कोविड-19: मध्य-आय वाले देशों के लिये कर्ज़ राहत का आहवान

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने यूएन महासभा में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक को सम्बोधित करते हुए, कोविड-19 महामारी से उबरने में मध्य-आय वाले देशों के लिये, वित्तीय संसाधनों व कर्ज़ राहत की आवश्यकता को रेखांकित किया है.

संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में मध्य-आय वाले देशों की संख्या 100 से ज़्यादा हैं, और उन्हें कर्ज़ राहत प्रदान करने के लिये नवाचारी उपायों को अपनाये जाने पर बल दिय गया है.
इससे, उनके लिये अपनी अर्थव्यवस्थाओं का विस्तार करना और महामारी से उबरना सम्भव हो सकेगा.
यूएन महासचिव ने गुरुवार को आयोजित बैठक को सम्बोधित करते हुए कहा कि मध्य-आय वाले देशों के लिये कर्ज़ अदायगी को 2022 तक के लिये टाल देना चाहिए.
इससे उन्हें कोरोनावायरस के आर्थिक व सामाजिक प्रभावों से निपटने में मदद मिलेगी.  
वैश्विक महामारी से पहले भी बड़ी संख्या में देश, बढ़ते कर्ज़ की चुनौती का सामना कर रहे थे, जोकि मौजूदा हालात में अब और भी गम्भीर हो गई है.   
उन्होंने बताया, “उदाहरणस्वरूप, लघु द्वीपीय देशों में, पर्यटन के ढह जाने से कर्ज़ अदायगी की उनकी क्षमता पर भीषण असर हुआ है.”
“कर्ज़ संकट पर वैश्विक जवाबी कार्रवाई में निम्न-आय वाले देशों को सही मायनों में सहारा देने का प्रयास किया जा रहा है, मध्य-आय वाले देशों को भी पीछे नहीं छूटने देना होगा.”
विश्व के मध्य-आय वाले देश आकार, आबादी, अर्थव्यवस्थाओं सहित कई पहलुओं में विविधतापूर्ण है, और महामारी से पहले यहाँ, विश्व में कुल निर्धनों की 62 फ़ीसदी आबादी बसती थी.
इनमें एक अरब से ज़्यादा की आबादी वाले देश भारत से लेकर, प्रशान्त द्वीप पर 20 हज़ार की आबादी वाला देश पलाऊ है.  
इन देशों में वार्षिक प्रति व्यक्ति आय, एक हज़ार डॉलर से लेकर 12 हज़ार डॉलर है, यानि कर्ज़ राहत प्राप्ति के लिये तय सीमा से, उनकी प्रति व्यक्ति आय अधिक होती है.
यूएन प्रमुख ने कर्ज़ के बढ़ते स्तर से निपटने के लिये बेहतर ढाँचागत व्यवस्थाओं और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया है.
इस क्रम में कर्ज़ की अदला-बदली से लेकर उसे रद्द किये जाने के उपायों का सहारा लेने की बात कही गई है.
लम्बित समस्याओं से निपटना
महासचिव गुटेरेश ने कहा कि यह लम्हा अन्तरराष्ट्रीय कर्ज़ संरचना में, लम्बे समय से मौजूद कमज़ोरियों से निपटने का है. उदाहरण के लिये, सहमत सिद्धान्तों का अभाव और ऐसी प्रक्रियाएँ जिनसे देरी के बाद भी कम राहत ही मिलती है.
इससे पहले मार्च महीने में, महासचिव ने विश्व नेताओं की एक बैठक आयोजित की थी जिसमें विकासशील देशों में कर्ज़ संकट को गहराने से टालने के लिये मज़बूत समर्थन की पुकार लगाई गई थी.
पिछले वर्ष, जी-20 समूह की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं ने कर्ज़ अदायगी को रोके जाने की पहली की घोषणा की थी. इसके ज़रिये, विश्व के निर्धनतम देशों के लिये अस्थाई तौर पर द्विपक्षीय क़िस्त अदायगी को रोक दिया गया.
यूएन प्रमुख ने इस उपाय को 2022 में भी जारी रखने का आग्रह किया है.
साथ ही, इसे उन निर्बल मध्य-आय वाले देशों के लिये भी उपलब्ध बनाने का सुझाव दिया है, जो कर्ज़ के बोझ में दबे हैं और जिन्हें ऐसे उपायों की आवश्यकता है. , संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने यूएन महासभा में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक को सम्बोधित करते हुए, कोविड-19 महामारी से उबरने में मध्य-आय वाले देशों के लिये, वित्तीय संसाधनों व कर्ज़ राहत की आवश्यकता को रेखांकित किया है.

संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में मध्य-आय वाले देशों की संख्या 100 से ज़्यादा हैं, और उन्हें कर्ज़ राहत प्रदान करने के लिये नवाचारी उपायों को अपनाये जाने पर बल दिय गया है.

इससे, उनके लिये अपनी अर्थव्यवस्थाओं का विस्तार करना और महामारी से उबरना सम्भव हो सकेगा.

यूएन महासचिव ने गुरुवार को आयोजित बैठक को सम्बोधित करते हुए कहा कि मध्य-आय वाले देशों के लिये कर्ज़ अदायगी को 2022 तक के लिये टाल देना चाहिए.

इससे उन्हें कोरोनावायरस के आर्थिक व सामाजिक प्रभावों से निपटने में मदद मिलेगी.  

वैश्विक महामारी से पहले भी बड़ी संख्या में देश, बढ़ते कर्ज़ की चुनौती का सामना कर रहे थे, जोकि मौजूदा हालात में अब और भी गम्भीर हो गई है.   

उन्होंने बताया, “उदाहरणस्वरूप, लघु द्वीपीय देशों में, पर्यटन के ढह जाने से कर्ज़ अदायगी की उनकी क्षमता पर भीषण असर हुआ है.”

“कर्ज़ संकट पर वैश्विक जवाबी कार्रवाई में निम्न-आय वाले देशों को सही मायनों में सहारा देने का प्रयास किया जा रहा है, मध्य-आय वाले देशों को भी पीछे नहीं छूटने देना होगा.”

विश्व के मध्य-आय वाले देश आकार, आबादी, अर्थव्यवस्थाओं सहित कई पहलुओं में विविधतापूर्ण है, और महामारी से पहले यहाँ, विश्व में कुल निर्धनों की 62 फ़ीसदी आबादी बसती थी.

इनमें एक अरब से ज़्यादा की आबादी वाले देश भारत से लेकर, प्रशान्त द्वीप पर 20 हज़ार की आबादी वाला देश पलाऊ है.  

इन देशों में वार्षिक प्रति व्यक्ति आय, एक हज़ार डॉलर से लेकर 12 हज़ार डॉलर है, यानि कर्ज़ राहत प्राप्ति के लिये तय सीमा से, उनकी प्रति व्यक्ति आय अधिक होती है.

यूएन प्रमुख ने कर्ज़ के बढ़ते स्तर से निपटने के लिये बेहतर ढाँचागत व्यवस्थाओं और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया है.

इस क्रम में कर्ज़ की अदला-बदली से लेकर उसे रद्द किये जाने के उपायों का सहारा लेने की बात कही गई है.

लम्बित समस्याओं से निपटना

महासचिव गुटेरेश ने कहा कि यह लम्हा अन्तरराष्ट्रीय कर्ज़ संरचना में, लम्बे समय से मौजूद कमज़ोरियों से निपटने का है. उदाहरण के लिये, सहमत सिद्धान्तों का अभाव और ऐसी प्रक्रियाएँ जिनसे देरी के बाद भी कम राहत ही मिलती है.

इससे पहले मार्च महीने में, महासचिव ने विश्व नेताओं की एक बैठक आयोजित की थी जिसमें विकासशील देशों में कर्ज़ संकट को गहराने से टालने के लिये मज़बूत समर्थन की पुकार लगाई गई थी.

पिछले वर्ष, जी-20 समूह की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं ने कर्ज़ अदायगी को रोके जाने की पहली की घोषणा की थी. इसके ज़रिये, विश्व के निर्धनतम देशों के लिये अस्थाई तौर पर द्विपक्षीय क़िस्त अदायगी को रोक दिया गया.

यूएन प्रमुख ने इस उपाय को 2022 में भी जारी रखने का आग्रह किया है.

साथ ही, इसे उन निर्बल मध्य-आय वाले देशों के लिये भी उपलब्ध बनाने का सुझाव दिया है, जो कर्ज़ के बोझ में दबे हैं और जिन्हें ऐसे उपायों की आवश्यकता है. 

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