कोविड-19: महामारी के कारण, करोड़ों लोग तस्करी के जोखिम दायरे में

संयुक्त राष्ट्र के ड्रग्स व अपराध निरोधक मामलों के कार्यालय (UNODC) ने कहा है कि प्रवासी जन व कामकाज और रोज़गार से वंचित हुए लोग, ऐसे समूहों में हैं जिनके मानव तस्करों के चंगुल में फँस जाने की बहुत ज़्यादा आशंका है. संगठन ने मंगलवार को आगाह करने के अन्दाज़ में कहा कि कोरोनावायरस महामारी के कारण हुई आर्थिक मन्दी और रोज़गार व आय ख़त्म होने जाने से, करोड़ों लोगों को जोखिम के दायरे में पहुँच गए हैं.

यूएन ड्रग्स व अपराध निरोधक कार्यालय की कार्यकारी निदेशक ग़ादा वॉली ने मानव तस्करी पर एजेंसी की एक ताज़ा रिपोर्ट के निष्कर्षों की जानकारी एक विज्ञप्ति में जारी की है. 
इसमें कहा गया है, “दुनिया भर में, लाखों-करोड़ों महिलाएँ और पुरुष, रोज़गार व आमदनी वाले कामकाज के बिना रह गए हैं, बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित हैं, और ये लोग कोविड-19 संकट के जारी रहते हुए भी, किसी सामाजिक संरक्षा व सुरक्षा से महरूम हैं. इन कारणों से ये सब, मानव तस्करी के बहुत जोखिम के दायरे में हैं.”
उन्होंने कहा, “हमें, आपराधिक मानव तस्करों को, महामारी से उत्पन्न हालात का अनुचित लाभ उठाने से रोकने के लिये, लक्षित और सधी हुई कार्रवाई करनी होगी.”
यूएन एजेंसी की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2018 के दौरान, 148 देशों में, मानव तस्करी के लगभग 50 हज़ार पीड़ितों की पहचान की गई, मगर इस अपराध की छुपी हुई प्रवृत्ति का मतलब है कि इस तरह के पीड़ितों की वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है.
टैक्नॉलॉजी का दुरुपयोग
रिपोर्ट में पाया गया है कि मानव तस्करों ने, अपनी गतिविधियों के हर स्तर पर, टैक्नॉलॉजी को अपनी ज़रूरतों के अनुरूप ढाल लिया है, पीड़ितों को बहलाने-फ़ुसलाने से लेकर, उनका शोषण करने तक.
रिपोर्ट में कहा गया है कि विशेष रूप में, सोशल मीडिया पर बच्चे बहुत नाज़ुक हालात का सामना कर रहे हैं, जहाँ बहुत से बच्चे, बहुत आसानी से अपराधियों के शिकार, बन जाते हैं.
यूएन ड्रग्स व अपराध निरोधक एजेंसी ने मानव तस्करों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली दो प्रमुख चालाकियों की निशानदेही की है: किसी नाज़ुक हालात वाले व्यक्ति का शिकार करना या उसे अपन जाल में फँसाने के लिये बहुत आक्रामक तरीक़े, लगातार अपनाते रहना. ऐसा आमतौर पर सोशल मीडिया पर किया जाता है; 

UNICEF/Adriana Zehbrauskasहोण्डुरस के कुछ स्कूलों में लड़कियों को, तथाकथित रूप में, यौन तस्करी का शिकार बनाए जाने के मामले सामने आए हैं.

दूसरा तरीक़ा है ‘फ़िशिंग’ यानि मछली जैसा शिकार करना. इस रणनीति में, तस्कर, किसी रोज़गार के कामकाज या आमदनी का विज्ञापन प्रकाशित करते हैं, और सम्भावित पीड़ितों द्वारा सम्पर्क किये जाने, या उन की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करते हैं.
एजेंसी का कहना है कि इण्टरनेट भी, तस्करों को अपने पीड़ितों का शोषण सीधे दिखाने का मौक़ा उपलब्ध कराता है. इस तरह, दुनिया के अनेक स्थानों पर मौजूद तस्कर व शोषक, एक ही पीड़ित का एक साथ शोषण करते हैं.
बाल पीड़ितों की संख्या में तीन गुना वृद्धि
रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 15 वर्षों के दौरान, मानव तस्करी का शिकार होने वाले बाल पीड़ितों की संख्या तीन गुना बढ़ी है. इनमें मुख्य रूप से लड़कियों की तस्करी, यौन शोषण के लिये की जाती है, जबकि लड़कों को बाल मज़दूरी में धकेल दिया जाता है.
रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि मानव तस्करों की मुख्य नज़र, महिलाओं पर रहती है, मगर इसी अवधि में, वयस्क महिला पीड़ितों की संख्या लगभग 70 प्रतिशत से कम होकर, क़रीब 50 प्रतिशत पर आई.
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2018 में पहचान किये गए, हर 10 पीड़ितों में, औसतन लगभग 5 वयस्क महिलाएँ और दो युवा लड़कियाँ थीं. मानव तस्करी के शिकार कुल पीड़ितों में से लगभग 20 प्रतिशत वयस्क पुरुष और 15 प्रतिशत युवा लड़के थे.
3 में से 2 अपराधी पुरुष हैं
रिपोर्ट में ये भी पाया गया है कि वैश्विक स्तर पर, जिन लोगों पर तस्करी के आरोप में मुक़दमा चलाया गया और जिन्हें दोषी या अपराधी पाया गया, उनमें, अधिकतर पुरुष थे. इनमें मुल्ज़िमों (अभियुक्त) की संख्या 64 प्रतिशत और मुजरिमों (दोषियों) की संख्या 62 प्रतिशत थी.
इन अभियुक्तों व अपराधियों में अधिकतर संख्या संगठित आपराधिक गुटों के सदस्यों की थी, साथ ही, इनमें ऐसे व्यक्ति भी थे जो या तो ख़ुद अकेले ही तस्करी में सम्मिलत थे, या किसी छोटे गुटों का हिस्सा थे जो मौक़ा देखकर तस्करी करते थे.
रिपोर्ट में कहा गया है कि मानव तस्कर, किसी भी पीड़ित को एक ‘उपभोग की जाने वाली वस्तु या चीज़’ समझते हैं, जिसकी कोई मानव गरिमा या अधिकार नहीं होते हैं. ये मानव तस्करी अपनी ही तरह के किसी दूसरे इनसान को, कुछ हज़ार डॉलर से लेकर लाखों डॉलर की क़ीमत में बेच देते हैं.
इसका सबसे बड़ा फ़ायदा या मुनाफ़ा बड़े आपराधिक गुटों को होता है., संयुक्त राष्ट्र के ड्रग्स व अपराध निरोधक मामलों के कार्यालय (UNODC) ने कहा है कि प्रवासी जन व कामकाज और रोज़गार से वंचित हुए लोग, ऐसे समूहों में हैं जिनके मानव तस्करों के चंगुल में फँस जाने की बहुत ज़्यादा आशंका है. संगठन ने मंगलवार को आगाह करने के अन्दाज़ में कहा कि कोरोनावायरस महामारी के कारण हुई आर्थिक मन्दी और रोज़गार व आय ख़त्म होने जाने से, करोड़ों लोगों को जोखिम के दायरे में पहुँच गए हैं.

यूएन ड्रग्स व अपराध निरोधक कार्यालय की कार्यकारी निदेशक ग़ादा वॉली ने मानव तस्करी पर एजेंसी की एक ताज़ा रिपोर्ट के निष्कर्षों की जानकारी एक विज्ञप्ति में जारी की है. 

इसमें कहा गया है, “दुनिया भर में, लाखों-करोड़ों महिलाएँ और पुरुष, रोज़गार व आमदनी वाले कामकाज के बिना रह गए हैं, बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित हैं, और ये लोग कोविड-19 संकट के जारी रहते हुए भी, किसी सामाजिक संरक्षा व सुरक्षा से महरूम हैं. इन कारणों से ये सब, मानव तस्करी के बहुत जोखिम के दायरे में हैं.”

उन्होंने कहा, “हमें, आपराधिक मानव तस्करों को, महामारी से उत्पन्न हालात का अनुचित लाभ उठाने से रोकने के लिये, लक्षित और सधी हुई कार्रवाई करनी होगी.”

यूएन एजेंसी की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2018 के दौरान, 148 देशों में, मानव तस्करी के लगभग 50 हज़ार पीड़ितों की पहचान की गई, मगर इस अपराध की छुपी हुई प्रवृत्ति का मतलब है कि इस तरह के पीड़ितों की वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है.

टैक्नॉलॉजी का दुरुपयोग

रिपोर्ट में पाया गया है कि मानव तस्करों ने, अपनी गतिविधियों के हर स्तर पर, टैक्नॉलॉजी को अपनी ज़रूरतों के अनुरूप ढाल लिया है, पीड़ितों को बहलाने-फ़ुसलाने से लेकर, उनका शोषण करने तक.

रिपोर्ट में कहा गया है कि विशेष रूप में, सोशल मीडिया पर बच्चे बहुत नाज़ुक हालात का सामना कर रहे हैं, जहाँ बहुत से बच्चे, बहुत आसानी से अपराधियों के शिकार, बन जाते हैं.

यूएन ड्रग्स व अपराध निरोधक एजेंसी ने मानव तस्करों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली दो प्रमुख चालाकियों की निशानदेही की है: किसी नाज़ुक हालात वाले व्यक्ति का शिकार करना या उसे अपन जाल में फँसाने के लिये बहुत आक्रामक तरीक़े, लगातार अपनाते रहना. ऐसा आमतौर पर सोशल मीडिया पर किया जाता है; 


UNICEF/Adriana Zehbrauskas
होण्डुरस के कुछ स्कूलों में लड़कियों को, तथाकथित रूप में, यौन तस्करी का शिकार बनाए जाने के मामले सामने आए हैं.

दूसरा तरीक़ा है ‘फ़िशिंग’ यानि मछली जैसा शिकार करना. इस रणनीति में, तस्कर, किसी रोज़गार के कामकाज या आमदनी का विज्ञापन प्रकाशित करते हैं, और सम्भावित पीड़ितों द्वारा सम्पर्क किये जाने, या उन की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करते हैं.

एजेंसी का कहना है कि इण्टरनेट भी, तस्करों को अपने पीड़ितों का शोषण सीधे दिखाने का मौक़ा उपलब्ध कराता है. इस तरह, दुनिया के अनेक स्थानों पर मौजूद तस्कर व शोषक, एक ही पीड़ित का एक साथ शोषण करते हैं.

बाल पीड़ितों की संख्या में तीन गुना वृद्धि

रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 15 वर्षों के दौरान, मानव तस्करी का शिकार होने वाले बाल पीड़ितों की संख्या तीन गुना बढ़ी है. इनमें मुख्य रूप से लड़कियों की तस्करी, यौन शोषण के लिये की जाती है, जबकि लड़कों को बाल मज़दूरी में धकेल दिया जाता है.

रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि मानव तस्करों की मुख्य नज़र, महिलाओं पर रहती है, मगर इसी अवधि में, वयस्क महिला पीड़ितों की संख्या लगभग 70 प्रतिशत से कम होकर, क़रीब 50 प्रतिशत पर आई.

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2018 में पहचान किये गए, हर 10 पीड़ितों में, औसतन लगभग 5 वयस्क महिलाएँ और दो युवा लड़कियाँ थीं. मानव तस्करी के शिकार कुल पीड़ितों में से लगभग 20 प्रतिशत वयस्क पुरुष और 15 प्रतिशत युवा लड़के थे.

3 में से 2 अपराधी पुरुष हैं

रिपोर्ट में ये भी पाया गया है कि वैश्विक स्तर पर, जिन लोगों पर तस्करी के आरोप में मुक़दमा चलाया गया और जिन्हें दोषी या अपराधी पाया गया, उनमें, अधिकतर पुरुष थे. इनमें मुल्ज़िमों (अभियुक्त) की संख्या 64 प्रतिशत और मुजरिमों (दोषियों) की संख्या 62 प्रतिशत थी.

इन अभियुक्तों व अपराधियों में अधिकतर संख्या संगठित आपराधिक गुटों के सदस्यों की थी, साथ ही, इनमें ऐसे व्यक्ति भी थे जो या तो ख़ुद अकेले ही तस्करी में सम्मिलत थे, या किसी छोटे गुटों का हिस्सा थे जो मौक़ा देखकर तस्करी करते थे.

रिपोर्ट में कहा गया है कि मानव तस्कर, किसी भी पीड़ित को एक ‘उपभोग की जाने वाली वस्तु या चीज़’ समझते हैं, जिसकी कोई मानव गरिमा या अधिकार नहीं होते हैं. ये मानव तस्करी अपनी ही तरह के किसी दूसरे इनसान को, कुछ हज़ार डॉलर से लेकर लाखों डॉलर की क़ीमत में बेच देते हैं.

इसका सबसे बड़ा फ़ायदा या मुनाफ़ा बड़े आपराधिक गुटों को होता है.

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