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जैन धर्म के प्रवर्तक थे भगवान महावीर

जैन धर्म के प्रवर्तक थे भगवान महावीर
October 01
08:39 2018

बुद्ध और ईसा से भी पहले अवतरित हुए महावीर

ईनसाइट आॅनलाईन न्यूज

जैन शब्द ‘जिन’ से बना है, जिसका अर्थ है-विजेता। जिन्होंने समस्त इन्द्रियों और अज्ञान पर विजय प्राप्त करके सम्यक ज्ञान प्राप्त कर लिया है, उन्हें ‘जिन’ कहते हैं। इस मत या धर्म के पालन करने वालों को जैन कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि यज्ञों की हिंसा आदि देखकर जिस विरोध का सूत्रपात हुआ, उसी ने कालांतर में जैन धर्म का रूप प्राप्त किया। अन्वेषणों से यह भी सिद्ध हुआ है कि यह बौद्ध धर्म से प्राचीन है। उदयगिरि, जूनागढ़ आदि के शिलालेखों से भी इसकी प्राचीनता सिद्ध होती है।

जैनियों के उपास्यदेव तीर्थंकर कहलाते हैं। इन्हें सभी दोषों से रहित, मुक्त और मुक्तिदाता माना जाता है। तीर्थ का अर्थ है भौसागर को पार करानेवाला और जिन्होंने भवसागर पार कर लिए हैं, उन्हें तीर्थंकर कहते हैं। तीर्थ करोति इति तीर्थंकरः। भगवान महावीर जैनधर्म के अंतिम तीर्थंकर थे।

भगवान महावीर का अवतरण

भगवान महावीर का जन्म वैशाली गणतंत्र (बिहार) के नाथवंशीय क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ के छोटे पुत्र के रूप में ईसा से 599 वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल त्रयोदशी दिन सोमवार को 543 वर्ष विक्रम पूर्व हुआ था। इनकी माता का नाम त्रिशला देवी था। वह लिच्छवी शासक चेतक की बहन थी।

महावीर का जन्म ग्राम कुंडलपुर माना जाता है जो बिहार प्रांत के वर्तमान नालंदा जिला में अवस्थित है। जैन धर्मावलम्बियों के लिए यह तीर्थ स्थल है। महावीर के जन्मदिवस पर आज भी प्रतिवर्ष यहां कुंडलपुर महोत्सव मनाया जाता है। कहते हैं कि भगवान महावीर के जन्म के साथ ही घर में ऐश्वर्य की खूब वृद्धि होने लगी, इसलिए उनका पहला नाम वर्धमान रख दिया गया।

बचपन से ही इनमें रूप-सौंदर्य, बुद्धि-विचार के साथ-साथ कूट-कूट कर साहस भरा हुआ था। इन्हीं गुणों के कारण लोग उन्हें वीर, अतिवीर और महावीर कहने लगे। ज्ञातृवंश का होने के कारण वे ज्ञातपुत्र भी कहलाए। आत्मज्ञानी हो जाने पर उन्हें सन्मति भी कहा जाने लगा। इस तरह उनके अनेक नाम हो गए। राजकुमार वर्धमान ने युवावस्था में क्षत्रियोचित सभी कला-कौशल सीखकर माता-पिता के आग्रह पर यशोदा नामक कन्या से विवाह किया। यशोदा भी राजपुत्री थी। वर्द्धमान को यशोदा से एक पुत्री हुई, जिसका नाम प्रियदर्शना रखा गया। प्रियदर्शना का विवाह राजकुमार जमालि से हुआ।

इतना अनुकूल सुखोपभोग के बावजूद उन्हें गृहस्थ जीवन एक बंधन, मायाजाल लगता। इससे मुक्ति के लिए उनकी आत्मा छटपटाती रहती। जैनमुनि आचार्य महाप्रज्ञ के अनुसार महावीर के माता-पिता भगवान पार्श्व की श्रमण परम्परा के अनुयायी थे।

जैन धर्म के प्रवर्तक थे भगवान महावीर

Photo : IANS

माता-पिता के निधन के बाद महावीर ने तत्काल श्रमण बनना चाहा। किन्तु उनके बड़े भाई नन्दीवर्धन ने रोक दिया। वे दो वर्ष घर में रह गए। फिर तीस वर्ष की अवस्था में अमरत्व की साधना के लिए घर से निकल गए। उन्होंने बारह वर्ष तक शांत, मौन और दीर्घ तपस्वी जीवन बिताया। दीक्षा ग्रहण कर वे वनवासी हो गए और गिरि-कंदराओं में रहते हुए आत्म साधन में रम गए।

तपस्या के क्रम में उन्हें घोर कष्ट सहना पड़ा। सांप-बिच्छू और अन्य जंगली जानवरों ने उन्हें बहुत कष्ट दिए। आंधी, पानी और लू के कारण भी उन्हें प्रकृति की प्रतिकूलता सहनी पड़ी। परन्तु तपस्या से डिगे नहीं। अविचल रहे। बयालीस वर्ष की अवस्था में उन्हें पूर्ण वीतरागता की प्राप्ति हुई। जुम्भिक ग्राम के पास ऋजुपालिका नदी के तट पर शाल वृक्ष के नीचे ध्यान अवस्था में उन्होंने कैवल्य प्राप्त किया।

साधक महावीर अब केवली बन गए। वे मोह-राग-द्वेष रूपी शत्रुओं को जीत कर सच्चे महावीर बन गए। सर्वज्ञ हो जाने से वे भगवान भी कहलाए। वीतराग हुए इसलिए ‘जिन’ या ’विजेता‘ कहलाए। साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका-इस तीर्थ चतुष्टय की स्थापना की इसलिए तीर्थंकर कहलाये।

भगवान महावीर की वाणी में आया है कि ‘जो मैं कहता हूॅँ उसे तर्क की कसौटी पर कसकर और अनुभूति से आत्मसात करके ही स्वीकार करो अन्यथा यह तुम्हारा नहीं बन पाएगा। आगम प्रमाण रूप चाबुक की मार से, तर्कों के प्रबल प्रहार से और मेरे अद्भुत व्यक्तित्व के प्रभाव से, जो मैंने कहा उसे यदि ऊपर से तुमने स्वीकार भी कर लिया तो कोई लाभ नहीं, यह तो एक नए अंधकार को ही जन्म देगा।’

अन्य संतों की भांति उन्होंने भी जीवों के जीवन-मरण, सुख-दुख को स्वंयकृत कर्मों का फल माना। उन्होंने कहा कि ‘एक को दूसरे के दुःख-सुःख और जीवन-मरण का कर्ता मानना अज्ञानता है। प्रत्येक प्राणी अपनी भूल से स्वयं दुखी है और अपने भूल को सुधार कर वह सुखी हो सकता है।’ भगवान महावीर के उपदेशों का केन्द्र विन्दु आत्मा और आत्मा की स्वतंत्रता अर्थात् मोक्ष मार्ग है।

अणुव्रत का उपदेश देते हुए उन्होंने मानव-व्यक्तित्व के चरम विकास के लिए कहा कि ‘ईश्वर तुम्ही हो, अपने आपको पहचानो और ईश्वरीय गुणों का विकास कर ईश्वर को पाओ। यदि सही दिशा में पुरूषार्थ करे तो प्रत्येक आत्मा परमात्मा बन सकती है।’

उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘आत्मा ही ब्रह्म है। आत्मा में हीं चर्या करना ब्रह्मचर्य है, जो साधक परदेह से विमुक्त होकर चर्या करता है, वही सच्चा ब्रह्मचारी है।’ ‘जो साधक आत्मा का ध्यान करता है, उसे परम समाधि प्राप्त होती है। ”ध्यान में लीन साधु सब दोषों का परित्याग करता है, इसलिए ध्यान ही सब दोषों का प्रतिक्रमण है-उपचार है।’

‘यदि दृष्टि तम को हरने वाली है तो फिर मनुष्य को दीपक से क्या प्रयोजन? आत्मा स्वयं सुखमय है, फिर विषय उसे क्या सुख देंगे।’
भगवान महावीर ने मुक्ति, मोक्ष निर्वाण की अंतिम चरम साधना आंतरिक नाद या शब्दयोग की भी साधना की। ऊपर में स्पष्ट किया गया है कि साधक को अपने अन्दर प्रकाश की उपलब्धि हो जाने पर साधक अपने भीतर विभिन्न प्रकार की मधुर ध्वनियां (शब्द) सुनता है। संतों ने इन्हें अनहद शब्द की संज्ञा दी है।

शब्द योग की साधना के द्वारा इन शब्दों को पार करते हुए साधक सारशब्द को पकड़ कर परमात्मा तक पहुंच जाता है जहां भक्त और भगवान का भेद मिट जाता हैं। यही मुक्ति, मोक्ष या निर्वाण है। यह साधना ध्यान की अंतिम साधना है, जिसका वर्णन जैन धर्म के साधकों और विद्वानों ने किया है। भगवान महावीर ने आंतरिक साधना में बिन्दु दर्शन को ‘स्व’ की अनुभूति कहा है।

भगवान महावीर ने साफ-साफ कहा है कि सदाचार और संयम से हीन जीवन में कभी भी आत्म कल्याण या मुक्ति नहीं हो सकती। वे कहते हैं-‘सीलं मोक्खस्स सोवाणं’ अर्थात् शील (संयम) मोक्ष का सोपान (सीढ़ी) है।

उन्होंने जीवन की पवित्रता और सच्चरित्रता के लिए पांच महाव्रतों पर बहुत बल दिया-अहिंसा, सत्य, अचैर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। उपरोक्त व्रतों में चार व्रतों का प्रतिपादन 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने किया था, जबकि ’ब्रह्मचर्य‘ व्रत को भगवान महावीर ने जोड़ा था। यहां उल्लेखनीय है कि गृहस्थजीवन में रहने वाले अनुयायियों (जैनियों) के लिए महाव्रत में कठोरता कम थी, इसलिए इन्हें ’अणुव्रत‘ भी कहा जाता है।

व्यवहारिक जीवन में इनके सफल प्रयोग के लिए उन्होंने इन्हें साधु और सामान्यजनों (श्रावकों) को लक्ष्य में रखकर ‘महाव्रत’ और ‘अणुव्रत’ के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने साधकों के लिए विषय त्याग आवश्यक बताया। कैवल्य प्राप्ति के बाद भगवान महावीर ने अपना प्रथम उपदेश राजगृह में विपुलचल पहाड़ी के पास दिये। उनके दामाद जमालि इनके प्रथम शिष्य तथा चम्पा नरेश दधिवाहन की पुत्री चंदना इनकी प्रथम भिक्षुणी बनीं।

निर्वाण

जीवन के अंतिम क्षणों तक भगवान महावीर ने आत्मशांति के द्वारा विश्वशांति का उपदेश देते हुए नर को नारायण बनने की प्रेरणा दी। लगभग तीस वर्षों तक सारे भारतवर्ष में उनका विहार होता रहा। अंत में ईसा पूर्व 527 वर्ष काल में दीपावली के दिन रात्रि के अंतिम प्रहर में उन्होंने पावापुरी में शुक्लध्यान की चरमावस्था में आरूढ़ हो अंतिम देह का पूर्णतः त्याग कर निर्वाण पद प्राप्त किया। तब उनकी आयु 72 वर्ष की थी। उनके प्रधान शिष्य इंद्रभूति या गौतम थे।

इतने वर्ष बाद भी भगवान महावीर की शिष्य-परंपरा अक्षुण रूप से अबतक चली आ रही है। महावीर की चिंतन परंपरा ने भारत के सांस्कृतिक इतिहास को समग्र रूप से प्रभावित किया है।

अहिंसा का सिद्धांत जैन धर्म की मुख्य देन है। भगवान महावीर ने पशु-पक्षी तथा पेड़-पौधे तक की हत्या नहीं करने को मना किया है। जैन धर्म ने भारतीय सम्यता और संस्कृति के विभिन्न पक्षों को प्रभावित किया है। दर्शन, कला और साहित्य के क्षेत्र में भी जैन धर्म का महत्वपूर्ण योगदान है। महावीर द्वारा स्थापित ‘जीयो और जीने दो’ का सिद्धांत जनकल्याण की भावना को परिलक्षित करता है।

श्रद्धापूरित निर्माण

भगवान महावीर से प्रेरित होकर इनके अनुयायियों और तत्कालीन राजाओं ने अनेक जैन मंदिरों, औषधालयों, विश्राम स्थलों एवं पाठशालाओं का निर्माण कराया था। आज भी यह सिलसिला जारी है। भव्य मंदिरों के साथ-साथ विविध ज्ञानदाता शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालयों की स्थापना भी हो रही है। हांलाकि महान जैन गुरु दिवंगत श्री तुलसी ने जैनधर्मावलम्बियों के बीच व्याप्त हो रहे विभेद को दूर करने के लिए कोरी पूजा और केवल माला नहीं फेरकर भगवान महावीर की बात को मान कर चलने का आग्रह किया है।

जैन धर्म के प्रवर्तक थे भगवान महावीर

Photo : IANS

श्वेताम्बर और दिगम्बर

भगवान महावीर के निर्वाण के लगभग दो सौ वर्ष बाद जैन धर्म श्वेताम्बर और दिगम्बर नामक दो सम्प्रदायों में बंट गया। वस्तुतः भगवान महावीर आरंभिक समय में श्वेत वस्त्र धारण करते थे।

लेकिन साधनाकाल में परिस्थितिवश वर्षाऋतु में उनके शरीर से वस्त्र गलकर समाप्त हो गए जिससे वह दिगम्बर हो गए थे। इसी कारण आगे चलकर जैन धर्म के साधुओं में कुछ लोग श्वेत वस्त्र धारण करने लगे और श्वेताम्बर कहलाए। कुछ लोग दिगम्बर महावीर को अपना इष्ट मानते हुए बिना वस्त्र के रहने लगे और दिगम्बर कहलाए।

अध्यात्म जगत में जैनधर्म के चैबीसवें और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर के ज्ञान-संदेश आज ढाई हजार वर्ष बीत जाने के बाद भी अक्षुण हैं और संसार के जीवन की सार्थकता का पाठ पढ़ा रहे हैं। आपने जीवन व्यापी अहिंसा का ऐसा स्रोत प्रवाहित किया जो जीवन की सूक्ष्म से सूक्ष्म वृत्ति तक जा पहुंचा। इससे हिंसा के प्रभावी अंग जातिवाद, भाषावाद और श्रेष्ठतावाद के विरूद्ध स्वतः क्रांति का शंख बज उठा।

गौरतलब है कि भगवान महावीर ‘जिन’ लाभ के बाद भी संकीर्ण सामाजिक वृत्तियों को दूर करने के अभ्यास तक सीमित नहीं रहे। उनका साध्य तो ’मुक्ति‘ था। उन्होंने सम्पूर्ण मानवों को मुक्ति के लिए प्ररित किया, दीक्षित किया। संसार और मानव जाति को उनका अवदान आज भी चैतन्य है और समझदारी विकसित करने का आधार भी है।

भगवान महावीर ने 23वे तीर्थंकर पार्श्वनाथ द्वारा आरंभ किए गए तत्वज्ञान को अपने तात्विक अनुभव ज्ञान के अनुसार परिमार्जित कर उसे जैन धर्म का स्थायी आधार प्रदान किया। वह ऐसे धार्मिक नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित हुए जिन्होंने राज्य या किसी बाहरी शक्ति का अवलंबन लिये बिना जैन धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की। आधुनिक काल में भी जैन धर्म की व्यापक्ता का पूर्ण श्रेय भगवान महावीर को है।

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