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कुम्भ में विभिन्न संस्कृतियां अनेकता में एकता को करती परिभाषित

कुम्भ में विभिन्न संस्कृतियां अनेकता में एकता को करती परिभाषित
January 18
10:11 2019

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा  ”मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर” मान्यता प्राप्त कुम्भ मेला जहां बाबाओं के अलग -अलग वेष भूषा लोगों को बरबस अपनी ओर  आकर्षित कर रही है वहीं नागा सन्यासियों की मढ़ियों पर “सुट्टा” के लिए बैठे देशी-विदेशी लोगों का मिलाप “ अनेकता मे एकता के साथ विश्व बन्धुत्व” को चरितार्थ कर रहा है।

कोई बाबा यहां अपनी आध्यात्म साधना को बल दे रहा है, कोई “सुट्टा” से दम ले रहा है ताे कोई शरीर पर भस्म लपेटे और कोई कांटो पर लेट कर लोगो का आश्चर्यचकित कर आनंद ले रह। कोई अपनी सनातनी परंपरा का निर्वाह कर रहा है कोई अपनी अन्य संस्कृति को लोगों में परोस रहा है। सभी को परमानंद की अनुभूति हो रही है।

यहां विभिन्न संस्कृतियां एक ही प्लेटफार्म पर संगम करती हैं। वह प्लेटफार्म पतित पावनी गंगा, श्यामल यमुना और अदृश्य सरस्वती का विस्तीर्ण त्रिवेणी की रेती है। इस प्लेटफार्म की विशेषता है भले ही लोग एक दूसरे की भाषा नहीं समझे पर उनकी भावनाओं को आसानी से समझते हैं। कई बार त्रिवेणी मार्ग पर ऐसे रोमांचारी दृश्य परिलक्षित होते हैं जब कोई विदेशी किसी साधारण व्यक्ति से कोई जानकारी मांगता है। वह कुछ समझ नहीं पाता पर अपने भाव को उसके भाव से जोड़कर हाथ के इशारे से संगम नोज की तरफ इशारा करता है। विदेशी धन्य होकर “ थैंक्यू” कह आगे बढ़ जाता है। यह व्यवहारिकता की संस्कृति को प्रकट करता है।

कुम्भ में विभिन्न संस्कृतियां अनेकता में एकता को करती परिभाषित
मेले में अलग-अलग वेष भूषा वाले बाबाओं की कमी नहीं है। दुनिया के कोने कोने से पतित पावनी गंगा, श्यामल यमुना और अदृश्य सरस्वती के त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगाने पहुंचे श्रद्धालुओं में किसी बाबा का 70 किलो के रूद्राक्ष  की टोपी और उसी का वस्त्र रूप में धारण, किसी के गले में मुंड़ माला तो किसी के बड़ी जटाओं का आकर्षण अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।

तीर्थराज प्रयाग के विस्तीर्ण रेती पर बसे विहंगम कुम्भ में जहां विभिन्न वेष भूषा वाले बाबा लोगों को आकर्षण का केन्द्र बन रहे है वहीं छोटे-छोटे बच्चे भी उनसे पीछे नहीं हैं। संगम का किनारा हो या मेला को वृहत क्षेत्र, अलग अलग देवी देवताओं का मुखौटा लगाए बच्चे नजर आते हैं। किसी ने मृगक्षाला धारण किया है तो कोई काली का मुखौटा पहन, हाथ में खड्ग और खप्पर लेकर लोगों को आकर्षित कर रहा है।

मेले में कुछ बाबा ऐसे मिलेगें जो कुटिया में मोटी लकड़ी लगाकर धूनी रमाये बैठे हैं। उनके अगल बगल कुछ विदेशी पर्यटक और अन्य लोगों को घेरा बैठा रहता है। यहां लगातार “सुट्टा” चिलम का दौर चलता रहता है। एक छोटी सी मिट्टी की चिलम होती है जिसमें गांजा भरा होता है। एक किनारे से शुरू होता है सुट्टा मारने का क्रम तो दूसरे किनारे जाकर ही रूकता है।

मेले में कोई अकेला नहीें। यहां हर किसी के साथ कोई न/न कोई जुडा है। अनेकता में एकता का प्रतीक और विश्व बन्धुत्व की भावना लिए हुए है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण गंगा में एक साथ राजा-रंक, अमीर-गरीब, महिला-पुरूष, विकलांग जहां एक साथ त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगाकर अनेकता में एकता को दर्शाता है वहीं बाबाओं की मढ़ी में गोला आकार में बैठे देश-विदेश के अलग-अलग स्थानों से आए पर्यटक और स्थानीय जिसमें शामिल पास में काम करने वाले मजदूर सुट्टा मारने के साथ  “विश्व बंधुत्व” को दर्शाता है।

कुम्भ में विभिन्न संस्कृतियां अनेकता में एकता को करती परिभाषित
सेक्टर 16 में जूना अखाड़े के बाहर कई नागा सन्यांसी और झूंसी में गंगा तीरे कुटिया में धूनी रमाये बैठे हैं। इनके अगल बगल विदेशी और स्थानीय लोग भी अपनी बारी आने का इंतजार करते शांत चित्त बैठे रहते हैं। एक व्यक्ति दम मारने के बाद दूसरे की तरफ चिलम बढ़ा देता है। यह क्रम बारी-बारी से आगे बढ़ता रहता है। सुट्टा मारने के बाद सभी अपनी-अपनी अलग दिशाओं में बढ़ जाते हैं। खूबी यह कि यहां अधिकांश एक दूसरे को जानते-पहचानते नहीं लेकिन सम्मान सब को एक बराबर। यहां “नसेड़ी यार किसके, दम लगाये खिसके” को चरितार्थ करती है।”

“मढ़ी में बैठे यूएसए के टूटी-फूटी हिन्दी बोलने वाला विलियम ने बताया,“उसे चिलम का ‘सुट्टा” बहुत अच्छा लगता है। कुछ समय के लिए वह सब कुछ भूल जाता है। उसने कहा हम जानटा है नशा खराब होता है लेकिन जीने का कोई सहारा तो चाहिए। उसने बताया वह एक अच्छा स्कालर था। लेकिन कुछ ऐसी परिस्थितयां उसके सामने आयीं कि उसका सारा क्रेज खत्म हो गया। उसने बताया,“ लोग हिन्दुस्तान के बारे में बोलटा ही वहां बहुत धोका होता है, लेकिन यहां बहुट अच्छा लोग है। हम कभी कभी इधर आटा है।” हमको यहां बहुट अच्छा लगता है।

कुम्भ में ठंड पर भारी पड़ी श्रद्धा की आस्था

दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक और सांस्कृतिक समागम कुम्भ मेले में कड़ाके की ठंड पर श्रद्धालुओं की आस्था भारी पड़ रही है।

गंगा, श्यामल यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में तड़के से ही दूर दराज से पहुंचे कल्पवासी और श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हुए ‘‘ऊं नम: शिवाय, हर-हर महादवे, हर-हर गंगे” का उच्चारण करते हैं। हाड कंपाने वाली लगातार बढ़ती ठंड के बावजूद श्रद्धालुओं का कारवां सिर पर गठरी, कंधे पर कमरी और हाथ में लकड़ी पकड़े पग खरामा-खरामा संगम की ओर बढ़ते आ रहे हैं।

पहाड़ों पर हो रही बर्फबारी और पछुआ हवा के कारण हाड़तोड़ ठंड भी बुजुर्ग श्रद्धालुओं की आस्था को ड़िगा नहीं पा रही है। एक तरफ पहाडों पर बर्फबारी दूसरी तरफ पछुआ का का असर “सोने में सुहागा” की कहावत को चरितार्थ कर रही है। श्रद्धालुओं का त्रिवेणी की आस्था, दुधिया रोश्नी में नहाए भोर के पहर घाट के किनारे सीना चीरती शीत लहरें भी श्रद्धालुओं का गंगा की तरफ बढने वाले कदमों को रोक नहीं सक रहे। उनकी प्रचण्ड आस्था के सामने मानो शीश झुका कर त्याग, तपस्या, दान और भजन करने वाले कल्पवासियों एवं स्नानार्थियों का अभिवादन कर रही हैं। पारा लुढ़क कर 5.5 डिग्री सेल्सियस और अधिकतम 22.3 डिग्री सेल्सियस रहा।

श्रद्धालुओं में श्रद्धा ऐसी की रेल गाड़ी और बसों में ठुंस कर त्रिवेणी में एक डुबकी की साध लिए पहुंच रहे हैं। मकर संक्रांति की पूर्व संध्या छह बजे तक करीब 65 लाख और मकर संक्रांति के पावन पर्व पर एक करोड़ 40 लाख श्रद्धालुओं

ने देवाधिदेव की जटाओं से निकलने वाली गंगा में स्नान किया था। करीब 70 लाख स्त्री, पुरूष, बूढे और बच्चों ने स्नान किया।

कुम्भ में विभिन्न संस्कृतियां अनेकता में एकता को करती परिभाषित
मध्य प्रदेश के सीधी से कुंभ में आए सेवानिवृत्त शिक्षक देवदत्त कर्मकार ने कुम्भ और गंगा की महत्ता के बारे में अपना विचार व्यक्त करते हुए बताया कि दिव्य आभा से सराबोर कुम्भ क्षेत्र रात्रि के पहर में इस कदर दमक रहा है मानो सहस्त्रों तारे धरती पर उतर आए हैं। कुम्भ भारत की सतरंगी छटा का ऐसा चटक रंग है जिसने उसे देखा वह भाग्यशाली जिसने नहीं देखा उससे सनातन सस्कृति का एक दमकता पक्ष छूट गया। फिर इंतजार होता है लम्बे समय का।

श्री कर्माकर ने बताया कि कुम्भ मेले में  एक तरफ जहां आध्यात्म की बयार बह रही है वहीं दूससरी तरफ आश्चर्य चकित विदेशी, जहां-तहां हो रही कथाएं, प्रवचन और देव समर्पण का हिलोरें मारता समंदर, इन सबका मिश्रण एक ऐसा अलौकिक आभा दृष्टांत करता है जिससे केवल निहाल हुआ जा सकता है।

श्री कर्माकर की धार्मिक विचारों वालीे पत्नी कांता बाई का कहना है गंगा निर्मल, अविरल, पाप नाशिनी और मोक्ष दायिनी है। उन्होंने बताया कि लाखों की संख्या में यहां पुरूष और महिला संयम, अहिंसा, श्रद्धा एवं कायाशोधन के लिए कल्पवास कर रहे हैं वहीं उनके साथ आए दूसरे परिजन भी कल्पवास न/न करते हुए कल्पवास का पुण्य प्राप्त कर रहे हैं।

श्रीमती कांता बाई ने बताया कि तीर्थराज प्रयाग में सतत आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह होता रहता है। जिस स्थान पर ऋषियों और मुनियों ने बडे बडे यज्ञ किये हों वह स्थान धन्य है। गंगा के दर्शन से ही आत्मा सुखमय हो जाती है। कल-कल बहती गंगा की लहरें मानो कुछ कह रही हैं। उन्होंने बताया कि नहाने से पहले मां “गंगे’ को पुकारती हूं, और डूबकी मारती हूं। कोई ठंड नहीं। ठंड ताे मन की एक सोच है।

एजेंसी 

आस्था, विश्वास, सौहार्द एवं संस्कृतियों के मिलन का पर्व है “कुम्भ”

 

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