एक ज़िम्मेदार आर्टिफ़िशियल इंटैलिजेंस (AI) – समय की ज़रूरत (ब्लॉग)

भारत में संयुक्त राष्ट्र की रेज़िडेन्ट कोऑर्डिनेटर (RCO), रेनाटा डेज़ालिएन का मानना है कि पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना, आर्टिफ़िशियल इंटैलिजेंस यानि AI से, सामाजिक व आर्थिक खाई और भी ग़हरी हो सकती है, जिसके भेदभावपूर्ण परिणाम सामने आ सकते हैं. 
 

पूर्व चैकोस्लोवाकिया के लेखक कारेल कापेक ने 1920 के दशक में, पहली बार नाटकों में रोबोट का उल्लेख किया था. तब से ही, मनुष्य बुद्धिमान मशीनों को लेकर कल्पनाशील रहे हैं. क्या होगा, अगर रोबोट पुलिस की जगह ले लें? क्या होगा, अगर रोबोट हमारे बच्चों और बुज़ुर्गों की देखभाल करें? या डायस्टोपियन साहित्य के लिये दिलचस्प सामग्री होगी कि क्या हो, अगर रोबोट हमसे अधिक बुद्धिमान हो जाएँ?
हालाँकि हम चारों ओर, सादृश्य दुनिया के प्रतीकों से घिरे हुए हैं, फिर भी हम में से अनेक लोगों को, अब भी लगता है कि इस आश्चर्यजनक मंज़र के पूरा होने में दशकों का समय लग सकता है. लेकिन चौथी औद्योगिक क्रान्ति लाने के लिये, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) हमारे पास मौजूद है.
एआई का बढ़ता उपयोग
यह हमारे पसन्दीदा मनोरंजन कार्यक्रमों की स्ट्रीमिंग या शॉपिंग साइट पर, रोज़ दी जाने वाली सिफ़ारिशों में अन्तर्निहित है; जीपीएस मैपिंग तकनीक में मौजूद है; जब हम एक ईमेल भेजने या एक वेब खोज को पूरा करने की कोशिश करते हैं, तो आगे-आगे रहकर, हमारे वाक्यों को पूरा करने वाले पूर्वानुमानों में नज़र आती है. इसमें  बिजली के दोहन से भी अधिक परिवर्तनकारी क्रान्ति साबित होने की सम्भावना छिपी है.
जितना अधिक हम एआई का उपयोग करते हैं, उतना अधिक डेटा हम उत्पन्न करते हैं, उतनी ही अधिक बुद्धिमत्ता उसमें विकसित होती है. पिछले एक दशक में, AI अभूतपूर्व गति के साथ विकसित हुई है – 2011 में मानव चैम्पियनों को ‘जैपर्डी’ में हराने से लेकर, विश्व के नम्बर एक खिलाड़ी को हराने और पिछले साल प्रोटीन के अणु को डिकोड करने तक. 

स्वचालन, बड़ा डेटा और अल्गोरिदम हमारे जीवन के नए-नए कोनों पर क़ब्ज़ा करते रहेंगे, और एक दिन हम भूल जाएँगे कि स्थिति “पहले” कैसी थी. जिस तरह बिजली ने हमें समय को थामने की अनुमति दी, और हमारे अस्तित्व के लगभग हर पहलू को मौलिक रूप से बदलने में सक्षम बनाया, उसी तरह एआई हमें भूख, ग़रीबी और बीमारी के उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ा सकती है, व जलवायु परिवर्तन शमन, शिक्षा और वैज्ञानिक खोज के लिये, नए और ऊँचे अकल्पनीय रास्ते खोल सकती है. 
बेहतर या बदतर 
AI से फ़सलों की पैदावार बढ़ाने में मदद मिली है, व्यवसाय की उत्पादकता में वृद्धि हुई है, ऋण हासिल करने की सुविधा में सुधार और कैंसर का तेज़ी व अधिक सटीक ढंग से पता लगाने में सफलता हासिल हुई हैं.
विश्व अर्थव्यवस्था में, वर्ष 2030 तक, इसका 15 ख़रब डॉलर से अधिक का योगदान होगा, यानि वैश्विक जीडीपी में 14% की बढ़ोत्तरी.
गूगल ने दुनिया भर में “कल्याण के लिये एआई” के 2 हज़ार 600 से अधिक उपयोगी मामलों की पहचान की है.
टिकाऊ विकास लक्ष्यों (SDG) पर AI के प्रभाव की समीक्षा करते हुए ‘नेचर जर्नल’ में प्रकाशित अध्ययन में पाया गया है कि AI, लगभग 134 यानि 79% एसडीजी लक्ष्यों को हासिल करने में मददगार साबित हो सकती है. हम अभूतपूर्व तकनीकी सफलताओं के पुंज पर हैं जो हमारी दुनिया को पहले से कहीं अधिक गहराई से, और सकारात्मक तरीक़े से बदलने का विश्वास दिलाते हैं.
लेकिन साथ ही, ‘नेचर’ में प्रकाशित अध्ययन से यह भी मालूम होता है कि AI, 59 टिकाऊ विकास लक्ष्यों यानि लगभग 35% – लक्ष्यों में सक्रिय रूप से बाधा भी डाल सकती है. शुरुआत में, एआई को बड़े पैमाने पर कम्प्यूटेशनल क्षमता की आवश्यकता होती है, जिसका अर्थ है अधिक ऊर्जा माँग वाला डेटा केन्द्र, जो बड़ा कार्बन फुटप्रिन्ट छोड़ेगा.
फिर, कृत्रिम बुद्दिमत्ता (AI) डिजिटल बहिष्करण को बढ़ावा दे सकती है. रोबोटिक्स और एआई कम्पनियाँ ऐसी बुद्धिमान मशीनों का निर्माण कर रही हैं जो आमतौर पर कम आय वाले श्रमिकों के कार्यों का स्थान ले लेंगी: जैसेकि स्वचालित सेवाओं के खजांची, फलों को चुनने वाले मैदानी कामगारों की जगह रोबोट आदि. लेकिन वह दिन दूर नहीं, जब एआई, अकाउंटेंट, वित्तीय व्यापारी और मध्य प्रबन्धक जैसे, कुर्सी-मेज़ वाले बहुत से रोज़गारों को भी निगल जाएगी.
श्रमिकों के लिये दूसरे कौशल विकसित करने की स्पष्ट नीतियों के बिना, नए अवसरों का वादा करना, वास्तव में गम्भीर असमानताएँ पैदा कर सकता है. निवेश भी उन देशों में स्थानान्तरित हो सकता है, जहाँ एआई-सम्बन्धित कार्य पहले से ही स्थापित हों, जिससे देशों के बीच व्याप्त अन्तर और भी गहरा होगा. 
कुल मिलाकर, चार बिग टेक बड़ी कम्पनियाँ – एल्फ़ाबेट/गूगल, एमेज़ॉन, एप्पल और फ़ेसबुक – का कुल मूल्य 5 खरब डॉलर है, जो पृथ्वी के हर एक देश के जीडीपी से अधिक है. 2020 में, जब दुनिया कोविड-19 महामारी के प्रभाव से उबर रही थी, इनकी आमदनी में 2 खरब डॉलर का इज़ाफा हुआ. 
सच यह है कि जिस तरह एआई में अरबों लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की क्षमता है, वह मौजूदा समस्याओं को बढ़ा भी सकती है व नई समस्याएँ पैदा भी कर सकती है. उदाहरण के लिये, AI की, चेहरे की पहचान और निगरानी तकनीक के प्रलेखित उदाहरण, जिसके तहत रंग के आधार पर अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव हुआ.
या मौजूदा कार्यबल प्रोफ़ाइल के आधार पर एआई-सक्षम भर्ती इन्जिन, ने स्वत: ही यह सीख लिया कि महिलाओं की अपेक्षा पुरुष उम्मीदवारों को भर्ती करना चाहिये.
गोपनीयता की चिन्ता
एआई गम्भीर डेटा गोपनीयता चिन्ताएँ भी पेश करती है. अल्गोरिदम में डेटा के लिये कभी न ख़त्म होने वाली खोज के कारण, हमारे डिजिटल फुटप्रिन्ट बिना हमारी जानकारी या सूचित सहमति के बिना बेचे जा रहे हैं. हमारी पसन्द-नापसन्द पर निगरानी रखी जा रही है, समान विचारधारा वालों को अलग-अलग गुटों में डालकर एक-दूसरे से अलग किया जा रहा है, जिससे विभिन्न दृष्टिकोणों पर बहस करके, आम सहमति पर पहुँचने के तरीक़े ख़त्म होते जा रहे हैं.

ITU/D. Procofieffआर्टिफ़िशियल इंटैलिजेंस आसानियाँ होने के साथ-साथ, विषमताएँ बढ़ने और रोज़गार कम होने का भी जोखिम है.

आज, हमारे बारे में जिस तरह ऑनलाइन मंचों पर जानकारी मौजूद है, तो यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अल्गोरिदम हमें हमसे बेहतर जानते हैं. वे हमारे जाने बिना ही  हमारे व्यवहार को दर्शा सकते हैं. जिस तरह हमें उपकरणों की लत लग गई है, घंटों फोन देखने की आदत पड़ गई है, और कैम्ब्रिज एनालिटिका में मतदान के फ़ैसलों को बदलने के लिये अल्गोरिदम और डेटा का उपयोग करने के सनसनीख़ेज़ मामले को देखते हुए – वर्तमान एआई व्यापार मॉडल से चिन्ताएँ उत्पन्न होना स्वाभाविक है. इसे सभी व्यक्तियों और सामाजों को एक शक्तिशाली चेतावनी के रूप में देखना चाहिये. 
जहाँ दुनिया में एल्गोरिदम का बोलबाला है, यह याद रखना भी ज़रूरी है कि अपने सभी पूर्वाग्रहों व जागरूक और अचेतन मन के साथ, मनुष्यों ने ही इसे जन्म दिया है. हम ही अल्गोरिदम को आकार देते हैं और हमारे डेटा पर ही वो काम करता है. 
याद करें कि वर्ष 2016 में, माइक्रोसॉफ़्ट के “ताई” नामक ट्विटर चैटबोट ने, उपलब्ध सामग्री के आधार पर, एक दिन से भी कम समय में, नस्लभेदी सामग्री उगलनी शुरू कर दी थी. 
मानवीय भविष्य की सुनिश्चितता
फिर हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि AI एप्लिकेशन्स यथासम्भव निष्पक्ष, न्यायसंगत, पारदर्शी, सभ्य व समावेशी हों? हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि सम्भावित नुक़सान को कम किया जाए, विशेषकर बच्चों और कमज़ोर वर्गों के लिये? नैतिक रक्षक नीतियों के बिना, एआई सामाजिक और आर्थिक खाई को और ग़हरा करेगी, समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों को बढ़ाकर, भेदभावपूर्ण नतीजे सामने लाएगी.
यह, न तो पर्याप्त हैं और न ही, एआई तकनीक वाली कम्पनियों से, अपने-अपने नियम बनाकर, इन सभी चुनौतियों से निपटने की उम्मीद करना उचित है. 
पहली बात तो यह है कि वे एआई को विकसित करने वाले अकेले नहीं हैं; सरकारें भी ऐसा करती हैं.
दूसरी बात, एआई गवर्नेंस के लिये डिज़ाइन, विकास और तैनाती चरणों के दौरान, सम्भावित नुक़सान को कम करने के उपाय, समीक्षाएँ और ऑडिट सुनिश्चित करने वाले नैतिक सिद्धान्तों, संस्कृतियाँ और आचार संहिताएँ विकसित करने, AI के उत्कर्ष के लिये पारदर्शिता, जवाबदेही, समावेश और सामाजिक विश्वास को विकसित करने, व इसकी असाधारण सफलताओं को सामने लाने में, “वृहद समाजिक दृष्टिकोण” ही हमें सक्षम बनाएगा.

Unsplash/Possessed Photographyइंजीनियरिंग व आर्टिफ़िशियल इंटैलिजेंस, टिकाऊ विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.

एआई की वैश्विक पहुँच को देखते हुए, इस तरह के “पूर्ण सामाजिक” दृष्टिकोण को “पूर्ण वैश्विक” दृष्टिकोण में बदल देना होगा. डिजिटल सहयोग पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव का रोडमैप  एक उत्कृष्ट प्रारम्भिक बिन्दु है: यह वैश्विक सहयोग पर बहु-हितधारक प्रयासों की आवश्यकता पर बल देता है, जिससे एआई का उपयोग इस तरह से किया जाए, जो “भरोसेमन्द” हो, मानवाधिकार आधारित हो, सुरक्षित एवँ टिकाऊ हो, और शान्ति को बढ़ावा देता हो.” 
यूनेस्को ने भी सदस्य देशों को विचार-विमर्श के ज़रिये, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता पर एक वैश्विक, व्यापक मानक-तय करने वाला मसौदा अपनाने की सिफ़ारिशें तैयार की है.
भारत सहित अनेक देश, अवसरों और जोखिमों के प्रति संज्ञान ले रहे हैं, और कल्याण हेतु, एआई प्रोत्साहन और एआई गवर्नेंस के बीच सही सन्तुलन बनाने के लिये प्रयासरत हैं. भारत सरकार के नीति आयोग की साल भर की सलाह प्रक्रिया के बाद बनाई गई एआई योजना, ‘Responsible AI for All strategy’ इसी सोच का परिणाम है. इसके तहत यह माना गया है कि हमारे डिजिटल भविष्य को, बहु-हितधारक शासन संरचनाओं के बिना, कल्याण के उन कार्यों के लिये अनुकूलित नहीं किया जा सकता है, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि लाभांश उचित, समावेशी और न्यायपूर्ण हों.
आम मार्गदर्शक सिद्धान्तों पर सहमत होना एक पहला महत्वपूर्ण क़दम है, लेकिन यह भी सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा नहीं है. दरअसल सिद्धान्तों का पालन करके ही इसके लचीलेपन का अन्दाज़ा होगा. यहाँ सिद्धान्तों का सामना वास्तविकता से होगा, जब अमल के दौरान नैतिक मुद्दे और रुकावटें पैदा होंगी, जिनके लिये हमें गहन, कठिन, बहु-हितधारक सम्वाद, नैतिक विश्लेषण और समाधान करने के लिये तैयार रहना चाहिये. तभी एआई, मानवता को दिया अपना वादा पूरा कर सकती है. तब तक, एआई (और इसे बनाने वाले मनुष्य) प्रोमेथियस के मिथक को ही जीवन्त करेंगे. प्रोमेथियस यानि वो टाइटन जिसने देवताओं की अग्नि नश्वर मानवों को दी – वो चालबाज़, जिसके ज़ीउस की अवहेलना करने से, पंडोरा ने अपना बक्सा खोल दिया था., भारत में संयुक्त राष्ट्र की रेज़िडेन्ट कोऑर्डिनेटर (RCO), रेनाटा डेज़ालिएन का मानना है कि पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना, आर्टिफ़िशियल इंटैलिजेंस यानि AI से, सामाजिक व आर्थिक खाई और भी ग़हरी हो सकती है, जिसके भेदभावपूर्ण परिणाम सामने आ सकते हैं. 
 

पूर्व चैकोस्लोवाकिया के लेखक कारेल कापेक ने 1920 के दशक में, पहली बार नाटकों में रोबोट का उल्लेख किया था. तब से ही, मनुष्य बुद्धिमान मशीनों को लेकर कल्पनाशील रहे हैं. क्या होगा, अगर रोबोट पुलिस की जगह ले लें? क्या होगा, अगर रोबोट हमारे बच्चों और बुज़ुर्गों की देखभाल करें? या डायस्टोपियन साहित्य के लिये दिलचस्प सामग्री होगी कि क्या हो, अगर रोबोट हमसे अधिक बुद्धिमान हो जाएँ?

हालाँकि हम चारों ओर, सादृश्य दुनिया के प्रतीकों से घिरे हुए हैं, फिर भी हम में से अनेक लोगों को, अब भी लगता है कि इस आश्चर्यजनक मंज़र के पूरा होने में दशकों का समय लग सकता है. लेकिन चौथी औद्योगिक क्रान्ति लाने के लिये, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) हमारे पास मौजूद है.

एआई का बढ़ता उपयोग

यह हमारे पसन्दीदा मनोरंजन कार्यक्रमों की स्ट्रीमिंग या शॉपिंग साइट पर, रोज़ दी जाने वाली सिफ़ारिशों में अन्तर्निहित है; जीपीएस मैपिंग तकनीक में मौजूद है; जब हम एक ईमेल भेजने या एक वेब खोज को पूरा करने की कोशिश करते हैं, तो आगे-आगे रहकर, हमारे वाक्यों को पूरा करने वाले पूर्वानुमानों में नज़र आती है. इसमें  बिजली के दोहन से भी अधिक परिवर्तनकारी क्रान्ति साबित होने की सम्भावना छिपी है.

जितना अधिक हम एआई का उपयोग करते हैं, उतना अधिक डेटा हम उत्पन्न करते हैं, उतनी ही अधिक बुद्धिमत्ता उसमें विकसित होती है. पिछले एक दशक में, AI अभूतपूर्व गति के साथ विकसित हुई है – 2011 में मानव चैम्पियनों को ‘जैपर्डी’ में हराने से लेकर, विश्व के नम्बर एक खिलाड़ी को हराने और पिछले साल प्रोटीन के अणु को डिकोड करने तक

स्वचालन, बड़ा डेटा और अल्गोरिदम हमारे जीवन के नए-नए कोनों पर क़ब्ज़ा करते रहेंगे, और एक दिन हम भूल जाएँगे कि स्थिति “पहले” कैसी थी. जिस तरह बिजली ने हमें समय को थामने की अनुमति दी, और हमारे अस्तित्व के लगभग हर पहलू को मौलिक रूप से बदलने में सक्षम बनाया, उसी तरह एआई हमें भूख, ग़रीबी और बीमारी के उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ा सकती है, व जलवायु परिवर्तन शमन, शिक्षा और वैज्ञानिक खोज के लिये, नए और ऊँचे अकल्पनीय रास्ते खोल सकती है. 

बेहतर या बदतर 

AI से फ़सलों की पैदावार बढ़ाने में मदद मिली है, व्यवसाय की उत्पादकता में वृद्धि हुई है, ऋण हासिल करने की सुविधा में सुधार और कैंसर का तेज़ी व अधिक सटीक ढंग से पता लगाने में सफलता हासिल हुई हैं.

विश्व अर्थव्यवस्था में, वर्ष 2030 तक, इसका 15 ख़रब डॉलर से अधिक का योगदान होगा, यानि वैश्विक जीडीपी में 14% की बढ़ोत्तरी.

गूगल ने दुनिया भर में “कल्याण के लिये एआई” के 2 हज़ार 600 से अधिक उपयोगी मामलों की पहचान की है.

टिकाऊ विकास लक्ष्यों (SDG) पर AI के प्रभाव की समीक्षा करते हुए ‘नेचर जर्नल’ में प्रकाशित अध्ययन में पाया गया है कि AI, लगभग 134 यानि 79% एसडीजी लक्ष्यों को हासिल करने में मददगार साबित हो सकती है. हम अभूतपूर्व तकनीकी सफलताओं के पुंज पर हैं जो हमारी दुनिया को पहले से कहीं अधिक गहराई से, और सकारात्मक तरीक़े से बदलने का विश्वास दिलाते हैं.

लेकिन साथ ही, ‘नेचर’ में प्रकाशित अध्ययन से यह भी मालूम होता है कि AI, 59 टिकाऊ विकास लक्ष्यों यानि लगभग 35% – लक्ष्यों में सक्रिय रूप से बाधा भी डाल सकती है. शुरुआत में, एआई को बड़े पैमाने पर कम्प्यूटेशनल क्षमता की आवश्यकता होती है, जिसका अर्थ है अधिक ऊर्जा माँग वाला डेटा केन्द्र, जो बड़ा कार्बन फुटप्रिन्ट छोड़ेगा.

फिर, कृत्रिम बुद्दिमत्ता (AI) डिजिटल बहिष्करण को बढ़ावा दे सकती है. रोबोटिक्स और एआई कम्पनियाँ ऐसी बुद्धिमान मशीनों का निर्माण कर रही हैं जो आमतौर पर कम आय वाले श्रमिकों के कार्यों का स्थान ले लेंगी: जैसेकि स्वचालित सेवाओं के खजांची, फलों को चुनने वाले मैदानी कामगारों की जगह रोबोट आदि. लेकिन वह दिन दूर नहीं, जब एआई, अकाउंटेंट, वित्तीय व्यापारी और मध्य प्रबन्धक जैसे, कुर्सी-मेज़ वाले बहुत से रोज़गारों को भी निगल जाएगी.

श्रमिकों के लिये दूसरे कौशल विकसित करने की स्पष्ट नीतियों के बिना, नए अवसरों का वादा करना, वास्तव में गम्भीर असमानताएँ पैदा कर सकता है. निवेश भी उन देशों में स्थानान्तरित हो सकता है, जहाँ एआई-सम्बन्धित कार्य पहले से ही स्थापित हों, जिससे देशों के बीच व्याप्त अन्तर और भी गहरा होगा. 

कुल मिलाकर, चार बिग टेक बड़ी कम्पनियाँ – एल्फ़ाबेट/गूगल, एमेज़ॉन, एप्पल और फ़ेसबुक – का कुल मूल्य 5 खरब डॉलर है, जो पृथ्वी के हर एक देश के जीडीपी से अधिक है. 2020 में, जब दुनिया कोविड-19 महामारी के प्रभाव से उबर रही थी, इनकी आमदनी में 2 खरब डॉलर का इज़ाफा हुआ. 

सच यह है कि जिस तरह एआई में अरबों लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की क्षमता है, वह मौजूदा समस्याओं को बढ़ा भी सकती है व नई समस्याएँ पैदा भी कर सकती है. उदाहरण के लिये, AI की, चेहरे की पहचान और निगरानी तकनीक के प्रलेखित उदाहरण, जिसके तहत रंग के आधार पर अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव हुआ.

या मौजूदा कार्यबल प्रोफ़ाइल के आधार पर एआई-सक्षम भर्ती इन्जिन, ने स्वत: ही यह सीख लिया कि महिलाओं की अपेक्षा पुरुष उम्मीदवारों को भर्ती करना चाहिये.

गोपनीयता की चिन्ता

एआई गम्भीर डेटा गोपनीयता चिन्ताएँ भी पेश करती है. अल्गोरिदम में डेटा के लिये कभी न ख़त्म होने वाली खोज के कारण, हमारे डिजिटल फुटप्रिन्ट बिना हमारी जानकारी या सूचित सहमति के बिना बेचे जा रहे हैं. हमारी पसन्द-नापसन्द पर निगरानी रखी जा रही है, समान विचारधारा वालों को अलग-अलग गुटों में डालकर एक-दूसरे से अलग किया जा रहा है, जिससे विभिन्न दृष्टिकोणों पर बहस करके, आम सहमति पर पहुँचने के तरीक़े ख़त्म होते जा रहे हैं.


ITU/D. Procofieff
आर्टिफ़िशियल इंटैलिजेंस आसानियाँ होने के साथ-साथ, विषमताएँ बढ़ने और रोज़गार कम होने का भी जोखिम है.

आज, हमारे बारे में जिस तरह ऑनलाइन मंचों पर जानकारी मौजूद है, तो यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अल्गोरिदम हमें हमसे बेहतर जानते हैं. वे हमारे जाने बिना ही  हमारे व्यवहार को दर्शा सकते हैं. जिस तरह हमें उपकरणों की लत लग गई है, घंटों फोन देखने की आदत पड़ गई है, और कैम्ब्रिज एनालिटिका में मतदान के फ़ैसलों को बदलने के लिये अल्गोरिदम और डेटा का उपयोग करने के सनसनीख़ेज़ मामले को देखते हुए – वर्तमान एआई व्यापार मॉडल से चिन्ताएँ उत्पन्न होना स्वाभाविक है. इसे सभी व्यक्तियों और सामाजों को एक शक्तिशाली चेतावनी के रूप में देखना चाहिये. 

जहाँ दुनिया में एल्गोरिदम का बोलबाला है, यह याद रखना भी ज़रूरी है कि अपने सभी पूर्वाग्रहों व जागरूक और अचेतन मन के साथ, मनुष्यों ने ही इसे जन्म दिया है. हम ही अल्गोरिदम को आकार देते हैं और हमारे डेटा पर ही वो काम करता है. 

याद करें कि वर्ष 2016 में, माइक्रोसॉफ़्ट के “ताई” नामक ट्विटर चैटबोट ने, उपलब्ध सामग्री के आधार पर, एक दिन से भी कम समय में, नस्लभेदी सामग्री उगलनी शुरू कर दी थी. 

मानवीय भविष्य की सुनिश्चितता

फिर हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि AI एप्लिकेशन्स यथासम्भव निष्पक्ष, न्यायसंगत, पारदर्शी, सभ्य व समावेशी हों? हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि सम्भावित नुक़सान को कम किया जाए, विशेषकर बच्चों और कमज़ोर वर्गों के लिये? नैतिक रक्षक नीतियों के बिना, एआई सामाजिक और आर्थिक खाई को और ग़हरा करेगी, समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों को बढ़ाकर, भेदभावपूर्ण नतीजे सामने लाएगी.

यह, न तो पर्याप्त हैं और न ही, एआई तकनीक वाली कम्पनियों से, अपने-अपने नियम बनाकर, इन सभी चुनौतियों से निपटने की उम्मीद करना उचित है. 
पहली बात तो यह है कि वे एआई को विकसित करने वाले अकेले नहीं हैं; सरकारें भी ऐसा करती हैं.

दूसरी बात, एआई गवर्नेंस के लिये डिज़ाइन, विकास और तैनाती चरणों के दौरान, सम्भावित नुक़सान को कम करने के उपाय, समीक्षाएँ और ऑडिट सुनिश्चित करने वाले नैतिक सिद्धान्तों, संस्कृतियाँ और आचार संहिताएँ विकसित करने, AI के उत्कर्ष के लिये पारदर्शिता, जवाबदेही, समावेश और सामाजिक विश्वास को विकसित करने, व इसकी असाधारण सफलताओं को सामने लाने में, “वृहद समाजिक दृष्टिकोण” ही हमें सक्षम बनाएगा.


Unsplash/Possessed Photography
इंजीनियरिंग व आर्टिफ़िशियल इंटैलिजेंस, टिकाऊ विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.

एआई की वैश्विक पहुँच को देखते हुए, इस तरह के “पूर्ण सामाजिक” दृष्टिकोण को “पूर्ण वैश्विक” दृष्टिकोण में बदल देना होगा. डिजिटल सहयोग पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव का रोडमैप  एक उत्कृष्ट प्रारम्भिक बिन्दु है: यह वैश्विक सहयोग पर बहु-हितधारक प्रयासों की आवश्यकता पर बल देता है, जिससे एआई का उपयोग इस तरह से किया जाए, जो “भरोसेमन्द” हो, मानवाधिकार आधारित हो, सुरक्षित एवँ टिकाऊ हो, और शान्ति को बढ़ावा देता हो.” 
यूनेस्को ने भी सदस्य देशों को विचार-विमर्श के ज़रिये, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता पर एक वैश्विक, व्यापक मानक-तय करने वाला मसौदा अपनाने की सिफ़ारिशें तैयार की है.

भारत सहित अनेक देश, अवसरों और जोखिमों के प्रति संज्ञान ले रहे हैं, और कल्याण हेतु, एआई प्रोत्साहन और एआई गवर्नेंस के बीच सही सन्तुलन बनाने के लिये प्रयासरत हैं. भारत सरकार के नीति आयोग की साल भर की सलाह प्रक्रिया के बाद बनाई गई एआई योजना, ‘Responsible AI for All strategy’ इसी सोच का परिणाम है. इसके तहत यह माना गया है कि हमारे डिजिटल भविष्य को, बहु-हितधारक शासन संरचनाओं के बिना, कल्याण के उन कार्यों के लिये अनुकूलित नहीं किया जा सकता है, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि लाभांश उचित, समावेशी और न्यायपूर्ण हों.

आम मार्गदर्शक सिद्धान्तों पर सहमत होना एक पहला महत्वपूर्ण क़दम है, लेकिन यह भी सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा नहीं है. दरअसल सिद्धान्तों का पालन करके ही इसके लचीलेपन का अन्दाज़ा होगा. यहाँ सिद्धान्तों का सामना वास्तविकता से होगा, जब अमल के दौरान नैतिक मुद्दे और रुकावटें पैदा होंगी, जिनके लिये हमें गहन, कठिन, बहु-हितधारक सम्वाद, नैतिक विश्लेषण और समाधान करने के लिये तैयार रहना चाहिये. तभी एआई, मानवता को दिया अपना वादा पूरा कर सकती है. तब तक, एआई (और इसे बनाने वाले मनुष्य) प्रोमेथियस के मिथक को ही जीवन्त करेंगे. प्रोमेथियस यानि वो टाइटन जिसने देवताओं की अग्नि नश्वर मानवों को दी – वो चालबाज़, जिसके ज़ीउस की अवहेलना करने से, पंडोरा ने अपना बक्सा खोल दिया था.

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