एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में लगभग 1.9 अरब लोग स्वस्थ ख़ुराकों से वंचित

संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों ने एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि कोरोनावायरस महामारी और खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों के कारण, एशिया प्रशान्त क्षेत्र में, लगभग दो अरब लोगों को भोजन की सम्पूर्ण और स्वस्थ ख़ुराकें नहीं मिल पा रही हैं. 

खाद्य सुरक्षा और पोषण की क्षेत्रीय समीक्षा-2020 नामक इस रिपोर्ट में, कहा गया है कि क्षेत्र में रहने वाले निर्धन लोग सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं, जिन्हें बहुत सस्ते और कम पोषक खाद्य पदार्थों पर गुज़ारा करने को मजबूर होना पड़ रहा है.

A diet is considered unaffordable if costs exceed 63% of a person’s income. Over 1.9 billion people in Asia and the Pacific can’t afford a healthy diet. Read🆕@FAO @WHO @UNICEF @WFP 2020 Regional Overview of Food and Nutrition 👉https://t.co/tc3PUDMeSN #SOFI2020 pic.twitter.com/41DOstXlPG— UNICEF South Asia (@UNICEFROSA) January 20, 2021

ये रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO), यूनीसेफ़, विश्व खाद्य कार्यक्रम और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मिलकर तैयार की है.
इन एजेंसियों ने कहा है कि लगभग एक अरब 90 करोड़ की आबादी को, कोरोनावायरस महामारी शुरू होने और उसके कारण हुई भारी तबाही से पहले भी, स्वस्थ ख़ुराक जुटाने के लिये धन उपलब्ध नहीं था.
“कोविड-19 महामारी के फैलाव और क्षेत्र के अनेक हिस्सों में अच्छे रोज़गार वाले कामकाज के अभाव और खाद्य प्रणालियों व बाज़ारों में फैली महत्वपूर्ण अनिश्चितता के माहौल ने असमानता को और बढ़ाया है. परिणामस्वरूप, निर्धन परिवारों को अपनी कम होती आय के मद्देनज़र और भी ज़्यादा सस्ती और कम पोषण वाली ख़ुराक़ों का इन्तज़ाम करने के लिये मजबूर होना पड़ा है.” 
एजेंसियों के अनुसार, “एशिया-प्रशान्त क्षेत्र के अनेक देशों में, फलों, सब्ज़ियों और दुग्ध उत्पादों की बढ़ी क़ीमतों के कारण, निर्धन लोगों के लिये स्वस्थ ख़ुराकों का इन्तज़ाम करना, लगभग असम्भव हो गया है. जबकि एक स्वस्थ ख़ुराक का इन्तज़ाम सभी के लिये खाद्य सुरक्षा और पोषण सुनिश्चित करने के लिये बहुत अहम है, ख़ासतौर से महिलाओं और बच्चों के लिये.”
इन हालात के कारण, पोषण को बेहतर बनाने के क्षेत्र में प्रगति धीमी हो गई है. याद रहे कि पोषण टिकाऊ विकास लक्ष्यों का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है. 
एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में वर्ष 2019 तक, लगभग 35 करोड़ लोगों के कम पोषित होने का अनुमान था, जिनमें से 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 7 करोड़ 45 लाख बच्चे कम पोषण के कारण, अपनी उम्र के अनुपात में, बौने थे, और लगभग 3 करोड़ 15 लाख बच्चे, अपनी ऊँचाई के अनुपात में, बहुत पतले व कमज़ोर थे.
पहले 1000 दिन
यूएन एजेंसियों ने कहा है कि वैसे तो इनसानों की पूरी ज़िन्दगी के दौरान ही पोषण की बहुत अहमियत है, मगर किसी बच्चे के जीवन के प्रथम 1000 दिन के दौरान, कम पोषण वाली ख़ुराक बहुत गम्भीर असर होता है, जिसमें गर्भावस्था के लेकर बच्चे की उम्र दो वर्ष हो जाने तक की अवधि मुख्य रूप में शामिल है. 
“विशेष रूप से, जब शिशु लगभग छह महीने की उम्र पूरी करने पर अपनी पहली ख़ुराकें खाना शुरू करते हैं, तो उनकी सन्तुलित, बढ़त के लिये उच्च पोषण वाले खाद्य पदार्थों की ज़रूरत होती है, और इसमें प्रत्येक कण और ख़ुराक के हर हिस्सा का अपना महत्व होता है.”
यूएन एजेंसियों ने सभी माताओं और बच्चों के लिये स्वस्थ ख़ुराकें मुहैया कराने और अन्य ज़रूरी कारकों के समाधान निकालने की ख़ातिर, एक ऐसी एकीकृत व्यवस्था बनाने का आहवान किया है जिसमें खाद्य, जल, स्वच्छता, स्वास्थ्य, सामाजिक संरक्षण और शिक्षा प्रणालियों के एक साथ रखा जाए.
कुपोषण का बदलता चेहरा
संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने कुपोषण के बदलते चेहरे की तरफ़ भी ध्यान दिलाया है जिसमें बहुत अधिक प्रससंस्कृ और महंगे खाद्य पदार्थ, पूरे एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में, आसानी से उपलब्ध हैं. इन खाद्य पदार्थों में अक्सर शकर और स्वास्थ्य के लिये हानिकारक चर्बी और वसा भरी होती है.
ऐसे खाद्य पदार्थों में विटामिन और खनिजों की कमी होती है, जबकि बच्चों और वयस्कों के स्वास्थ्य और विकास के लिये इनकी ज़रूरत होती है. ऐसे पदार्थ खाने से मोटापा बढ़ने, डायबटीज़ और दिल की बीमारियाँ होने का ख़तरा बहुत होता है.
रिपोर्ट में, एशिया-प्रशान्त क्षेत्र के देशों की सरकारों से स्वस्थ ख़ुराकों की उपलब्धता को बढावा देने के लिये, पोषण खाद्य सुरक्षा में ज़्यादा संसाधन निवेश करने का आग्रह किया गया है.
साथ ही, ख़ासतौर से, बच्चों सहित तमाम उपभोक्ताओं के लिये खाद्य पदार्थों की बिक्री और विपणन और विज्ञापनों को क़ानूनी शिकंजा कसे जाने की भी ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया है.
रिपोर्ट में, निजी क्षेत्र के भीतर भी कार्रवाई किये जाने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है, क्योंकि खाद्य प्रणाली और स्वस्थ ख़ुराकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये, मूल्य श्रृंखला में, निजी क्षेत्र की भी अहम भूमिका है., संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों ने एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि कोरोनावायरस महामारी और खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों के कारण, एशिया प्रशान्त क्षेत्र में, लगभग दो अरब लोगों को भोजन की सम्पूर्ण और स्वस्थ ख़ुराकें नहीं मिल पा रही हैं. 

खाद्य सुरक्षा और पोषण की क्षेत्रीय समीक्षा-2020 नामक इस रिपोर्ट में, कहा गया है कि क्षेत्र में रहने वाले निर्धन लोग सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं, जिन्हें बहुत सस्ते और कम पोषक खाद्य पदार्थों पर गुज़ारा करने को मजबूर होना पड़ रहा है.

ये रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO), यूनीसेफ़, विश्व खाद्य कार्यक्रम और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मिलकर तैयार की है.

इन एजेंसियों ने कहा है कि लगभग एक अरब 90 करोड़ की आबादी को, कोरोनावायरस महामारी शुरू होने और उसके कारण हुई भारी तबाही से पहले भी, स्वस्थ ख़ुराक जुटाने के लिये धन उपलब्ध नहीं था.

कोविड-19 महामारी के फैलाव और क्षेत्र के अनेक हिस्सों में अच्छे रोज़गार वाले कामकाज के अभाव और खाद्य प्रणालियों व बाज़ारों में फैली महत्वपूर्ण अनिश्चितता के माहौल ने असमानता को और बढ़ाया है. परिणामस्वरूप, निर्धन परिवारों को अपनी कम होती आय के मद्देनज़र और भी ज़्यादा सस्ती और कम पोषण वाली ख़ुराक़ों का इन्तज़ाम करने के लिये मजबूर होना पड़ा है.” 

एजेंसियों के अनुसार, “एशिया-प्रशान्त क्षेत्र के अनेक देशों में, फलों, सब्ज़ियों और दुग्ध उत्पादों की बढ़ी क़ीमतों के कारण, निर्धन लोगों के लिये स्वस्थ ख़ुराकों का इन्तज़ाम करना, लगभग असम्भव हो गया है. जबकि एक स्वस्थ ख़ुराक का इन्तज़ाम सभी के लिये खाद्य सुरक्षा और पोषण सुनिश्चित करने के लिये बहुत अहम है, ख़ासतौर से महिलाओं और बच्चों के लिये.”

इन हालात के कारण, पोषण को बेहतर बनाने के क्षेत्र में प्रगति धीमी हो गई है. याद रहे कि पोषण टिकाऊ विकास लक्ष्यों का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है. 

एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में वर्ष 2019 तक, लगभग 35 करोड़ लोगों के कम पोषित होने का अनुमान था, जिनमें से 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 7 करोड़ 45 लाख बच्चे कम पोषण के कारण, अपनी उम्र के अनुपात में, बौने थे, और लगभग 3 करोड़ 15 लाख बच्चे, अपनी ऊँचाई के अनुपात में, बहुत पतले व कमज़ोर थे.

पहले 1000 दिन

यूएन एजेंसियों ने कहा है कि वैसे तो इनसानों की पूरी ज़िन्दगी के दौरान ही पोषण की बहुत अहमियत है, मगर किसी बच्चे के जीवन के प्रथम 1000 दिन के दौरान, कम पोषण वाली ख़ुराक बहुत गम्भीर असर होता है, जिसमें गर्भावस्था के लेकर बच्चे की उम्र दो वर्ष हो जाने तक की अवधि मुख्य रूप में शामिल है. 

“विशेष रूप से, जब शिशु लगभग छह महीने की उम्र पूरी करने पर अपनी पहली ख़ुराकें खाना शुरू करते हैं, तो उनकी सन्तुलित, बढ़त के लिये उच्च पोषण वाले खाद्य पदार्थों की ज़रूरत होती है, और इसमें प्रत्येक कण और ख़ुराक के हर हिस्सा का अपना महत्व होता है.”

यूएन एजेंसियों ने सभी माताओं और बच्चों के लिये स्वस्थ ख़ुराकें मुहैया कराने और अन्य ज़रूरी कारकों के समाधान निकालने की ख़ातिर, एक ऐसी एकीकृत व्यवस्था बनाने का आहवान किया है जिसमें खाद्य, जल, स्वच्छता, स्वास्थ्य, सामाजिक संरक्षण और शिक्षा प्रणालियों के एक साथ रखा जाए.

कुपोषण का बदलता चेहरा

संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने कुपोषण के बदलते चेहरे की तरफ़ भी ध्यान दिलाया है जिसमें बहुत अधिक प्रससंस्कृ और महंगे खाद्य पदार्थ, पूरे एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में, आसानी से उपलब्ध हैं. इन खाद्य पदार्थों में अक्सर शकर और स्वास्थ्य के लिये हानिकारक चर्बी और वसा भरी होती है.

ऐसे खाद्य पदार्थों में विटामिन और खनिजों की कमी होती है, जबकि बच्चों और वयस्कों के स्वास्थ्य और विकास के लिये इनकी ज़रूरत होती है. ऐसे पदार्थ खाने से मोटापा बढ़ने, डायबटीज़ और दिल की बीमारियाँ होने का ख़तरा बहुत होता है.

रिपोर्ट में, एशिया-प्रशान्त क्षेत्र के देशों की सरकारों से स्वस्थ ख़ुराकों की उपलब्धता को बढावा देने के लिये, पोषण खाद्य सुरक्षा में ज़्यादा संसाधन निवेश करने का आग्रह किया गया है.

साथ ही, ख़ासतौर से, बच्चों सहित तमाम उपभोक्ताओं के लिये खाद्य पदार्थों की बिक्री और विपणन और विज्ञापनों को क़ानूनी शिकंजा कसे जाने की भी ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया है.

रिपोर्ट में, निजी क्षेत्र के भीतर भी कार्रवाई किये जाने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है, क्योंकि खाद्य प्रणाली और स्वस्थ ख़ुराकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये, मूल्य श्रृंखला में, निजी क्षेत्र की भी अहम भूमिका है.

,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *