‘आर्टिफ़िशियल इन्टैलिजेंस’ के युग में बच्चों का संरक्षण

भारत में संयुक्त राष्ट्र की रैज़िडैंट कोऑर्डिनेटर, रेनाटा डिज़ालिएन का मानना है कि डिजिटल वातावरण में बच्चों के अधिकारों, गोपनीयता और कल्याण को संरक्षित किया जाना चाहिये, ठीक उसी तरह, जिस तरह हम भौतिक दुनिया में उनकी रक्षा करते हैं.

आज हम इतिहास की सबसे पहली “AI” यानि (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) पीढ़ी के बीच रह रहे हैं.
ऐलेक्सा के साथ बातचीत करने से लेकर उनके खेल के रोबोट साथियों, या फिर यूट्यूब के वर्महोल में ग़ायब होने की कला तक – आज के बच्चे और किशोर ऐसी दुनिया में पैदा हुए हैं, जो आभासी वास्तविकता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से संचालित हो रही है.
सभी मूलभूत तकनीकी परिवर्तनों की तरह, मनुष्य क्या-कुछ कर सकता है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता न केवल उसे बदल सकती है, बल्कि यह हमारे व्यवहारों, हमारी प्राथमिकताओं, दुनिया की हमारी अवधारणाओं और ख़ुद को भी आकार दे रही है.
पुरानी पीढ़ी अब भी एआई और डिजिटल दुनिया से पहले की ज़िन्दगी याद करती है – हमारे सन्दर्भ, एंकर और पोल सितारे भले ही चौथी औद्योगिक क्रान्ति से पहले के काल के हों, लेकिन उन लाखों बच्चों और किशोरों के नहीं, जो बाद में पैदा हुए. तो उनके और हमारे लिये – उनके माता-पिता और अभिभावकों के लिये, इसके क्या मायने हैं?
सभी बच्चों को ऑनलाइन लाना और उनके लिये सुरक्षित डिजिटल स्थान बनाना
सबसे महत्वपूर्ण चिन्ताओं में से एक यह है कि हर इनसान इस परिवर्तन से सामने आए अवसरों का लाभ नहीं उठा सकता. यूनीसेफ़ और आईटीयू के अनुसार, दुनिया के दो-तिहाई बच्चों के पास घर पर इण्टरनेट की सुविधा नहीं है.
भारत में, दिल्ली के एक विश्वविद्यालय के एक युवा छात्र की आत्महत्या के पीछे का कारण, पिछले साल डिजिटल ‘हैव और हैव-नॉट्स’ यानि साधन सम्पन्न और वंचितों के बीच का विभाजन था, क्योंकि उनके माता-पिता का सामर्थ्य नहीं था कि वो घर पर लैपटॉप या स्मार्टफोन ख़रीद सकें.

©ITU/Rowan Farrellआईटीयू टेलीकॉम वर्ल्ड 2019 के दौरान चाइना टेलीकॉम का 5-जी चालित रोबोट.

जब तक हम इस डिजिटल खाई को ख़त्म करने के लिये तेज़ और ठोस कार्रवाई नहीं करते हैं, एआई –  मौलिक रूप से विभिन्न जातियों, सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, लिंग और विभिन्न क्षेत्रों के बच्चों के बीच सामाजिक असमानताओं को बढ़ाएगी.
हमें, डिजिटल अन्तर ख़त्म करने के अलावा, बच्चों और किशोरों को ऑन-लाइन बेहतर ढंग से संरक्षित करने की आवश्यकता है. जैसा कि मैंने पिछले ब्लाग में तर्क दिया था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विस्तार इतनी तेज़ी से हो रहा है कि हम इसके निहितार्थों को समझने से बहुत पीछे हैं, विशेषकर बच्चों पर इसके प्रभाव को लेकर.
इससे अधिक सम्वेदनशील और कोई समूह नहीं, जिसे हमारी विशेष देखभाल की इतनी ज़रूरत हो. फिर भी, प्रश्न यह है कि बच्चों के लिये सुरक्षित ‘चाइल्डप्रूफ़ एआई’ कैसे सुनिश्चित की जाए? बच्चों के विकास के लिये एआई के फ़ायदों को प्रोत्साहित करते हुए उन्हें उसके नुक़सान से कैसे बचाएँ? माता-पिता और अभिभावक, समाज और सरकार के रूप में, हम इस एआई युक्त दुनिया में, अपने युवाओं के प्रति ज़िम्मेदारी कैसे निभाएँ, जब शायद हम ख़ुद ही इसे पूरी तरह समझने में नाकाम हैं? फिर, बच्चे और युवा अपनी रक्षा कर सकें, इसके लिये उन्हें पूर्ण ज्ञान, उपकरण और जागरूकता से कैसे सम्पन्न करें?
पुराने ज़माने की भौतिक दुनिया में, हमने बच्चों की सुरक्षा के लिये नियम व मानक विकसित किए थे: उदाहरण के लिये, अकेले यात्रा कर रहे बच्चे के लिये नीतियाँ और प्रोटोकॉल. कोई भी माता-पिता अपने छह साल के बच्चे को सामान के साथ, किसी अनजान जगह जाने के लिये बस या ट्रेन से अचानक जाने की अनुमति नहीं देंगे. या फिर,  पास के खेल के मैदान में अजनबियों से बात न करने की हिदायत और देखभाल करने वाले की पैनी निगरानी में ही खेलना. अनेक माता-पिता तो मीडिया द्वारा अपने बच्चों की फोटो खिंचवाने में भी हिचकते हैं, और कई देशों में तो समाचार एजेंसियाँ, बच्चों की सुरक्षा के लिये उनके चेहरे धुंधले कर दिखाती हैं, ताकि उनकी पहचान सुरक्षित रहे. ऑनलाइन माध्यमों के लिये यह सुरक्षा क्यों नहीं है?
वर्चुअल दुनिया बिना निगरानी की “छुट्टियों” और “खेल के मैदानों” से भरी हुई है – अन्य बच्चों के साथ और सम्भवतः बेईमान व्यस्कों, जो कभी-कभी बच्चों के नाम से पोस्ट करते हैं. अगर लोकप्रिय उदाहरणों के नाम लें तो वीडियो गेम और चैट फ़ोरम, Fortnite: Battle Royale, जैसे खेल, बच्चों को अपने दोस्तों के साथ मेलजोल करने के लिये ऑनलाइन मंच प्रदान करते हैं, लेकिन इन वर्चुअल खेल के मैदानों में बाल शिकारियों के लिये शिकार आसान हो जाता है. स्क्रीन समय पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगाने के बाद, बच्चे ऑनलाइन क्या कर रहे हैं, किसके साथ क्या कर रहे हैं, इस पर नज़र रखने के लिये माता-पिता को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. ऑनलाइन होमवर्क के साथ, यह और भी ज़्यादा कठिन हो गया है.
बच्चों की स्वतंत्रता का अधिकार
एआई सिस्टम चालित अनेक वीडियो गेम और सोशल नेटवर्क, बच्चों को इसकी लत लगाने के लिये डिज़ायन किये गए हैं – एल्गोरिदम और “लकीरें”, “पसन्द”, अनन्त स्क्रॉल, आदि जैसे तरीक़ों से. हो सकता है कि यह व्यवसायिक मॉडल का हिस्सा हो, लेकिन बच्चों को नुक़सान तो पहुँच ही चुका है – बचपन से किशोरावस्था तक के बच्चे, डिजिटल लत का शिकार हो रहे हैं. जब उन्हें एकाग्रता, कौशल, भावनात्मक और सामाजिक बुद्धिमत्ता सीखने की आवश्यकता होती है, तो उनके ध्यान देने की क्षमता घटाई जा रही है, व उनका सामाजिक सम्वाद तेज़ी से ‘वर्चुअलाइज़्ड’ हो रहा है.
इसी तरह, दुनिया के बारे में शुरुआती विचार गढ़ने की उम्र में बच्चों और युवाओं को गहरे वर्चुअल स्पेस में धकेला जा रहा है, जिसमें नक़ली समाचारों के ब्रह्माण्ड के साथ-साथ, साज़िश की थ्योरी, ग़लत प्रचार, हेकड़ी, ऑनलाइन बदमाशी, अभद्र भाषा जैसी चीज़ें शामिल हैं. हर बार क्लिक और स्क्रॉल करने के साथ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता उन्हें अलग-अलग गुटों में बाँटकर, उनके लिये विशेष रूप से तैयार सन्देश परोस रही है. यह सब हमारे बच्चों पर उस समय थोपा जा रहा है, जब वो यह समझने की कोशिश ही कर रहे होते हैं कि उनका और जिस दुनिया में वो रहते हैं, उसका अस्तित्व क्या है. उस समय, जब उन्हें समझने और करुणा व सदभावना जागृत करने के लिये विभिन्न दृष्टिकोणों, वरीयताओं, विश्वासों और रीति-रिवाज़ों को समझने एवं उनकी सराहना करना सीखना बेहद ज़रूरी है. 
बच्चों की डेटा हारवेस्टिंग और एल्गोरिथम पूर्वाग्रह से रक्षा
इसके अलावा,  अन्य अनेक परेशानियाँ भी ‘जैनेरेशन एआई’ बच्चों के रास्ते में आ रही हैं. आज बहुत से एआई खिलौने पहले से ही अपने व्यक्तित्व और आवाज़ के साथ प्रोग्राम किये गए होते हैं. इनसे बच्चों को खेल वाले, रचनात्मक अवसर मिलते हैं, और बहुत से तो साक्षरता, सामाजिक कौशल और भाषा के विकास में भी सहायक होते हैं. लेकिन इनके उपयोग को नियंत्रित करने के लिये कोई रूपरेखा न होने के कारण, वो हमारे बच्चों को सुनकर, उनका डेटा भी ग्रहण करते हैं.
इनमें से कुछ एआई खिलौने बच्चों के चेहरों की पहचान भी करते हैं. जर्मनी में इन्टरनेट से जुड़ी गुड़िया, ‘कायला’ पर प्रतिबन्ध लगाया गया, क्योंकि ऐसी चिन्ताएँ व्यक्त की गईं थीं कि इसे हैक करके बच्चों की जासूसी की जा सकती है. फिर भी ज़्यादातर देशों में इस तरह के खिलौनों पर प्रतिबन्ध लगाने के लिये क़ानूनी ढाँचे उपलब्ध नहीं हैं.

ITU Tसंयुक्त राष्ट्र आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस के इस्तेमाल से सम्बन्धित नियामक तैयार कर रहा है.

अन्त में, शिक्षा के क्षेत्र में, एआई को सीखने की सामग्री और बच्चे की ज़रूरतों के लिये शैक्षणिक दृष्टिकोण के अभूतपूर्व तरीक़े के रूप में उपयोग किया जा रहा है – जैसे कि बुद्धिमत्तापूर्ण ट्यूशन प्रणाली, आवश्यकता के अनुरूप पाठ्यक्रम योजनाएँ, और कल्पनाशील वर्चुअल रियलिटी निर्देश, जो बेहद ज्ञानवर्धक एवं आकर्षक पेशकश के ज़रिये शैक्षिक परिणाम बेहतर कर सकते हैं. लेकिन एल्गोरिदम भी शिक्षा प्रणालियों के साथ मौजूदा समस्याओं को बढ़ा सकते हैं और नई चुनौतियाँ पैदा कर सकते हैं – जब ब्रिटेन में महामारी के कारण अन्तरराष्ट्रीय बोर्ड (आईबी) की परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ीं, तो उसके विकल्प एल्गोरिदम के कारण हज़ारों छात्रों को कॉलेज के प्रवेश और छात्रवृत्ति से हाथ धोना पड़ा. जब तक बच्चों के शैक्षिक और प्रदर्शन डेटा को गोपनीय व गुमनाम नहीं रखा जाता, तब तक यह अनजाने में ही बच्चों को टाइपकास्ट या ब्राण्ड करके, बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर सकता है.
एआई दुनिया में बाल अधिकारों और सुरक्षा का संचालन
तो, हम डिजिटल अन्तर को पाटकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में बच्चों के अधिकारों की रक्षा कैसे कर सकते हैं? हम बच्चों के लिये, एआई की कमज़ोरियों को ऊपर रखते हुए, एआई के लाभों को कैसे सन्तुलित करें, जिससे अनजाने में उनसे नुक़सान या उनका दुरुपयोग न हो सके?
चौथी औद्योगिक क्रान्ति के अगले चरण में सभी बच्चों तक इन्टरनेट की पहुँच बढ़ाने के लिये एक व्यापक योजना शामिल होनी चाहिये. सरकारें, निजी क्षेत्र, नागरिक समाज, माता-पिता और बच्चों को इसके लिये अभी से ज़ोर लगाना चाहिये, इससे पहले कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पहले से मौजूद असमानताओं को और गहरा करे और नई असमानताएँ पैदा करे.
ऑन-लाइन नुक़सान कम करने पर, हमें एक बहु-आयामी कार्रवाई योजना की आवश्यकता है: हमें क़ानूनी और तकनीकी सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है; हमें माता-पिता, अभिभावकों और बच्चों के बीच जागरूकता की आवश्यकता है कि एआई कैसे काम करता है; हमें सुरक्षित एआई ऐप्स पर ध्वनि विकल्पों को सक्षम करने के लिये भरोसेमन्द मानक और रेटिंग प्रणाली की आवश्यकता है; हमें अनाम खातों पर प्रतिबन्ध लगाने की आवश्यकता है; हमें एआई सिस्टम की नीति और डिज़ायन में अन्तर्निहित भेदभाव रहित और निष्पक्षता के नैतिक सिद्धान्त लागू करने की आवश्यकता है – हमें उन सभी एल्गोरिदम के लिये “इससे कोई नुक़सान नहीं” आधारित जोखिम आकलन की आवश्यकता है, जिनका बच्चों या उनके डेटा के साथ सम्पर्क रहता है.
संक्षेप में, हमें बच्चों के लिये सुरक्षित ऑनलाइन स्थान चाहिये, बिना एल्गोरिदमिक हेरफेर और प्रतिबन्धित प्रोफ़ाइलिंग व डेटा संग्रह के. हमें ऑनलाइन टूल (और एक ऑनलाइन संस्कृति) की आवश्यकता है जो इसकी लत रोकने में मदद करे, जो ध्यान-केन्द्रित करने के कौशल को बढ़ावा दे, जो बच्चों के ज्ञान की सीमा को बढ़ाए, विभिन्न दृष्टिकोणों के लिये समझ और प्रशंसा का विस्तार करे, और जो उनकी सीखने की सामाजिक व भावनात्मक क्षमता का निर्माण करे.
बाल अधिकारों पर कन्वेंशन के तहत, सभी सार्वजनिक और निजी भागीदारों से उनकी सभी विकासात्मक गतिविधियों और सेवाओं के प्रावधान के तहत, बच्चे के सर्वोत्तम हित में कार्य करने का आग्रह किया गया है. पिछले महीने, एक ऐतिहासिक फ़ैसले में, बाल अधिकारों पर कन्वेंशन लागू करने और डिजिटल वातावरण में सभी बच्चों के अधिकारों के लिये, बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र की समिति ने, सामान्य टिप्पणी-25 को अपनाया. यह आगे के लम्बे रास्ते की ओर एक महत्वपूर्ण पहला क़दम है.
इस वर्ष सदस्य देशों द्वारा अपनाई जाने वाली नैतिक एआई की सिफ़ारिशों का मसौदा तैयार करने में, यूनेस्को ने युवाओं समेत अन्य हितधारकों के साथ परामर्श किया और ‘MOOC’ के माध्यम से एआई साक्षरता बढ़ाने की कोशिशों में लगा है. यूनेस्को के शान्ति व टिकाऊ विकास के लिये महात्मा गांधी शिक्षा संस्थान ने, इस वर्ष भारत में यूनीसेफ़, यूएनवी, और संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर, कृत्रिम बुद्धमत्ता से जुड़ी नैतिक चिन्ताओं को समझने के लिये, युवाओं के साथ राष्ट्रव्यापी परामर्श किया.
भारत सरकार ने एक क़ानूनी ढाँचे समेत, बच्चों के अधिकारों और कल्याण की रक्षा के लिये मज़बूत नीतियाँ बनाई हैं, जिनमें शिक्षा का अधिकार भी शामिल है. दुरुपयोग और हिंसा को रोकने के लिये बच्चों के लिये 2013 की राष्ट्रीय नीति जैसे कई प्रकार के क़ानून और नीतियाँ, डिजिटल स्थान में बच्चों की रक्षा के लिये लागू की जा सकती हैं.
लेकिन अभी बहुत कुछ किये जाने की ज़रूरत है, भारत ही नहीं, दुनिया भर में. और इस परस्पर जुड़े संसार में, हम बहुपक्षीय और बहु-हितधारक समूहों में जितनी सहमति बना सकते हैं, उतना ही राष्ट्रीय और स्थानीय रूप से इसे लागू करना आसान हो सकता है. जिस तरह भारत ने मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को आकार देने में मदद की और दुनिया को अहिंसा का सिद्धान्त दिया, यह महान देश, ‘जैनरेशन एआई’ के लिये नैतिक मानदण्ड सुनिश्चित करने के मक़सद से अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को एक-साथ ला सकता है., भारत में संयुक्त राष्ट्र की रैज़िडैंट कोऑर्डिनेटर, रेनाटा डिज़ालिएन का मानना है कि डिजिटल वातावरण में बच्चों के अधिकारों, गोपनीयता और कल्याण को संरक्षित किया जाना चाहिये, ठीक उसी तरह, जिस तरह हम भौतिक दुनिया में उनकी रक्षा करते हैं.

आज हम इतिहास की सबसे पहली “AI” यानि (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) पीढ़ी के बीच रह रहे हैं.

ऐलेक्सा के साथ बातचीत करने से लेकर उनके खेल के रोबोट साथियों, या फिर यूट्यूब के वर्महोल में ग़ायब होने की कला तक – आज के बच्चे और किशोर ऐसी दुनिया में पैदा हुए हैं, जो आभासी वास्तविकता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से संचालित हो रही है.

सभी मूलभूत तकनीकी परिवर्तनों की तरह, मनुष्य क्या-कुछ कर सकता है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता न केवल उसे बदल सकती है, बल्कि यह हमारे व्यवहारों, हमारी प्राथमिकताओं, दुनिया की हमारी अवधारणाओं और ख़ुद को भी आकार दे रही है.

पुरानी पीढ़ी अब भी एआई और डिजिटल दुनिया से पहले की ज़िन्दगी याद करती है – हमारे सन्दर्भ, एंकर और पोल सितारे भले ही चौथी औद्योगिक क्रान्ति से पहले के काल के हों, लेकिन उन लाखों बच्चों और किशोरों के नहीं, जो बाद में पैदा हुए. तो उनके और हमारे लिये – उनके माता-पिता और अभिभावकों के लिये, इसके क्या मायने हैं?

सभी बच्चों को ऑनलाइन लाना और उनके लिये सुरक्षित डिजिटल स्थान बनाना

सबसे महत्वपूर्ण चिन्ताओं में से एक यह है कि हर इनसान इस परिवर्तन से सामने आए अवसरों का लाभ नहीं उठा सकता. यूनीसेफ़ और आईटीयू के अनुसार, दुनिया के दो-तिहाई बच्चों के पास घर पर इण्टरनेट की सुविधा नहीं है.

भारत में, दिल्ली के एक विश्वविद्यालय के एक युवा छात्र की आत्महत्या के पीछे का कारण, पिछले साल डिजिटल ‘हैव और हैव-नॉट्स’ यानि साधन सम्पन्न और वंचितों के बीच का विभाजन था, क्योंकि उनके माता-पिता का सामर्थ्य नहीं था कि वो घर पर लैपटॉप या स्मार्टफोन ख़रीद सकें.


©ITU/Rowan Farrell
आईटीयू टेलीकॉम वर्ल्ड 2019 के दौरान चाइना टेलीकॉम का 5-जी चालित रोबोट.

जब तक हम इस डिजिटल खाई को ख़त्म करने के लिये तेज़ और ठोस कार्रवाई नहीं करते हैं, एआई –  मौलिक रूप से विभिन्न जातियों, सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, लिंग और विभिन्न क्षेत्रों के बच्चों के बीच सामाजिक असमानताओं को बढ़ाएगी.

हमें, डिजिटल अन्तर ख़त्म करने के अलावा, बच्चों और किशोरों को ऑन-लाइन बेहतर ढंग से संरक्षित करने की आवश्यकता है. जैसा कि मैंने पिछले ब्लाग में तर्क दिया था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विस्तार इतनी तेज़ी से हो रहा है कि हम इसके निहितार्थों को समझने से बहुत पीछे हैं, विशेषकर बच्चों पर इसके प्रभाव को लेकर.

इससे अधिक सम्वेदनशील और कोई समूह नहीं, जिसे हमारी विशेष देखभाल की इतनी ज़रूरत हो. फिर भी, प्रश्न यह है कि बच्चों के लिये सुरक्षित ‘चाइल्डप्रूफ़ एआई’ कैसे सुनिश्चित की जाए? बच्चों के विकास के लिये एआई के फ़ायदों को प्रोत्साहित करते हुए उन्हें उसके नुक़सान से कैसे बचाएँ? माता-पिता और अभिभावक, समाज और सरकार के रूप में, हम इस एआई युक्त दुनिया में, अपने युवाओं के प्रति ज़िम्मेदारी कैसे निभाएँ, जब शायद हम ख़ुद ही इसे पूरी तरह समझने में नाकाम हैं? फिर, बच्चे और युवा अपनी रक्षा कर सकें, इसके लिये उन्हें पूर्ण ज्ञान, उपकरण और जागरूकता से कैसे सम्पन्न करें?

पुराने ज़माने की भौतिक दुनिया में, हमने बच्चों की सुरक्षा के लिये नियम व मानक विकसित किए थे: उदाहरण के लिये, अकेले यात्रा कर रहे बच्चे के लिये नीतियाँ और प्रोटोकॉल. कोई भी माता-पिता अपने छह साल के बच्चे को सामान के साथ, किसी अनजान जगह जाने के लिये बस या ट्रेन से अचानक जाने की अनुमति नहीं देंगे. या फिर,  पास के खेल के मैदान में अजनबियों से बात न करने की हिदायत और देखभाल करने वाले की पैनी निगरानी में ही खेलना. अनेक माता-पिता तो मीडिया द्वारा अपने बच्चों की फोटो खिंचवाने में भी हिचकते हैं, और कई देशों में तो समाचार एजेंसियाँ, बच्चों की सुरक्षा के लिये उनके चेहरे धुंधले कर दिखाती हैं, ताकि उनकी पहचान सुरक्षित रहे. ऑनलाइन माध्यमों के लिये यह सुरक्षा क्यों नहीं है?

वर्चुअल दुनिया बिना निगरानी की “छुट्टियों” और “खेल के मैदानों” से भरी हुई है – अन्य बच्चों के साथ और सम्भवतः बेईमान व्यस्कों, जो कभी-कभी बच्चों के नाम से पोस्ट करते हैं. अगर लोकप्रिय उदाहरणों के नाम लें तो वीडियो गेम और चैट फ़ोरम, Fortnite: Battle Royale, जैसे खेल, बच्चों को अपने दोस्तों के साथ मेलजोल करने के लिये ऑनलाइन मंच प्रदान करते हैं, लेकिन इन वर्चुअल खेल के मैदानों में बाल शिकारियों के लिये शिकार आसान हो जाता है. स्क्रीन समय पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगाने के बाद, बच्चे ऑनलाइन क्या कर रहे हैं, किसके साथ क्या कर रहे हैं, इस पर नज़र रखने के लिये माता-पिता को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. ऑनलाइन होमवर्क के साथ, यह और भी ज़्यादा कठिन हो गया है.

बच्चों की स्वतंत्रता का अधिकार

एआई सिस्टम चालित अनेक वीडियो गेम और सोशल नेटवर्क, बच्चों को इसकी लत लगाने के लिये डिज़ायन किये गए हैं – एल्गोरिदम और “लकीरें”, “पसन्द”, अनन्त स्क्रॉल, आदि जैसे तरीक़ों से. हो सकता है कि यह व्यवसायिक मॉडल का हिस्सा हो, लेकिन बच्चों को नुक़सान तो पहुँच ही चुका है – बचपन से किशोरावस्था तक के बच्चे, डिजिटल लत का शिकार हो रहे हैं. जब उन्हें एकाग्रता, कौशल, भावनात्मक और सामाजिक बुद्धिमत्ता सीखने की आवश्यकता होती है, तो उनके ध्यान देने की क्षमता घटाई जा रही है, व उनका सामाजिक सम्वाद तेज़ी से ‘वर्चुअलाइज़्ड’ हो रहा है.

इसी तरह, दुनिया के बारे में शुरुआती विचार गढ़ने की उम्र में बच्चों और युवाओं को गहरे वर्चुअल स्पेस में धकेला जा रहा है, जिसमें नक़ली समाचारों के ब्रह्माण्ड के साथ-साथ, साज़िश की थ्योरी, ग़लत प्रचार, हेकड़ी, ऑनलाइन बदमाशी, अभद्र भाषा जैसी चीज़ें शामिल हैं. हर बार क्लिक और स्क्रॉल करने के साथ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता उन्हें अलग-अलग गुटों में बाँटकर, उनके लिये विशेष रूप से तैयार सन्देश परोस रही है. यह सब हमारे बच्चों पर उस समय थोपा जा रहा है, जब वो यह समझने की कोशिश ही कर रहे होते हैं कि उनका और जिस दुनिया में वो रहते हैं, उसका अस्तित्व क्या है. उस समय, जब उन्हें समझने और करुणा व सदभावना जागृत करने के लिये विभिन्न दृष्टिकोणों, वरीयताओं, विश्वासों और रीति-रिवाज़ों को समझने एवं उनकी सराहना करना सीखना बेहद ज़रूरी है. 

बच्चों की डेटा हारवेस्टिंग और एल्गोरिथम पूर्वाग्रह से रक्षा

इसके अलावा,  अन्य अनेक परेशानियाँ भी ‘जैनेरेशन एआई’ बच्चों के रास्ते में आ रही हैं. आज बहुत से एआई खिलौने पहले से ही अपने व्यक्तित्व और आवाज़ के साथ प्रोग्राम किये गए होते हैं. इनसे बच्चों को खेल वाले, रचनात्मक अवसर मिलते हैं, और बहुत से तो साक्षरता, सामाजिक कौशल और भाषा के विकास में भी सहायक होते हैं. लेकिन इनके उपयोग को नियंत्रित करने के लिये कोई रूपरेखा न होने के कारण, वो हमारे बच्चों को सुनकर, उनका डेटा भी ग्रहण करते हैं.

इनमें से कुछ एआई खिलौने बच्चों के चेहरों की पहचान भी करते हैं. जर्मनी में इन्टरनेट से जुड़ी गुड़िया, ‘कायला’ पर प्रतिबन्ध लगाया गया, क्योंकि ऐसी चिन्ताएँ व्यक्त की गईं थीं कि इसे हैक करके बच्चों की जासूसी की जा सकती है. फिर भी ज़्यादातर देशों में इस तरह के खिलौनों पर प्रतिबन्ध लगाने के लिये क़ानूनी ढाँचे उपलब्ध नहीं हैं.


ITU T
संयुक्त राष्ट्र आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस के इस्तेमाल से सम्बन्धित नियामक तैयार कर रहा है.

अन्त में, शिक्षा के क्षेत्र में, एआई को सीखने की सामग्री और बच्चे की ज़रूरतों के लिये शैक्षणिक दृष्टिकोण के अभूतपूर्व तरीक़े के रूप में उपयोग किया जा रहा है – जैसे कि बुद्धिमत्तापूर्ण ट्यूशन प्रणाली, आवश्यकता के अनुरूप पाठ्यक्रम योजनाएँ, और कल्पनाशील वर्चुअल रियलिटी निर्देश, जो बेहद ज्ञानवर्धक एवं आकर्षक पेशकश के ज़रिये शैक्षिक परिणाम बेहतर कर सकते हैं. लेकिन एल्गोरिदम भी शिक्षा प्रणालियों के साथ मौजूदा समस्याओं को बढ़ा सकते हैं और नई चुनौतियाँ पैदा कर सकते हैं – जब ब्रिटेन में महामारी के कारण अन्तरराष्ट्रीय बोर्ड (आईबी) की परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ीं, तो उसके विकल्प एल्गोरिदम के कारण हज़ारों छात्रों को कॉलेज के प्रवेश और छात्रवृत्ति से हाथ धोना पड़ा. जब तक बच्चों के शैक्षिक और प्रदर्शन डेटा को गोपनीय व गुमनाम नहीं रखा जाता, तब तक यह अनजाने में ही बच्चों को टाइपकास्ट या ब्राण्ड करके, बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर सकता है.

एआई दुनिया में बाल अधिकारों और सुरक्षा का संचालन

तो, हम डिजिटल अन्तर को पाटकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में बच्चों के अधिकारों की रक्षा कैसे कर सकते हैं? हम बच्चों के लिये, एआई की कमज़ोरियों को ऊपर रखते हुए, एआई के लाभों को कैसे सन्तुलित करें, जिससे अनजाने में उनसे नुक़सान या उनका दुरुपयोग न हो सके?

चौथी औद्योगिक क्रान्ति के अगले चरण में सभी बच्चों तक इन्टरनेट की पहुँच बढ़ाने के लिये एक व्यापक योजना शामिल होनी चाहिये. सरकारें, निजी क्षेत्र, नागरिक समाज, माता-पिता और बच्चों को इसके लिये अभी से ज़ोर लगाना चाहिये, इससे पहले कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पहले से मौजूद असमानताओं को और गहरा करे और नई असमानताएँ पैदा करे.

ऑन-लाइन नुक़सान कम करने पर, हमें एक बहु-आयामी कार्रवाई योजना की आवश्यकता है: हमें क़ानूनी और तकनीकी सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है; हमें माता-पिता, अभिभावकों और बच्चों के बीच जागरूकता की आवश्यकता है कि एआई कैसे काम करता है; हमें सुरक्षित एआई ऐप्स पर ध्वनि विकल्पों को सक्षम करने के लिये भरोसेमन्द मानक और रेटिंग प्रणाली की आवश्यकता है; हमें अनाम खातों पर प्रतिबन्ध लगाने की आवश्यकता है; हमें एआई सिस्टम की नीति और डिज़ायन में अन्तर्निहित भेदभाव रहित और निष्पक्षता के नैतिक सिद्धान्त लागू करने की आवश्यकता है – हमें उन सभी एल्गोरिदम के लिये “इससे कोई नुक़सान नहीं” आधारित जोखिम आकलन की आवश्यकता है, जिनका बच्चों या उनके डेटा के साथ सम्पर्क रहता है.

संक्षेप में, हमें बच्चों के लिये सुरक्षित ऑनलाइन स्थान चाहिये, बिना एल्गोरिदमिक हेरफेर और प्रतिबन्धित प्रोफ़ाइलिंग व डेटा संग्रह के. हमें ऑनलाइन टूल (और एक ऑनलाइन संस्कृति) की आवश्यकता है जो इसकी लत रोकने में मदद करे, जो ध्यान-केन्द्रित करने के कौशल को बढ़ावा दे, जो बच्चों के ज्ञान की सीमा को बढ़ाए, विभिन्न दृष्टिकोणों के लिये समझ और प्रशंसा का विस्तार करे, और जो उनकी सीखने की सामाजिक व भावनात्मक क्षमता का निर्माण करे.

बाल अधिकारों पर कन्वेंशन के तहत, सभी सार्वजनिक और निजी भागीदारों से उनकी सभी विकासात्मक गतिविधियों और सेवाओं के प्रावधान के तहत, बच्चे के सर्वोत्तम हित में कार्य करने का आग्रह किया गया है. पिछले महीने, एक ऐतिहासिक फ़ैसले में, बाल अधिकारों पर कन्वेंशन लागू करने और डिजिटल वातावरण में सभी बच्चों के अधिकारों के लिये, बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र की समिति ने, सामान्य टिप्पणी-25 को अपनाया. यह आगे के लम्बे रास्ते की ओर एक महत्वपूर्ण पहला क़दम है.

इस वर्ष सदस्य देशों द्वारा अपनाई जाने वाली नैतिक एआई की सिफ़ारिशों का मसौदा तैयार करने में, यूनेस्को ने युवाओं समेत अन्य हितधारकों के साथ परामर्श किया और ‘MOOC’ के माध्यम से एआई साक्षरता बढ़ाने की कोशिशों में लगा है. यूनेस्को के शान्ति व टिकाऊ विकास के लिये महात्मा गांधी शिक्षा संस्थान ने, इस वर्ष भारत में यूनीसेफ़, यूएनवी, और संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर, कृत्रिम बुद्धमत्ता से जुड़ी नैतिक चिन्ताओं को समझने के लिये, युवाओं के साथ राष्ट्रव्यापी परामर्श किया.

भारत सरकार ने एक क़ानूनी ढाँचे समेत, बच्चों के अधिकारों और कल्याण की रक्षा के लिये मज़बूत नीतियाँ बनाई हैं, जिनमें शिक्षा का अधिकार भी शामिल है. दुरुपयोग और हिंसा को रोकने के लिये बच्चों के लिये 2013 की राष्ट्रीय नीति जैसे कई प्रकार के क़ानून और नीतियाँ, डिजिटल स्थान में बच्चों की रक्षा के लिये लागू की जा सकती हैं.

लेकिन अभी बहुत कुछ किये जाने की ज़रूरत है, भारत ही नहीं, दुनिया भर में. और इस परस्पर जुड़े संसार में, हम बहुपक्षीय और बहु-हितधारक समूहों में जितनी सहमति बना सकते हैं, उतना ही राष्ट्रीय और स्थानीय रूप से इसे लागू करना आसान हो सकता है. जिस तरह भारत ने मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को आकार देने में मदद की और दुनिया को अहिंसा का सिद्धान्त दिया, यह महान देश, ‘जैनरेशन एआई’ के लिये नैतिक मानदण्ड सुनिश्चित करने के मक़सद से अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को एक-साथ ला सकता है.

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