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ज्ञान, योग और प्रेम के पुंज श्रीकृष्ण

ज्ञान, योग और प्रेम के पुंज श्रीकृष्ण
August 23
09:01 2019

वह स्वार्थी नहीं, परमार्थी हैं। वह योगी हैं, कर्मपुरूष हैं, क्या नहीं है। ऐसे भगवान कृष्ण को बार-बार नमस्कार!

भारतीय मनीषा में जितने भी अवतारी-महापुरूष हुए हैं, उनमें श्रीकृष्ण अनुपम, अप्रतिम व विलक्षण हैं। वह सामान्य भी है और असमान्य भी। वह सरल तो है, लेकिन विरल और विकट भी है। वह धूरि धरत अति सुंदर श्याम भी हैं और द्वारिकाधीश भी।

वह रास रचैया हैं तो सबसे बड़े लड़वैया भी। वह बजाते तो हैं बांसुरी, लेकिन चलाते हैं सुदर्शन चक्र। वह माखन चुराते हैं, गोपियों के चीर चुराते हैं, लेकिन द्रौपदी की चीर इतनी बढ़ा देते हैं कि दुःशासन खींचते-खींचते थक जाता है।

वह कभी स्वयं राजा नहीं बने, लेकिन हस्तिनापुर (दिल्ली) में एक ईमानदार, सत्यनिष्ठ सरकार बनवाने के लिए महाभारत में अर्जुन के सारथि बन जाते हैं। उन्होंने अपने लिए कभी किसी की सहायता नहीं ली, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर याचित-अयाचित सहायता देने के लिए दौड़ पड़े।

श्रीकृष्ण ने प्रेम किया, तो जमकर, मित्रता की, तो कोई कमी नहीं रखी, जिससे लड़े दम भर लड़े और जब लगा कि किसी वरदान के कारण शत्रु भारी पड़ रहा है तो भाग खड़े हुए और रणछोड़ कहलाने में कोई संकोच नहीं किया। वह गीता के अमर ज्ञान के गायक या उद्गाता हैं तो अहीर की छोहरियां उन्हें छछिया भर छांछ पर नाच नचाती रहती है।

श्रीकृष्ण का जन्म भादो कृष्ण अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। उस समय उनके माता-पिता देवकी-वसुदेव कंस के कारागार में बंद थे। लेकिन भारी बारिश में उफनाई यमुना को पार कर वसुदेव ने श्रीकृष्ण को मथुरा पहुंचा दिया। वहां उनके पिता थे। नंद और माता थी यशोदा। लेकिन कृष्ण जन्म देनेवाली देवकी के नंदन से अधिक यशोदा के लाल बन गये। वसुदेव के पुत्र होने के कारण वह वासुदेव तो थे लेकिन नंदलाल के रूप में उन्होंने बाल्यकाल में हीं अपनी अलौकिकता और लीलाओं से जो धाक जमाई, उससे कंस सहम गया था।

कृष्ण अपने इलाके, राज्य से दूर रहनेवाली रुक्मिणी से प्यार करते थे। रूक्मिणी भी उन्हें चाहती थी। इसलिए उन्होंने रूक्मिणी का अपहरण किया और शादी की, क्योंकि रूक्मिणी का भाई रूक्की कृष्ण से अपनी बहन की शादी के विरूद्ध था। कृष्ण ने सत्यभामा, जामंती से भी विवाह किया। लेकिन उनके दिल पर राज तो राधा ही करती थी।

तभी तो कृष्ण राधेश्याम हो गये। वस्तुतः राधा प्रेम अगाधा थी।  वह कृष्ण के लिए पत्नी न होते हुए भी उर्जा का स्रोत थी। कृष्ण और राधा का यही अमर प्रेम ब्रज की वीथियों में आज भी प्रतिध्वनित होता है। मथुरा आने के बाद कृष्ण कभी राधा से मिले या गोपियों के साथ जैसी शारारतें की, इसका प्रमाण तो नहीं मिलता, लेकिन ज्ञान मार्ग के पुरोधा अपने मित्र उद्धव से कहते रहे कि ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।

यही उद्धव गोपियों को ज्ञान का अमृत बांटने वृंदावन चले गये, लेकिन वहां प्रेम के मद में ऐसे छक गये कि लड़खड़ाने लगे। कृष्ण ने एक तरह से यह स्थापित किया कि प्रेम संगीतमय जीवन की गहरी चलती धारा है, जिसमें अवगाहन करनेवाले को दिव्य माधुर्य के अतिरिक्त कहीं कुछ नहीं दिखाई देता है। प्रेम का यही दिव्य माधुर्य उत्कट-उदान्त प्रेम की याती है। कृष्ण की बहन थी सुभद्रा।

अर्जुन का रथ तो हांका हीं।

वह अर्जुन से प्रेम करती थी लेकिन बलराम जी उसका विवाह दुर्योधन से कराना चाहते थे। फिर क्या था, कृष्ण ने सुभद्रा-अर्जुन के प्रेम की रक्षा के लिए अर्जुन से कहा, सुभद्रा को ले भागो, दाऊ यानी बलराम को मैं संभाल लूंगा।

उन्होंने प्रेम के वशीभूत होकर ही युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के जूठी पत्तलें उठाई, दुर्योधन का मेवा छोड़कर-विदुर के घर साग खाया और अर्जुन का रथ तो हांका हीं।

कृष्ण अपनी वास्तविकता कुरूक्षेत्र में प्रकट करते हैं जहां कौरवों और पाण्डवों की सेनाएं आमने-सामने यही थीं और अर्जुन मोहवश युद्ध के लिए तैयार नहीं थे। तब कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया। उन्होंने योग की बात की। कहा-

योग: कर्मसु कौशुलम्।

यानी कर्म में कुशलता ही योग हैं। तभी उन्होंने बताया कि

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे।

लेकिन उन्होंने कर्म की प्रधानता स्थापित की और स्पष्ट रूप से कहा-

कर्मणेवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

अर्जुन तुम कर्म करो, फल की चिंता छोड़ो। जिन्हें तुम मारना नहीं चाहते हो, वे मरे हुए ही हैं, तुम सिर्फ माध्यम हो। कृष्ण ने लगे हाथ योगक्षेमं वहाम्यहम्ं का संदेश देते हुए यह भी बता दिया कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड में जो कुछ भी है, जैसा है, जितना है, उनका ही है, उनके कारण ही है। लेकिन गीता के अमर संदेश के बावजूद के बावजूद महाभारत जीतने के लिए उन्होंने रणनीति बनाई और प्रारम्भ में हीं धृष्टधुम्न (द्रौपदी का भाई) को सेनापति बनवा दिया, क्योंकि पाण्डव धर्म नीति से चिपके रहते और भीष्म, द्रोण, कर्ण के कारण जीत नहीं पाये।

धृष्टधुम्न येन-केन-प्रकारेन युद्ध जीतने में विश्वास करता था। हुआ वही। कृष्ण ने बड़ी चालाकी से भीष्म द्रोण और कर्ण का अलग-अलग युक्तियों से अंत करा दिया। यानी कहा जा सकता है कि कृष्ण प्रेम और युद्ध में सबकुछ जायज मानते थे।

वह योगी भी थे। उन्हें योगेश्वर भी कहा जाता है। जो योगी नहीं होगा, उसके वश में माया नहीं होगी। वस्तुतः वह रगी-वैरागी-नहीं, वीतरागी थे। उन्हें अपने लिए कुछ चाहिए नहीं, लेकिन कुछ त्याज्य भी नहीं था।

समय के हिसाब से वह सत्य, धर्म के अनुरक्षण के लिए निर्णय लेते थे। कृष्ण कथा में एक क्षेपक है। एक बार महर्षि दुर्वासा ने यमुना पार डेरा जमाया और कृष्ण को भोजन भेजने का निर्देश भेजवाया। उस समय यमुना उफान पर थी। शत्र्त थी कि गोपियां भोजन लेकर जायेंगी। पर वे यमुना पर कैसे करें? वे लौट आयी।

कृष्ण को परेशानी बतायी। कृष्ण ने कहा जाओ यमुना से कह देना, यदि कृष्ण योगी हैं तो कृपया रास्ता दे दें। गापियां सकुचाई। यह क्या-दिन रात साथ रहते हैं और अब योगी बन रहे हैं। लेकिन कृष्ण का कहा टाले कौन? उन्होंने यमुना को कृष्ण का संदेश बताया और यमुना का पानी नीचे चला गया।

उधर दुर्वासा अपनी मंडली के साथ जब भोजन कर चुके तो गोपियों ने पूछा जायेंगे कैसे, यमुना उफान पर हैं। दुर्वासा ने पूछा-ऐसे में तुम आयें, कैसे? उन्होंने बताया कृष्ण की कृपा से और सारा वृतांत बता दिया। दुर्वासा ने कहा जाओ-यमुना से कह देना-दुर्वासा दूब के सिवा कुछ नहीं खाता हो तो मार्ग दे दो।

गोपियां भी भौचक। यह ऋषि अभी-अभी इतना खाया है और कह रहा है सिर्फ दूब खाता है। लेकिन मजबूरी थी। वे यमुना तट पहुंची और दुर्वासा का संदेश सुनाया। उन्हें फिर रास्ता मिल गया। दरअसल कृष्ण और दुर्वासा दोनों वीतरागी थे। संसार से निरपेक्ष। संसार में रहते हुए संासारिक सुखों-दुखों को भोगते हुए भी उससे अलग।

संक्षेप में कहा जाय तो कृष्ण को हम जिस रूप में देखना-समझना चाहें, वह उसी रूप में उपलब्ध हैं। वह धूल में खेलते, गाय चराते, यमुना में नहाते, निपट देहाती हैं तो गीता के ज्ञान से सबको चैंकाते हैं। वह प्रेम के पुंज है, प्रेम की परिभाषा हैं, लेकिन उसे अंदर रखते हुए भी अपना कर्म, ध्येय नहीं भूलते हैं।

वह स्वार्थी नहीं, परमार्थी हैं। वह योगी हैं, कर्मपुरूष हैं, क्या नहीं है। ऐसे भगवान कृष्ण को बार-बार नमस्कार!

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