इण्टरव्यू: मानवीय राहत ज़रूरतें घटाने के लिये ‘हिंसक संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, बीमारियों से निपटना होगा’

मार्क लोकॉक ने चार वर्ष पहले जब मानवीय मामलों और आपात राहत समन्वयक और संयुक्त राष्ट्र के अवर महासचिव के तौर ज़िम्मेदारी सम्भाली, तो उन्होंने उम्मीद की थी कि वैश्विक स्तर पर मानवीय राहत ज़रूरतों में कमी आएगी. मगर लम्बे समय से जारी और उभरते हिंसक संघर्षों व टकरावों, जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर और ईबोला व कोविड-19 जैसी बीमारियों के कारण ज़रूरतमन्दों की संख्या इस अवधि में अभूतपूर्व स्तर पर पहुँच गई है. कार्यभार छोड़ने से पहले, मार्क लोकॉक के साथ यूएन न्यूज़ की एक ख़ास बातचीत….

इस इंटरव्यू को प्रकाशन ज़रूरतों के लिये सम्पादित किया गया है.
यूएन न्यूज़: संयुक्त राष्ट्र की मानवीय राहत शाखा (OCHA) की चार वर्षों तक अगुवाई करने के बाद आप यूएन छोड़ रहे हैं. आपने मानवीय राहत मामलों के प्रमुख के तौर पर किन लक्ष्यों को हासिल करने की उम्मीद की थी?
मार्क लोकॉक: मैंने 2017 में यह ज़िम्मेदारी सम्भालते हुए उम्मीद की थी कि दुनिया एक ऐसे युग में प्रवेश करेगा, जहाँ विश्व भर में मानवीय ज़रूरत कुछ हद तक कम हो जाएँगी. 2010 के दशक में इनमें काफ़ी हद तक बढ़ोत्तरी हुई थी, मुख्यत: नए हिंसक संघर्षों के कारण, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की वजह से भी.  
मुझे आशा थी कि उन रूझानों की दिशा को उलटना सम्भव हो सकता है, चूँकि पिछले 50 वर्षों के दौरान अधिकाँश समय तक, मानव विकास में विशाल प्रगति हुई है, और लोग लम्बे समय तक जी रहे हैं, उनका ख़ान-पान बेहतर है, ज़्यादा बच्चे स्कूल जाते हैं, जिन बीमारियों की रोकथाम की जा सकती है, उनसे कम मौतें होती हैं.
मैंने उम्मीद की थी कि हम किसी तरह उस प्रगति को और आगे बढ़ाएँगे, और यह उसे दुनिया के सबसे निर्बलों तक पहुँचाना सम्भव होगा, जो ख़ुद को मानवीय ज़रूरतों के हालात में पाते हैं.  
मगर, निरपेक्ष भाव से कहूँ तो मुझे लगता है कि पिछले चार वर्ष बेहद कठिन समय साबित हुआ है.
पहला, हिंसक संघर्ष का दायरा अने स्थानों पर फैल गया; सीरिया और यमन में लम्बे समय से चले आ रहे टकरावों को सुलझाने में विफलता मिली, और मोज़म्बीक़ व इथियोपिया नए हालात बने.   
दूसरा, हम जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर को देख रहे हैं, जोकि अब विश्व भर में मानवीय पीड़ा की एक बड़ी वजह बनते जा रहे हैं.
और तीसरा, हमने बीमारी के फैलाव को देखा है, सिर्फ़ महामारी ही नहीं, बल्कि उसके कारण व्यापक स्तर पर जो बदलाव हुआ है.
इसलिये, मेरा लक्ष्य, पीड़ा में कमी को देखना था, मगर असल में सहायता व संरक्षा के ज़रूरतमन्दों की संख्या में अभूतपूर्व स्तर तक वृद्धि हुई है.
अच्छी ख़बर यह है कि, संयुक्त राष्ट्र, एनजीओ, रैड क्रॉस ने ज़िन्दगियों को बचाने और पीड़ा को हरने में शानदार कार्य को जारी रखना है. और मुझे लगता है कि हाल के वर्षों में मानवीय राहत प्रणाली ने वास्तव में आगे बढ़ कर काम किया है.
और, हम एक साल में 10 करोड़ लोगों तक पहुंचते हैं; हम निश्चित रूप से हर वर्ष लाखों ज़िन्दगियों को बचाते हैं. दुनिया भर में मानवायी राहत एजेंसियों के लिये काम करने वाले लोगों के साहस, संकल्प, पेशेवर रवैये और समर्पण के बग़ैर हालात और भी ख़राब होते.
इनमें से अधिकाँश उस देश के नागरिक होते हैं, जो स्वयं संकटों में घिरा है.
हमने वित्त पोषण, स्वैच्छिक वित्त पोषण में ठोस बढ़ोत्तरी को देखा है, जिसे सदस्य देश मानवीय राहत संगठनों के लिये प्रदान करते हैं. मैं जब से यह काम कर रहा हूँ तब से इसमें लगभग 30 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हो चुका है.
यह सही है कि ज़रूरी धनराशि और प्राप्त धनराशि में अब भी एक बड़ा अन्तर है, मगर हम और ज़्यादा धन जुटाने में सफल रहे हैं, और इसका अर्थ यह है कि पीड़ा आशंका से कहीं कम रही है.

OCHA/Saviano Abreuमानवीय मामलों और आपात राहत मामलों के समन्वयक और संयुक्त राष्ट्र के अवर महासचिव मार्क लोकॉक, सूडान के कसाला में युवा स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं, जो बीमारियों के फैलाव के रोकथाम प्रयासों में मदद कर रहे हैं.

लेकिन बड़ी बात यह है कि जब तक दुनिया मानवीय राहत समस्याओं की वजहों – हिंसक संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, कोविड व अन्य बीमारियाँ – से बेहतर ढँग से नहीं निपटती, तब तक किसी को भी इन लक्षणों में कमी आने की आशा नहीं करनी चाहिए.
जब तक इन वजहों को दूर नहीं किया जाता तब तक, ज़रूरतमन्द लोगों की संख्या बढ़ती रहेगी.
यूएन न्यूज: निसन्देह, 2020 एक बेहद कठिन वर्ष था. वैश्विक महामारी की वजह से यूएन राहत अभियानों पर किस तरह से असर पड़ा है?
मार्क लोकॉक: वैश्विक महामारी के बारे में पहली बात तो यह है कि ये दुनिया के हर कोने में पहुँच चुका है.
इसके प्रभाव, सिर्फ़ वायरस और उसके कारण होन वाली बीमारी व मौतों की वजह से नहीं हुए हैं, बल्कि उससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर होने वाला भीषण असर व व्यापक संकुचन भी है, जिसका सामना निर्धनतम देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं मे किया है.
इससे अनेक निर्बल देशों में निर्धनता में वृद्धि हुई है और इस वजह से मानवीय आवश्यकताओं का दायरा पहले से अधिक हो रहा है.
हमने अति-आवश्यक उपकरणों की भारी क़िल्लत को देखा है: निजी बचाव उपकरण, दवाएँ, और अन्य सामान. और हमने देखा है कि साधन-सम्पन्न देश, मोटे तौर पर इन्हें अपने पास जमा कर रहे हैं. हमने वैक्सीन उपलब्धता में भयावह विषमताओं को देखा है.
इस महामारी से बाहर निकलने में सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे देश, धनी हैं, जिनके पास वैज्ञानिक, औषधि निर्माता कम्पनियाँ, वित्तीय आधार, कर प्रणाली है. यानी, विशाल टीकाकरण कार्यक्रमों के लिये वे धन का इन्तज़ाम कर सकते हैं.
निर्धनतम देशों के पास अभी यह सब नहीं है, और ऐशा लगता है कि अब भी यह बहुत दूर है.
महामारी ने, अभी एक तरह से पहले से मौजूदा समस्याओं को और गहरा कर दिया है, जिसे अभी पर्याप्त ढँग से समझा नहीं गया है.
महामारी का फैलाव शुरू होने के 15 महीनों के दौरान नए हिंसक संघर्ष व टकराव उभरे हैं: नगोर्नो-काराबाख़, मोज़ाम्बीक़ मे कुछ स्थान, हमने जो इथियोपिया में देखा है.  
और कुछ हद तक, दुर्भाग्यवश, यह अनिष्टकर हितों द्वारा एक ऐसे लम्हे का लाभ उठाने का नतीजा रहा है, जब बाक़ी दुनिया का ध्यान एक बड़ी समस्या पर केन्द्रित हो. इसके ज़रिये हानिकारक और अवांछनीय उद्देश्यों को हासिल करने की क़वायद करना है.    
यूएन न्यूज: और महामारी के विषय में, OCHA ने इन चुनौतियों का सामना किस तरह किया है?
मार्क लोकॉक: OCHA का कार्य मुख्य रूप से मानवीय राहत प्रणाली के लिये एक समन्वयक बनना है. हम जिस तरह से संगठित थे, उसे हमने पुनर्गठित किया है. ज़मीनी स्तर पर पहले से कहीं अधिक लोग हैं, मुख्यालयों में कम हैं. अपने वित्तीय लेखाजोखा को सही किया है.
जब मैंने यह काम शुरू किया, तो OCHA अनेक प्रकार की वित्तीय मुश्किलों का सामना कर रहा था, जिसे हम सुलझाने में सफल रहे हैं. और हमने अपनी चार प्रमुख ज़िम्मेदारियों पर वास्तव में ज़्यादा ध्यान केंद्रित किया है.

OCHA/David Swansonयूएन मानवीय राहत समन्वयक मार्क लोकॉक, तुर्की-सीरिया की सीमा के नज़दीक ड्राइवरों के एक समूह से मिल रहे हैं.

पहला, उभरती मानवीय आवश्यकताओं की शिनाख़्त. दूसरा, हर समस्याग्रस्त देश में जवाबी कार्रवाई योजना के विकास के लिये समन्वय.
तीसरा, इन जवाबी कार्रवाई योजनाओं के लिये धन को जुटाना. और चौथा, लागू करने के काम में विशिष्ट मुद्दों के लिये सहायता.
लोगों तक भोजन, मेडिकल देखभाल या सामान पहुँचाना नहीं, बल्कि हिंसक संघर्ष के दौरान रास्तों तक पहुँच के लिये बातचीत और बम व बन्दूकधारियों से मानवीय राहत कर्मचारियों की सुरक्षा.  
यूएन न्यूज़: मैंने इस इंटरव्यू की शुरुआत में आपसे उन लक्ष्यों के बारे में पूछा था, आपको जिन्हें हासिल करने की उम्मीद थी. क्या आपको लगता है कि आपने उन्हें पा लिया?
मार्क लोकॉक: जैसे मैंने कहा, मुझे उम्मीद थी कि दुनिया में मानवीय आवश्यकताएँ कम होंगी; असल में यह पहले से कहीं ज़्यादा हैं. एक स्तर पर यह सकारात्मक संकेत नहीं है, जिसकी मैंने आशा की थी.
लेकिन यह कहना वास्तव में अहम है कि हमने कुछ बड़े संकटों में बदतर नतीजों को टाला है. मुझे पिछले वर्ष, हर समय, यमन में लाखों लोगों के एक विकराल अकाल की चपेट में आने और ज़िन्दगियाँ गँवाने की चिन्ता रही.
हम अब तक उसे टालने में सफल रहे हैं.
इसी तहर, अन्य संकटों में भी, जहाँ खाद्य असुरक्षा की वजह से बड़ी संख्या में लोगों की ज़िन्दगियाँ दाँव पर लगी थी:  पूर्वोत्तर नाइजीरिया, दक्षिण सूडान, सहेल के कुछ क्षेत्र.
कार्यकाल पूरा करते समय, हम उत्तरी इथियोपिया में अकाल की एक विशाल समस्या को देख रहे हैं. अभी बदतरीन हालात को टालने में समय है, लेकिन अगर बम और बन्दूकधारियों व उनके राजनैतिक आकाओं ने अपना व्यवहार नहीं बदला तो फिर यह नहीं हो पाएगा. इसलिये, हमें उन सभी इलाक़ों में काम जारी रखना होगा.
मुझे लगता है कि मानवीय राहत प्रणाली ने इन चुनौतियों का बख़ूबी सामना किया है. मैं अग्रिम मोर्चे पर डटे मानवीय राहतकर्मियों के पेशवराना अन्दाज़, साहस और संकल्प की बहुत सराहना करता हूँ.
अगर उन्होंने लोगों की मदद करने के लिये अपने जीवन को जोखिम में नहीं डाला होता, तो हालात और भी ज़्यादा ख़राब हो सकते थे.
मुझे लगता है कि हमने मानवीय राहत प्रणाली में नवाचारों के मामलों में प्रगति की शुरुआत की है.  समस्याओं के उभरने से पहले ही कार्रवाई करने का प्रयास; सहायता पाने के लिये डिजिटल टैक्नॉलॉजी के बेहतर इस्तेमाल का प्रयास.

© UNHCR/Will Swansonआपात राहत मामलों के समन्वयक मार्क लोकॉक, म्याँमार के कुटापलोंग शिविर में रोहिंज्या शरणार्थियों के समूह से मिल रहे हैं.

हम निर्बल समूहों की शिनाख़्त करने में बेहतर हुए हैं, विशेष रूप से महिलाएँ व लड़कियों, विकलाँगों, मानसिक स्वास्थ्य व मनोसामाजिक समस्या से पीड़ित लोगों की.
और सभी निर्बल समूहों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये हमने बेहतर ढँग से जवाबी कार्रवाई को तैयार किया है.  
इसलिये, ऐसे कईं मायनों में, मानवीय राहत प्रणाली बेहतर हो रही है, मगर यह सिर्फ़ इस बात की गहनता को ही कम रही है कि ज़रूरतें बढ़ रही हैं, चूँकि ज़रूरतों की वजहों को नहीं सुलझाया जा रहा है. और यही वो बात है जिससे दुनिया को बेहतर ढँग से निपटने की आवश्यकता है.
यूएन न्यूज़: आपके बाद इस पद की ज़िम्मेदारी सम्भालने वालो को आप क्या सलाह देना चाहेंगे?
मार्क लोकॉक: भाग्यवश, मेरे बाद इस पद की ज़िम्मेदारी सम्भालने वाले एक बहुत, बहुत अनुभवी व्यक्ति हैं, जो अन्तरराष्ट्रीय मानवीय राहत प्रमाली के बारे में मुझसे कहीं ज़्यादा जानते हैं. इसलिये मैं नहीं समझता कि उन्हें मुझसे किसी सलाह की ज़रूरत होगी.  
स्पष्ट है कि मार्टिन और मैं एक दूससे को बहुत अच्छे से जानते हैं. हमने यमन के मुद्दे पर पिछले तीन वर्षों से नज़दीकी तौर पर काम किया है. उनके और मेरे बीच में काफ़ी विचार-विमर्श हुए हैं.
उन्होंने मुझसे मौजूदा हालात पर काफ़ी सवाल किये हैं, ताकि वो ख़ुद को इस काम के लिये तैयार कर सकें. मैं दूर से उन्हें देखता रहूँगा.
मैं सभी मानवीय राहत एजेंसियों का हौंसला बढ़ाता रहूँगा. अगर मैं किसी तरह से अपने विचार, सुझाव या योगदान दे सकूँ, मैं ख़ुशी से ऐसा करूँगा.
मगर, मैं जानता हूँ कि OCHA और मानवीय राहत प्रणाली की बागडोर, नए समन्वयक के रूप में मार्टिन के कुशल नेतृत्व में होगी., मार्क लोकॉक ने चार वर्ष पहले जब मानवीय मामलों और आपात राहत समन्वयक और संयुक्त राष्ट्र के अवर महासचिव के तौर ज़िम्मेदारी सम्भाली, तो उन्होंने उम्मीद की थी कि वैश्विक स्तर पर मानवीय राहत ज़रूरतों में कमी आएगी. मगर लम्बे समय से जारी और उभरते हिंसक संघर्षों व टकरावों, जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर और ईबोला व कोविड-19 जैसी बीमारियों के कारण ज़रूरतमन्दों की संख्या इस अवधि में अभूतपूर्व स्तर पर पहुँच गई है. कार्यभार छोड़ने से पहले, मार्क लोकॉक के साथ यूएन न्यूज़ की एक ख़ास बातचीत….

इस इंटरव्यू को प्रकाशन ज़रूरतों के लिये सम्पादित किया गया है.

यूएन न्यूज़: संयुक्त राष्ट्र की मानवीय राहत शाखा (OCHA) की चार वर्षों तक अगुवाई करने के बाद आप यूएन छोड़ रहे हैं. आपने मानवीय राहत मामलों के प्रमुख के तौर पर किन लक्ष्यों को हासिल करने की उम्मीद की थी?

मार्क लोकॉक: मैंने 2017 में यह ज़िम्मेदारी सम्भालते हुए उम्मीद की थी कि दुनिया एक ऐसे युग में प्रवेश करेगा, जहाँ विश्व भर में मानवीय ज़रूरत कुछ हद तक कम हो जाएँगी. 2010 के दशक में इनमें काफ़ी हद तक बढ़ोत्तरी हुई थी, मुख्यत: नए हिंसक संघर्षों के कारण, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की वजह से भी.  

मुझे आशा थी कि उन रूझानों की दिशा को उलटना सम्भव हो सकता है, चूँकि पिछले 50 वर्षों के दौरान अधिकाँश समय तक, मानव विकास में विशाल प्रगति हुई है, और लोग लम्बे समय तक जी रहे हैं, उनका ख़ान-पान बेहतर है, ज़्यादा बच्चे स्कूल जाते हैं, जिन बीमारियों की रोकथाम की जा सकती है, उनसे कम मौतें होती हैं.

मैंने उम्मीद की थी कि हम किसी तरह उस प्रगति को और आगे बढ़ाएँगे, और यह उसे दुनिया के सबसे निर्बलों तक पहुँचाना सम्भव होगा, जो ख़ुद को मानवीय ज़रूरतों के हालात में पाते हैं.  

मगर, निरपेक्ष भाव से कहूँ तो मुझे लगता है कि पिछले चार वर्ष बेहद कठिन समय साबित हुआ है.

पहला, हिंसक संघर्ष का दायरा अने स्थानों पर फैल गया; सीरिया और यमन में लम्बे समय से चले आ रहे टकरावों को सुलझाने में विफलता मिली, और मोज़म्बीक़ व इथियोपिया नए हालात बने.   

दूसरा, हम जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर को देख रहे हैं, जोकि अब विश्व भर में मानवीय पीड़ा की एक बड़ी वजह बनते जा रहे हैं.

और तीसरा, हमने बीमारी के फैलाव को देखा है, सिर्फ़ महामारी ही नहीं, बल्कि उसके कारण व्यापक स्तर पर जो बदलाव हुआ है.

इसलिये, मेरा लक्ष्य, पीड़ा में कमी को देखना था, मगर असल में सहायता व संरक्षा के ज़रूरतमन्दों की संख्या में अभूतपूर्व स्तर तक वृद्धि हुई है.

अच्छी ख़बर यह है कि, संयुक्त राष्ट्र, एनजीओ, रैड क्रॉस ने ज़िन्दगियों को बचाने और पीड़ा को हरने में शानदार कार्य को जारी रखना है. और मुझे लगता है कि हाल के वर्षों में मानवीय राहत प्रणाली ने वास्तव में आगे बढ़ कर काम किया है.

और, हम एक साल में 10 करोड़ लोगों तक पहुंचते हैं; हम निश्चित रूप से हर वर्ष लाखों ज़िन्दगियों को बचाते हैं. दुनिया भर में मानवायी राहत एजेंसियों के लिये काम करने वाले लोगों के साहस, संकल्प, पेशेवर रवैये और समर्पण के बग़ैर हालात और भी ख़राब होते.

इनमें से अधिकाँश उस देश के नागरिक होते हैं, जो स्वयं संकटों में घिरा है.

हमने वित्त पोषण, स्वैच्छिक वित्त पोषण में ठोस बढ़ोत्तरी को देखा है, जिसे सदस्य देश मानवीय राहत संगठनों के लिये प्रदान करते हैं. मैं जब से यह काम कर रहा हूँ तब से इसमें लगभग 30 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हो चुका है.

यह सही है कि ज़रूरी धनराशि और प्राप्त धनराशि में अब भी एक बड़ा अन्तर है, मगर हम और ज़्यादा धन जुटाने में सफल रहे हैं, और इसका अर्थ यह है कि पीड़ा आशंका से कहीं कम रही है.

OCHA/Saviano Abreu
मानवीय मामलों और आपात राहत मामलों के समन्वयक और संयुक्त राष्ट्र के अवर महासचिव मार्क लोकॉक, सूडान के कसाला में युवा स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं, जो बीमारियों के फैलाव के रोकथाम प्रयासों में मदद कर रहे हैं.

लेकिन बड़ी बात यह है कि जब तक दुनिया मानवीय राहत समस्याओं की वजहों – हिंसक संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, कोविड व अन्य बीमारियाँ – से बेहतर ढँग से नहीं निपटती, तब तक किसी को भी इन लक्षणों में कमी आने की आशा नहीं करनी चाहिए.

जब तक इन वजहों को दूर नहीं किया जाता तब तक, ज़रूरतमन्द लोगों की संख्या बढ़ती रहेगी.

यूएन न्यूज: निसन्देह, 2020 एक बेहद कठिन वर्ष था. वैश्विक महामारी की वजह से यूएन राहत अभियानों पर किस तरह से असर पड़ा है?

मार्क लोकॉक: वैश्विक महामारी के बारे में पहली बात तो यह है कि ये दुनिया के हर कोने में पहुँच चुका है.

इसके प्रभाव, सिर्फ़ वायरस और उसके कारण होन वाली बीमारी व मौतों की वजह से नहीं हुए हैं, बल्कि उससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर होने वाला भीषण असर व व्यापक संकुचन भी है, जिसका सामना निर्धनतम देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं मे किया है.

इससे अनेक निर्बल देशों में निर्धनता में वृद्धि हुई है और इस वजह से मानवीय आवश्यकताओं का दायरा पहले से अधिक हो रहा है.

हमने अति-आवश्यक उपकरणों की भारी क़िल्लत को देखा है: निजी बचाव उपकरण, दवाएँ, और अन्य सामान. और हमने देखा है कि साधन-सम्पन्न देश, मोटे तौर पर इन्हें अपने पास जमा कर रहे हैं. हमने वैक्सीन उपलब्धता में भयावह विषमताओं को देखा है.

इस महामारी से बाहर निकलने में सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे देश, धनी हैं, जिनके पास वैज्ञानिक, औषधि निर्माता कम्पनियाँ, वित्तीय आधार, कर प्रणाली है. यानी, विशाल टीकाकरण कार्यक्रमों के लिये वे धन का इन्तज़ाम कर सकते हैं.

निर्धनतम देशों के पास अभी यह सब नहीं है, और ऐशा लगता है कि अब भी यह बहुत दूर है.

महामारी ने, अभी एक तरह से पहले से मौजूदा समस्याओं को और गहरा कर दिया है, जिसे अभी पर्याप्त ढँग से समझा नहीं गया है.

महामारी का फैलाव शुरू होने के 15 महीनों के दौरान नए हिंसक संघर्ष व टकराव उभरे हैं: नगोर्नो-काराबाख़, मोज़ाम्बीक़ मे कुछ स्थान, हमने जो इथियोपिया में देखा है.  

और कुछ हद तक, दुर्भाग्यवश, यह अनिष्टकर हितों द्वारा एक ऐसे लम्हे का लाभ उठाने का नतीजा रहा है, जब बाक़ी दुनिया का ध्यान एक बड़ी समस्या पर केन्द्रित हो. इसके ज़रिये हानिकारक और अवांछनीय उद्देश्यों को हासिल करने की क़वायद करना है.    

यूएन न्यूज: और महामारी के विषय में, OCHA ने इन चुनौतियों का सामना किस तरह किया है?

मार्क लोकॉक: OCHA का कार्य मुख्य रूप से मानवीय राहत प्रणाली के लिये एक समन्वयक बनना है. हम जिस तरह से संगठित थे, उसे हमने पुनर्गठित किया है. ज़मीनी स्तर पर पहले से कहीं अधिक लोग हैं, मुख्यालयों में कम हैं. अपने वित्तीय लेखाजोखा को सही किया है.

जब मैंने यह काम शुरू किया, तो OCHA अनेक प्रकार की वित्तीय मुश्किलों का सामना कर रहा था, जिसे हम सुलझाने में सफल रहे हैं. और हमने अपनी चार प्रमुख ज़िम्मेदारियों पर वास्तव में ज़्यादा ध्यान केंद्रित किया है.

OCHA/David Swanson
यूएन मानवीय राहत समन्वयक मार्क लोकॉक, तुर्की-सीरिया की सीमा के नज़दीक ड्राइवरों के एक समूह से मिल रहे हैं.

पहला, उभरती मानवीय आवश्यकताओं की शिनाख़्त. दूसरा, हर समस्याग्रस्त देश में जवाबी कार्रवाई योजना के विकास के लिये समन्वय.

तीसरा, इन जवाबी कार्रवाई योजनाओं के लिये धन को जुटाना. और चौथा, लागू करने के काम में विशिष्ट मुद्दों के लिये सहायता.

लोगों तक भोजन, मेडिकल देखभाल या सामान पहुँचाना नहीं, बल्कि हिंसक संघर्ष के दौरान रास्तों तक पहुँच के लिये बातचीत और बम व बन्दूकधारियों से मानवीय राहत कर्मचारियों की सुरक्षा.  

यूएन न्यूज़: मैंने इस इंटरव्यू की शुरुआत में आपसे उन लक्ष्यों के बारे में पूछा था, आपको जिन्हें हासिल करने की उम्मीद थी. क्या आपको लगता है कि आपने उन्हें पा लिया?

मार्क लोकॉक: जैसे मैंने कहा, मुझे उम्मीद थी कि दुनिया में मानवीय आवश्यकताएँ कम होंगी; असल में यह पहले से कहीं ज़्यादा हैं. एक स्तर पर यह सकारात्मक संकेत नहीं है, जिसकी मैंने आशा की थी.

लेकिन यह कहना वास्तव में अहम है कि हमने कुछ बड़े संकटों में बदतर नतीजों को टाला है. मुझे पिछले वर्ष, हर समय, यमन में लाखों लोगों के एक विकराल अकाल की चपेट में आने और ज़िन्दगियाँ गँवाने की चिन्ता रही.

हम अब तक उसे टालने में सफल रहे हैं.

इसी तहर, अन्य संकटों में भी, जहाँ खाद्य असुरक्षा की वजह से बड़ी संख्या में लोगों की ज़िन्दगियाँ दाँव पर लगी थी:  पूर्वोत्तर नाइजीरिया, दक्षिण सूडान, सहेल के कुछ क्षेत्र.

कार्यकाल पूरा करते समय, हम उत्तरी इथियोपिया में अकाल की एक विशाल समस्या को देख रहे हैं. अभी बदतरीन हालात को टालने में समय है, लेकिन अगर बम और बन्दूकधारियों व उनके राजनैतिक आकाओं ने अपना व्यवहार नहीं बदला तो फिर यह नहीं हो पाएगा. इसलिये, हमें उन सभी इलाक़ों में काम जारी रखना होगा.

मुझे लगता है कि मानवीय राहत प्रणाली ने इन चुनौतियों का बख़ूबी सामना किया है. मैं अग्रिम मोर्चे पर डटे मानवीय राहतकर्मियों के पेशवराना अन्दाज़, साहस और संकल्प की बहुत सराहना करता हूँ.

अगर उन्होंने लोगों की मदद करने के लिये अपने जीवन को जोखिम में नहीं डाला होता, तो हालात और भी ज़्यादा ख़राब हो सकते थे.

मुझे लगता है कि हमने मानवीय राहत प्रणाली में नवाचारों के मामलों में प्रगति की शुरुआत की है.  समस्याओं के उभरने से पहले ही कार्रवाई करने का प्रयास; सहायता पाने के लिये डिजिटल टैक्नॉलॉजी के बेहतर इस्तेमाल का प्रयास.

© UNHCR/Will Swanson
आपात राहत मामलों के समन्वयक मार्क लोकॉक, म्याँमार के कुटापलोंग शिविर में रोहिंज्या शरणार्थियों के समूह से मिल रहे हैं.

हम निर्बल समूहों की शिनाख़्त करने में बेहतर हुए हैं, विशेष रूप से महिलाएँ व लड़कियों, विकलाँगों, मानसिक स्वास्थ्य व मनोसामाजिक समस्या से पीड़ित लोगों की.

और सभी निर्बल समूहों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये हमने बेहतर ढँग से जवाबी कार्रवाई को तैयार किया है.  

इसलिये, ऐसे कईं मायनों में, मानवीय राहत प्रणाली बेहतर हो रही है, मगर यह सिर्फ़ इस बात की गहनता को ही कम रही है कि ज़रूरतें बढ़ रही हैं, चूँकि ज़रूरतों की वजहों को नहीं सुलझाया जा रहा है. और यही वो बात है जिससे दुनिया को बेहतर ढँग से निपटने की आवश्यकता है.

यूएन न्यूज़: आपके बाद इस पद की ज़िम्मेदारी सम्भालने वालो को आप क्या सलाह देना चाहेंगे?

मार्क लोकॉक: भाग्यवश, मेरे बाद इस पद की ज़िम्मेदारी सम्भालने वाले एक बहुत, बहुत अनुभवी व्यक्ति हैं, जो अन्तरराष्ट्रीय मानवीय राहत प्रमाली के बारे में मुझसे कहीं ज़्यादा जानते हैं. इसलिये मैं नहीं समझता कि उन्हें मुझसे किसी सलाह की ज़रूरत होगी.  

स्पष्ट है कि मार्टिन और मैं एक दूससे को बहुत अच्छे से जानते हैं. हमने यमन के मुद्दे पर पिछले तीन वर्षों से नज़दीकी तौर पर काम किया है. उनके और मेरे बीच में काफ़ी विचार-विमर्श हुए हैं.

उन्होंने मुझसे मौजूदा हालात पर काफ़ी सवाल किये हैं, ताकि वो ख़ुद को इस काम के लिये तैयार कर सकें. मैं दूर से उन्हें देखता रहूँगा.

मैं सभी मानवीय राहत एजेंसियों का हौंसला बढ़ाता रहूँगा. अगर मैं किसी तरह से अपने विचार, सुझाव या योगदान दे सकूँ, मैं ख़ुशी से ऐसा करूँगा.

मगर, मैं जानता हूँ कि OCHA और मानवीय राहत प्रणाली की बागडोर, नए समन्वयक के रूप में मार्टिन के कुशल नेतृत्व में होगी.

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