इराक़: पोप की यात्रा, ‘शान्ति, धार्मिक समरसता व इनसानी सहनशीलता का सन्देश’

संयुक्त राष्ट्र की शीर्ष सांस्कृतिक अधिकारी ऑड्री अज़ूले ने कहा है कि ईसाइयों के धर्मगुरू पोप फ्रांसिस की इराक़ के उत्तरी क्षेत्र में स्थित एक प्राचीन चर्च में प्रार्थना करने के लिये ऐतिहासिक यात्रा करना, विश्व के लिये एक स्पष्ट सन्देश दर्शाता है कि तमाम धर्मों के अनुयाइयों के बीच समरसता और एकजुटता ही, मानवता की प्रगति व आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है. 

पोप फ्रांसिस ने अपनी इराक़ यात्रा के दौरान, एक ऐसे प्राचीन चर्च का दौरा किया है जिसे इस्लामिक स्टेट (दाएश) ने ध्वस्त कर दिया था.

Today @Pontifex is in #mossoul and sends the world a message of hope, healing and trust in our shared humanity. He visits Al Tahira restored by @UNESCO w/ @mckduae @NouraAlKaabi #revivethespiritofmosul #PopeFrancisInIraq @UNESCOIraq pic.twitter.com/dto5pJOUjF— Audrey Azoulay (@AAzoulay) March 7, 2021

पोप फ्रांसिस ने, शुक्रवार को इराक़ में पहुँचने के बाद, सप्ताहान्त में, मोसुल और देश में ईसाइयों के लिये पवित्र स्थलों का दौरा किया.
मीडिया ख़बरों के अनुसार, पोप फ्रांसिस ने, रविवार को, शान्ति का आहवान किया और चर्च के अवशेष हिस्से में उन पीड़ितों के लिये प्रार्थना की, जो इस्लामिक स्टेट (दाएश) द्वारा चलाए गए संघर्ष की चपेट में आए, और इस संघर्ष के परिणामस्वरूप जिन हज़ारों लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी.
संयुक्त राष्ट्र के शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन – यूनेस्को की महानिदेशक ऑड्री अज़ूले और संयुक्त अरब अमीरात की संस्कृति व युवा मामलों की मन्त्री नूरा अल काबी ने, अल ताहेरा चर्च में, पोप फ्रांसिस की इस ऐतिहासिक यात्रा का स्वागत किया.
ये चर्च भी यूनेस्को के नेतृत्व में चलाई जा रही – मोसुल की आत्मा की पुनर्बहली की परियोजना में शामिल है.
संस्कृतियों का मिलन स्थल
अल ताहेरा चर्च का निर्माण 1859 में हुआ था और उसे 1862 में धर्मावलम्बियों के लिये खोला गया था.
ये चर्च मोसुल के इतिहास में बुना हुआ एक अदभुत प्रतीक है. ये चर्च प्राचीन शहर के बीचोंबीच स्थित है जो टिगरिस (दजला) नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित है.
जब दिसम्बर 2020 में, इस चर्च का मरम्मत कार्य शुरू हुआ था तो इराक़ में यूनेस्को प्रतिनिधि पाओलो फ़ॉण्टनी ने कहा था कि चर्च की पुनःस्थापना, केवल एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में इसके मूल्यवान होने की नज़र से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि शहर की विविधता का सबूत होने के रूप में भी अहम है.
ये परिसर विभिन्न संस्कृतियों का मिलन स्थल और सदियों तक, विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिये शान्तिपूर्ण आश्रयस्थल रहा है. 
उस समय नूरा अल काबी ने कहा था कि यूनेस्को के साथ मिलकर, संयुक्त अरब अमीरात के प्रयासों का मक़सद, केवल इन प्राचीन धार्मिक स्थलों को पुनर्बहाल किया जाना ही नहीं है, बल्कि मोसुल में रोज़गार अवसर पैदा करके, युवाओं को सशक्त बनाना भी है.
साथ ही व्यावसायिक और तकनीकी प्रशिक्षण देना और सांस्कृतिक धरोहर की संरक्षा के क्षेत्र में कौशल क्षमताएँ विकसित करना भी है.
धर्मों के बीच सदभाव और एकजुटता
मन्त्री नूरा अल काबी और यूनेस्को महानिदेशक ऑड्री अज़ूले ने शनिवार को एक संयुक्त वक्तव्य में, पोप फ्रांसिस की अल ताहिरा चर्च की यात्रा को, विश्व के लिये एक यह स्पष्ट सन्देश भी क़रार दिया कि विभिन्न धर्मों के अनुयाइयों के बीच सदभाव और एकजुटता ही, मानवता की प्रगति को आगे बढ़ाने और आज की दुनिया के सामने पेश बढ़ती चुनौतियों का मुक़ाबला करने का एक मात्र रास्ता है.
मन्त्री नूरा अल काबी और महानिदेशक ऑड्री अज़ूले ने पोप फ्रांसिस की, इन स्थलों की इस यात्रा को शान्ति और बन्धुत्व का सन्देश फैलाने के लिये महत्वपूर्ण बताया. 
साथ ही, पोप की इस यात्रा को, अल नूरी मसजिद, व अल साआ और अल ताहेरा चर्च ध्वस्त करने वाले उस गुट (दाएश) द्वारा फैलाए गए विभाजनकारी सन्देश का मुक़ाबला करने की ताक़त व सहनशीलता को रेखांकित करने वाली भी बताया.
दोनों सांस्कृतिक अधिकारियों ने संयुक्त बयान में कहा था कि पोप फ्रांसिस की ये यात्रा उन लोगों के लिये भी प्रेरणा का स्रोत है जो इन प्राचीन स्थलों की पुनर्बहाली परियोजना में सक्रिय हैं.
साथ ही इस यात्रा से उन लोगों के प्रयासों को भी बल मिला है जो इराक़, उस क्षेत्र और पूरी दुनिया में शान्ति और सदभाव फैलाने के प्रयासों में जी-जान से लगे हैं., संयुक्त राष्ट्र की शीर्ष सांस्कृतिक अधिकारी ऑड्री अज़ूले ने कहा है कि ईसाइयों के धर्मगुरू पोप फ्रांसिस की इराक़ के उत्तरी क्षेत्र में स्थित एक प्राचीन चर्च में प्रार्थना करने के लिये ऐतिहासिक यात्रा करना, विश्व के लिये एक स्पष्ट सन्देश दर्शाता है कि तमाम धर्मों के अनुयाइयों के बीच समरसता और एकजुटता ही, मानवता की प्रगति व आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है. 

पोप फ्रांसिस ने अपनी इराक़ यात्रा के दौरान, एक ऐसे प्राचीन चर्च का दौरा किया है जिसे इस्लामिक स्टेट (दाएश) ने ध्वस्त कर दिया था.

पोप फ्रांसिस ने, शुक्रवार को इराक़ में पहुँचने के बाद, सप्ताहान्त में, मोसुल और देश में ईसाइयों के लिये पवित्र स्थलों का दौरा किया.

मीडिया ख़बरों के अनुसार, पोप फ्रांसिस ने, रविवार को, शान्ति का आहवान किया और चर्च के अवशेष हिस्से में उन पीड़ितों के लिये प्रार्थना की, जो इस्लामिक स्टेट (दाएश) द्वारा चलाए गए संघर्ष की चपेट में आए, और इस संघर्ष के परिणामस्वरूप जिन हज़ारों लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी.

संयुक्त राष्ट्र के शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन – यूनेस्को की महानिदेशक ऑड्री अज़ूले और संयुक्त अरब अमीरात की संस्कृति व युवा मामलों की मन्त्री नूरा अल काबी ने, अल ताहेरा चर्च में, पोप फ्रांसिस की इस ऐतिहासिक यात्रा का स्वागत किया.

ये चर्च भी यूनेस्को के नेतृत्व में चलाई जा रही – मोसुल की आत्मा की पुनर्बहली की परियोजना में शामिल है.

संस्कृतियों का मिलन स्थल

अल ताहेरा चर्च का निर्माण 1859 में हुआ था और उसे 1862 में धर्मावलम्बियों के लिये खोला गया था.

ये चर्च मोसुल के इतिहास में बुना हुआ एक अदभुत प्रतीक है. ये चर्च प्राचीन शहर के बीचोंबीच स्थित है जो टिगरिस (दजला) नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित है.

जब दिसम्बर 2020 में, इस चर्च का मरम्मत कार्य शुरू हुआ था तो इराक़ में यूनेस्को प्रतिनिधि पाओलो फ़ॉण्टनी ने कहा था कि चर्च की पुनःस्थापना, केवल एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में इसके मूल्यवान होने की नज़र से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि शहर की विविधता का सबूत होने के रूप में भी अहम है.

ये परिसर विभिन्न संस्कृतियों का मिलन स्थल और सदियों तक, विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिये शान्तिपूर्ण आश्रयस्थल रहा है. 

उस समय नूरा अल काबी ने कहा था कि यूनेस्को के साथ मिलकर, संयुक्त अरब अमीरात के प्रयासों का मक़सद, केवल इन प्राचीन धार्मिक स्थलों को पुनर्बहाल किया जाना ही नहीं है, बल्कि मोसुल में रोज़गार अवसर पैदा करके, युवाओं को सशक्त बनाना भी है.

साथ ही व्यावसायिक और तकनीकी प्रशिक्षण देना और सांस्कृतिक धरोहर की संरक्षा के क्षेत्र में कौशल क्षमताएँ विकसित करना भी है.

धर्मों के बीच सदभाव और एकजुटता

मन्त्री नूरा अल काबी और यूनेस्को महानिदेशक ऑड्री अज़ूले ने शनिवार को एक संयुक्त वक्तव्य में, पोप फ्रांसिस की अल ताहिरा चर्च की यात्रा को, विश्व के लिये एक यह स्पष्ट सन्देश भी क़रार दिया कि विभिन्न धर्मों के अनुयाइयों के बीच सदभाव और एकजुटता ही, मानवता की प्रगति को आगे बढ़ाने और आज की दुनिया के सामने पेश बढ़ती चुनौतियों का मुक़ाबला करने का एक मात्र रास्ता है.

मन्त्री नूरा अल काबी और महानिदेशक ऑड्री अज़ूले ने पोप फ्रांसिस की, इन स्थलों की इस यात्रा को शान्ति और बन्धुत्व का सन्देश फैलाने के लिये महत्वपूर्ण बताया. 

साथ ही, पोप की इस यात्रा को, अल नूरी मसजिद, व अल साआ और अल ताहेरा चर्च ध्वस्त करने वाले उस गुट (दाएश) द्वारा फैलाए गए विभाजनकारी सन्देश का मुक़ाबला करने की ताक़त व सहनशीलता को रेखांकित करने वाली भी बताया.

दोनों सांस्कृतिक अधिकारियों ने संयुक्त बयान में कहा था कि पोप फ्रांसिस की ये यात्रा उन लोगों के लिये भी प्रेरणा का स्रोत है जो इन प्राचीन स्थलों की पुनर्बहाली परियोजना में सक्रिय हैं.

साथ ही इस यात्रा से उन लोगों के प्रयासों को भी बल मिला है जो इराक़, उस क्षेत्र और पूरी दुनिया में शान्ति और सदभाव फैलाने के प्रयासों में जी-जान से लगे हैं.

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