एशिया प्रशान्त: टिकाऊ ऊर्जा ही कोविड-19 से पुनर्बहाली की कुँजी

एशिया-प्रशान्त के लिये संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग (ESCAP) की एक नई रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि कोविड-19 महामारी ख़त्म होने के बाद, पुनर्बहाली में सतत ऊर्जा किस तरह अहम भूमिका निभाएगी. आयोग की कार्यकारी सचिव और संयुक्त राष्ट्र की अवर महासचिव आर्मिदा सालसाहिया अलिसजबाना का ब्लॉग. 

हम सब शायद ही बीता साल कभी भूल पाएँ. हालाँकि एशिया और प्रशान्त क्षेत्र के विभिन्न क्षेत्रों में कोविड-19 महामारी का असर असमान रहा है, लेकिन फिर भी, यह क्षेत्र मे, दुनिया के अन्य हिस्सों में सामने आए अनेक दुष्प्रभावों से बचा रहा है. महामारी ने हमें याद दिलाया है कि इस संकट का सामना करने के उपायों के प्रबन्धन के लिये एक विश्वसनीय और निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति अत्यन्त महत्वपूर्ण है.
अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधा प्रणालियाँ जारी रखने के अलावा, ऊर्जा के ज़रिये उन प्रणालियों को भी सुचारू रूप से कार्य करने में मदद मिलती है, जिन पर हम दूरस्थ कार्यों के लिये निर्भर हैं, या जिनके ज़रिये हम दूरस्थ शिक्षा लेते हैं, या फिर आवश्यक स्वास्थ्य जानकारी प्रदान कर रहे हैं. सबसे अहम यह बात है कि ऊर्जा से, शीतलन श्रंखला और ढाँचागत सुविधाएँ यह सुनिश्चित करते हैं कि वैक्सीन की अरबों ख़ुराकें उन लोगों तक पहुँच सकें, जिनकी उन्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.
अच्छी ख़बर यह है कि हमारे क्षेत्र की ऊर्जा प्रणाली पूरी महामारी में काम करती रही है.
एशिया और प्रशान्त क्षेत्र में एक स्थाई ऊर्जा भविष्य को आकार देने वाली संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग की एक नई रिपोर्ट – Shaping a sustainable energy future in Asia and the Pacific: A greener, more resilient and inclusive energy system से मालूम होता है कि ऊर्जा की माँग में कमी से, मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन पर असर पड़ता है, जिससे तेल और गैस की क़ीमतें कम होती हैं.
चीन और भारत जैसे क्षेत्रों में अक्षय ऊर्जा विकास 2020 में पूरी रफ़्तार से जारी रहा.
जैसे-जैसे एशिया-प्रशान्त क्षेत्र अपनी ऊर्जा प्रणाली को स्वच्छ, कुशल और निम्न कार्बन वाली प्रौद्योगिकियों में परिवर्तित कर रहा है, महामारी फैलने से कुछ मूलभूत प्रश्न उठ खड़े हुए है. 
एक परिवर्तित ऊर्जा प्रणाली से, कोविड-19 जैसे भविष्य के संकटों के प्रति हमारा लचीलापन सुनिश्चित करने में कैसे मदद मिल सकती है? 
जैसे ही हम इस महामारी से उबरेंगे, क्या एक “हरित पुनर्बहाली” शुरू कर सकते हैं, जो हमारी अर्थव्यवस्थाओं के पुनर्निर्माण के साथ-साथ वैश्विक जलवायु और टिकाऊ लक्ष्यों को पूरा करने में भी सहायक हो?
दो अहम पहलू
एक स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा कोविड-19 महामारी से उबरने के लिये बहुत अहम है. एक मार्गदर्शक ढाँचे के रूप में टिकाऊ विकास लक्ष्यों के महत्व को रेखांकित करते हुए, हमें दो महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान देना चाहिये:
सबसे पहले, टिकाऊ विकास लक्ष्यों (एसडीजी) पर सार्थक प्रगति करके, हम उन अनेक व्यवस्थागत मुद्दों को सम्बोधित कर सकते हैं, जिन्होंने समाज को कोविड-19 के प्रति अधिक सम्वेदनशील बना दिया है – जैसेकि स्वास्थ्य, सम्मानपूर्ण कामकाज की आवश्यकता, ग़रीबी और असमानताएँ.

Sergei Gapon / UNDP Belarus संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने बेलारूस में, देश का सबसे बड़ा वायु ऊर्जा फॉर्म स्थापित करने में मदद की है. जलवायु आपदा का मुक़ाबला करने के लिये नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन पर ज़ोर दिया जा रहा है

दूसरा, निवेश प्रोत्साहन ख़र्च को एसडीजी हासिल करने की दिशा में मोड़कर कर, हम बेहतर तरीक़े से पुनर्निर्माण कर सकते हैं.
यदि देश जीवाश्म ईंधन जैसे पुराने उद्योगों को प्रोत्साहन देते रहेंगे, तो हम वो कामकाज व रोज़गार उत्पन्न नहीं कर पाने का जोखिम उठाते हैं जिनकी हमें ज़रूरत है, या उन वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये सही दिशा में आगे नहीं बढ़ पाएँगे, जो भविष्य की पीढ़ियों के लिये महत्वपूर्ण हैं. 
ऊर्जा क्षेत्र भविष्य के स्वच्छ उद्योगों को प्रोत्साहन देने के बहुत से अवसर प्रदान करता है.
तथ्यों से मालूम होता है कि जीवाश्म ईंधन परियोजनाओं और नवीकरणीय ऊर्जा में समान निवेश होने पर, ऊर्जा दक्षतापूर्ण परियोजनाएँ अधिक रोज़गार अवसर पैदा करती हैं. 
स्वच्छ तरीक़े से भोजन तैयार करने और बिजली तक पहुँच बढ़ाकर, हम ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ा सकते हैं और आधुनिक बुनियादी ढाँचा विकसित कर सकते हैं. ये सब पहलू इन समुदायों को अधिक लचीला और समावेशी बना सकते हैं, ख़ासतौर पर महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिये.
इनके अतिरिक्त, कम कार्बन वाले बुनियादी ढाँचे और प्रौद्योगिकियों में निवेश करने से हम अधिक महत्वाकाँक्षी जलवायु प्रतिबद्धताओं के लिये एक आधार बना सकते हैं, जो पेरिस समझौते में लक्षित 2-डिग्री वैश्विक गर्माहट सीमा के लक्ष्य तक पहुँचने के लिये आवश्यक है. 
इसी को लेकर, कई देशों ने कार्बन निष्पक्षता की घोषणा की है, जिसमें दीर्घकालिक दृष्टिकोण और टिकाऊ ऊर्जा में त्वरित परिवर्तन के लिये प्रतिबद्धता जताई गई है. 
समाजों की सुरक्षा के लिये
नवीनीकरण के साथ प्रतिस्थापन, जीवाश्म ईंधन अनुदान समाप्त करने और कार्बन मूल्य निर्धारण लागू करने से बिजली उत्पादन विभागों से कोयले के उपयोग को चरणबद्ध तरीक़े से ख़त्म किया जा सकता है.
कोविड-19 संकट ने हमें अपने, और अपने समाज को सुरक्षित रखने के लिये अपने जीवन के अनेक पहलुओं को बदलने के लिये मजबूर किया है. 
इससे मालूम हुआ है कि हम अपनी समझ से कहीं अधिक अनुकूल और लचीले हैं. 
फिर भी, इस संकट ने बदलाव के जो अवसर हमारे सामने रखे हैं, हमें उन्हें बर्बाद नहीं करना चाहिये. हमें सर्वजन को आधुनिक ऊर्जा उपलब्ध कराने और क्षेत्र की ऊर्जा प्रणाली को टिकाऊ ऊर्जा के माध्यम से, कार्बन मुक्त करने के तत्काल कार्य से, विचलित नहीं होने देना चाहिये. इसके बजाय, इससे हमें तात्कालिकता का एक नया अहसास होना चाहिये.
हमें टिकाऊ विकास के लिये 2030 एजेंडा हासिल करने में पर्यावरण की रक्षा करते हुए, अपने समाजों और अर्थव्यवस्थाओं के पुनर्निर्माण के लिये स्थाई ऊर्जा की क्षमता का दोहन करना चाहिये., एशिया-प्रशान्त के लिये संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग (ESCAP) की एक नई रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि कोविड-19 महामारी ख़त्म होने के बाद, पुनर्बहाली में सतत ऊर्जा किस तरह अहम भूमिका निभाएगी. आयोग की कार्यकारी सचिव और संयुक्त राष्ट्र की अवर महासचिव आर्मिदा सालसाहिया अलिसजबाना का ब्लॉग. 

हम सब शायद ही बीता साल कभी भूल पाएँ. हालाँकि एशिया और प्रशान्त क्षेत्र के विभिन्न क्षेत्रों में कोविड-19 महामारी का असर असमान रहा है, लेकिन फिर भी, यह क्षेत्र मे, दुनिया के अन्य हिस्सों में सामने आए अनेक दुष्प्रभावों से बचा रहा है. महामारी ने हमें याद दिलाया है कि इस संकट का सामना करने के उपायों के प्रबन्धन के लिये एक विश्वसनीय और निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति अत्यन्त महत्वपूर्ण है.

अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधा प्रणालियाँ जारी रखने के अलावा, ऊर्जा के ज़रिये उन प्रणालियों को भी सुचारू रूप से कार्य करने में मदद मिलती है, जिन पर हम दूरस्थ कार्यों के लिये निर्भर हैं, या जिनके ज़रिये हम दूरस्थ शिक्षा लेते हैं, या फिर आवश्यक स्वास्थ्य जानकारी प्रदान कर रहे हैं. सबसे अहम यह बात है कि ऊर्जा से, शीतलन श्रंखला और ढाँचागत सुविधाएँ यह सुनिश्चित करते हैं कि वैक्सीन की अरबों ख़ुराकें उन लोगों तक पहुँच सकें, जिनकी उन्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.

अच्छी ख़बर यह है कि हमारे क्षेत्र की ऊर्जा प्रणाली पूरी महामारी में काम करती रही है.

एशिया और प्रशान्त क्षेत्र में एक स्थाई ऊर्जा भविष्य को आकार देने वाली संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग की एक नई रिपोर्ट – Shaping a sustainable energy future in Asia and the Pacific: A greener, more resilient and inclusive energy system से मालूम होता है कि ऊर्जा की माँग में कमी से, मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन पर असर पड़ता है, जिससे तेल और गैस की क़ीमतें कम होती हैं.

चीन और भारत जैसे क्षेत्रों में अक्षय ऊर्जा विकास 2020 में पूरी रफ़्तार से जारी रहा.

जैसे-जैसे एशिया-प्रशान्त क्षेत्र अपनी ऊर्जा प्रणाली को स्वच्छ, कुशल और निम्न कार्बन वाली प्रौद्योगिकियों में परिवर्तित कर रहा है, महामारी फैलने से कुछ मूलभूत प्रश्न उठ खड़े हुए है. 

एक परिवर्तित ऊर्जा प्रणाली से, कोविड-19 जैसे भविष्य के संकटों के प्रति हमारा लचीलापन सुनिश्चित करने में कैसे मदद मिल सकती है? 

जैसे ही हम इस महामारी से उबरेंगे, क्या एक “हरित पुनर्बहाली” शुरू कर सकते हैं, जो हमारी अर्थव्यवस्थाओं के पुनर्निर्माण के साथ-साथ वैश्विक जलवायु और टिकाऊ लक्ष्यों को पूरा करने में भी सहायक हो?

दो अहम पहलू

एक स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा कोविड-19 महामारी से उबरने के लिये बहुत अहम है. एक मार्गदर्शक ढाँचे के रूप में टिकाऊ विकास लक्ष्यों के महत्व को रेखांकित करते हुए, हमें दो महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान देना चाहिये:

सबसे पहले, टिकाऊ विकास लक्ष्यों (एसडीजी) पर सार्थक प्रगति करके, हम उन अनेक व्यवस्थागत मुद्दों को सम्बोधित कर सकते हैं, जिन्होंने समाज को कोविड-19 के प्रति अधिक सम्वेदनशील बना दिया है – जैसेकि स्वास्थ्य, सम्मानपूर्ण कामकाज की आवश्यकता, ग़रीबी और असमानताएँ.


Sergei Gapon / UNDP Belarus
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने बेलारूस में, देश का सबसे बड़ा वायु ऊर्जा फॉर्म स्थापित करने में मदद की है. जलवायु आपदा का मुक़ाबला करने के लिये नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन पर ज़ोर दिया जा रहा है

दूसरा, निवेश प्रोत्साहन ख़र्च को एसडीजी हासिल करने की दिशा में मोड़कर कर, हम बेहतर तरीक़े से पुनर्निर्माण कर सकते हैं.

यदि देश जीवाश्म ईंधन जैसे पुराने उद्योगों को प्रोत्साहन देते रहेंगे, तो हम वो कामकाज व रोज़गार उत्पन्न नहीं कर पाने का जोखिम उठाते हैं जिनकी हमें ज़रूरत है, या उन वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये सही दिशा में आगे नहीं बढ़ पाएँगे, जो भविष्य की पीढ़ियों के लिये महत्वपूर्ण हैं. 

ऊर्जा क्षेत्र भविष्य के स्वच्छ उद्योगों को प्रोत्साहन देने के बहुत से अवसर प्रदान करता है.

तथ्यों से मालूम होता है कि जीवाश्म ईंधन परियोजनाओं और नवीकरणीय ऊर्जा में समान निवेश होने पर, ऊर्जा दक्षतापूर्ण परियोजनाएँ अधिक रोज़गार अवसर पैदा करती हैं. 

स्वच्छ तरीक़े से भोजन तैयार करने और बिजली तक पहुँच बढ़ाकर, हम ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ा सकते हैं और आधुनिक बुनियादी ढाँचा विकसित कर सकते हैं. ये सब पहलू इन समुदायों को अधिक लचीला और समावेशी बना सकते हैं, ख़ासतौर पर महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिये.

इनके अतिरिक्त, कम कार्बन वाले बुनियादी ढाँचे और प्रौद्योगिकियों में निवेश करने से हम अधिक महत्वाकाँक्षी जलवायु प्रतिबद्धताओं के लिये एक आधार बना सकते हैं, जो पेरिस समझौते में लक्षित 2-डिग्री वैश्विक गर्माहट सीमा के लक्ष्य तक पहुँचने के लिये आवश्यक है. 

इसी को लेकर, कई देशों ने कार्बन निष्पक्षता की घोषणा की है, जिसमें दीर्घकालिक दृष्टिकोण और टिकाऊ ऊर्जा में त्वरित परिवर्तन के लिये प्रतिबद्धता जताई गई है. 

समाजों की सुरक्षा के लिये

नवीनीकरण के साथ प्रतिस्थापन, जीवाश्म ईंधन अनुदान समाप्त करने और कार्बन मूल्य निर्धारण लागू करने से बिजली उत्पादन विभागों से कोयले के उपयोग को चरणबद्ध तरीक़े से ख़त्म किया जा सकता है.

कोविड-19 संकट ने हमें अपने, और अपने समाज को सुरक्षित रखने के लिये अपने जीवन के अनेक पहलुओं को बदलने के लिये मजबूर किया है. 
इससे मालूम हुआ है कि हम अपनी समझ से कहीं अधिक अनुकूल और लचीले हैं. 

फिर भी, इस संकट ने बदलाव के जो अवसर हमारे सामने रखे हैं, हमें उन्हें बर्बाद नहीं करना चाहिये. हमें सर्वजन को आधुनिक ऊर्जा उपलब्ध कराने और क्षेत्र की ऊर्जा प्रणाली को टिकाऊ ऊर्जा के माध्यम से, कार्बन मुक्त करने के तत्काल कार्य से, विचलित नहीं होने देना चाहिये. इसके बजाय, इससे हमें तात्कालिकता का एक नया अहसास होना चाहिये.

हमें टिकाऊ विकास के लिये 2030 एजेंडा हासिल करने में पर्यावरण की रक्षा करते हुए, अपने समाजों और अर्थव्यवस्थाओं के पुनर्निर्माण के लिये स्थाई ऊर्जा की क्षमता का दोहन करना चाहिये.

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