कोविड-19 ने क़ैदियों को बुरी तरह प्रभावित किया – यूएन विशेषज्ञ

जेल सुधारों पर संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञ फ़िलिप माइज़नर ने कहा है कि कोविड-19 महामारी के दौरान, दुनिया भर के बन्दीगृहों में लोगों पर विषमतापूर्ण असर हुआ है. जेलों में कोविड-19 महामारी के असर के मुद्दे पर, बुधवार को जापान के क्योटो में, अपराध रोकथाम और आपराधिक न्याय पर संयुक्त राष्ट्र काँग्रेस की 14वीं बैठक हो रही है. इस आयोजन में शिरकत कर रहे फ़िलिप माइज़नर से यूएन न्यूज़ के साथ विशेष बातचीत…

कोविड-19 के कारण, दुनिया भर में क़ैदी, कितनी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं? 
कोविड-19 महामारी का जेल प्रणालियों और दुनिया भर में एक करोड़ 10 लाख से ज़्यादा क़ैदियों पर विषमतापूर्ण असर हुआ है.
एक अनुमान के मुताबिक, 122 देशों में पाँच लाख 27 हज़ार से ज़्यादा बन्दी, वायरस से संक्रमित हुए हैं और 47 देशों में तीन हज़ार 800 बन्दियों की मौत हुई है.
बहुत से न्यायिक क्षेत्रों में, परीक्षण क्षमता सीमित है, और तेज़ी से बदलते हालात में, वास्तविक संख्या इससे कहीं ज़्यादा हो सकती है. 
ये भी शिनाख़्त की जानी चाहिये कि बन्दियों, बन्दीगृह अधिकारियों, स्वास्थ्य देखभालकर्मियों के बीच नज़दीकी और नियमित रूप से सम्पर्क होता है, जिससे संक्रमण का जोखिम बढ़ जाता है.
निसन्देह, कोविड-19 संक्रमण के लिये बन्दीगृहों में, जोखिम बहुत ज़्यादा है, उन लोगों के लिये जो वहाँ काम करते हैं और रहते हैं. 
बन्दियों को सबसे ज़्यादा पीड़ा का अनुभव कहाँ हो रहा है? 
सभी महाद्वीपों में. अधिकांश देशों में क़ैदियों पर भीषण असर हुआ है. संसाधन-युक्त दण्ड प्रणालियों में को भी, बन्दीगृहों में महामारी के असर को कम करने में गम्भीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. 
उन बन्दीगृह प्रणालियों में इसके ज़्यादा गम्भीर नतीजे हुए हैं, जोकि प्रणालीगत उपेक्षा, कर्मचारियों की कमी, और अन्य संसाधनों की कमी के कारण पहले से ही भारी बोझ में दबे थे.
इन परिस्थितियों में, जेलों में हालात बदतर हैं, और साफ़-सफ़ाई, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं की अपर्याप्त व्यवस्था है.  

UNODCमादक पदार्थों एवँ अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय में जेल सुधारों के मुद्दे पर अधिकारी, फ़िलिप माइज़नर.

दुनिया के अधिकतर देश, जेलों में भीड़-भाड़ की समस्या से ग्रस्त हैं, और इस वजह से कोविड-19 के कारण पेश चुनौतियाँ और भी गहरी हुई हैं – संक्रमण की रोकथाम और उस पर क़ाबू पाने के उपायों की पुख़्ता व्यवस्था कर पाना ज़मीनी स्तर पर मुश्किल हो जाता है.
जेलों में महामारी के फैलाव से निपटते समय राष्ट्रीय प्राधिकरणों को किस तरह की मुश्किलें पेश आती हैं?
महामारी से पहले ही, अनेक जेल प्रणालियों को, बन्दियों की बुनियादी ज़रूरतें पूरी कर पाने, और स्वास्थ्य सुनिश्चित कर पाने के लिये संघर्ष करना पड़ रहा था. 
दुनिया की अनेक जेलों में, पर्याप्त स्थान, पोषण, पेयजल, स्वच्छता सामग्री, साफ़-सफ़ाई, और हवादार कमरों की समुचित व्यवस्था को तय नहीं माना जा सकता.
कोविड-19 के लिये निजी बचाव सामग्री व उपकरणों (पीपीई), इन्फ़्रारैड थर्मोमीटर्स, और परीक्षणों की सुलभता भी चुनौतीपूर्ण है. 
जेलों में बन्दियों का आमतौर पर स्वास्थ्य कमज़ोर होता है, और संचारी व ग़ैर-संचारी बीमारियाँ का फैलाव अधिक होता है, जोकि परिस्थितियों को और भी बदतर बनाता है. 
देखभाल में तुल्यता का सिद्धान्त है कि सभी बन्दियों को स्वास्थ्य सेवा, निशुल्क और समुदाय को प्रदान की जाने वाली सेवा मानकों के अनुरूप सुलभ होनी चाहिये. मगर अनेक देशों में यह सुनिश्चित नहीं किया जा सका है.
यह भी अहम है कि अन्तरराष्ट्रीय मानकों, विशेष रूप से, बन्दियों के साथ बर्ताव के लिये यूएन मानकों में, न्यूनतम नियमों का अनुपालन किया जाए – इन्हें नेलसन मण्डेला नियम भी कहा जाता है. 
बहुद से देशों में, बन्दीगृहों में माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया है. बन्दियों व जेल अधिकारियों में बेचैनी, भय और अनिश्चितता का माहौल इसे और बढ़ा रहा है.
लगभग 50 देशों की जेलों में दंगे और हंगामा होने की अन्य घटनाएँ दर्शाती हैं कि कोविड-19 पर पारदर्शी ढंग से बातचीत किया जाना अहम है, और इसमें बन्दियों को भी सम्मिल्लित किया जाना चाहिये.
अनेक देशों में ऐसे उपाय किये गए हैं, जिनके परिणामस्वरूप जेलों में व्यवस्था को और भी सख़्त बनाया गया है.
क़ैदियों से मुलाक़ातें रोक दी गई हैं, पुनर्वास कार्यक्रमों और रहने के स्थानों से बाहर, सृजनात्मक गतिविधियों तक उनकी पहुँच बेहद मुश्किल हो गई है.
लम्बे समय तक अपने परिवारों और बच्चों को ना देख पाने का, क़ैदियों के मानसिक स्वास्थ्य व कल्याण पर असर हुआ है.
इनमें कारावास में बन्द माताएँ और पिताएँ भी हैं. ऐसी नई व्यवस्थाएँ, जेल के माहौल में पहले से मौजूद मुश्किल हालात को और भी गम्भीर बना रही हैं. 
क्या महामारी के दौरान, क़ैदियों की व्यथा पर राष्ट्रीय सरकारेंरा पर्याप्त ध्यान दे जा रही हैं?
अनेक देशों में जेल प्रबन्धन और सेवा, आपराधिक न्याय प्रणाली की एक कमज़ोर कड़ी है. क़ैदी भी, समाज का एक ऐसा हिस्सा हैं, जिन्हें नीतिनिर्धारक और आम जनता आसानी से भुला देते हैं. 
मादक पदार्थों एवँ अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (UNODC) ने महामारी के शुरुआती दिनों से ही, देशों की सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्रवाई में क़ैदियों, बन्दीगृहों और जेलकर्मियों का भी ध्यान रखे जाने की अहमियत को रेखांकित किया है.

UNODCज़ाम्बिया की एक जेल में निजी बचाव उपकरणों व सामग्री मुहैया कराई गई हैं.

अनेक न्यायिक क्षेत्रों में, इस अपील को सुना गया है और वहाँ सराहनीय प्रयास हुए हैं.
लेकिन महामारी के दौरान क़ैदियों की व्यथा को पूर्ण रूप से दूर करने और जेलों में कोविड-19 के जोखिम को कम करने के लिये और ज़्यादा प्रयास किये जाने की आवश्यकता है. इनमें टीकाकरण कार्यक्रम को भी शामिल किया जाना होगा.
जेलों में वायरस का फैलाव रोकने के लिये क्या समाधान तलाश किये गए हैं?
जेलों में भीड़भाड़ एक बड़ा मुद्दा है और इसलिये अनेक देशों ने बन्दियों के निरन्तर प्रवाह पर रोक लगानी चाही है. 
उदाहरणस्वरूप, कम गम्भीर अपराधों के लिये निलम्बित सज़ा के आदेश जारी किये गए और आपातकालीन उपायों के तहत क़ैदियों की रिहाई की गई. विशेष तौर पर उनकी, जिनकी सज़ा या तो समाप्त होने वाली थी या फिर जिन्हें संक्रमण का जोखिम ज़्यादा था. 
एक अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में, महामारी के दौरान, सात लाख से ज़्यादा क़ैदियों को रिहा किये जाने के आदेश दिये गए. 
जेलों में रोकथाम उपाय बेहतर बनाने में संयुक्त राष्ट्र किस तरह सहायता कर सकता है?
संयुक्त राष्ट्र, समग्र जेल सुधारों की पैरवी कर रहा है और कारावास में रखे जाने की मौजूदा व्यवस्था की फिर से परख की जा रही है. 
इसका उद्देश्य, जेलों में भीड़भाड़ की समस्या को दूर करना, और कारावास में सज़ा पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भरता से निपटना है.
यूएन एजेंसी ने इस क्रम में, 50 से ज़्यादा देशों की राष्ट्रीय जेलों और सुधारगृह सेवाओं के साथ सम्पर्क स्थापित किया है ताकि संक्रमणों की रोकथाम और उन पर क़ाबू पाने के उपायों को मज़बूती दी जा सके.
इसके ज़रिये, यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि जेलों के लिये तय न्यूनतम मानकों का अनुपालन किया जाए, और जहाँ सम्भव हो, वहाँ कारावास की सज़ा के विकल्पों का इस्तेमाल बढ़ाया जाए. , जेल सुधारों पर संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञ फ़िलिप माइज़नर ने कहा है कि कोविड-19 महामारी के दौरान, दुनिया भर के बन्दीगृहों में लोगों पर विषमतापूर्ण असर हुआ है. जेलों में कोविड-19 महामारी के असर के मुद्दे पर, बुधवार को जापान के क्योटो में, अपराध रोकथाम और आपराधिक न्याय पर संयुक्त राष्ट्र काँग्रेस की 14वीं बैठक हो रही है. इस आयोजन में शिरकत कर रहे फ़िलिप माइज़नर से यूएन न्यूज़ के साथ विशेष बातचीत…

कोविड-19 के कारण, दुनिया भर में क़ैदी, कितनी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं? 

कोविड-19 महामारी का जेल प्रणालियों और दुनिया भर में एक करोड़ 10 लाख से ज़्यादा क़ैदियों पर विषमतापूर्ण असर हुआ है.

एक अनुमान के मुताबिक, 122 देशों में पाँच लाख 27 हज़ार से ज़्यादा बन्दी, वायरस से संक्रमित हुए हैं और 47 देशों में तीन हज़ार 800 बन्दियों की मौत हुई है.

बहुत से न्यायिक क्षेत्रों में, परीक्षण क्षमता सीमित है, और तेज़ी से बदलते हालात में, वास्तविक संख्या इससे कहीं ज़्यादा हो सकती है. 

ये भी शिनाख़्त की जानी चाहिये कि बन्दियों, बन्दीगृह अधिकारियों, स्वास्थ्य देखभालकर्मियों के बीच नज़दीकी और नियमित रूप से सम्पर्क होता है, जिससे संक्रमण का जोखिम बढ़ जाता है.

निसन्देह, कोविड-19 संक्रमण के लिये बन्दीगृहों में, जोखिम बहुत ज़्यादा है, उन लोगों के लिये जो वहाँ काम करते हैं और रहते हैं. 

बन्दियों को सबसे ज़्यादा पीड़ा का अनुभव कहाँ हो रहा है? 

सभी महाद्वीपों में. अधिकांश देशों में क़ैदियों पर भीषण असर हुआ है. संसाधन-युक्त दण्ड प्रणालियों में को भी, बन्दीगृहों में महामारी के असर को कम करने में गम्भीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. 

उन बन्दीगृह प्रणालियों में इसके ज़्यादा गम्भीर नतीजे हुए हैं, जोकि प्रणालीगत उपेक्षा, कर्मचारियों की कमी, और अन्य संसाधनों की कमी के कारण पहले से ही भारी बोझ में दबे थे.

इन परिस्थितियों में, जेलों में हालात बदतर हैं, और साफ़-सफ़ाई, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं की अपर्याप्त व्यवस्था है.  

UNODC
मादक पदार्थों एवँ अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय में जेल सुधारों के मुद्दे पर अधिकारी, फ़िलिप माइज़नर.

दुनिया के अधिकतर देश, जेलों में भीड़-भाड़ की समस्या से ग्रस्त हैं, और इस वजह से कोविड-19 के कारण पेश चुनौतियाँ और भी गहरी हुई हैं – संक्रमण की रोकथाम और उस पर क़ाबू पाने के उपायों की पुख़्ता व्यवस्था कर पाना ज़मीनी स्तर पर मुश्किल हो जाता है.

जेलों में महामारी के फैलाव से निपटते समय राष्ट्रीय प्राधिकरणों को किस तरह की मुश्किलें पेश आती हैं?

महामारी से पहले ही, अनेक जेल प्रणालियों को, बन्दियों की बुनियादी ज़रूरतें पूरी कर पाने, और स्वास्थ्य सुनिश्चित कर पाने के लिये संघर्ष करना पड़ रहा था. 

दुनिया की अनेक जेलों में, पर्याप्त स्थान, पोषण, पेयजल, स्वच्छता सामग्री, साफ़-सफ़ाई, और हवादार कमरों की समुचित व्यवस्था को तय नहीं माना जा सकता.

कोविड-19 के लिये निजी बचाव सामग्री व उपकरणों (पीपीई), इन्फ़्रारैड थर्मोमीटर्स, और परीक्षणों की सुलभता भी चुनौतीपूर्ण है. 

जेलों में बन्दियों का आमतौर पर स्वास्थ्य कमज़ोर होता है, और संचारी व ग़ैर-संचारी बीमारियाँ का फैलाव अधिक होता है, जोकि परिस्थितियों को और भी बदतर बनाता है. 

देखभाल में तुल्यता का सिद्धान्त है कि सभी बन्दियों को स्वास्थ्य सेवा, निशुल्क और समुदाय को प्रदान की जाने वाली सेवा मानकों के अनुरूप सुलभ होनी चाहिये. मगर अनेक देशों में यह सुनिश्चित नहीं किया जा सका है.

यह भी अहम है कि अन्तरराष्ट्रीय मानकों, विशेष रूप से, बन्दियों के साथ बर्ताव के लिये यूएन मानकों में, न्यूनतम नियमों का अनुपालन किया जाए – इन्हें नेलसन मण्डेला नियम भी कहा जाता है. 

बहुद से देशों में, बन्दीगृहों में माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया है. बन्दियों व जेल अधिकारियों में बेचैनी, भय और अनिश्चितता का माहौल इसे और बढ़ा रहा है.

लगभग 50 देशों की जेलों में दंगे और हंगामा होने की अन्य घटनाएँ दर्शाती हैं कि कोविड-19 पर पारदर्शी ढंग से बातचीत किया जाना अहम है, और इसमें बन्दियों को भी सम्मिल्लित किया जाना चाहिये.

अनेक देशों में ऐसे उपाय किये गए हैं, जिनके परिणामस्वरूप जेलों में व्यवस्था को और भी सख़्त बनाया गया है.

क़ैदियों से मुलाक़ातें रोक दी गई हैं, पुनर्वास कार्यक्रमों और रहने के स्थानों से बाहर, सृजनात्मक गतिविधियों तक उनकी पहुँच बेहद मुश्किल हो गई है.

लम्बे समय तक अपने परिवारों और बच्चों को ना देख पाने का, क़ैदियों के मानसिक स्वास्थ्य व कल्याण पर असर हुआ है.

इनमें कारावास में बन्द माताएँ और पिताएँ भी हैं. ऐसी नई व्यवस्थाएँ, जेल के माहौल में पहले से मौजूद मुश्किल हालात को और भी गम्भीर बना रही हैं. 

क्या महामारी के दौरान, क़ैदियों की व्यथा पर राष्ट्रीय सरकारेंरा पर्याप्त ध्यान दे जा रही हैं?

अनेक देशों में जेल प्रबन्धन और सेवा, आपराधिक न्याय प्रणाली की एक कमज़ोर कड़ी है. क़ैदी भी, समाज का एक ऐसा हिस्सा हैं, जिन्हें नीतिनिर्धारक और आम जनता आसानी से भुला देते हैं. 

मादक पदार्थों एवँ अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (UNODC) ने महामारी के शुरुआती दिनों से ही, देशों की सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्रवाई में क़ैदियों, बन्दीगृहों और जेलकर्मियों का भी ध्यान रखे जाने की अहमियत को रेखांकित किया है.


UNODC
ज़ाम्बिया की एक जेल में निजी बचाव उपकरणों व सामग्री मुहैया कराई गई हैं.

अनेक न्यायिक क्षेत्रों में, इस अपील को सुना गया है और वहाँ सराहनीय प्रयास हुए हैं.

लेकिन महामारी के दौरान क़ैदियों की व्यथा को पूर्ण रूप से दूर करने और जेलों में कोविड-19 के जोखिम को कम करने के लिये और ज़्यादा प्रयास किये जाने की आवश्यकता है. इनमें टीकाकरण कार्यक्रम को भी शामिल किया जाना होगा.

जेलों में वायरस का फैलाव रोकने के लिये क्या समाधान तलाश किये गए हैं?

जेलों में भीड़भाड़ एक बड़ा मुद्दा है और इसलिये अनेक देशों ने बन्दियों के निरन्तर प्रवाह पर रोक लगानी चाही है. 

उदाहरणस्वरूप, कम गम्भीर अपराधों के लिये निलम्बित सज़ा के आदेश जारी किये गए और आपातकालीन उपायों के तहत क़ैदियों की रिहाई की गई. विशेष तौर पर उनकी, जिनकी सज़ा या तो समाप्त होने वाली थी या फिर जिन्हें संक्रमण का जोखिम ज़्यादा था. 

एक अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में, महामारी के दौरान, सात लाख से ज़्यादा क़ैदियों को रिहा किये जाने के आदेश दिये गए. 

जेलों में रोकथाम उपाय बेहतर बनाने में संयुक्त राष्ट्र किस तरह सहायता कर सकता है?

संयुक्त राष्ट्र, समग्र जेल सुधारों की पैरवी कर रहा है और कारावास में रखे जाने की मौजूदा व्यवस्था की फिर से परख की जा रही है. 

इसका उद्देश्य, जेलों में भीड़भाड़ की समस्या को दूर करना, और कारावास में सज़ा पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भरता से निपटना है.

यूएन एजेंसी ने इस क्रम में, 50 से ज़्यादा देशों की राष्ट्रीय जेलों और सुधारगृह सेवाओं के साथ सम्पर्क स्थापित किया है ताकि संक्रमणों की रोकथाम और उन पर क़ाबू पाने के उपायों को मज़बूती दी जा सके.

इसके ज़रिये, यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि जेलों के लिये तय न्यूनतम मानकों का अनुपालन किया जाए, और जहाँ सम्भव हो, वहाँ कारावास की सज़ा के विकल्पों का इस्तेमाल बढ़ाया जाए. 

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