एक ऐसा वायरस जिसने विश्व को घुटनों पर ला दिया: शिक्षा का संकट

वर्ष 2020 के दौरान, कोविड-19 महामारी से निपटने के उपायों के तहत, दुनिया भर में अनेक स्थानों पर स्कूल भी बन्द करने पड़े हैं, जिसके कारण विश्व भर में बच्चों की शिक्षा में व्यवधान पैदा हुआ. स्कूल खुल और बन्द हो रहे हैं, अलबत्ता कुछ बच्चों को अपनी शिक्षा जारी रखने के लिये ऑनलाइन माध्यम भी उपलब्ध हैं, जबकि बहुत से बच्चे इससे वंचित हैं. मगर, निस्सन्देह, कमज़ोर हालात वाले बच्चे, तालाबन्दी उपायों से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं. इस लेख में, शिक्षा क्षेत्र पर कोविड-19 महामारी के असर के बारे में एक नज़र…

वर्ष 2020: जिसे कोविड-19 ने बिल्कुल उलट-पलट कर दिया…

अतुल्य व्यवधान का वैश्विक प्रभाव
स्वास्थ्य और अन्य तरह के संकटों के कारण, स्कूलों को बन्द किया जाना, कोई नई बात नहीं है, कम से कम विकासशील देशों में तो नहीं, और उनके सम्भावित विनाशकारी परिणाम भी सर्वविदित हैं; बच्चों की शिक्षा बादित होती है और बहुत से बच्चे हमेशा के लिये स्कूल से हट जाते हैं, बच्चों के ख़िलाफ़ हिंसा में बढ़ोत्तरी, किशोर उम्र में ही लड़कियों का गर्भवती हो जाना और छोटी उम्र में ही विवाह.
कोविड-19, अन्य तरह के संकटों से इस तरह से अलग है कि इसने पूरी दूनिया में, एक साथ बच्चों को प्रभावित किया है.
ये भी पढ़ें: विश्व बाल दिवस – हर बच्चे के लिये, एक बेहतर भविष्य की कल्पना
जब स्कूल बन्द होते हैं तो निर्धनतम और बहुत कमज़ोर हालात वाले बच्चों को सबसे ज़्यादा नुक़सान उठाना पड़ता है, इसलिये, जैसे-जैसे, देशों ने तालाबन्दी उपाय लागू करने शुरू किये, संयुक्त राष्ट्र ने बच्चों की शिक्षा और सीखना जारी रखने, और यथासम्भव स्कूलों को सुरक्षित माहौल में फिर से खोले जाने की हिमायत में तेज़ी से आवाज़ उठाई. 
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और साँस्कृतिक संगठन – यूनेस्को की महानिदेशक ऑड्री अज़ूले ने मार्च में आगाह करते हुए कहा था कि ये दुर्भाग्य की बात है कि दुनिया भर में शिक्षा जारी रखने में उत्पन्न हुई बाधा का स्तर और गति, अतुल्य है, अगर यही स्थिति जारी रही तो, इससे शिक्षा का अधिकार ही ख़तरे में पड़ सकता है. 
डिजिटल विभाजन

© UNICEF/Helene Sandbu Ryengदक्षिण सूडान की राजधानी जूबा में एक 14 वर्षीय लड़की, रेडियों के ज़रिये अंग्रेज़ी भाषा और विज्ञान की पढ़ाई करती हुई.

छात्रों और अध्यापकों को इस तरह के टैक्नॉलॉजी तरीक़ों और डिजिटल उपकरणों से जूझना पड़ा जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखे थे. ये एक ऐसा अनुभव था, जो बहुत से लोगों को बहुत मुश्किल लगा जिसे वो समझ नहीं पाए, मगर, यही एक मात्र उपाय था जिसके माध्यम से किसी भी तरह की शिक्षा जारी रखी जा सकती थी. याद रहे कि उनमें बहुत से लोग अपने घरों और कमरों में सीमित थे.
ये भी पढ़ें: एक डिजिटल खाई – एक अरब 30 करोड़ बच्चों के पास घर पर शिक्षा के लिये इंटरनेट नहीं
अलबत्ता, लाखों बच्चों के लिये, ऑनलाइन वर्चुअल शिक्षा कक्ष की अवधारणा ही एक ऐसा सपना है जो कभी वास्तविक रूप नहीं ले सकता. अप्रैल में, यूनेस्को ने डिजिटल उपकरणों के माध्यम से दूरस्थ शिक्षा की उपलब्धता में चौंका देने वाली असमानता और विभाजन उजागर किया. आँकड़ों के अनुसार, लगभग 83 करोड़ बच्चों को कोई कम्प्यूटर उपलब्ध नहीं था.
ये भी पढ़ें: डिजिटल उपलब्धता को सार्वभौमिक बनाने की ज़रूरत
विशेष रूप में, कम आय वाले देशों में तस्वीर और भी निराशाजनक थी: सब सहारा अफ्रीका में, लगभग 90 प्रतिशत बच्चों के घरों में कम्प्यूटर उपलब्ध नहीं थे, जबकि 82 प्रतिशत बच्चों को ऑनलाइन पहुँच यानि इंटरनेट सुविधा हासिल नहीं थी. 
जून में, यूनीसेफ़ के एक अधिकारी रॉबर्ट जेनकिन्स ने कहा था, “कोविड-19 महामारी फैलने से पहले भी, शिक्षा का संकट मौजूद था. अब हमारे सामने, अब और भी अधिक विभाजनकारी और गहराता शैक्षिक संकट है.”
अलबत्ता, ऐसे बहुत से विकासशील देशों में, जहाँ बहुत से छात्रों के लिये, ऑनलाइन माध्यम और कम्प्यूटर कोई विकल्प नहीं हैं, वहाँ रेडियो अब भी लाखों लोगों तक पहुँच बनाने में एक सशक्त माध्यम साबित हुआ है, और किसी ना किसी रूप में, शिक्षा जारी रखने में रेडियो का प्रयोग किया जा रहा है. 
दक्षिण सूडान में, संयुक्त राष्ट्र मिशन द्वारा चलाए गए रेडियो मिराया ने, समाचारों के एक विश्वस्त सूत्र के रूप में अपना नाम बनाया है. इस रेडियो स्टेशन ने ऐसे बच्चों के लिये शैक्षिक कार्यक्रम प्रसारित किये, जो कोविड-19 से निपटने के उपायों के कारण लगी पाबन्दियों में, अपनी स्कूली शिक्षा जारी नहीं रख पाए. 
एक पीढ़ी का सवाल

©UNICEF/Filippovयूक्रेन के क्यीव में एक 7 वर्षीय लड़की, अपने घर में पढ़ाई करते हुए, क्योंकि कोविड-19 महामारी के कारण स्कूल बन्द रहे.

इस तरह के उपायों के बावजूद, संयुक्त राष्ट्र ने अगस्त में आगाह करते हुए कहा था कि शिक्षा बाधित रहने का दीर्घकालीन असर ये पड़ेगा कि अफ्रीका में, बच्चों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार होगी जो शिक्षा से वंचित रह जाएगी. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के एक सर्वे के अनुसार, 39 सब सहारा देशों में पाया गया कि केवल 6 देशों में ही स्कूल खुले थे और 19 देशों में, केवल आँशिक रूप में ही स्कूल खुले थे.
ये भी पढ़ें: स्कूल बन्द करना, महामारी के ख़िलाफ़ रणनीति में ग़लत क़दम
वर्ष के अन्त तक, दुनिया भर में, लगभग 32 करोड़ बच्चे, स्कूलों से बाहर थे. यूनीसेफ़ ने तमाम देशों से, स्कूल खोले जाने और कक्षाओं को यथासम्भव सुरक्षित बनाने के मुद्दे को प्राथमिक देने की पुकार लगाई थी.
यूनीसेफ़ के शिक्षा मामलों के वैश्विक प्रमुख रॉबर्ट जैनकिन्स का कहना है, “कोविड-19 के दौरान, हमने स्कूलों के बारे में जो कुछ सीखा है, वो स्पष्ट है: स्कूलों को खुले रखने के फ़ायदे, उन्हें बन्द रखने पर आने वाली लागत की तुलना में कहीं ज़्यादा हैं, और स्कूलों को राष्ट्रीय स्तर पर बन्द रखने से हर हाल में बचा जाना चाहिये.”
रॉबर्ट जेनकिन्स का कहना है कि जैसे-जैसे, दुनिया भर में, कोविड-19 के मामलों में फिर से उछाल देखा गया है, और वैक्सीन, अब भी बहुत से लोगों की पहुँच से दूर है, तो अन्धाधुन्ध तालाबन्दियाँ लागू करने के बजाय, देशों में ज़्यादा सम्वेदनशील और तार्किक नीतियों की ज़रूरत है.
“सबूतों से स्पष्ट होता है कि स्कूल, महामारी फैलने के मुख्य स्रोत या वाहन नहीं हैं. फिर भी हम ये चिन्ताजनक चलन देख रहे हैं कि देशों की सरकारें एक बार, स्कूलों को ही पहले उपाये के रूप में बन्द करने पर तुले हुए हैं, जबकि स्कूलों को बन्द करना, अन्तिम उपाय होना चाहिये. कुछ मामलों में, ऐसा, समुदायों के स्तर पर करने के बजाय, राष्ट्रीय स्तर पर किया जा रहा है, और बच्चों को अपनी शिक्षा, मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य और सुरक्षा, पर विनाशकारी प्रभावों का सामना करना पड़ रहा है.”, वर्ष 2020 के दौरान, कोविड-19 महामारी से निपटने के उपायों के तहत, दुनिया भर में अनेक स्थानों पर स्कूल भी बन्द करने पड़े हैं, जिसके कारण विश्व भर में बच्चों की शिक्षा में व्यवधान पैदा हुआ. स्कूल खुल और बन्द हो रहे हैं, अलबत्ता कुछ बच्चों को अपनी शिक्षा जारी रखने के लिये ऑनलाइन माध्यम भी उपलब्ध हैं, जबकि बहुत से बच्चे इससे वंचित हैं. मगर, निस्सन्देह, कमज़ोर हालात वाले बच्चे, तालाबन्दी उपायों से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं. इस लेख में, शिक्षा क्षेत्र पर कोविड-19 महामारी के असर के बारे में एक नज़र…

वर्ष 2020: जिसे कोविड-19 ने बिल्कुल उलट-पलट कर दिया…

अतुल्य व्यवधान का वैश्विक प्रभाव

स्वास्थ्य और अन्य तरह के संकटों के कारण, स्कूलों को बन्द किया जाना, कोई नई बात नहीं है, कम से कम विकासशील देशों में तो नहीं, और उनके सम्भावित विनाशकारी परिणाम भी सर्वविदित हैं; बच्चों की शिक्षा बादित होती है और बहुत से बच्चे हमेशा के लिये स्कूल से हट जाते हैं, बच्चों के ख़िलाफ़ हिंसा में बढ़ोत्तरी, किशोर उम्र में ही लड़कियों का गर्भवती हो जाना और छोटी उम्र में ही विवाह.

कोविड-19, अन्य तरह के संकटों से इस तरह से अलग है कि इसने पूरी दूनिया में, एक साथ बच्चों को प्रभावित किया है.

ये भी पढ़ें: विश्व बाल दिवस – हर बच्चे के लिये, एक बेहतर भविष्य की कल्पना

जब स्कूल बन्द होते हैं तो निर्धनतम और बहुत कमज़ोर हालात वाले बच्चों को सबसे ज़्यादा नुक़सान उठाना पड़ता है, इसलिये, जैसे-जैसे, देशों ने तालाबन्दी उपाय लागू करने शुरू किये, संयुक्त राष्ट्र ने बच्चों की शिक्षा और सीखना जारी रखने, और यथासम्भव स्कूलों को सुरक्षित माहौल में फिर से खोले जाने की हिमायत में तेज़ी से आवाज़ उठाई. 

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और साँस्कृतिक संगठन – यूनेस्को की महानिदेशक ऑड्री अज़ूले ने मार्च में आगाह करते हुए कहा था कि ये दुर्भाग्य की बात है कि दुनिया भर में शिक्षा जारी रखने में उत्पन्न हुई बाधा का स्तर और गति, अतुल्य है, अगर यही स्थिति जारी रही तो, इससे शिक्षा का अधिकार ही ख़तरे में पड़ सकता है. 

डिजिटल विभाजन


© UNICEF/Helene Sandbu Ryeng
दक्षिण सूडान की राजधानी जूबा में एक 14 वर्षीय लड़की, रेडियों के ज़रिये अंग्रेज़ी भाषा और विज्ञान की पढ़ाई करती हुई.

छात्रों और अध्यापकों को इस तरह के टैक्नॉलॉजी तरीक़ों और डिजिटल उपकरणों से जूझना पड़ा जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखे थे. ये एक ऐसा अनुभव था, जो बहुत से लोगों को बहुत मुश्किल लगा जिसे वो समझ नहीं पाए, मगर, यही एक मात्र उपाय था जिसके माध्यम से किसी भी तरह की शिक्षा जारी रखी जा सकती थी. याद रहे कि उनमें बहुत से लोग अपने घरों और कमरों में सीमित थे.

ये भी पढ़ें: एक डिजिटल खाई – एक अरब 30 करोड़ बच्चों के पास घर पर शिक्षा के लिये इंटरनेट नहीं

अलबत्ता, लाखों बच्चों के लिये, ऑनलाइन वर्चुअल शिक्षा कक्ष की अवधारणा ही एक ऐसा सपना है जो कभी वास्तविक रूप नहीं ले सकता. अप्रैल में, यूनेस्को ने डिजिटल उपकरणों के माध्यम से दूरस्थ शिक्षा की उपलब्धता में चौंका देने वाली असमानता और विभाजन उजागर किया. आँकड़ों के अनुसार, लगभग 83 करोड़ बच्चों को कोई कम्प्यूटर उपलब्ध नहीं था.

ये भी पढ़ें: डिजिटल उपलब्धता को सार्वभौमिक बनाने की ज़रूरत

विशेष रूप में, कम आय वाले देशों में तस्वीर और भी निराशाजनक थी: सब सहारा अफ्रीका में, लगभग 90 प्रतिशत बच्चों के घरों में कम्प्यूटर उपलब्ध नहीं थे, जबकि 82 प्रतिशत बच्चों को ऑनलाइन पहुँच यानि इंटरनेट सुविधा हासिल नहीं थी. 

जून में, यूनीसेफ़ के एक अधिकारी रॉबर्ट जेनकिन्स ने कहा था, “कोविड-19 महामारी फैलने से पहले भी, शिक्षा का संकट मौजूद था. अब हमारे सामने, अब और भी अधिक विभाजनकारी और गहराता शैक्षिक संकट है.”

अलबत्ता, ऐसे बहुत से विकासशील देशों में, जहाँ बहुत से छात्रों के लिये, ऑनलाइन माध्यम और कम्प्यूटर कोई विकल्प नहीं हैं, वहाँ रेडियो अब भी लाखों लोगों तक पहुँच बनाने में एक सशक्त माध्यम साबित हुआ है, और किसी ना किसी रूप में, शिक्षा जारी रखने में रेडियो का प्रयोग किया जा रहा है. 

दक्षिण सूडान में, संयुक्त राष्ट्र मिशन द्वारा चलाए गए रेडियो मिराया ने, समाचारों के एक विश्वस्त सूत्र के रूप में अपना नाम बनाया है. इस रेडियो स्टेशन ने ऐसे बच्चों के लिये शैक्षिक कार्यक्रम प्रसारित किये, जो कोविड-19 से निपटने के उपायों के कारण लगी पाबन्दियों में, अपनी स्कूली शिक्षा जारी नहीं रख पाए. 

एक पीढ़ी का सवाल


©UNICEF/Filippov
यूक्रेन के क्यीव में एक 7 वर्षीय लड़की, अपने घर में पढ़ाई करते हुए, क्योंकि कोविड-19 महामारी के कारण स्कूल बन्द रहे.

इस तरह के उपायों के बावजूद, संयुक्त राष्ट्र ने अगस्त में आगाह करते हुए कहा था कि शिक्षा बाधित रहने का दीर्घकालीन असर ये पड़ेगा कि अफ्रीका में, बच्चों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार होगी जो शिक्षा से वंचित रह जाएगी. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के एक सर्वे के अनुसार, 39 सब सहारा देशों में पाया गया कि केवल 6 देशों में ही स्कूल खुले थे और 19 देशों में, केवल आँशिक रूप में ही स्कूल खुले थे.

ये भी पढ़ें: स्कूल बन्द करना, महामारी के ख़िलाफ़ रणनीति में ग़लत क़दम

वर्ष के अन्त तक, दुनिया भर में, लगभग 32 करोड़ बच्चे, स्कूलों से बाहर थे. यूनीसेफ़ ने तमाम देशों से, स्कूल खोले जाने और कक्षाओं को यथासम्भव सुरक्षित बनाने के मुद्दे को प्राथमिक देने की पुकार लगाई थी.

यूनीसेफ़ के शिक्षा मामलों के वैश्विक प्रमुख रॉबर्ट जैनकिन्स का कहना है, “कोविड-19 के दौरान, हमने स्कूलों के बारे में जो कुछ सीखा है, वो स्पष्ट है: स्कूलों को खुले रखने के फ़ायदे, उन्हें बन्द रखने पर आने वाली लागत की तुलना में कहीं ज़्यादा हैं, और स्कूलों को राष्ट्रीय स्तर पर बन्द रखने से हर हाल में बचा जाना चाहिये.”

रॉबर्ट जेनकिन्स का कहना है कि जैसे-जैसे, दुनिया भर में, कोविड-19 के मामलों में फिर से उछाल देखा गया है, और वैक्सीन, अब भी बहुत से लोगों की पहुँच से दूर है, तो अन्धाधुन्ध तालाबन्दियाँ लागू करने के बजाय, देशों में ज़्यादा सम्वेदनशील और तार्किक नीतियों की ज़रूरत है.

“सबूतों से स्पष्ट होता है कि स्कूल, महामारी फैलने के मुख्य स्रोत या वाहन नहीं हैं. फिर भी हम ये चिन्ताजनक चलन देख रहे हैं कि देशों की सरकारें एक बार, स्कूलों को ही पहले उपाये के रूप में बन्द करने पर तुले हुए हैं, जबकि स्कूलों को बन्द करना, अन्तिम उपाय होना चाहिये. कुछ मामलों में, ऐसा, समुदायों के स्तर पर करने के बजाय, राष्ट्रीय स्तर पर किया जा रहा है, और बच्चों को अपनी शिक्षा, मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य और सुरक्षा, पर विनाशकारी प्रभावों का सामना करना पड़ रहा है.”

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