गहन प्राकृतिक आपदाओं में तेज़ी – कृषि क्षेत्र पर सर्वाधिक असर

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवँ कृषि संगठन (UNFAO) का कहना है कि प्राकृतिक आपदाओं के नए और अभूतपूर्व रूपों का, कृषि उद्योग पर भीषण असर हुआ है. यूएन कृषि एजेंसी ने गुरुवार को जारी अपनी एक नई रिपोर्ट में यह बात कही है.   
 

रिपोर्ट के अनुसार, इतिहास में कृषि-खाद्य प्रणालियों (Agri-food systems) को, पहले कभी, इस स्तर पर जंगलों में बड़े पैमाने पर आग, चरम मौसम की घटनाओं, टिड्डी दलों के असाधारण हमलों और उभरते जैविक ख़तरों का सामना नहीं करना पड़ा है, जैसाकि कोविड-19 महामारी के दौरान वर्ष 2020 में हुआ. 

RT @FAO: 🛑Drought🛑Floods🛑Storms🛑Pests & diseases🛑WildfiresAgriculture & the farmers who produce our food bear the brunt of these shocks – more than any other productive sector!Check out the new @FAO report 👉https://t.co/tsLKqaxh3b#DRR pic.twitter.com/arwnsSR7Io— FAO Climate Change (@FAOclimate) March 18, 2021

और ना ही इन प्राकृतिक आपदाओं की घटनाओं में इससे पहले, इतनी तेज़ी, तीव्रता व जटिलता दर्ज किये गए.
इन आपदाओं के कारण कृषि पर आधारित आजीविकाएँ बर्बाद हो जाती हैं, जिनका आर्थिक दुष्प्रभाव, क्रमवार ढँग से, घरों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचता है.
इनका ख़मियाज़ा अनेक पीढ़ियों द्वारा भुगते जाने की भी आशंका बढ़ जाती है.
यूएन एजेंसी के अनुसार, वर्ष 1970 और 1980 के दशक की तुलना में, आपदाओं की घटनाओं में तीन गुना बढोत्तरी हुई है.
प्राकृतिक आपदाओं का विषमतापूर्ण असर, पर्यटन, वाणिज्य, उद्योग जैसे अन्य क्षेत्रों की तुलना में, कृषि पर, सबसे ज़्यादा पड़ता है, जो लगभग 63 फ़ीसदी है.  
सबसे कम विकसित और निम्न से मध्य आय वाले देशो को सर्वाधिक आपदाओं का सामना करना पड़ा है.
वर्ष 2008 से 2018 तक, प्राकृतिक आपदाओं के कारण विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के कृषि क्षेत्र में फ़सल उत्पादन और मवेशी जीवन को क्षति पहुँचने से 108 अरब डॉलर से ज़्यादा का नुक़सान हुआ.
इसी अवधि में, एशिया सबसे बुरी तरह पीड़ित क्षेत्रो में रहा है, और उसे 49 अरब डॉलर की आर्थिक हानि झेलनी पड़ी. 
इसके बाद अफ़्रीका और लातिन अमेरिका व कैरिबियाई क्षेत्र का स्थान है, जहाँ क्रमश: 30 अरब डॉलर और 29 अरब डॉलर का नुक़सान हुआ है. 
कृषि उत्पादन में गिरावट का सबसे बड़ा और अहम कारण सूखा बताया गया है, जिसके बाद बाढ़, तूफ़ान, विनाशकारी कीट, बीमारियाँ और जंगलों में आग लगने की घटनाएँ हैं. 
खाद्य सुरक्षा पर असर
समय पर बारिश ना होने के कारण फ़सल उत्पादन और मवेशी जीवन को 34 प्रतिशत का नुक़सान हुआ है, जबकि जैविक आपदाओं की वजह से आने वाली गिरावट, 9 फ़ीसदी आँकी गई है. 
इस बीच, कोविड-19 महामारी के कारण मौजूदा समस्याओं का आकार और भी विशाल हो गया है. 
देशों की अर्थव्यवस्थाओं को होने वाली क्षति से परे, खाद्य व पोषण सुरक्षा के लिये भी इसके गम्भीर व गहरे परिणाम होते हैं.  
यह पहली बार है कि जब यूएन एजेंसी की रिपोर्ट के इस संस्करण में आर्थिक नुक़सान को कैलरी (calories) और पोषण के तुल्य रूप में भी मापा गया है.
एक अनुमान के मुताबिक, फ़सल और मवेशी उत्पादन में नुक़सान की वजह से, सबसे कम विकसित देशों और निम्न से मध्य आय वाले देशों में, वर्ष 2008 से 2018 तक, हर वर्ष 6.9 ट्रिलियन किलो कैलरी का नुक़सान हुआ.
यह आँकड़ा, 70 लाख वयस्कों की वार्षिक कैलरी खपत के बराबर है.  
रिपोर्ट बताती है कि सहनक्षमता और आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश किया जाना बेहद अहम है. 
डेटा संग्रहण और विश्लेषण की मदद से तथ्य आधारित कार्रवाई को प्रोत्साहन दिया जा सकता है, जिससे एक टिकाऊ भविष्य के लिये कृषि की अहम भूमिका को सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी. , संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवँ कृषि संगठन (UNFAO) का कहना है कि प्राकृतिक आपदाओं के नए और अभूतपूर्व रूपों का, कृषि उद्योग पर भीषण असर हुआ है. यूएन कृषि एजेंसी ने गुरुवार को जारी अपनी एक नई रिपोर्ट में यह बात कही है.   
 

रिपोर्ट के अनुसार, इतिहास में कृषि-खाद्य प्रणालियों (Agri-food systems) को, पहले कभी, इस स्तर पर जंगलों में बड़े पैमाने पर आग, चरम मौसम की घटनाओं, टिड्डी दलों के असाधारण हमलों और उभरते जैविक ख़तरों का सामना नहीं करना पड़ा है, जैसाकि कोविड-19 महामारी के दौरान वर्ष 2020 में हुआ. 

और ना ही इन प्राकृतिक आपदाओं की घटनाओं में इससे पहले, इतनी तेज़ी, तीव्रता व जटिलता दर्ज किये गए.

इन आपदाओं के कारण कृषि पर आधारित आजीविकाएँ बर्बाद हो जाती हैं, जिनका आर्थिक दुष्प्रभाव, क्रमवार ढँग से, घरों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचता है.

इनका ख़मियाज़ा अनेक पीढ़ियों द्वारा भुगते जाने की भी आशंका बढ़ जाती है.

यूएन एजेंसी के अनुसार, वर्ष 1970 और 1980 के दशक की तुलना में, आपदाओं की घटनाओं में तीन गुना बढोत्तरी हुई है.

प्राकृतिक आपदाओं का विषमतापूर्ण असर, पर्यटन, वाणिज्य, उद्योग जैसे अन्य क्षेत्रों की तुलना में, कृषि पर, सबसे ज़्यादा पड़ता है, जो लगभग 63 फ़ीसदी है.  

सबसे कम विकसित और निम्न से मध्य आय वाले देशो को सर्वाधिक आपदाओं का सामना करना पड़ा है.

वर्ष 2008 से 2018 तक, प्राकृतिक आपदाओं के कारण विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के कृषि क्षेत्र में फ़सल उत्पादन और मवेशी जीवन को क्षति पहुँचने से 108 अरब डॉलर से ज़्यादा का नुक़सान हुआ.

इसी अवधि में, एशिया सबसे बुरी तरह पीड़ित क्षेत्रो में रहा है, और उसे 49 अरब डॉलर की आर्थिक हानि झेलनी पड़ी. 

इसके बाद अफ़्रीका और लातिन अमेरिका व कैरिबियाई क्षेत्र का स्थान है, जहाँ क्रमश: 30 अरब डॉलर और 29 अरब डॉलर का नुक़सान हुआ है. 

कृषि उत्पादन में गिरावट का सबसे बड़ा और अहम कारण सूखा बताया गया है, जिसके बाद बाढ़, तूफ़ान, विनाशकारी कीट, बीमारियाँ और जंगलों में आग लगने की घटनाएँ हैं. 

खाद्य सुरक्षा पर असर

समय पर बारिश ना होने के कारण फ़सल उत्पादन और मवेशी जीवन को 34 प्रतिशत का नुक़सान हुआ है, जबकि जैविक आपदाओं की वजह से आने वाली गिरावट, 9 फ़ीसदी आँकी गई है. 

इस बीच, कोविड-19 महामारी के कारण मौजूदा समस्याओं का आकार और भी विशाल हो गया है. 

देशों की अर्थव्यवस्थाओं को होने वाली क्षति से परे, खाद्य व पोषण सुरक्षा के लिये भी इसके गम्भीर व गहरे परिणाम होते हैं.  

यह पहली बार है कि जब यूएन एजेंसी की रिपोर्ट के इस संस्करण में आर्थिक नुक़सान को कैलरी (calories) और पोषण के तुल्य रूप में भी मापा गया है.

एक अनुमान के मुताबिक, फ़सल और मवेशी उत्पादन में नुक़सान की वजह से, सबसे कम विकसित देशों और निम्न से मध्य आय वाले देशों में, वर्ष 2008 से 2018 तक, हर वर्ष 6.9 ट्रिलियन किलो कैलरी का नुक़सान हुआ.

यह आँकड़ा, 70 लाख वयस्कों की वार्षिक कैलरी खपत के बराबर है.  

रिपोर्ट बताती है कि सहनक्षमता और आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश किया जाना बेहद अहम है. 

डेटा संग्रहण और विश्लेषण की मदद से तथ्य आधारित कार्रवाई को प्रोत्साहन दिया जा सकता है, जिससे एक टिकाऊ भविष्य के लिये कृषि की अहम भूमिका को सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी. 

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