कोरोना मरीजों के प्रति संवेदनशीलता ही मानवीय गुणों की पहचान

राघव कुमार सिंह

अगर कोई व्यक्ति कोरोना वायरस की चपेट में आकर बीमार हो जाता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह कोई पाप किया है। इसलिए मरीजों के प्रति संवेदनशील बनें और ना भी बन सकें, तो कम से कम उन्हें बदनाम न करें। शर्म का एहसास न कराएं। कोरोना के मरीजों को न केवल संक्रमण के दर्द से, बल्कि इसके कलंक से भी लड़ना पड़ रहा है।

आमतौर पर जब भी कोई प्राकृतिक संकट आता है तो कुछ देशों अथवा राज्यों तक ही सीमित रहता है। लेकिन इस बार का संकट ऐसा है, जिसने विश्वभर की पूरी मानव जाति को संकट में डाल दिया है। इसलिए देश के प्रत्येक नागरिक को अब अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि कोरोना के आसन्न खतरे को हल्के में लेना देश के लिए बेहद खतरनाक हो सकता है।

दरअसल, अभी तक विज्ञान कोरोना महामारी से बचने के लिए कोई निश्चित उपाय नहीं सुझा सका है और न ही इसकी कोई वैक्सीन टेस्ट के बाद उपयोग में आ सकी है। इसलिए कोराना को हल्के में मत लें, अगर किसी को हो गया है तो उनसे नफरत भी न करें। हो सकता है आज उनकी बारी है तो कल आपकी भी बारी हो सकती है।

लेकिन लोगों को लगता है कि उसको हुआ तो हमको नहीं होगा। शहर के जिस इलाके में कारोना संक्रमित मरीज मिल रहे हैं, उस इलाके में दहशत में लोग आ जा रहे हैं। ऐसा ही हर जगह देखने को मिल रहा है। राजधानी रांची के सुखदेवनगर इलाके में भी 17 जुलाई को कुछ ऐसा ही देखने को मिला। एक बैंककर्मी की जांच में पॉजिटिव रिपोर्ट आते ही पूरे इलाके के लोगों में भय का माहौल हो गया। बैंककर्मी जिस आपर्टमेंट में रहते थे, कहा जाता है कि वहां के लोग उन्हें जबरन बाहर निकाल दिये। इसके बाद अपार्टमेंट के गेट पर ताला लगा दिया।

इतने पर भी लोग नहीं माने, जब बैंककर्मी के परिजन उनसे मिलना चाहा तो उन्हें भी उनसे नहीं मिलने दिया गया। यही तो नफरत है, कोरोना मरीज को उस वक्त सिर्फ संक्रमण का ही दर्द नहीं हुआ होगा, बल्कि उन्हें कलंक की भी अनुभूति हुई होगी। अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब लोग एक दूसरे नफरत करने लगेंगे।

यह सिलसिला धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है। एक जानकारी के अनुसार धुर्वा स्थित पारस अस्पताल में इलाजरत गुमला सिंचाई विभाग के जूनियर इंजीरियर ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। उनके परिजनों का कहना है कि कोरोना के शक में उनका ठीक से इलाज ही नहीं हुआ और उनकी जान चली गयी। वहीं, कारोना के भय का एक और ताजा उदाहरण सिमडेगा में पदस्थापित एज्क्यूटिव मजिस्ट्रेट के एक संबंधी का है। हजारीबाज निवासी एक मरीज को आज सिर्फ इसलिए अस्पतालों में भर्ती नहीं कराया गया सका कि वह कोरोना संक्रमित तो नहीं है और उन्हें भी अपनी जान गंवानी पड़ी।

एक ओर जहां कोरोना का खतरा गहरा रहा है। वहीं, लोगों के बीच नफरत और डर बढ़ते जा रहा हैं। इसलिए वर्तमान समय में हम सब को मिलकर लड़ने की जरूरत है। अगर एक दूसरे से घृणा करेंगे तो हम कारोना से कैसे लड़ पायेंगे। इसके अलावा सोशल मीडिया के माध्यम से भी कोरोना को लेकर बहुत सारी अफवाहें भी फैलाई जा रही हैं, कोरोना को लेकर मजाक बनाया जा रहा है, आज की परिस्थितियों को देखते यह सब ठीक नहीं है। अपने पर संयम रखने के साथ सोशल मीडिया के इस तरह के दुरूपयोग पर लगाम लगाए जाने के लिए आवाज उठाने की जरूरत है।

बस अभी की परिस्थिति में मरीजों से सिर्फ सहानुभूति की जरूरत है। क्योंकि, पूछ लेते वो बस मिजाज मेरा, कितना आसान था इलाज मेरा.. मौत का भी इलाज हो शायद…। इसलिए इस कोरोना काल में अपने को बचाते हुए कोराना मरीजों की मदद करने की जरूरत। रोज हजारों की संख्या मरीज बढ़ रहे हैं। हो सकता है कि अस्पतालों में मरीजों को जगह नहीं मिले तो होम क्वॉरंटाइन कर भी इलाज किया जा सकता है, तो क्या अपने घर में भी लोग नहीं रह पायेंगे। लोगों को सोच बदलने की जरूरत है और इंसानियत को सबसे आगे करना होगा, तभी इस कारोना से हम जीत पायेंगे। बस हमें अपनी संस्कृति को याद रख जीवन जीना होगा, जो कि हमें शुरू से सिखाया गया है।

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