आप्रवासी कामगारों को, स्थानीय लोगों की तुलना में, बहुत कम मेहनताना

अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने सोमवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा है कि आप्रवासियों और स्थानीय या राष्ट्रीय कामगारों को मिलने वाले वेतन या मेहनताना के बीच काफ़ी बड़ा अन्तर है और ये अन्तर लगातार बढ़ता जा रहा है, यहाँ तक कि कोविड-19 महामारी के प्रभावों के कारण ये अन्तर और भी ज़्यादा बड़ा हो सकता है.

इस रिपोर्ट में ऐसे 49 देशों के हालात का जायज़ा लिया गया है जहाँ दुनिया भर के प्रवासी कामगारों की लगभग आधी संख्या रहती है, और पाया गया है कि प्रवासी कामगारों को औसतन लगभग 13 प्रतिशत कम वेतन या मेहनताना मिलता है.

A new ILO Migrant Pay Gap report has highlighted the ever-widening inequalities taking place in the #worldofwork during the #COVID19 crisis. In some countries a national can be paid up to 42% more than a migrant.https://t.co/ngBYFc9j5G— International Labour Organization (@ilo) December 14, 2020

इस रिपोर्ट का नाम है – प्रवासी वेतन अन्तर: आप्रवासियों और राष्ट्रीय कामगारों के बीच वेतन अन्तर को समझना.
श्रम संगठन की प्रवासी शाखा की प्रमुख मिशेल लीटॉन का कहना है, “हमारी रिपोर्ट दर्शाती है कि कोविड-19 महामारी के फैलाव से पहले भी, आप्रवासी कामगारों को वेतन के मामले में काफ़ी बड़े भेदभाव और अन्तर का सामना करना पड़ता था.”
“और हम जानते हैं कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान वेतन या मेहनताना में ये अन्तर ना केवल और ज़्यादा व्यापक हुआ है, बल्कि आप्रवासी कामगारों को इस महामारी के दौरान भी भेदभाव का निशाना बनाया जा रहा है.”
महिलाएँ दोगुने भेदभाव की शिकार
मिशेल लीटॉन ने रिपोर्ट के निष्कर्ष प्रस्तुत करने के लिये बुलाई गई प्रेस वार्ता में कहा कि कुछ मामलों में तो इस अन्तर को शिक्षा, कौशल और अनुभवों जैसे उद्देश्यपरक तत्वों के आधार पर सही ठहराया जा सकता है, मगर, कुल मिलाकर देखा जाए तो आप्रवासियों को कम वेतन या मेहनताना मिलने का मुख्य कारण भेदभाव ही है.
उन्होंने कहा, “इसलिये, हमारे समाजों और कामकाज के स्थानों पर, बहुत गहराई से जड़ जमाए हुए पूर्वाग्रहों और भेदभाव का मुक़ाबला करना, पहले से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है. और आप्रवासियों को मिलने वाले कम वेतन के मुद्दे का हल निकालना ना केवल सामाजिक न्याय का मुद्दा है बल्कि परिवारों के बीच आय असमानताएँ कम करने के लिये भी, ये महिलाओं और पुरुषों के बीच असमानता को कम करने के लिये बहुत अहम मुद्दा है.”
महिला आप्रवासी कामगार अक्सर घरेलू कामकाज, या स्वास्थ्य देखभाल के कामकाज करती हैं, जहाँ उनके साथ वेतन या मेहनताना का मामले में दोगुना अन्तर किया जाता है, और अन्ततः वो राष्ट्रीय या स्थानीय कामगारों और पुरुष आप्रवासी कामगारों की तुलना में औसतन कम वेतन पाती हैं.
ये वेतन अन्तर साइप्रस में सबसे ज़्यादा क़रीब 42 प्रतिशत, इटली में 30 प्रतिशत और ऑस्ट्रिया में 25 प्रतिशत पाया गया. योरोपीय संघ के क्षेत्रीय स्तर पर ये अन्तर वैश्विक औसत से कम स्तर पर 9 प्रतिशत से कम पाया गया.
उच्च आय वाले देशों में, आप्रवासी कामगारों को अक्सर जोखिम वाले कामकाज में लगाया जाता है, जिनमें लगभग 27 प्रतिशत को अस्थाई रोज़गार ठेके मिलते हैं और 15 प्रतिशत आप्रवासी कामगार अंशकालिक रूप में काम करते हैं.
ये आप्रवासी कामगार खेतीबाड़ी, मछली शिकार, जंगल गतिविधियाँ, खदान, खुदाई, औद्योगिक उत्पादन, ऊर्जा व पानी उपभोक्ता सेवाओं और ढाँचा निर्माण क्षेत्र में काम करते हैं.
लेकिन निर्धन देशों में, जहाँ आप्रवासी कामगार अक्सर धनी देशों से आए कुशल व हुनरमन्द कामगार होते हैं, उन्हें अस्थाई ठेके पर भेजा जाताहै, मगर वहाँ उन्हें मिलने वाले वेतन या मेहनताना में सकारात्मक अन्तर होता है, यानि इन आप्रवासी कामगारों को राष्ट्रीय या स्थानीय कामगारों की तुलना में लगभग 17.3 प्रतिशत ज़्यादा वेतन मिलता है., अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने सोमवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा है कि आप्रवासियों और स्थानीय या राष्ट्रीय कामगारों को मिलने वाले वेतन या मेहनताना के बीच काफ़ी बड़ा अन्तर है और ये अन्तर लगातार बढ़ता जा रहा है, यहाँ तक कि कोविड-19 महामारी के प्रभावों के कारण ये अन्तर और भी ज़्यादा बड़ा हो सकता है.

इस रिपोर्ट में ऐसे 49 देशों के हालात का जायज़ा लिया गया है जहाँ दुनिया भर के प्रवासी कामगारों की लगभग आधी संख्या रहती है, और पाया गया है कि प्रवासी कामगारों को औसतन लगभग 13 प्रतिशत कम वेतन या मेहनताना मिलता है.

इस रिपोर्ट का नाम है – प्रवासी वेतन अन्तर: आप्रवासियों और राष्ट्रीय कामगारों के बीच वेतन अन्तर को समझना.

श्रम संगठन की प्रवासी शाखा की प्रमुख मिशेल लीटॉन का कहना है, “हमारी रिपोर्ट दर्शाती है कि कोविड-19 महामारी के फैलाव से पहले भी, आप्रवासी कामगारों को वेतन के मामले में काफ़ी बड़े भेदभाव और अन्तर का सामना करना पड़ता था.”

“और हम जानते हैं कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान वेतन या मेहनताना में ये अन्तर ना केवल और ज़्यादा व्यापक हुआ है, बल्कि आप्रवासी कामगारों को इस महामारी के दौरान भी भेदभाव का निशाना बनाया जा रहा है.”

महिलाएँ दोगुने भेदभाव की शिकार

मिशेल लीटॉन ने रिपोर्ट के निष्कर्ष प्रस्तुत करने के लिये बुलाई गई प्रेस वार्ता में कहा कि कुछ मामलों में तो इस अन्तर को शिक्षा, कौशल और अनुभवों जैसे उद्देश्यपरक तत्वों के आधार पर सही ठहराया जा सकता है, मगर, कुल मिलाकर देखा जाए तो आप्रवासियों को कम वेतन या मेहनताना मिलने का मुख्य कारण भेदभाव ही है.

उन्होंने कहा, “इसलिये, हमारे समाजों और कामकाज के स्थानों पर, बहुत गहराई से जड़ जमाए हुए पूर्वाग्रहों और भेदभाव का मुक़ाबला करना, पहले से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है. और आप्रवासियों को मिलने वाले कम वेतन के मुद्दे का हल निकालना ना केवल सामाजिक न्याय का मुद्दा है बल्कि परिवारों के बीच आय असमानताएँ कम करने के लिये भी, ये महिलाओं और पुरुषों के बीच असमानता को कम करने के लिये बहुत अहम मुद्दा है.”

महिला आप्रवासी कामगार अक्सर घरेलू कामकाज, या स्वास्थ्य देखभाल के कामकाज करती हैं, जहाँ उनके साथ वेतन या मेहनताना का मामले में दोगुना अन्तर किया जाता है, और अन्ततः वो राष्ट्रीय या स्थानीय कामगारों और पुरुष आप्रवासी कामगारों की तुलना में औसतन कम वेतन पाती हैं.

ये वेतन अन्तर साइप्रस में सबसे ज़्यादा क़रीब 42 प्रतिशत, इटली में 30 प्रतिशत और ऑस्ट्रिया में 25 प्रतिशत पाया गया. योरोपीय संघ के क्षेत्रीय स्तर पर ये अन्तर वैश्विक औसत से कम स्तर पर 9 प्रतिशत से कम पाया गया.

उच्च आय वाले देशों में, आप्रवासी कामगारों को अक्सर जोखिम वाले कामकाज में लगाया जाता है, जिनमें लगभग 27 प्रतिशत को अस्थाई रोज़गार ठेके मिलते हैं और 15 प्रतिशत आप्रवासी कामगार अंशकालिक रूप में काम करते हैं.

ये आप्रवासी कामगार खेतीबाड़ी, मछली शिकार, जंगल गतिविधियाँ, खदान, खुदाई, औद्योगिक उत्पादन, ऊर्जा व पानी उपभोक्ता सेवाओं और ढाँचा निर्माण क्षेत्र में काम करते हैं.

लेकिन निर्धन देशों में, जहाँ आप्रवासी कामगार अक्सर धनी देशों से आए कुशल व हुनरमन्द कामगार होते हैं, उन्हें अस्थाई ठेके पर भेजा जाताहै, मगर वहाँ उन्हें मिलने वाले वेतन या मेहनताना में सकारात्मक अन्तर होता है, यानि इन आप्रवासी कामगारों को राष्ट्रीय या स्थानीय कामगारों की तुलना में लगभग 17.3 प्रतिशत ज़्यादा वेतन मिलता है.

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