कोविड-19: सामाजिक संरक्षा उपाय जीवनदायी, मगर धनी व निर्धन देशों के बीच खाई 

संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट दर्शाती है कि कोविड-19 महामारी के दौरान, अभूतपूर्व संख्या में सामाजिक संरक्षा उपायों की शुरुआत की गई है, मगर इससे धनी व निर्धन देशों के बीच बढ़ती खाई को पाट पाने में सफलता नहीं मिल पाई है.

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने निर्धनता की समीक्षा के सम्बन्ध में गुरुवार को अपनी एक नई रिपोर्ट प्रकाशित की है.
रिपोर्ट बताती है कि सामाजिक सहायता उपायों से किस हद तक, महामारी के दौरान उपजे आर्थिक झटकों को झेल पाना सम्भव हुआ है. 
इस अध्ययन में 41 देशों से प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण किया गया. 

Just released: our new report on mitigating #poverty shows that cash assistance policies significantly reduced the number of people who might otherwise have fallen into poverty during the #COVID19 pandemic. 📘 Read it here: https://t.co/FUtq80aUGB pic.twitter.com/cfS9GI1Esj— UN Development (@UNDP) July 1, 2021

बताया गया है कि ग़रीबी रेखा से नीचे जाने का जोखिम झेल रहे, डेढ़ करोड़ में से लगभग एक करोड़ 20 लाख लोगों को रोक पाने में सफलता मिली है.
मोटे तौर पर, आर्थिक संकट के दंश को कम करना सम्भव हुआ है, मगर अध्ययन बताता है कि ऐसा मुख्यत: उच्च और ऊपरी मध्य-आय वाले देशों में ही हो पाया है. 
धनी देशों ने सामाजिक सहायता के लिये, प्रति व्यक्ति स्तर पर निर्धन देशों की तुलना में, 212 गुना अधिक ख़र्च किया.
यूएन विकास कार्यक्रम के प्रशासक एखिम श्टाइनर ने बताया कि सामाजिक संरक्षा उपायों पर ख़र्च करने की क्षमता ने लोगों को निर्धनता से दूर रखने में अहम भूमिका निभाई है. 
रिपोर्ट के अनुसार, निम्न मध्य-आय वाले देशों के लिये सामाजिक सहायता सम्बन्धी व्यय, लोगों को नए सिरे से ग़रीबी के गर्त में धँसने से रोक पाने के लिये अपर्याप्त था. 
निम्न-आय वाले देशों में तो, आय को पहुँचे नुक़सान की रोकथाम करने में बिलकुल भी सफलता हासिल नहीं हो पाई. 
“यह जीवनरेखा इस बात पर निर्भर करती है कि आप कहाँ रहते हैं.”
“अब चुनौती इस वित्तीय इन्तज़ाम का दायरा बढ़ाने की है ताकि सभी देशों के लिये सामाजिक सहायता व्यय उपाय लागू करना और बरक़ररार रखना सम्भव हो सके.”
यूएनडीपी के शीर्षतम अधिकारी ने बताया कि लोगों को ग़रीबी की चपेट में आने से बचाने के लिये, यह एक बेहद किफ़ायती और कारगर उपाय है. 
धनी व निर्धन जगत में अन्तर
विशेषज्ञों का अनुमान है कि कोविड-19 महामारी के दौरान 11 करोड़ 70 लाख से लेकर 16 करोड़ 80 लाख लोगों निर्धनता का शिकार हुए. 
विश्व भर में सामाजिक संरक्षा नीतियों में दो हज़ार 900 अरब डॉलर का निवेश किया गया है, मगर विकासशील देशों ने इस मद में महज़ 379 अरब डॉलर ही ख़र्च किया है.
उच्च-आय वाले देशों ने सामाजिक संरक्षा उपायों पर औसतन, प्रति व्यक्ति 847 डॉलर आवण्टित किये जबकि निम्न और मध्य आय वाले देशों में, प्रति व्यक्ति 124 डॉलर ख़र्च हुआ है.
निम्न-आय वाले देशों में प्रति व्यक्ति सामाजिक संरक्षा उपाय महज़ चार डॉलर तक सिमट गए. 
यूएन एजेंसी के मुख्य अर्थशास्त्री जॉर्ज ग्रे मोलीना ने बताया कि रिपोर्ट में महामारी से, विकासशील देशों में निर्धन व निर्बल घरों पर हुए असर का आकलन किया गया है 
साथ ही अध्ययन निर्धनता से निपटने में नीतिगत विकल्पों की अहमयित को रेखांकित करता है. 
एक अनुमान के अनुसार, विकासशील जगत में सभी निर्धन व निर्बल घरों के लिये, अस्थाई बुनियादी आय के प्रावधान के ज़रिये बड़ी संख्या में लोगों को निर्धनता के गर्त में धँसने से रोका जा सकता था. 
रिपोर्ट बताती है कि छह महीनों में, विकासशील देशों के सकल घरेलू उत्पाद की महज़ 0.5 प्रतिशत धनराशि को ख़र्च कर इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता था. , संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट दर्शाती है कि कोविड-19 महामारी के दौरान, अभूतपूर्व संख्या में सामाजिक संरक्षा उपायों की शुरुआत की गई है, मगर इससे धनी व निर्धन देशों के बीच बढ़ती खाई को पाट पाने में सफलता नहीं मिल पाई है.

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने निर्धनता की समीक्षा के सम्बन्ध में गुरुवार को अपनी एक नई रिपोर्ट प्रकाशित की है.

रिपोर्ट बताती है कि सामाजिक सहायता उपायों से किस हद तक, महामारी के दौरान उपजे आर्थिक झटकों को झेल पाना सम्भव हुआ है. 
इस अध्ययन में 41 देशों से प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण किया गया. 

Just released: our new report on mitigating #poverty shows that cash assistance policies significantly reduced the number of people who might otherwise have fallen into poverty during the #COVID19 pandemic.

📘 Read it here: https://t.co/FUtq80aUGB pic.twitter.com/cfS9GI1Esj

— UN Development (@UNDP) July 1, 2021

बताया गया है कि ग़रीबी रेखा से नीचे जाने का जोखिम झेल रहे, डेढ़ करोड़ में से लगभग एक करोड़ 20 लाख लोगों को रोक पाने में सफलता मिली है.

मोटे तौर पर, आर्थिक संकट के दंश को कम करना सम्भव हुआ है, मगर अध्ययन बताता है कि ऐसा मुख्यत: उच्च और ऊपरी मध्य-आय वाले देशों में ही हो पाया है. 

धनी देशों ने सामाजिक सहायता के लिये, प्रति व्यक्ति स्तर पर निर्धन देशों की तुलना में, 212 गुना अधिक ख़र्च किया.

यूएन विकास कार्यक्रम के प्रशासक एखिम श्टाइनर ने बताया कि सामाजिक संरक्षा उपायों पर ख़र्च करने की क्षमता ने लोगों को निर्धनता से दूर रखने में अहम भूमिका निभाई है. 

रिपोर्ट के अनुसार, निम्न मध्य-आय वाले देशों के लिये सामाजिक सहायता सम्बन्धी व्यय, लोगों को नए सिरे से ग़रीबी के गर्त में धँसने से रोक पाने के लिये अपर्याप्त था. 

निम्न-आय वाले देशों में तो, आय को पहुँचे नुक़सान की रोकथाम करने में बिलकुल भी सफलता हासिल नहीं हो पाई. 

“यह जीवनरेखा इस बात पर निर्भर करती है कि आप कहाँ रहते हैं.”

“अब चुनौती इस वित्तीय इन्तज़ाम का दायरा बढ़ाने की है ताकि सभी देशों के लिये सामाजिक सहायता व्यय उपाय लागू करना और बरक़ररार रखना सम्भव हो सके.”

यूएनडीपी के शीर्षतम अधिकारी ने बताया कि लोगों को ग़रीबी की चपेट में आने से बचाने के लिये, यह एक बेहद किफ़ायती और कारगर उपाय है. 

धनी व निर्धन जगत में अन्तर

विशेषज्ञों का अनुमान है कि कोविड-19 महामारी के दौरान 11 करोड़ 70 लाख से लेकर 16 करोड़ 80 लाख लोगों निर्धनता का शिकार हुए. 

विश्व भर में सामाजिक संरक्षा नीतियों में दो हज़ार 900 अरब डॉलर का निवेश किया गया है, मगर विकासशील देशों ने इस मद में महज़ 379 अरब डॉलर ही ख़र्च किया है.

उच्च-आय वाले देशों ने सामाजिक संरक्षा उपायों पर औसतन, प्रति व्यक्ति 847 डॉलर आवण्टित किये जबकि निम्न और मध्य आय वाले देशों में, प्रति व्यक्ति 124 डॉलर ख़र्च हुआ है.

निम्न-आय वाले देशों में प्रति व्यक्ति सामाजिक संरक्षा उपाय महज़ चार डॉलर तक सिमट गए. 

यूएन एजेंसी के मुख्य अर्थशास्त्री जॉर्ज ग्रे मोलीना ने बताया कि रिपोर्ट में महामारी से, विकासशील देशों में निर्धन व निर्बल घरों पर हुए असर का आकलन किया गया है 

साथ ही अध्ययन निर्धनता से निपटने में नीतिगत विकल्पों की अहमयित को रेखांकित करता है. 

एक अनुमान के अनुसार, विकासशील जगत में सभी निर्धन व निर्बल घरों के लिये, अस्थाई बुनियादी आय के प्रावधान के ज़रिये बड़ी संख्या में लोगों को निर्धनता के गर्त में धँसने से रोका जा सकता था. 

रिपोर्ट बताती है कि छह महीनों में, विकासशील देशों के सकल घरेलू उत्पाद की महज़ 0.5 प्रतिशत धनराशि को ख़र्च कर इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता था. 

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