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चंद्रयान के सफर में बंगाल के चंद्रकांत की बड़ी भूमिका, आज भी झोपड़ी में रहते हैं मां-बाप

चंद्रयान के सफर में बंगाल के चंद्रकांत की बड़ी भूमिका, आज भी झोपड़ी में रहते हैं मां-बाप
July 23
18:07 2019
ओम प्रकाश
कोलकाता, 22 जुलाई (हि. स.)। पूरी दुनिया में अपनी वैज्ञानिक क्षमता का डंका पीटते हुए सोमवार को इसरो ने चंद्रयान-2 को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है। इस चंद्रयान के प्रक्षेपण की तैयारी तक जिन वैज्ञानिकों की टीम जुटी थी उसमें पश्चिम बंगाल के हुगली जिला अंतर्गत गुड़ाप के निवासी चंद्रकांत कुमार की भी बड़ी भूमिका है। उनके पिता मधुसूदन कुमार और मां असीमा देवी ने जब बेटे का नाम चंद्रकांत रखा था तब शायद नहीं सोचा होगा कि आगे चलकर यही चंद्रकांत चांद पर भारत का कदम जमाने में बड़ी भूमिका निभाएंगे। चंद्रकांत के माता-पिता किसान हैं। आज भी झोपड़ी में ही रहते हैं दरअसल चंद्रकांत ने एक एंटीना बनाया है जिसके जरिए चंद्रयान-2 का पूरा संचार नियंत्रित हो रहा है। इसके अलावा भारत के मंगल मिशन के लिए संचार में भी उनका एंटीना इस्तेमाल किया जा रहा है। इसरो से मिली जानकारी के मुताबिक चंद्रकांत द्वारा बनाए गए एंटीना के जरिए ही धरती के कक्ष के बाहर चंद्रयान-2 तस्वीरें और अन्य संदेशों को भेजेगा।
गुड़ाप थाना अंतर्गत शिवपुर गांव में चंद्रकांत का पैतृक आवास है। आठवीं तक उन्होंने मजीना नव विद्यालय में पढ़ाई की। 1992 में खजूरदह उच्च विद्यालय से माध्यमिक पास की तथा धनियाखाली महामाया विद्या मंदिर से उच्च माध्यमिक की परीक्षा पास कर बेलूर रामकृष्ण मिशन से उन्होंने भौतिक विज्ञान में बीएससी ऑनर्स की डिग्री ली। रेडियो फिजिक्स एंड इलेक्ट्रॉनिक्स लेकर एमएससी और एमटेक की पढ़ाई राजा बाजार साइंस कॉलेज से उन्होंने पूरी की। कलकत्ता विश्वविद्यालय से पीएचडी की और उसके बाद 2001 से इसरो में नौकरी करने लगे। भारत के चंद्रयान-2 मिशन में उन्हें डिप्टी प्रोजेक्ट डायरेक्टर (टेक्निकल) बनाया गया है। उनके भाई शशिकांत कुमार भी बेंगलुरु में इसरो के लिए काम करते हैं।
 
माता-पिता की खुशी का ठिकाना नहीं
बेटे की सफलता ने किसान माता-पिता की खुशियों में चार चांद लगा दिया है। गरीबी से जूझते हुए खुद कम खाकर बेटों की पढ़ाई और भोजन की व्यवस्था माता-पिता करते थे। आज वही बेटा अंतरिक्ष में भारत का परचम लहराने वाला बन गया है। आज भी चंद्रकांत का पैतृक आवास पुआल की मड़ई से बना हुआ है। घर के पास कटहल का पेड़ है और आसपास कई फूलों के पेड़ भी लगे हैं। जब हम उनके घर पहुंचे तो उनकी मां कटहल का बीज सुखा रही थीं। 66 वर्षीय पिता गाय धो रहे थे। “हिन्दुस्थान समाचार” की टीम ने उनसे बेटे के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि मैंने बिना सोचे बेटे के नाम के साथ चंद्र जोड़ा था लेकिन आज वही नाम सार्थक हो गया है। उन्होंने बताया कि गहना बंधक रखकर, सूद‌ पर रुपये लेकर बेटे की पढ़ाई पूरी करवाई। मां असीमा ने कहा कि चंद्रकांत जब पढ़ रहे थे तो उनकी सारी जरूरतें हमलोग पूरी नहीं कर पाते थे लेकिन कोशिश में कोई कमी नहीं रखते थे। आज बेटे के कारण देश का नाम पूरी दुनिया में हो रहा है। इससे बड़ी खुशी की बात कुछ नहीं होगी।

 

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