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जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति दिलाते हैं गुरु

जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति दिलाते हैं गुरु
July 11
08:38 2019
(गुरु पूर्णिमा, 16 जुलाई पर विशेष) 
चन्द्र प्रकाश
हिन्दू धर्म शास्त्रों में गुरु की महिमा का बखान किया गया है। उसे ईश्वर के बहुत करीब बताया गया है। यहां तक कहा गया है कि सच्चा गुरु शिष्य को भवसागर के पार लगाने की क्षमता रखता है। इसीलिए गुरु का दर्जा संसार में सबसे ऊंचा दिया गया है। एक कथा बताती है कि एक शिष्य गुरु के साथ भगवान को खड़ा देख दुविधा में पड़ जाता है कि पहले किसे प्रणाम करें।
अंतर्यामी प्रभु शिष्य की शंका का समाधान करते हुए गुरु को पहले दण्डवत करने का इशारा करते हैं। कहने का आशय यह है कि भगवान से भी पहले गुरु की ही पूजा का विधान है। इसीलिए कहा गया है कि -‘गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिंद; गुरु मेरा पारब्रह्म, गुरु भगवंत।’
भारतीय परम्परा के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा मनाया जाता है। शास्त्रों में वर्णित है कि इसी दिन महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था। वे पराशर मुनि की संतान थे। उनका एक नाम कृष्ण द्वैपायन भी था। वेदों की रचना करने के कारण उनका नाम वेद व्यास पड़ा। उन्होंने ही महाभारत की रचना की थी। कहा जाता है कि वेद व्यास जी से पहले शास्त्रों की रचना नहीं हुई थी। वे ही शास्त्रों के प्रथम रचनाकार हैं। उनके पूर्व शास्त्र गुरु-शिष्य परम्परा के तहत श्रुति पर आधारित थे। महर्षि वेद व्यास को आदि गुरु भी कहा जाता है। उनके सम्मान में गुरु पूजा को व्यास पूजा के रूप में मनाया जाता है।
अब सवाल उठता है कि गुरु किसे कहा जाता है। सभी जानते हैं कि गुरु का मतलब शिक्षक होता है, जो शिक्षा या ज्ञान प्रदान करता है। बाल्यकाल से ही बच्चों को पठन-पाठन के लिए विद्यालय भेजा जाता है, क्योंकि वहां के शिक्षक उन्हें शिक्षा देते हैं। पहले के जमाने में जब स्कूल नहीं थे तब गुरु का घर ही विद्यालय होता था। तभी तो रामचरित मानस में आया है कि ‘गुरु गृह पढ़न गए रघुराई, अल्पकाल विद्या सब पाई’। आज के जमाने में भी किसी विषय का ज्ञान प्राप्त करने के लिए स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय में दाखिला लेना पड़ता है, क्योंकि वहां विषय के विशेषज्ञ मौजूद होते हैं जो विद्यार्थियों को शिक्षा देते हैं।
गुरु पूजा या व्यास पूजा आस्था का पर्व है। इस उत्सव के केंद्र में गुरु होते हैं। इस दिन खासतौर पर गुरु की आराधना का विशेष विधान है। गुरु की महिमा का बखान करते हुए कबीर कहते हैं कि ‘तीन लोक नौ खंड में गुरु से बड़ा न कोय, कर्ता करे न करि सके, गुरु करे सो होय।’ मानस में भी आता है कि ‘गुरु बिन भवनिधि तरै न कोई, जो बिरंचि संकर सम होई।’ अब सोचिए कि गुरु आखिर ऐसा क्या करता है जिसके चलते उसकी पदवी सबसे ऊंची है। गुरु शब्द की शाब्दिक व्याख्या करें तो गु माने होता है अंधकार और रु माने होता है प्रकाश। अर्थात जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए उसे गुरु कहते हैं।
धर्म शास्त्रों में संसार को ही भवसागर की संज्ञा दी गई है। इस संसार के प्राणी मोह रूपी रात्रि, निशा या अंधकार में सो रहे हैं। गोस्वामी तुलसी दास जी कहते हैं कि ‘मोह निशा सब सोवनहारा, देखिय स्वप्न अनेक प्रकारा।’ धर्म के मार्ग में मोह को ही अज्ञान या अंधकार बताया गया है। गीता का उपदेश भी इसी मोहपाश से छूटने का विधि-विधान है। महाभारत युद्ध के दौरान जब अर्जुन बंधु-बांधवों को देखते हैं तो धनुष रखकर रथ के पीछे बैठ जाते हैं। परिजनों और रिश्तेदारों को देखते ही उनका मोह उमड़ पड़ता है। नतीजतन धनंजय व्याकुल हो जाते हैं। तब योग-योगेश्वर श्रीकृष्ण गुरु के रुप में उनका मार्गदर्शन करते हैं।
सत्य-असत्य, विद्या-अविद्या और ज्ञान-अज्ञान की सैद्धांतिक व्याख्या करते हैं। इस पर भी जब पार्थ का मोहभंग नहीं होता है तब अपना विराट स्वरूप दिखाकर सत्य का बोध कराते हैं। उपदेश पूरा होने पर अंत में श्रीकृष्ण के पूछने पर अर्जुन कहते हैं कि ‘नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा’ यानी मेरा मोह नष्ट हो गया है और मैं स्मृति अर्थात ज्ञान को प्राप्त हो गया हूं।
मानस में गोस्वामी जी कहते हैं कि ‘बंदऊं गुरु पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरी, महा मोह तम पुंज जासु वचन रविकर निकर’। यानी उस गुरु के चरणों की वंदना करता हूं जो कृपा का सागर है और मनुष्य के रूप में साक्षात भगवान है।
यहां गोस्वामी जी गुरु की करनी का बखान करते हुए कहते हैं कि उसके वचन सूर्य की करनी करते हैं। यहां सवाल उठता है कि सूर्य वास्तव में क्या करते हैं। विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि सूर्य की किरणें जब धरती पर पड़ती हैं तो पेड़-पौधों और वनस्पतियों में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया होती है। नतीजतन प्राणियों को प्राण वायु या ऑक्सीजन की प्राप्ति होती है। ठीक इसी प्रकार गुरु भी शिष्य के भीतर के अंधकार को हटाकर उजाला भर देते हैं।
इसीलिए कबीर कहते हैं कि ‘गुरु बिन ज्ञान न उपजे, गुरु बिन मिले न मोक्ष; गुरु बिन लखे न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष।’ यहां तक कहा गया है कि ‘यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान; शीश दिये सदगुरु मिले, तो भी सस्ता जान। ‘ वास्तव में देखा जाए तो गुरु की महिमा का बखान करना असंभव है। कबीर तो कहते हैं कि पूरी धरती को कागज बना दूं, जंगलों के सारे पेड़ों को लेखनी बना दूं, सात समुद्र की स्याही बना दूं तो भी गुरु के गुण का वर्णन करना संभव नहीं है। कहा गया है कि ‘सदगुरु की महिमा अनंत, अनंत कियो उपकार; लोचन अनंत उघारिया, अनंत लखावनहार’। यहां भी गुरु की महिमा को अनंत करार दिया गया है।
कुल मिलाकर कहा जाय तो माता-पिता से हमें शरीर मिलता है, लेकिन गुरु महाराज जीव को ज्ञान देकर जन्म-मरण के बंधन से ही छुटकारा दिला देते हैं। भगवान ने भी सभी जीवों को अपनी माया में भटका दिया है। ऐसे में विकट परिस्थिति में उलझे जीव के लिए गुरु ही समाधान लेकर आता है।
अर्जुन के समान मोह-शोक में व्यथित-व्याकुल मानव को रास्ता दिखाने के लिए जब श्रीकृष्ण के समान कोई तत्वदर्शी महान पुरुष मिल जाता है तभी बात बनती है। गुरु के रूप में वह महान पुरुष अपनी ज्ञान श्लाका से शिष्य के नेत्र पर पड़े अज्ञान के पर्दे को हटा देता है। परिणाम स्वरूप वह शिष्य सत्य का साक्षात्कार कर कृत्य-कृत्य, धन्य-धन्य हो जाता है। ऐसे सदगुरु की बार-बार वंदना करते हुए हम उसके चरणों में अपने शीश को नवाते हैं।

(हि..)

 

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