Online News Channel

News

किंग जार्ज पंचम के नाम पर रखा गया था जार्ज फर्नांडिस का नाम

किंग जार्ज पंचम के नाम पर रखा गया था जार्ज फर्नांडिस का नाम
June 03
10:18 2019

नवीन शर्मा

जार्ज फर्नांडिस भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित और विवादास्पद शख्श्यित रहे हैं। उनका जीवन विरोधाभासों से भरपूर रहा है। इसकी शुरुआत अनजाने में ही उनकी मां ने कर दी थी। उनकी मां ब्रिटेन के शासक किंग जॉर्ज फिफ्थ की बड़ी प्रशंसक थीं। उन्हीं के नाम पर अपने छह बच्चों में से सबसे बड़े का नाम उन्होंने जॉर्ज रखा था।

किंग जार्ज पंचम के नाम पर रखा गया था जार्ज फर्नांडिस का नाम

10 भाषाओं के जानकार : तीन जून 1930 को जन्मे जॉर्ज फर्नांडिस 10 भाषाओं के जानकार थे। वे-हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, मराठी, कन्नड़, उर्दू, मलयाली, तुलु, कोंकणी और लैटिन जानते थे।

परिजन बनाना चाहते थे पादरी : मंगलौर में पले-बढ़े फर्नांडिस जब 16 साल के हुए तो क्रिश्चियन मिशनरी में पादरी बनने की शिक्षा लेने भेजे गए। पर चर्च में पाखंड देखकर उनका उससे मोहभंग हो गया। उन्होंने 18 साल की उम्र में चर्च छोड़ दिया और रोजगार की तलाश में बंबई चले आए।

जॉर्ज ने खुद बताया था कि इस दौरान वे चैपाटी की बेंच पर सोया करते थे और लगातार सोशलिस्ट पार्टी और ट्रेड यूनियन आंदोलन के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। फर्नांडिस की शुरुआती छवि एक जबरदस्त विद्रोही की थी। उस वक्त मुखर वक्ता राम मनोहर लोहिया, फर्नांडिस की प्रेरणा थे।

टैक्सी ड्राइवर यूनियन के नेता बने : 1950 आते-आते वे टैक्सी ड्राइवर यूनियन के बेताज बादशाह बन गए। बिखरे बाल, और पतले चेहरे वाले फर्नांडिस, तुड़े-मुड़े खादी के कुर्ते-पायजामे, घिसी हुई चप्पलों और चश्मे में खांटी एक्टिविस्ट लगा करते थे। कुछ लोग तभी से उन्हें ‘अनथक विद्रोही’ (रिबेल विद्आउट ए पॉज) कहने लगे थे। वे बंबई के सैकड़ों-हजारों मजदूरों व गरीबों के मसीहा बन गए थे।

जॉर्ज द जायंट किलर’ : 1967 के लोकसभा चुनावों में वे उस समय के बड़े कांग्रेसी नेताओं में शुमार एसके पाटिल के सामने मैदान में उतरे। बॉम्बे दक्षिण की इस सीट से जब उन्होंने पाटिल को हराया तो लोग उन्हें ‘जॉर्ज द जायंट किलर’ भी कहने लगे।

देश की सबसे बड़ी हड़ताल : 1973 में जॉर्ज ‘ऑल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन’ के चेयरमैन चुने गए। इंडियन रेलवे में उस वक्त करीब 14 लाख कर्मचारी थे।। रेलवे कामगारों की मांगों को लेकर में जॉर्ज ने आठ मई, 1974 को देशव्यापी रेल हड़ताल का आह्वान किया। कई दिनों तक रेलवे का सारा काम ठप रहा। इलेक्ट्रिसिटी वर्कर्स, ट्रांसपोर्ट वर्कर्स और टैक्सी चलाने वाले भी इस हड़ताल से जुड़ गए।

सरकार ने आंदोलन को कुचलते हुए 30 हजार लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। हजारों को नौकरी और रेलवे की सरकारी कॉलोनियों से बेदखल कर दिया गया। कई जगह तो आर्मी तक बुलानी पड़ी। इस निर्ममता का असर दिखा और तीन हफ्ते के अंदर हड़ताल खत्म हो गई। लेकिन इंदिरा गांधी को इसका हर्जाना भी भुगतना पड़ा और फिर वे जीते-जी कभी मजदूरों-कामगारों के वोट नहीं पा सकीं।

आपातकाल में मछुआरा, साधु और सिख बने जॉर्ज : आपातकाल लगने की सूचना जॉर्ज को रेडियो पर मिली थी उस वक्त वे उड़ीसा में थे। गिरफ्तारी से बचने के लिए जार्ज कभी मछुआरे के तो कभी साधु के रूप में घूमते फिरे। आखिर में उन्होंने अपनी दाढ़ी और बाल बढ़ जाने का फायदा उठाते हुए सिख का भेष धरा और भूमिगत होकर आपातकाल के खिलाफ आंदोलन चलाने लगे।

तमाम सुरक्षा एजेंसियों के पीछे पड़े होने के बावजूद उन्हें पकड़ा नहीं जा सका। 15 अगस्त को उन्होंने जनता के नाम एक अपील भी जारी की। जिसमें सभी पार्टियों के बड़े नेताओं के जेल में बंद होने के चलते आंदोलन जारी रखने के लिए अलग-अलग स्तर पर नए नेतृत्व को गढ़ने की अपील की गई थी।

जॉर्ज फर्नांडिस मानते थे कि अहिंसात्मक तरीके से किया जाना वाला सत्याग्रह ही न्याय के लिए लड़ने का एकमात्र तरीका नहीं है। उन्हें यह लग रहा था कि आपातकाल के खिलाफ शुरुआत में संघर्ष करने वाले संगठन अपने नेताओं की गिरफ्तारी से डर गए हैं।

बड़ौदा डायनामाइट कांड : फर्नांडिस आपातकाल की घोषणा के बाद से उसके सशक्त विरोध के लिए डायनामाइट लगाकर विस्फोट और विध्वंस करने का फैसला किया। इसके लिए ज्यादातर डायनामाइट गुजरात के बड़ौदा से आया पर था।

Motilal Oswal

आपातकाल पर लिखी कूमी कपूर की किताब के अनुसार डायनामाइट के इस्तेमाल की ट्रेनिंग बड़ौदा में ही कुछ लोगों को दी गई। जॉर्ज समर्थकों के निशाने पर मुख्यतरू खाली सरकारी भवन, पुल, रेलवे लाइन और इंदिरा गांधी की सभाओं के नजदीक की जगहें थीं।

जॉर्ज और उनके साथियों को जून 1976 में गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उन सहित 25 लोगों के खिलाफ सीबीआई ने मामला दर्ज किया जिसे बड़ौदा डायनामाइट केस के नाम से जाना जाता है।

बाद में जॉर्ज फर्नांडिस और उनके सहयोगियों का कहना था कि वे बस पब्लिसिटी चाहते थे, ताकि देश के अंदर और बाहर लोग जान जाएं कि आपातकाल का विरोध भारत में किस स्तर पर किया जा रहा है। जनता पार्टी की सरकार आने के बाद बड़ौदा डायनामाइट केस बंद कर दिया गया।

जेल में रहते हुए ही मुजफ्फरपुर से रिकॉर्ड मतों से जीते

इंदिरा गांधी द्वारा चुनावों की घोषणा के साथ ही इमरजेंसी का अंत हो गया। फर्नांडिस ने 1977 का लोकसभा चुनाव जेल में रहते हुए ही मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट से रिकॉर्ड मतों से जीता। जनता पार्टी की सरकार में वे उद्योग मंत्री बने। अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने निवेश के उल्लंघन के कारण, अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों आईबीएम और कोका-कोला को देश छोड़ने का आदेश दिया।

बाद में जनता पार्टी टूटी, फर्नांडिस ने अपनी पार्टी समता पार्टी बनाई और भाजपा का समर्थन किया। फर्नांडिस ने अपने राजनीतिक जीवन में कुल तीन मंत्रालयों का कार्यभार संभाला – उद्योग, रेल और रक्षा मंत्रालय। पर वे इनमें से किसी में भी बहुत सफल नहीं रहे। कोंकण रेलवे के विकास का श्रेय उन्हें भले जाता हो लेकिन उनके रक्षा मंत्री रहते हुए परमाणु परीक्षण और ऑपरेशन पराक्रम का श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी को ही दिया गया।

ताबूत घोटाले और तहलका खुलासा से छवि हुई धूमिल

रक्षामंत्री के रूप में जॉर्ज का कार्यकाल खासा विवादित रहा। ताबूत घोटाले और तहलका खुलासे से उनके संबंध के मामले में जॉर्ज को अदालत से तो क्लीन चिट मिल गई लेकिन यह भी सही है कि लोगों के जेहन में यह बात अब तक बनी हुई है कि जॉर्ज के रक्षा मंत्री रहते ऐसा हुआ था। उनके कार्यकाल के दौरान परिस्थितियां इतनी खराब हो चली थीं कि मिग-29 विमानों को ‘फ्लाइंग कॉफिन’ कहा जाने लगा था।

सियाचिन ग्लेशियर का 18 बार दौरा : जॉर्ज एकमात्र रक्षामंत्री रहे जिन्होंने 6,600 मीटर ऊंचे सियाचिन ग्लेशियर का 18 बार दौरा किया था।। रक्षामंत्री रहते हुए जॉर्ज के बंगले के दरवाजे कभी बंद नहीं होते थे और वे किसी नौकर की सेवा नहीं लेते थे, अपने काम स्वयं किया करते थे।

लैला कबीर से विवाह : एक हवाई यात्रा के दौरान जॉर्ज की मुलाकात लैला कबीर से हुई थी। लैला पूर्व केंद्रीय मंत्री हुमायूं कबीर की बेटी थीं। दोनों ने कुछ वक्त एक-दूसरे को डेट किया और फिर शादी कर ली। उनका एक बेटा शॉन फर्नांडिस है जो न्यूयॉर्क में इंवेस्टमेंट बैंकर है।

जया जेटली से नजदीकियां : जया जेटली से जॉर्ज की नजदीकियां बढ़ने पर लैला उन्हें छोड़कर चली गई थीं। हालांकि बाद में वे जॉर्ज की बीमारी की बात सुनकर 2010 में वापस लौट आईं। इस समय तक जॉर्ज फर्नांडिस को अल्जाइमर और पार्किंसन जैसी बीमारियां घेर चुकी थीं और वे सार्वजनिक जीवन से कट चुके थे।

पारिवारिक विवाद : लैला के साथ रहने के बाद जॉर्ज के भाइयों ने भी उन पर हक जताया था। मामला अदालत तक गया। फैसला हुआ कि वे लैला और शॉन के साथ ही रहेंगे, भाई चाहें तो जॉर्ज को देखने आ सकते हैं। कुछ अर्सा पहले अदालत ने जया जेटली को भी लैला फर्नांडिस के मना करने के बाद जॉर्ज से मिलने से रोक दिया था। इस सारे बवाल की वजह जॉर्ज की संपत्ति बताई जाती है।

29 जनवरी 2019 को लंबी बीमारी के बाद नई दिल्ली में उनका निधन हो गया।

kallu
Novelty Fashion Mall
Fly Kitchen
Harsha Plastics
Status
Prem-Industries
Friends IT Solution
Tanishq
Akash
Swastik Tiles
Reshika Boutique
Paul Opticals
New Anjan Engineering Works
The Raymond Shop
Metro Glass
Krsna Restaurant
Motilal Oswal
Chotanagpur Handloom
S_MART
Home Essentials
Abhushan
Raymond

About Author

admin_news

admin_news

Related Articles

0 Comments

No Comments Yet!

There are no comments at the moment, do you want to add one?

Write a comment

Write a Comment

Sponsored Ad

SPONSORED ADS SPONSORED ADS SPONSORED ADS SPONSORED ADS

LATEST ARTICLES

    भारतीय एवं विश्व इतिहास में 21 जून की प्रमुख घटनाएं

भारतीय एवं विश्व इतिहास में 21 जून की प्रमुख घटनाएं

0 comment Read Full Article

Subscribe to Our Newsletter