, जो उन्होंने प्रवासी श्रमिकों को गरिमा के साथ घर पहुँचाने के मक़सद से बनाई थी.

यह महीनों के उस बेहद थकाने वाले, लेकिन संतोषजजनक काम की शुरूआत थी, जिसके बीच मैं बच्चों की देखभाल, खाना बनाने, साफ़-सफ़ाई और अन्य घर के काम संभालने की परिवार की अपेक्षाओं के साथ-साथ, काम के नए माहौल (और उन सभी जूम मीटिंग्स!) की चुनौतियों से भी निपटती रही.

हालाँकि, उस समय मैंने व्यंजन बनाने, बोर्ड गेम खेलने जैसे शौक पूरे कर, अधिक समय परिवार के साथ बिताने का आनंद लिया, लेकिन फिर भी मैं कभी भी 2020 में वापस नहीं जाना चाहूँगी.

कोविड-19 की छाया चारों ओर थी. दिल में डर व्याप्त था. मैं हर किसी की आवाज़ में चिन्ता और तनाव महसूस कर सकती थी. हर कोई ख़ुद को समझाने की कोशिश कर रहा था कि सबकुछ जल्दी ही सामान्य हो जाएगा.

लेकिन आख़िर कब? हम सभी एक-दूसरे के लिये सकारात्मक और मज़बूत बने रहने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे थे. यही वजह थी कि यूनीसेफ़ इण्डिया के कर्मचारियों को जोड़ने के लिये हमने एक समाचार पत्र “रे ऑफ़ होप” भी शुरू किया.

2020 में इसके लगभग 20 संस्करण भी प्रकाशित हुए और जनवरी 2021 तक लगने लगा कि हमारे जीवन का सबसे ख़राब वर्ष अब बीत चुका है.

© UNICEF/Biju Boro
भारत के पूर्वोत्तर गुवाहाटी शहर में कोविड-19 का टीका लगवाती महिला.

2021 की दूसरी लहर

लेकिन 2021 मानो मुझे ग़लत साबित करने का इन्तज़ार कर रहा था.

इस वर्ष, जैसे-जैसे मामले फिर बढ़े हैं, मैंने हर चीज़ पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है. क्यों हो रहा है? हमने क्या गलत किया? भगवान हमें इस तरह से सज़ा क्यों देना चाहता है?

बहुत कठिन होता हर एक दिन किसी न किसी जान-पहचान के व्यक्ति की मौत की ख़बर सुनना. लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से केवल यही हो रहा है.

लेकिन हिम्मत अभी भी बनी है तो केवल सभी को एक-दूसरे की मदद के लिये एक साथ आते देखकर.

अनजान लोगों की मदद के लिये एक अतिरिक्त कॉल करने के लिये मुस्तैद, ज़रूरत पड़ने पर ऑक्सीजन सिलेण्डर दिलाने के लिये मीलों का सफ़र तय करते दोस्तों की कहानियाँ, अपने से कम उम्र के व्यक्ति के लिये अस्पताल का अपना बिस्तर छोड़ देने वाले बुज़ुर्ग की कहानी, घर पर मरीज़ों के लिये खाना बनाने वाले लोगों की कहानी, और साथ मिलकर सुविधाओं के बारे में जानकारी प्रदान करने वाले युवाओं की कहानियाँ.

करुणा और दयालुता की इतनी कहानियाँ हैं, जोकि एक बार फिर मानवता में विश्वास जगाती हैं, हम ज़रूर कामयाब होंगे और एक साथ मिलकर इस पर विजय हासिल करेंगे.”

यह ब्लॉग पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.

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