कोविड-19 महामारी से उबरने में महत्वाकाँक्षी जलवायु कार्रवाई पर ज़ोर

विकासशील देश जलवायु परिवर्तन का मुक़ाबल करने के लिये ज़्यादा महत्वाकाँक्षी योजनाओं पर काम कर रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के मुताबिक इन प्रयासों के तहत कोविड-19 से उबरने और हरित पुनर्बहाली की दिशा में आर्थिक स्फूर्ति पैकेजों का सहारा लिया जा रहा है. 

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु कार्रवाई योजनाओं को मज़बूती प्रदान करने के लिये 115 विकासशील देशों का समर्थन कर रहा है. 
हर देश, इन योजनाओं के तहत क़दम उठाकर, वर्ष 2015 के पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने की मंशा रखता है जिसमें वैश्विक तापमान में औसत बढ़ोत्तरी को 2 डिग्री फ़ीसदी से कम रखने या सम्भवत: 1.5 डिग्री तक सीमित रखने की बात कही गई है. 
इस ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षरकर्ता देश शनिवार, 12 दिसम्बर, को एक जलवायु महत्वाकाँक्षा शिखर वार्ता में हिस्सा लेंगे जो पेरिस में हुई सहमति के पाँच वर्ष पूरे होने पर वर्चुअली आयोजित की जा रही है.
इस बैठक में, अगले पाँच वर्षों के लिये नए और महत्वाकाँक्षी संकल्प लिये जाएँगे जिनसे वर्ष 2021 में स्कॉटलैण्ड के ग्लासगो शहर में होने वाली कॉप-26 वार्ता के लिये मज़बूती मिलने के संकेत हैं. 
यूएनडीपी में जलवायु सलाहकार कैसी फ़्लिन ने बताया कि तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सैल्सियस तक ही रखने का लक्ष्य, दुनिया की कायापलट कर देने वाला व्यापक लक्ष्य हासिल करने के लिये रखा गया है. उनके मुताबिक जिस तेज़ी और स्तर पर इसे पूरा किया जाना है, वह अभूतपूर्व है.
गम्भीर हालात 
“अच्छी ख़बर यह है कि हमारे पास सभी समाधान हैं, हमें मालूम है कि हमें क्या करने की ज़रूरत है. हम जानते हैं कि स्वच्छ ऊर्जा के लिये क्या चाहिये, हम जानते हैं कि जलवायु प्रभावों के प्रति सहनक्षमता बढ़ाने के लिये क्या चाहिये…प्रकृति की रक्षा के लिये.”
“लेकिन पहले की तुलना में हमें इसे तेज़ी से और बड़े स्तर पर करना होगा.”

UNDP/Karin Schermbruckerज़िम्बाब्वे के बुलावायो में बिजली की निर्बाध आपूर्ति के लिये सौर ऊर्जा द्वारा का प्रयोग किया जा रहा है.

राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई योजनाओं के ज़रिये निम्न तीन क्षेत्रों में मौजूदा नीतियों की अपेक्षित प्रगति को दर्शाने का प्रयास किया जाता है: कार्बन उत्सर्जन में कटौती, अनुकूलन, और समर्थन. 
कैसी फ़्लिन ने जिनीवा में पत्रकारों को बताया कि हर पाँच वर्षीय योजना एक लम्बी किताब के एक अध्याय की तरह है जिसमें बताया गया है कि दुनिया, वर्ष 2050 तक नैट-शून्य कार्बन उत्सर्जन तक किस तरह पहुँचेगी. 
कुछ देश, कोविड-19 महामारी के कारण, अपने संकल्पों को वर्ष 2021 की शुरुआत तक तैयार नहीं कर पाएँगे. इनमें वे विकासशील देश भी हैं जिन्हें यूएनडीपी से समर्थन प्राप्त है और जोकि कुल वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के 22.5 फ़ीसदी हिस्से के लिये ज़िम्मेदार हैं. 
अवसरों की उपलब्धता
यूएन एजेंसी का मानना है कि कोरोनावायरस संकट ने जलवायु संकल्पों को ज़्यादा महत्वाकाँक्षी बनाने की एक नई वजह और अवसर प्रदान किये हैं. और अब देशों ने महामारी से उबरने की अपनी योजनाओं में हरित पुनर्बहाली को ध्यान में रखना शुरू किया है 
“इसका अर्थ यह है कि 115 देशों में से 80 फ़ीसदी देश, अब यह आकलन कर रहे हैं कि उत्सर्जनों को घटाने में वे ज़्यादा आक्रामक किस तरह हो सकते हैं.”
“और जब बात अनुकूलन, जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ सहनक्षमता बढ़ाने की हो, तो लगभग हर एक देश – 97 फ़ीसदी – के पास अनुकूलन महत्वाकाँक्षाओं को बढ़ाने के लिये योजना है.”
यूएन एजेंसी अधिकारी ने बताया कि कोविड-19 की वजह से कुछ जलवायु कार्रवाई संकल्पों में देरी हुई है लेकिन योजनाओं में फुर्ती आई है. 
“बहुत से मामलों में, कोविड के शुरुआती दिनों में हमने सोचा कि इससे हमारी रफ़्तार धीमी हो जाएगी. और हम सोचते हैं कि हुआ यह है कि हम तेज़ी से बढ़े हैं क्योंकि हरित पुनर्बहाली के सम्बन्ध में, देश जो चयन कर रहे हैं वे जलवायु पर बातचीत से ही जुड़ा है.” 
ज़्यादा समावेशी
कैसी फ़्लिन के मुताबिक राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई योजनाओं का दूसरा संस्करण पहले की तुलना में ज़्यादा समावेशी है, विशेषत: लैंगिक मुद्दों और युवाओं के नज़रिये से. 
इस क्रम में देशों ने सभी की आवाज़ों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया है. उन्होंने कहा कि जलवायु सम्बन्धी वायदे करने वाले 91 फ़ीसदी देशों ने अपनी योजनाओं में लैंगिक परिप्रेक्ष्यों व ज़रूरतों का ध्यान रखा है. 
इसमें प्रभावी शासन, समावेशन, योजना प्रक्रिया के साथ-साथ नीतिगत ख़ाका तैयार करने पर ज़ोर दिया गया है ताकि महिलाओं व लड़कियों को ना सिर्फ़ निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जा सके, बल्कि राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई योजनाओं को साकार करने में भी समर्थन प्रदान किया जा सके.  
इन योजनाओं के पहले संस्करण में लगभग 40 फ़ीसदी में बच्चों व युवाओं को प्रत्यक्ष रूप से सम्बोधित किया गया था लेकिन अब यह बढ़कर 75 प्रतिशत हो गया है. 
उन्होंने कोस्टा रीका का उदाहरण देते हुए कहा कि कोविड-19 और हरित पुनर्बहाली के बीच सम्बन्ध पर विशेष ध्यान दिया गया है.  
नाइजीरिया एक अन्य उदाहरण है जहाँ इन योजनाओं में कृषि और आवास सम्बन्धी आवश्यकताओं और अर्थव्यवस्था में फिर स्फूर्ति भरने के लिये हरित रोज़गारों पर बल दिया गया है. 
बताया गया है कि पाँच वर्ष पहले की तुलना में देश अब जलवायु परिवर्तन के प्रति ज़्यादा गम्भीर हैं, इसलिये भी क्योंकि जलवायु आपदा की घटनाएँ पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा सामने आ रही हैं. , विकासशील देश जलवायु परिवर्तन का मुक़ाबल करने के लिये ज़्यादा महत्वाकाँक्षी योजनाओं पर काम कर रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के मुताबिक इन प्रयासों के तहत कोविड-19 से उबरने और हरित पुनर्बहाली की दिशा में आर्थिक स्फूर्ति पैकेजों का सहारा लिया जा रहा है. 

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु कार्रवाई योजनाओं को मज़बूती प्रदान करने के लिये 115 विकासशील देशों का समर्थन कर रहा है. 

हर देश, इन योजनाओं के तहत क़दम उठाकर, वर्ष 2015 के पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने की मंशा रखता है जिसमें वैश्विक तापमान में औसत बढ़ोत्तरी को 2 डिग्री फ़ीसदी से कम रखने या सम्भवत: 1.5 डिग्री तक सीमित रखने की बात कही गई है. 

इस ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षरकर्ता देश शनिवार, 12 दिसम्बर, को एक जलवायु महत्वाकाँक्षा शिखर वार्ता में हिस्सा लेंगे जो पेरिस में हुई सहमति के पाँच वर्ष पूरे होने पर वर्चुअली आयोजित की जा रही है.

इस बैठक में, अगले पाँच वर्षों के लिये नए और महत्वाकाँक्षी संकल्प लिये जाएँगे जिनसे वर्ष 2021 में स्कॉटलैण्ड के ग्लासगो शहर में होने वाली कॉप-26 वार्ता के लिये मज़बूती मिलने के संकेत हैं. 

यूएनडीपी में जलवायु सलाहकार कैसी फ़्लिन ने बताया कि तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सैल्सियस तक ही रखने का लक्ष्य, दुनिया की कायापलट कर देने वाला व्यापक लक्ष्य हासिल करने के लिये रखा गया है. उनके मुताबिक जिस तेज़ी और स्तर पर इसे पूरा किया जाना है, वह अभूतपूर्व है.

गम्भीर हालात 

“अच्छी ख़बर यह है कि हमारे पास सभी समाधान हैं, हमें मालूम है कि हमें क्या करने की ज़रूरत है. हम जानते हैं कि स्वच्छ ऊर्जा के लिये क्या चाहिये, हम जानते हैं कि जलवायु प्रभावों के प्रति सहनक्षमता बढ़ाने के लिये क्या चाहिये…प्रकृति की रक्षा के लिये.”

“लेकिन पहले की तुलना में हमें इसे तेज़ी से और बड़े स्तर पर करना होगा.”


UNDP/Karin Schermbrucker
ज़िम्बाब्वे के बुलावायो में बिजली की निर्बाध आपूर्ति के लिये सौर ऊर्जा द्वारा का प्रयोग किया जा रहा है.

राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई योजनाओं के ज़रिये निम्न तीन क्षेत्रों में मौजूदा नीतियों की अपेक्षित प्रगति को दर्शाने का प्रयास किया जाता है: कार्बन उत्सर्जन में कटौती, अनुकूलन, और समर्थन. 

कैसी फ़्लिन ने जिनीवा में पत्रकारों को बताया कि हर पाँच वर्षीय योजना एक लम्बी किताब के एक अध्याय की तरह है जिसमें बताया गया है कि दुनिया, वर्ष 2050 तक नैट-शून्य कार्बन उत्सर्जन तक किस तरह पहुँचेगी. 

कुछ देश, कोविड-19 महामारी के कारण, अपने संकल्पों को वर्ष 2021 की शुरुआत तक तैयार नहीं कर पाएँगे. इनमें वे विकासशील देश भी हैं जिन्हें यूएनडीपी से समर्थन प्राप्त है और जोकि कुल वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के 22.5 फ़ीसदी हिस्से के लिये ज़िम्मेदार हैं. 

अवसरों की उपलब्धता

यूएन एजेंसी का मानना है कि कोरोनावायरस संकट ने जलवायु संकल्पों को ज़्यादा महत्वाकाँक्षी बनाने की एक नई वजह और अवसर प्रदान किये हैं. और अब देशों ने महामारी से उबरने की अपनी योजनाओं में हरित पुनर्बहाली को ध्यान में रखना शुरू किया है 

“इसका अर्थ यह है कि 115 देशों में से 80 फ़ीसदी देश, अब यह आकलन कर रहे हैं कि उत्सर्जनों को घटाने में वे ज़्यादा आक्रामक किस तरह हो सकते हैं.”

“और जब बात अनुकूलन, जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ सहनक्षमता बढ़ाने की हो, तो लगभग हर एक देश – 97 फ़ीसदी – के पास अनुकूलन महत्वाकाँक्षाओं को बढ़ाने के लिये योजना है.”

यूएन एजेंसी अधिकारी ने बताया कि कोविड-19 की वजह से कुछ जलवायु कार्रवाई संकल्पों में देरी हुई है लेकिन योजनाओं में फुर्ती आई है. 

“बहुत से मामलों में, कोविड के शुरुआती दिनों में हमने सोचा कि इससे हमारी रफ़्तार धीमी हो जाएगी. और हम सोचते हैं कि हुआ यह है कि हम तेज़ी से बढ़े हैं क्योंकि हरित पुनर्बहाली के सम्बन्ध में, देश जो चयन कर रहे हैं वे जलवायु पर बातचीत से ही जुड़ा है.” 

ज़्यादा समावेशी

कैसी फ़्लिन के मुताबिक राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई योजनाओं का दूसरा संस्करण पहले की तुलना में ज़्यादा समावेशी है, विशेषत: लैंगिक मुद्दों और युवाओं के नज़रिये से. 

इस क्रम में देशों ने सभी की आवाज़ों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया है. उन्होंने कहा कि जलवायु सम्बन्धी वायदे करने वाले 91 फ़ीसदी देशों ने अपनी योजनाओं में लैंगिक परिप्रेक्ष्यों व ज़रूरतों का ध्यान रखा है. 

इसमें प्रभावी शासन, समावेशन, योजना प्रक्रिया के साथ-साथ नीतिगत ख़ाका तैयार करने पर ज़ोर दिया गया है ताकि महिलाओं व लड़कियों को ना सिर्फ़ निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जा सके, बल्कि राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई योजनाओं को साकार करने में भी समर्थन प्रदान किया जा सके.  

इन योजनाओं के पहले संस्करण में लगभग 40 फ़ीसदी में बच्चों व युवाओं को प्रत्यक्ष रूप से सम्बोधित किया गया था लेकिन अब यह बढ़कर 75 प्रतिशत हो गया है. 

उन्होंने कोस्टा रीका का उदाहरण देते हुए कहा कि कोविड-19 और हरित पुनर्बहाली के बीच सम्बन्ध पर विशेष ध्यान दिया गया है.  

नाइजीरिया एक अन्य उदाहरण है जहाँ इन योजनाओं में कृषि और आवास सम्बन्धी आवश्यकताओं और अर्थव्यवस्था में फिर स्फूर्ति भरने के लिये हरित रोज़गारों पर बल दिया गया है. 

बताया गया है कि पाँच वर्ष पहले की तुलना में देश अब जलवायु परिवर्तन के प्रति ज़्यादा गम्भीर हैं, इसलिये भी क्योंकि जलवायु आपदा की घटनाएँ पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा सामने आ रही हैं. 

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