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गुलाम हैदर ने पहचाना था लता की प्रतिभा को

गुलाम हैदर ने पहचाना था लता की प्रतिभा को
November 08
07:38 2018

(पुण्यतिथि नौ नवंबर के अवसर पर)

मुंबई 08 नवंबर : लता मंगेशकर के सिने करियर के शुरूआती दौर में कई निर्माता-निर्देशक और संगीतकारों ने पतली आवाज के कारण उन्हें गाने का अवसर नहीं दिया लेकिन उस समय एक संगीतकार ऐसे भी थे जिन्हें लता मंगेशकर की प्रतिभा पर पूरा भरोसा था और उन्होंने उसी समय भविष्यवाणी कर दी थी ..यह लड़की आगे चलकर इतना अधिक नाम करेगी कि बड़े से बड़े निर्माता, निर्देशक और संगीतकार उसे अपनी फिल्म में गाने का मौका देंगे। यह संगीतकार थे..गुलाम हैदर।

वर्ष 1908 में जन्मे गुलाम हैदर ने स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद दंत चिकित्सा की पढ़ाई शुरू की थी। इस दौरान अचानक उनका रुझान संगीत की ओर हुआ और उन्होंने बाबू गणेश लाल से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी। दंत चिकित्सा की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह दंत चिकित्सक के रूप में काम करने लगे। पांच वर्ष तक दंत चिकित्सक के रूप में काम करने के बाद गुलाम हैदर का मन इस काम से उचट गया। उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि संगीत के क्षेत्र में उनका भविष्य अधिक सुरक्षित होगा। इसके बाद वह कलकत्ता की एलेक्जेंडर थियेटर कंपनी में हारमोनियम वादक के रूप में काम करने लगे।

वर्ष 1932 में गुलाम हैदर की मुलाकात निर्माता-निर्देशक ए आर कारदार से हुयी जो उनकी संगीत प्रतिभा से काफी प्रभावित हुये। कारदार उन दिनों अपनी नयी फिल्म “स्वर्ग की सीढ़ी” के लिये संगीतकार की तलाश कर रहे थे। उन्होंने हैदर से अपनी फिल्म में संगीत देने की पेशकश की लेकिन अच्छा संगीत देने के बावजूद फिल्म बॉक्स आफिस पर असफल रही। इस बीच गुलाम हैदर को डी एम पंचोली की वर्ष 1939 में प्रदर्शित पंजाबी फिल्म “गुल-ए-बकावली” में संगीत देने का मौका मिला। फिल्म में नूरजहां की आवाज में गुलाम हैदर का संगीतबद्ध गीत “पिंजरे दे विच कैद जवानी” उन दिनों सबकी जुबान पर था। वर्ष 1941 गुलाम हैदर के सिने कैरियर का अहम वर्ष साबित हुआ। फिल्म “खजांची” में उनके संगीतबद्ध गीतों ने भारतीय फिल्म संगीत की दुनिया में एक नये युग की शुरुआत कर दी।

वर्ष 1930 से 1940 के बीच संगीत निर्देशक शास्त्रीय राग-रागिनियों पर आधारित संगीत दिया करते थे लेकिन गुलाम हैदर इस विचारधारा के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने शास्त्रीय संगीत में पंजाबी धुनों का मिश्रण करके एक अलग तरह का संगीत देने का प्रयास दिया और उनका यह प्रयास काफी सफल भी रहा। वर्ष 1946 में प्रदर्शित फिल्म “शमां” में अपने संगीतबद्ध गीत “गोरी चली पिया के देश” हम गरीबों को भी पूरा कभी आराम कर दे, और “एक तेरा सहारा” में उन्होंने तबले का बेहतर इस्तेमाल किया जो श्रोताओ को काफी पसंद आया। इस बीच, उन्होंने बांबे टॉकीज के बैनर तले बनी फिल्म “मजबूर” के लिये भी संगीत दिया।

एजेंसी 

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