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आस्था, विश्वास, सौहार्द एवं संस्कृतियों के मिलन का पर्व है “कुम्भ”

आस्था, विश्वास, सौहार्द एवं संस्कृतियों के मिलन का पर्व है “कुम्भ”
January 08
09:46 2019

इनसाइट ऑनलाइन न्यूज़ ; भाग १

कुम्भ मेला भारत एवं विश्व के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर का एक केन्द्र माना जाता है। लेकिन कुछ कथाओं के अनुसार कुंभ की शुरुआत समुद्र मंथन के आदिकाल से ही हो गई थी। कुंभ मेला 2019 का आयोजन संगमनगरी प्रयागराज में किया जा रहा है।

आस्था, विश्वास, सौहार्द एवं संस्कृतियों के मिलन का पर्व है “कुम्भ”

कुंभ मेला मकर संक्रांति (14 जनवरी) से शुरू होकर महाशिवरात्री (04 मार्च) तक चलेगा। हिंदू धर्म के मुताबिक मान्यता है कि किसी भी कुंभ मेले में पवित्र नदी में स्नान या तीन डुबकी लगाने से सभी पाप धुल जाते हैं। महाकुंभ का आयोजन चार शहरें प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में किया जाता है।
आस्था, विश्वास, सौहार्द एवं संस्कृतियों के मिलन का पर्व है “कुम्भ”। ज्ञान, चेतना और उसका परस्पर मंथन कुम्भ मेले का वो आयाम है जो आदि काल से ही हिन्दू धर्मावलंबियों की जागृत चेतना को बिना किसी आमन्त्रण के खींच कर ले आता है।

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कुम्भ पर्व किसी इतिहास निर्माण के दृष्टिकोण से नहीं शुरू हुआ था अपितु इसका इतिहास समय द्वारा स्वयं ही बना दिया गया। वैसे भी धार्मिक परम्पराएं हमेशा आस्था एवं विश्वास के आधार पर टिकती हैं न कि इतिहास पर। यह कहा जा सकता है कि कुम्भ जैसा विशालतम् मेला संस्कृतियों को एक सूत्र में बांधे रखने के लिए ही आयोजित होता है।

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कुम्भ का शाब्दिक अर्थ है कलश और यहाँ ‘कलश’ का सम्बन्ध अमृत कलश से है। बात उस समय की है जब देवासुर संग्राम के बाद दोनों पक्ष समुद्र मंथन को राजी हुए थे। मथना था समुद्र तो मथनी और नेति भी उसी हिसाब की चाहिए थी। ऐसे में मंदराचल पर्वत मथनी बना और नाग वासुकी उसकी नेति। मंथन से चैदह रत्नों की प्राप्ति हुई जिन्हें परस्पर बाँट लिया गया परन्तु जब धन्वन्तरि ने अमृत कलश देवताओं को दे दिया तो फिर युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। तब भगवान् विष्णु ने स्वयं मोहिनी रूप धारण कर सबको अमृत-पान कराने की बात कही और अमृत कलश का दायित्व इंद्र-पुत्र जयंत को सौंपा।

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अमृत-कलश को प्राप्त कर जब जयंत दानवों से अमृत की रक्षा हेतु भाग रहा था तभी इसी क्रम में अमृत की बूंदे पृथ्वी पर चार स्थानों पर गिरी- हरिद्वार, नासिक, उजैन और प्रयागराज। चूँकि विष्णु की आज्ञा से सूर्य, चन्द्र, शनि एवं बृहस्पति भी अमृत कलश की रक्षा कर रहे थे और विभिन्न राशियों (सिंह, कुम्भ एवं मेष) में विचरण के कारण ये सभी कुम्भ पर्व के द्योतक बन गये। इस प्रकार ग्रहों एवं राशियों की सहभागिता के कारण कुम्भ पर्व ज्योतिष का पर्व भी बन गया।

जयंत को अमृत कलश को स्वर्ग ले जाने में 12 दिन का समय लगा था और माना जाता है कि देवताओं का एक दिन पृथ्वी के एक वर्ष के बराबर होता है। यही कारण है कि कालान्तर में वर्णित स्थानों पर ही ग्रह-राशियों के विशेष संयोग पर 12 वर्षों में कुम्भ मेले का आयोजन होता है। धार्मिकता एवं ग्रह-दशा के साथ-साथ कुम्भ पर्व को पुनः तत्वमीमांसा की कसौटी पर भी कसा जा सकता है, जिससे कुम्भ की उपयोगिता सिद्ध होती है।

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कुम्भ पर्व का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि यह पर्व प्रकृति एवं जीव तत्व में सामंजस्य स्थापित कर उनमें जीवनदायी शक्तियों को समाविष्ट करता है। प्रकृति ही जीवन एवं मृत्यु का आधार है, ऐसे में प्रकृति से सामंजस्य अति-आवश्यक हो जाता है। कहा भी गया है ष्यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डेष् अर्थात जो शरीर में है, वही ब्रह्माण्ड में है, इस लिए ब्रह्माण्ड की शक्तियों के साथ पिण्ड (शरीर) कैसे सामंजस्य स्थापित करे, उसे जीवनदायी शक्तियाँ कैसे मिले इसी रहस्य का पर्व है कुम्भ। विभिन्न मतों-अभिमतों-मतान्तरों के व्यवहारिक मंथन का पर्व है कुम्भ, और इस मंथन से निकलने वाला ज्ञान-अमृत ही कुम्भ-पर्व का प्रसाद है।

प्रयागराज में श्कुम्भश् कानों में पड़ते ही गंगा, यमुना एवं सरस्वती का पावन सुरम्य त्रिवेणी संगम मानसिक पटल पर चमक उठता है। पवित्र संगम स्थल पर विशाल जन सैलाब हिलोरे लेने लगता है और हृदय भक्ति-भाव से विहवल हो उठता है। श्री अखाड़ो के शाही स्नान से लेकर सन्त पंडालों में धार्मिक मंत्रोच्चार, ऋषियों द्वारा सत्य, ज्ञान एवं तत्वमिमांसा के उद्गार, मुग्धकारी संगीत, नादो का समवेत अनहद नाद, संगम में डुबकी से आप्लावित हृदय एवं अनेक देवस्थानो के दिव्य दर्शन प्रयागराज कुम्भ का महिमा भक्तों को दर्शन कराते हैं।

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प्रयागराज का कुम्भ मेला अन्य स्थानों के कुम्भ की तुलना में बहुत से कारणों से काफी अलग है। सर्वप्रथम दीर्घावधिक कल्पवास की परंपरा केवल प्रयाग में है। दूसरे कतिपय शास्त्रों में त्रिवेणी संगम को पृथ्वी का केन्द्र माना गया है, तीसरे भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि-सृजन के लिए यज्ञ किया था, चैथे प्रयागराज को तीर्थों का तीर्थ कहा गया है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारण है यहाँ किये गये धार्मिक क्रियाकलापों एवं तपस्यचर्या का प्रतिफल अन्य तीर्थ स्थलों से अधिक माना जाना। मत्स्य पुराण में महर्षि मारकण्डेय युधिष्ठिर से कहते हैं कि यह स्थान समस्त देवताओं द्वारा विशेषतः रक्षित है, यहाँ एक मास तक प्रवास करने, पूर्ण परहेज रखने, अखण्ड ब्रह्मचर्य धारण करने से और अपने देवताओं व पितरों को तर्पण करने से समस्त मनोकामनायें पूर्ण होती हैं। यहाँ स्नान करने वाला व्यक्ति अपनी 10 पीढ़ियों को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त कर देता है और मोझ प्राप्त कर लेता है।

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यहाँ केवल तीर्थयात्रियों की सेवा करने से भी व्यक्ति को लोभ-मोह से छुटकारा मिल जाता है। उक्त कारणों से अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित सन्त- तपस्वी और उनके शिष्यगण एक ओर जहाँ अपनी विशिष्ठ मान्यताओं के अनुसार त्रिवेणी संगम पर विभिन्न धार्मिक क्रियाकलाप करते हैं तो दूसरी ओर उनको देखने हेतु विस्मित भक्तों का तांता लगा रहता है।

प्रयागराज का कुम्भ मेला लगभग 50 दिनों तक संगम क्षेत्र के आस-पास हजारों हेक्टेअर भूमि पर चलने के चलते विश्व के विशालतम अस्थायी शहर का रूप ले लेता है। समस्त क्रियाकलाप, सारी व्यवस्थायें स्वतः ही चलने लगती हैं। आदिकाल से चली आ रही इस आयोजन की एकरूपता अपने आप में ही अद्वितीय है। लगातार बढ़ती हुई जनांकिकीय दबाव और तेजी से फैलते शहर जब नदियों को निगल लेने को आतुर दिखायी देते हैं ऐसे में कुम्भ जैसे उत्सव नदियों को जगत जननी होने का गौरव देते प्रतीत होते हैं। सनातन काल से भारतीय जनमानस के रगो में बसी, उनके रक्त में प्रवाहित होती अगाध श्रद्धा एवं आस्था ही अमृत है। उनका अमर विश्वास ही प्रलय में अविनाशी ष्अक्षयवटष् है, ज्ञान, वैराग्य एवं रीतियों का मिल ही संगम है और आधार धर्म प्रयाग है।

स्वतंत्रता के पश्चात् विभिन्न नियमों के बनने से कुम्भ मेला को आयोजित करने में कतिपय परिवर्तन होते गये। सरकार ने तीर्थयात्रियों को मूलभूत सुविधायें उपलब्ध कराने के लिए प्राविधान किये। सरकार ने कुम्भ की महत्ता को महसूस करते हुए और मेला का भ्रमण करने वाले तीर्थयात्रियों की भारी संख्या की आवश्यकता को समझते हुए जनहित में बहुत से कदम उठाये हैं जिससे कि तीर्थयात्रियों को सुविधाओं के साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था, बेहतर यातायात व्यवस्था, प्रकाश व्यवस्था एवं चिकित्सा सेवायें की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके। यह कहना मुश्किल है कि सरकार के प्राविधान करने के पूर्व ये सुविधायें उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी थी। हालॉंकि वांछित कानूनों के पास होने के बाद मूलभूत सुविधायें उपलब्ध कराने का दायित्व सरकार का हो गया है। इसी क्रम में प्रयागराज मेला प्राधिकरण-2018 का गठन कुम्भ जैसे उत्सव आयोजित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सोपान है। प्रयागराज मेला प्राधिकरण के गठन से कुम्भ 2019 कुम्भ मेला भ्रमण करने वाले भक्तों को मूलभूत सुविधायें उपलब्ध कराना सुनिश्चित होगा। कुम्भ की दिव्यता और भव्यता को बढ़ाने के लिए नई तकनीकों का प्रयोग किया जा रहा है।

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प्रयागराज में लगने वाले कुंभ मेले के लिए संतों का आगमन शुरू हो गया है। अखाड़ों की पेशवाई शुरू हो गई है। संतों के साथ-साथ नागा साधु भी मेला क्षेत्र में पहुंचने लगे हैं। नागा साधु हमेशा ही आम जनता के लिए एक रहस्य का विषय रहे हैं। उनसे जुड़ी जानकारी हर कोई चाहता है। आइए आपको नागा साधुओं से जुड़ी ऐसी ही कुछ जानकारी देते हैं।
कुंभ मेले में विभिन्न अखाड़ों के अपने पंडाल होते हैं और उसमें सभी संतों की तरह नागा साधु भी रहते हैं, लेकिन नागा साधुओं का जप-तप और साधना बिल्कुल अलग होती है। वह सामान्य जिंदगी से काफी दूर होते हैं और भगवान की भक्ति में सदैव लीन रहते हैं। उनका पारिवारिक जीवन से कोई लेना-देना नहीं होता है।

कुंभ मेले में नागा साधु एक जिज्ञासा का विषय होते हैं। निर्वस्त्र, शरीर पर भस्म और रुद्राक्ष की माला उनकी पहचान होती है। नागा साधुओं को भगवान शिव का उपासक माना जाता है। वह सदैव अपनी ही दुनिया में खोए भगवान शिव में लीन रहते हैं।
नागा साधु बनने की प्रक्रिया काफी कठिन मानी जाती है। नागा साधु बनने के लिए व्यक्ति को अपना घर, परिवार छोड़ना पड़ता है। इसके साथ ही नागा अखाड़े के साथ रहना पड़ता है। अखाड़े में दाखिला मिलने से पहले व्यक्ति के बारे सारी जानकारी का पता लगाया जाता है।
नागा साधु बनने की प्रक्रिया इतनी आसान नहीं होती है। व्यक्ति को जिंदा रहते हुए भी खुद का पिंडदान और श्राद्धकर्म करना होता है। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए सांसारिक मोहमाया को छोड़ना पड़ता है। यदि इस कर्मकांड के पालन में किसी तरह की कोई कमी रह जाती है या फिर गलती होती है तो अखाड़ा उसे बर्खास्त कर देता है।

नागा साधु बनने की अंतिम परीक्षा दिगंबर और श्रीदिगंबर की प्रक्रिया होता है। दिगंबर साधु लंगोट पहनकर जप, तप एवं भ्रमण करता है। जबकि श्रीदिगंबर साधु निर्वस्त्र ही घूमते हैं। इस परीक्षा के दौरान श्रीदिगंबर साधु की इंद्री भी तोड़ दी जाती है।
कुंभ में अक्षयवट दर्शन के बिना श्रद्धालु प्रयागराज में स्नान और पूजा पाठ अधूरा माना जाता है। कुंम्भ में इस बार सभी श्रद्धालु अक्षयवट का दर्शन व पूजन कर सकेगें। कई दशको से यह अक्षयवट किले में सेना की सुरक्षा में था जिसे कुंम्भ मेले में आमजनता के लिए खोल दिया जायेगा।

जारी……….!

कुंभ 2019 : भारतीय संस्कृति की जीवन्तता का प्रतीक का पर्व

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