कोविड-19: सार्वजनिक स्वास्थ्य में ‘अल्प-निवेश के दुष्परिणाम’ उजागर

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कहा है कि कोरोनावायरस संकट ने सार्वजनिक स्वास्थ्य में लम्बे समय से चली आ रही निवेश की कमी को उजागर किया है. यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के प्रमुख टैड्रॉस एडहेनॉम घेबरेयेसस ने विश्व स्वास्थ्य ऐसेम्बली के सत्र के समापन को सम्बोधित करते हुए आगाह किया है कि समाजों में स्वास्थ्य को दिये जाने वाले महत्व पर पुनर्विचार किये जाने की ज़रूरत है. 

कोविड-19 महामारी के कारण मई 2020 में विश्व स्वास्थ्य ऐसेम्बली के वार्षिक सत्र को सीमित कर दिया गया था जिसके बाद सोमवार को 73वें सत्र के शेष भाग की फिर शुरुआत हुई. 

.@WHO is establishing a new Council on the Economics of #HealthForAll, to be led by @MazzucatoM. The council will focus on the links between health & sustainable, inclusive & innovation-led economic growth. It’s time to ensure that health is an investment, not a cost! #WHA73 https://t.co/a7ns9iQKoX— Tedros Adhanom Ghebreyesus (@DrTedros) November 13, 2020

संगठन के प्रमुख ने Pfizer/BioNTech वैक्सीन परीक्षणों के नतीजों को विशेष तौर पर उल्लेख किया, जिसके नतीजे उत्साहजनक रहे हैं – परीक्षणों में पाया गया है कि वैक्सीन 90 फ़ीसदी तक असरदार है. 
महानिदेशक घेबरेयेसस ने कहा कि मौजूदा महामारी पर क़ाबू पाने के लिये वैक्सीन निसन्देह एक अहम औज़ार है.  
“इतिहास में इससे पहले कभी भी वैक्सीन पर शोध इतनी तेज़ी से आगे नहीं बढ़ा. हमें सुनिश्चित करना होगा कि इस वैज्ञानिक उपलब्धि का लाभ सभी देशों तक पहुँचाने के लिये ऐसी ही तात्कालिकता और नवाचार को लागू किया जाये.”
“लेकिन हमें एक लम्बा रास्ता तय करना है. दुनिया इसी एक औज़ार पर अपने सारे प्रयास दाँव पर नहीं लगा सकती और अन्य मौजूद औज़ारों का भी इस्तेमाल करना होगा, जिन्हें थाईलैण्ड जैसे देशों ने दर्शाया है कि वायरस पर क़ाबू पाने में वे असरदार हैं.”
उन्होंने कहा कि टीकाकरण से पहले, परीक्षण किया जाना, संक्रमितों और उनके सम्पर्क में आये लोगों को अलग रखा जाना, और उपचार को पुख़्ता बनाना भी महत्वपूर्ण है. 
यूएन एजेंसी प्रमुख ने कहा कि कोविड-19 महामारी ने सार्वजनिक स्वास्थ्य में अल्प निवेश के दुष्परिणामों को दर्शाया है. 
स्वास्थ्य संकट के कारण सामाजिक-आर्थिक संकट भी उभरा है जिससे अरबों लोगों के जीवन और आजीविका पर असर पड़ा है और वैश्विक स्थिरता और एकजुटता कमज़ोर हुई हैं. इस वजह से यथास्थिति पर लौटना विकल्प नहीं है. 
यूएन एजेंसी महानिदेशक के मुताबिक सार्वजनिक स्वास्थ्य ढाँचों में महज़ निवेश की आवश्यकता नहीं है, यह भी ध्यान रखना होगा कि हम स्वास्थ्य को कितना मूल्यवान मानते हैं.
उन्होंने ऐसेम्बली को सम्बोधित स्पष्ट किया कि अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य देखभाल को एक क़ीमत के रूप में नहीं बल्कि एक निवेश के रूप में देखा जाये.
यही एक उत्पादक, सहनशील और स्थिर अर्थव्यवस्था की नींव है. 
इस सिलसिले में उन्होंने सर्वजन के लिये स्वास्थ्य अर्थव्यवस्था पर एक परिषद को स्थापित किया है जिसका उद्देश्य स्वास्थ्य और टिकाऊ, समावेशी व अभिनव समाधानों पर केंद्रित आर्थिक प्रगति के बीच सम्बन्ध पर ध्यान केंद्रित करना है. 
इस परिषद के पहले वर्चुअल सत्र में अग्रणी अर्थशास्त्रियों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों को आमन्त्रित किया जायेगा जहाँ कामकाज आगे बढ़ाने के सर्वश्रेष्ठ तरीक़ों और कार्ययोजना पर चर्चा होगी. 
महानिदेशक घेबरेयेसस के मुताबिक महामारी ने दर्शाया है कि पैथोजन सम्बन्धी सामग्री और क्लीनिक के नमूनों को साझा करने के लिये एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है जिस पर वैश्विक सहमति हो., विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कहा है कि कोरोनावायरस संकट ने सार्वजनिक स्वास्थ्य में लम्बे समय से चली आ रही निवेश की कमी को उजागर किया है. यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के प्रमुख टैड्रॉस एडहेनॉम घेबरेयेसस ने विश्व स्वास्थ्य ऐसेम्बली के सत्र के समापन को सम्बोधित करते हुए आगाह किया है कि समाजों में स्वास्थ्य को दिये जाने वाले महत्व पर पुनर्विचार किये जाने की ज़रूरत है. 

कोविड-19 महामारी के कारण मई 2020 में विश्व स्वास्थ्य ऐसेम्बली के वार्षिक सत्र को सीमित कर दिया गया था जिसके बाद सोमवार को 73वें सत्र के शेष भाग की फिर शुरुआत हुई. 

संगठन के प्रमुख ने Pfizer/BioNTech वैक्सीन परीक्षणों के नतीजों को विशेष तौर पर उल्लेख किया, जिसके नतीजे उत्साहजनक रहे हैं – परीक्षणों में पाया गया है कि वैक्सीन 90 फ़ीसदी तक असरदार है. 

महानिदेशक घेबरेयेसस ने कहा कि मौजूदा महामारी पर क़ाबू पाने के लिये वैक्सीन निसन्देह एक अहम औज़ार है.  

“इतिहास में इससे पहले कभी भी वैक्सीन पर शोध इतनी तेज़ी से आगे नहीं बढ़ा. हमें सुनिश्चित करना होगा कि इस वैज्ञानिक उपलब्धि का लाभ सभी देशों तक पहुँचाने के लिये ऐसी ही तात्कालिकता और नवाचार को लागू किया जाये.”

“लेकिन हमें एक लम्बा रास्ता तय करना है. दुनिया इसी एक औज़ार पर अपने सारे प्रयास दाँव पर नहीं लगा सकती और अन्य मौजूद औज़ारों का भी इस्तेमाल करना होगा, जिन्हें थाईलैण्ड जैसे देशों ने दर्शाया है कि वायरस पर क़ाबू पाने में वे असरदार हैं.”

उन्होंने कहा कि टीकाकरण से पहले, परीक्षण किया जाना, संक्रमितों और उनके सम्पर्क में आये लोगों को अलग रखा जाना, और उपचार को पुख़्ता बनाना भी महत्वपूर्ण है. 

यूएन एजेंसी प्रमुख ने कहा कि कोविड-19 महामारी ने सार्वजनिक स्वास्थ्य में अल्प निवेश के दुष्परिणामों को दर्शाया है. 

स्वास्थ्य संकट के कारण सामाजिक-आर्थिक संकट भी उभरा है जिससे अरबों लोगों के जीवन और आजीविका पर असर पड़ा है और वैश्विक स्थिरता और एकजुटता कमज़ोर हुई हैं. इस वजह से यथास्थिति पर लौटना विकल्प नहीं है. 

यूएन एजेंसी महानिदेशक के मुताबिक सार्वजनिक स्वास्थ्य ढाँचों में महज़ निवेश की आवश्यकता नहीं है, यह भी ध्यान रखना होगा कि हम स्वास्थ्य को कितना मूल्यवान मानते हैं.

उन्होंने ऐसेम्बली को सम्बोधित स्पष्ट किया कि अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य देखभाल को एक क़ीमत के रूप में नहीं बल्कि एक निवेश के रूप में देखा जाये.

यही एक उत्पादक, सहनशील और स्थिर अर्थव्यवस्था की नींव है. 

इस सिलसिले में उन्होंने सर्वजन के लिये स्वास्थ्य अर्थव्यवस्था पर एक परिषद को स्थापित किया है जिसका उद्देश्य स्वास्थ्य और टिकाऊ, समावेशी व अभिनव समाधानों पर केंद्रित आर्थिक प्रगति के बीच सम्बन्ध पर ध्यान केंद्रित करना है. 

इस परिषद के पहले वर्चुअल सत्र में अग्रणी अर्थशास्त्रियों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों को आमन्त्रित किया जायेगा जहाँ कामकाज आगे बढ़ाने के सर्वश्रेष्ठ तरीक़ों और कार्ययोजना पर चर्चा होगी. 

महानिदेशक घेबरेयेसस के मुताबिक महामारी ने दर्शाया है कि पैथोजन सम्बन्धी सामग्री और क्लीनिक के नमूनों को साझा करने के लिये एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है जिस पर वैश्विक सहमति हो.

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