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जनजातीय समुदाय भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के अभिन्न अंग हैं : द्रौपदी मुर्मू

जनजातीय समुदाय भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के अभिन्न अंग हैं : द्रौपदी मुर्मू
January 17
09:26 2020

Insightonlinenews Team

  • ‘‘आदिवासी दर्शन’’ सेमिनार का उद्घाटन हुआ

रांची: झारखण्ड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अंतरराष्ट्रीय जनजातीय दर्शन सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में उपस्थित हैं। रांची के ऑड्रे हाउस में आयोजित इस कॉन्फ्रेंस में 12 एकेडमिक सत्र होने हैं। हर सत्र में ट्राइबल कल्चर के अलग-अलग आयामों पर विभिन्न विद्वान अपना प्रेजेंटेशन देंगे। आदिवासी समुदाय के रहन-सहन, खान-पान, दिनचर्या और कला-संस्कृति समेत अन्य विधाओं पर चर्चा होगी।

इस अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस का आयोजन डॉ राम दयाल मुण्डा ट्राइबल वेलफेयर रिसर्च इंस्टीट्यूट और अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग, झारखण्ड सरकार के द्वारा किया गया है।

डाॅ० रामदयाल मुण्डा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, रांची द्वारा आयोजित इस सेमिनार ‘‘आदिवासी दर्शन’’ के उद्घाटन समारोह में आप सभी के मध्य सम्मिलित होकर अपार प्रसन्नता हो रही है। इस सेमिनार में, मैं देश-विदेश से आये सभी दार्षनिकों, प्राध्यापकों समेत अन्य विद्वानों का स्वागत करती हूँ। इस अवसर पर मैं अन्य राष्ट्रों से आने वाले अतिथियों का धरती आबा बिरसा मुण्डा की पावन भूमि पर हार्दिक अभिनंदन करती हूँ। आषा है कि प्राकृतिक सौन्दर्य एवं खनिज सम्पदा से परिपूर्ण यह पावन धरती आपको आकर्षित करेगी।

आप सभी जानते हैं कि हमारे देष की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा जनजातियों का है। अति प्राचीन काल से ही जनजातीय समुदाय भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के अभिन्न अंग रहे हैं। इस समुदाय का इतिहास काफी समृद्ध रहा है। विष्व स्तर पर इसकी अमिट पहचान रही है।
जनजातियों की कला, संस्कृति, लोक साहित्य, परंपरा एवं रीति-रिवाज़ समृद्ध रही है। जनजातीय गीत एवं नृत्य बहुत मनमोहक है। ये प्रकृति प्रेमी हैं। इसकी झलक इनके पर्व-त्यौहारों में भी दिखती है। इस राज्य में ही विभिन्न अवसरों पर देखते हैं कि जनजातियों के गायन और नृत्य उनके समुदाय तक ही सीमित नहीं हैं, सभी के अंदर उस पर झूमने के लिए इच्छा जगा देती है।

झारखंड राज्य में 3.25 करोड़ से अधिक की आबादी में जनजातियों की संख्या आबादी का लगभग 27 प्रतिषत है। राज्य में 32 प्रकार की अनुसूचित जनजातियाँ हैं, जिनमें पीवीटीजी भी सम्मिलित हैं। जनसंख्या का अधिकांष हिस्सा ग्रामों में निवास करते हैं।

प्रसन्नता का विशय है कि आज से प्रारंभ इस तीन दिवसीय सेमिनार का विषय ‘‘आदिवासी दर्शन’ है। आदिवासी समुदायों के धर्म-दर्शन, रीति-रिवाज़ों पर बड़े पैमाने पर गंभीर चर्चाएं करना सराहनीय है। किस प्रकार वे प्रकृति के संरक्षक हैं और प्रकृति की पूजा करते हैं। हर समय खुष रहते हैं और खुष रहने की सीख देते हैं। दर्शनशास्त्र की ज्ञान-शाखा में ‘‘आदिवासी-दर्शन’’ पर वृहत् चर्चा की जा सकती है।

चूंकि इस ज्ञान-शाखा को यह विषय नया-सा लगता रहा है इसलिए भी जरूरी है कि देश-दुनिया के विद्वान इस पर गम्भीरतापूर्वक चर्चा करें, इस विषय पर निरन्तर लिखें, इस विषय से जुड़ी पुस्तकें प्रकाशित हों ताकि ‘आदिवासी दर्शन’ भी दर्शनशास्त्र की विद्वतमंडली के ध्यान में आए और उस ज्ञान-शाखा में वैदिक और गैर-वैदिक बौद्ध-जैन दर्शन की तरह अपनी जगह बना सके।

अनुसूचित जनजातियों के पास विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार की विधा होती है। वे विभिन्न प्रकार की व्याधियों के उपचार की औषधीय दवा के सन्दर्भ में जानते हैं। हम सब जानते हैं कि आदिवासी लोग विभिन्न प्रकार के बीमारियों में, जंगलों से विभिन्न प्रकार के औषधि लाकर उपचार करते थे। लेकिन ये लिपिबद्ध नहीं हो सका जिस कारण आज का समाज ये लाभ न के बराबर उठा रहा है। अतः इस पर ष्शोध कर इसे लिपिबद्ध करने की आवष्यकता है।

अभी तक जनजातीय समुदायों के अध्ययन के विषय उनकी बाहरी गतिविधियों, बाह्य जगत से उनके सम्बन्धों, अपने समाज में उनके व्यवहारों तक ही सीमित रहे हैं। विशेष तौर पर मानवशास्त्री आदिवासी समाज के धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा पद्धतियों, जन्म से मृत्यु तक के संस्कारों, सामाजिक संगठनों, पर्व-त्यौहारों, किस्से-कहानियों-गीतों, तथा नृत्य की शैलियों पर ही अध्ययन करते आ रहे हैं।

एक रूढ़ि-सी बन गई है कि आदिवासियों की कला, धार्मिक अनुष्ठान, आर्थिक गतिविधियां, सामाजिक सम्बन्धों और प्रकृति को पूजने के तरीकों तक ही शोध, अध्ययन, लेखन और चर्चा को सीमित रखा जाए।

आदिवासी समुदायों की प्रकृति और परमात्मा के बीच के सम्बन्धों के देखने का जो नजरिया है, जो अलग-अलग मौलिक चिन्तन हैं, उन पर अभी तक गंभीरतापूर्वक विचार, चर्चा, शोध, लेखन अपेक्षित नहीं हुआ है। ऐसे में, आदिवासी-दर्शन को एक ज्ञान-शाखा के रूप में प्रबलता से स्थापित करने की दिषा में ध्यान देना होगा।

चूंकि उसके जीवन के मूल आधारों, हवा, जल, फल-फूल, भोजन की पूत्र्ति प्रकृति करती रही है। ऐसे में वह उसके प्रति स्नेह करता है और उसका शुक्रगुज़़ार-आभारी भी होता रहा है।
हमारे संताल समाज ने उन्हें ठाकुर जीयू, मरांग बुरू, जाहेर ऐरा आदि कहा तो मुण्डा समाज ने सिंङबोंगा, हातुबोंगको, इकिरबोंगा, उराँव समाज ने धरमे, चाला पच्चो, पहाड़िया समुदाय ने बड़े गोसाईं, विल्प गोसाईं आदि सम्बोधन दिए हैं।

इस प्रकार देश-विदेश के सारे जनजातीय समुदायों ने अपने-अपने तरीकों से प्रकृति के उद्भव, सूर्य-चन्द्र एवं अन्य ग्रहों की स्थिति और परम-आत्मा को जानने की कोशिशें की है। उन्हें वह अपने धार्मिक अनुष्ठानों, गीतों, कहानियों, मिथकों एवं अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों से प्रकट करता रहा है। चूँकि यह समाज मौखिक-परम्परा व्तंस ज्तंकपजपवद पर आधारित रहा है, दस्तावेजीकरण की यहां परम्परा ही नहीं रही है। अतएव आत्मा-प्रकृति और परम-आत्मा से जुड़े उसके चिन्तन, विवेचनाएं, अवधारणाओं के लिखित आधार अब तक नहीं रहे हैं, जिसकी अब बेह़द ज़रूरत है।
ज़रूरत है कि सारे आदिवासी-समाजों के हज़ारों सालों की चेतना, अनुभव, ज्ञान और आत्मा-प्रकृति-परमात्मा के सम्बन्धों की व्याख्याओं का अभिलेखीकरण प्रारम्भ हो। अब 21वीं सदी में ‘आदिवासी दर्शन’ को अहमियत देना होगा।

मुझे विष्वास है कि तीन दिनों के इस सेमिनार में देश-विदेश से एकत्रित विद्वत-जन विभिन्न जनजातीय समुदायों की सृष्टि कथाओं, परम-आत्मा एवं अन्य रक्षक आत्माओं की अवधारणाओं, धार्मिक अनुष्ठानों, मिथकों, लोक-कथाओं, लोकगीतों, धार्मिक उत्सव-त्यौहारों के आधार पर ‘आदिवासी दर्शन’ को ठोस आधार प्रदान करने में सफल होंगे। चूँकि तुलनात्मक रूप से यह एक नया विषय है। अतः मेहनत थोड़ी ज़्यादा करनी होगी और ऐसी चर्चा-परिचर्चा-शोध-अध्ययन-लेखन के आयोजन नियमित अन्तराल पर बार-बार करने होंगे।

आषा है कि डाॅ० रामदयाल मुण्डा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान ऐसे आयोजनों को बख़ूबी अंजाम देता रहेगा और इन्हीं माध्यमों से ‘आदिवासी दर्शन’ दर्शनशास्त्र की भारतीय शाखा में अपनी महत्वपूर्ण जगह बनाने में सफल होगा।

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