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कुंभ 2019 : भारतीय संस्कृति की जीवन्तता का प्रतीक का पर्व

कुंभ 2019 : भारतीय संस्कृति की जीवन्तता का प्रतीक का पर्व
January 10
09:02 2019

भाग-2

इनसाइट ऑनलाइन न्यूज़ 

आमजनता के लिये अक्षयवट के दर्शन के लिये इस बार 18 फिट ऊंचा द्वार और रास्ता बनाया जा रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कल्पांत या प्रलय में जब समस्त पृथ्वी जल में डूब गयी थी तो उस समय भी वट का एक वृक्ष बच गया था। जिसे आज अक्षयवट नाम से जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अक्षयवट का वृक्ष सृष्टि का परिचायक है। पद्म पुराण में अक्षयवट को तीर्थराज प्रयाग का छत्र कहा गया है। अक्षयवट की पत्तिया व शाखायें दूर दूर तक फैली है। अक्षयवट को ब्रहमा, विष्णु तथा शिव का रूप कहा गया है।

कुंभ 2019 : भारतीय संस्कृति की जीवन्तता का प्रतीक का पर्व

अक्षयवट मंदिर के महंत ने यहां बताया कि मान्यता है कि पूरे सृष्टि का निर्माण प्रयाग अक्षयवट से हुआ। अक्षयवट के पत्ते पर जब सृष्टि का निर्माण हुआ चारों तरफ जल ही जल का महाप्रलय था। विष्णु भगवान अक्षय वट के पत्ते पर बाल रूप में अपने दाहिने पांव के अंगूठा पोछते हुए दिखाई दिए। उन्होंने बताया कि यह तब की बात है जब ब्रह्मा जी पूरे ब्रह्मांड की और सृष्टि की रचना कर रहे थे।

उन्होंने बताया कि मार्कंडेय पुराण और शिव पुराण में इसके बारे में लिखा हुआ है। त्रेतायुग में भगवान राम ने जब अवतार लिया था तो उन्हें वनवास हुआ। उन्होने तीन रात अक्षयबट के मूल में बैठकर पूजा पाठ की। यहां से चित्रकूट गए। वनवास पूरा होने के बाद दोबारा यहां आये। अपने पिता राजा दशरथ का पहला पिंडदान अक्षय वट वृक्ष के नीचे किया। इससे पहले लोग पिंड पिंड दान नहीं करते थे।

कुंभ 2019 : भारतीय संस्कृति की जीवन्तता का प्रतीक का पर्व

महंत ने बताया कि द्वापर युग में कृष्ण और पांच पांडव अज्ञातवास में जब यहां आए उस समय यहां जंगल हुआ करता था। त्रेतायुग में गंगा जी अक्षय वट के बगल से कल-कल करती थी। उसी गंगा जी के घाट पर लोग पिंडदान करते थे। द्वापर युग में भी यहां जंगल हुआ करता था। पांच पांडव अज्ञातवास में इसी जंगल में छिप कर रहे। अक्षय वट वृक्ष को 644 ई0 में राजा हर्षवर्धन के समय आये चीनी यात्री हेनसांग ने प्रमाणित किया था। उन्होंने अपने यात्रा वर्णन में लिखा है कि मंदिर एक ऊंचे टीले पर है। यहां पर देवांगन और कामकूप कुआ है। यही पर एक अक्षय वट का पेड़ है और साथ में गंगा नदी है। उस समय यह कहा जाता था कि अक्षयवट से देवआंगन व गंगा नदी में कूदकर लोग जान देते थे।

उन्होने बताया कि उस समय माना जाता था कि ऐसा करने वाला सीधा स्वर्ग जाता है। यहां जो कूदेंगे उन्हें यहां से मुक्ति मिल जाएगा। कुछ लोग गंगा नदी में कूदते थे। कुछ लोग देवांगन में तो कुछ कामकूप कुआं में । इस प्रथा के बारे में चीनी यात्री हेनसांग ने बड़ी कटु आलोचना की। उन्होंने कहा कि हिंदू लोग अंधविश्वास में ऐसा कर रहे हैं। बाद में जब अकबर बादशाह ने प्रयाग में किले का निर्माण करवाया। उनको भी ये प्रथा खराब लगी।

कुंभ 2019 : भारतीय संस्कृति की जीवन्तता का प्रतीक का पर्व

महंत ने कहा कि एक राजा के सामने उनकी संतानें जान दे तो अच्छा नही है। श्रद्धालु तथा जनता को बचाने के लिए कुएं को बंद कर दिया। जो सरकार के गजट में है। गैजेटियर आफ इंडिया में इसका कारण दिया हुआ है। मंदिर के मंहत ने बताया कि हमारी 14 पीढ़ी यहां गुजर चुकी है। उन्होंने कहा कि चार युग से यह अक्षयवट वृक्ष की पूजा हो रही है।

कुंभ मेले के समय लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से इसके दर्शन करने यहां आने की उम्मीद है। इसके लिये कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गयी है। राज्य सरकार प्रयागराज में पहले ही 671 योजनाओं को पूरी कर चुकी है। कुंभ 2019 के लिए सरकार की तरफ से 4,300 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं, जबकि 2013 में इस मेले और इससे जुड़े आयोजन के लिए महज 1,214 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे।

प्रयागराज में कुंभ 14 जनवरी 2019 से शुरू होकर मार्च 2019 तक चलेगा। कुंभ में 8 प्रमुख स्नान तिथियां पड़ेंगी। कुम्भ की शुरुआत मकर संक्रान्ति से शुरू हो कर 4 मार्च महा शिवरात्रि तक चलेगा। अर्धकुम्भ करीब 50 दिन चलेगा और इस दौरान होने वाले 6 महत्वपूर्ण तिथियों पर होने वाले आयोजनों के बारे में आइये जानें।

  • मकर संक्रांति: कुंभ की शुरुआत मकर संक्रांति के दिन पहले स्नान से होगी। इसे शाही स्नान और राजयोगी स्नान के नाम से भी जानते हैं। इस दिन संगम, प्रयागराज पर विभिन्न अखाड़ों के संत की पहले शोभा यात्रा निकलते हैं फिर शाही स्नान का आयोजन होता है। मकर संक्रांति पर सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश होता है। इस दिन स्नान के बाद सूर्य को जल देकर चावल और तिल को स्पर्श कर उसे दान में दिया जाता है। इस दिन कहीं उरद दाल की खिचड़ी या दही-चूड़ा खाना जरुरी होता है।
  • पौष पूर्णिमा: पौष पूर्णिमा 21 जनवरी को है और इस दिन कुम्भ में दूसरा बड़ा आयोजन होगा। पौष पूर्णिमा के दिन से ही माघ महीने की शुरुआत होती है। कहा जाता है आज के दिन स्नान ध्यान के बाद दान पुण्य करेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन से सभी शुभ कार्यों की शुरुआत होती है। वहीं, इस दिन संगम पर सुबह स्नान के बाद कुंभ की अनौपचारिक शुरुआत हो जाती है। इस दिन से कल्पवास भी आरंभ हो जाता है।
  • पौष एकादशी: पौष एकादशी को कुम्भ में तीसरा बड़े शाही स्नान का आयोजन होगा। 31 जनवरी को स्नान के बाद दान पुण्य किया जाता है।
  • मौनी अमावस्या: कुंभ मेले में चैथा शाही स्नान मौनी अमावस्या यानि 4 फरवरी को होगा। इसी दिन कुंभ के पहले तीर्थाकर ऋषभ देव ने अपनी लंबी तपस्या का मौन व्रत तोड़ा था और संगम के पवित्र जल में स्नान किया था। इसलिये मौनी अमावस्या के दिन कुंभ मेले में बहुत बड़ा मेला लगता है, जिसमें लाखों की संख्या में भीड़ उमड़ती है।
  • बसंत पंचमी: 10 फरवरी को बसंत पंचमी यानि माघ महीने की पंचमी तिथ िको मनाई जायेगी। बसंत पंचमी के दिन से ही बसंत ऋतु शुरू हो जाती है। कड़कड़ाती ठंड के सुस्त मौसम के बाद बसंत पंचमी से ही प्रकृति की छटा देखते ही बनती है। वहीं, हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस दिन देवी सरस्वती का जन्म हुआ था। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का वशिेष महत्व है। पवित्र नदियों के तट और तीर्थ स्थानों पर बसंत मेला भी लगता है।
  • माघी पूर्णिमा: 19 फरवरी को छठां शाही स्नान माघी पूर्णिमा को होगा।माघ पूर्णिमा पर किए गए दान-धर्म और स्नान का विशेष महत्व होता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि माघी पूर्णिमा पर खुद भगवान विष्णु गंगा जल में निवास करते हैं। माघ मास स्वयं भगवान विष्णु का स्वरूप बताया गया है। पूरे महीने स्नान-दान नहीं करने की स्थिति में केवल माघी पूर्णिमा के दिन तीर्थ में स्नान किया जाए तो संपूर्ण माघ मास के स्नान का पूर्ण फल मिलता है।
  • माघी एकादशी: 16 फरवरी को सातवां शाही स्नान माघी एकादशी को होगा। इसदिन का पुराणों में बहुत महत्व है। इस दिन दान देना कई पापों को क्षम्य बना देता है।
  • महाशिवरात्रि: कुंभ मेले का आखिरी शाही स्नान 4 मार्च को महा शिवरात्रि के दिन होगा। इस दिन सभी कल्पवासियों अंतिम स्नान कर अपने घरों को लौट जाते हैं। भगवान शिव और माता पार्वती के इस पावन पर्व पर कुंभ में आए सभी भक्त संगम में डुबकी जरूर लगाते हैं। मान्यता है कि इस पर्व का देवलोक में भी इंतजार रहता है।

लगभग 12 करोड़ श्रद्धालुओं के स्वागत में कुंभ नगरी तैयार

कुंभ नगरी को 20 सेक्टर में बांटा गया है जिनमें कुंभ कल्पवासियों के लिए 5 हजार कैंप बनाए जाएंगे। आनंद की मानें तो इस बार कुंभ में लगभग 12 करोड़ से ज्यादा लोग पधारेंगे। कुंभ नगरी के ज्यादातर इलाके जूना अखाड़ा और निर्मोही अखाड़े को सौंप दिए गए हैं। अस्पताल, कैंटिन और सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन स्थल के अलावा गंगा आरती के लिए भी खास जगह तय की गई है। पूरे प्रयागराज जिले में 38 से भी ज्यादा पांटून पुल बनाए गए हैं।

लगभग 12 करोड़ श्रद्धालुओं के स्वागत में कुंभ नगरी तैयार

कुंभ नगरी के लगभग हरेक सेक्टर में पुलिस थाने और फायर ब्रिगेड की टीम तैनात की गई है। यहां 40 थाने बनाए गए हैं, जबकि पूरे प्रयागराज में 42 थाने हैं। 4 मार्च को संपन्न होने वाले कुंभ के लिए 20 हजार पुलिस बलों की तैनाती की गई है। पुलिसकर्मियों को भगदड़ जैसी दशा से निपटने के लिए खास ट्रेनिंग दी गई है। गुमशुदा लोगों की खोजबीन के लिए 15 खोया-पाया सेंटर बनाए जा रहे हैं। कुंभ नगरी का खास फोकस सेक्टर 18 पर है जहां वीआईपी गेट बनाया गया है। यहां 72 देशों के नुमाइंदे पधारेंगे जिनकी अगवानी खुद मुख्यमंत्री योगी करेंगे।

4 जगहों पर लगता है कुंभ

  • शास्त्रों के अनुसार चार विशेष स्थान है, जिन स्थानों पर कुंभ मेले का आयोजन होता है। नासिक में गोदावरी नदी के तट पर, उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर, हरिद्वार और प्रयाग में गंगा नदी के तट पर।
  • सबसे बड़ा मेला कुंभ 12 वर्षो के अन्तराल में लगता है और 6 वर्षो के अन्तराल में अर्द्ध कुंभ के नाम से मेले का आयोजन होता है। वर्ष 2019 में आयोजित होने वाले प्रयाग में अर्द्ध कुंभ मेले का आयोजन होने वाला है।
  • इसके बाद साल 2022 में हरिद्वार में कुंभ मेला होगा और साल 2025 में फिर से इलाहाबाद में कुंभ का आयोजन होगा और साल 2027 में नासिक में कुंभ मेला लगेगा।
  • शास्त्रों के अनुसार चार विशेष स्थान है, जिन स्थानों पर कुंभ मेले का आयोजन होता है। नासिक में गोदावरी नदी के तट पर, उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर, हरिद्वार में गंगा नदी के तट पर और प्रयाग में तट पर।

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आस्था, विश्वास, सौहार्द एवं संस्कृतियों के मिलन का पर्व है “कुम्भ”

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