तापमान वृद्धि को रोकने में, मीथेन गैस कटौती की अहम भूमिका

संयुक्त राष्ट्र समर्थित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मानव गतिविधि द्वारा उत्पन्न मीथेन गैस का उत्सर्जन, इस दशक में 45 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है, जिससे पेरिस जलवायु समझौते की शर्तों के अनुरूप, वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने में मदद मिलेगी.

गुरूवार को प्रकाशित – वैश्विक मीथेन आकलन नामक इस रिपोर्ट में मीथेन गैस में कमी करने के फ़ायदे गिनाए गए हैं. कोहरे, धुन्ध और प्रदूषण में, मीथेन गैस मुख्य तत्व होती है.

To reach the #ParisAgreement 1.5˚C target, we must reduce methane emissions in 3 sectors: 🛢️Fossil Fuels: 60%🗑️Waste: 30-35%🌾Agriculture: 20-25%New @CCACoalition / UNEP assessment shows how this can be done quickly and cost-effectively.#CutMethane https://t.co/KOUfDJB5UV— UN Environment Programme (@UNEP) May 6, 2021

रिपोर्ट कहती है कि मीथेन गैस उत्सर्जन में कमी करने से हर साल लगभग 2 लाख 60 हज़ार लोगों की मौतें रोकी जा सकती हैं और लगभग 7 लाख 75 हज़ार, अस्थमा मरीज़ों के अस्पताल इलाज से भी बचा जा सकता है. साथ ही, लगभग ढाई करोड़ टन फ़सलों के नुक़सान को भी टाला जा सकता है.
यह रिपोर्ट जलवायु और स्वच्छ वायु गठबन्धन (CCAC) ने तैयार की है जोकि सरकारों और ग़ैर-सरकारी साझीदारों का एक वैश्विक भागीदारी संगठन है, और इसे संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम का भी समर्थन हासिल है.
दमदार औज़ार
यूएन पर्यावरण कार्यक्रम की कार्यकारी निदेशक इन्गेर एण्डर्सन का कहना है, “अगले 25 वर्षों के दौरान, जलवायु परिवर्तन को धीमा करने और कार्बन डाइ ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी लाने के लिये आवश्यक प्रयासों को सहारा देने के लिये, मीथेन गैस उत्सर्जन को कम करने के रूप में, हमारे पास एक दमदार विकल्प मौजूद है.”
मीथेन, ग्रीनहाउस गैस समूह की एक शक्तिशाली गैस है, जोकि पूर्व – औद्योगिक काल से लेकर अब तक हुई तापमान वृद्धि में, 30 प्रतिशत हिस्से के लिये ज़िम्मेदार है.
मानव गतिविधि द्वारा उत्पन्न मीथेन गैस का बड़ा हिस्सा इन प्रमुख तीन क्षेत्रों से आता है: तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधन के प्रयोग से; विशाल कूड़ा घरों से जहाँ इनसानों द्वारा फेंका गया कूड़ा-कचरा इकट्ठा होता है; और खेतीबाड़ी से – मुख्य रूप से मवेशियों से सम्बन्धित.
उत्सर्जन में लगातार वृद्धि
रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया है कि 1980 के दौर में जब से रिकॉर्ड दर्ज करना शुरू किया गया, तब से देखा गया है कि मानव गतिविधियों के कराण, मीथेन गैस उत्सर्जन बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं, इसलिये अन्तरराष्ट्रीय कार्रवाई की तत्काल दरकार है.
जब वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण वर्ष, 2020 में आर्थिक गतिविधियाँ धीमी हुईं तो कार्बन डाइ ऑक्साइड के उत्सर्जन का एक अन्य रिकॉर्ड वर्ष दर्ज करने से बचा जा सका. मगर अमेरिका की समुद्री और वातावरणीय प्रशासन एजेंसी (NOAA) के आँकड़े दिखाते हैं कि वातावरण में पहुँचने वाली मीथेन गैस की मात्रा, वर्ष 2020 के दौरान रिकॉर्ड ऊँचाई के स्तर पर पहुँच गई.
अच्छी ख़बर
एक तरफ़ कार्बन डाइ ऑक्साइड जैसी गैस है जो वातावरण में सदियों तक ठहरती है, मगर मीथेन बहुत जल्दी बिखर जाती है और लगभग एक दशक के बाद लुप्त हो जाती है, इसका मतलब ये है कि सटीक कार्रवाई के ज़रिये, निकट भविष्य में , वैश्विक तापमान वृद्धि में तेज़ी से कमी लाई जा सकती है. 
जलवायु परिवर्तन पर अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष दूत जॉन कैरी के वरिष्ठ सलाहकार रिक ड्यूक का कहना है कि वैश्विक स्तर पर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में, मीथेन का हिस्सा लगभग 20 प्रतिशत है.
उन्होंने कहा, “अमेरिका अपने यहाँ और वैश्विक स्तर पर मीथेन गैस उत्सर्जन में कमी लाने के लिये प्रतिबद्ध है – इसके लिये शोध और विकास जैसे उपाय किये जाएंगे, जीवाश्म ईंधन के प्रयोग और कूड़ा घरों से निकलने वाली मीथेन गैस को नियंत्रित करने के लिये मानक तय किये जाएंगे, और कृषि क्षेत्र से निकलने वाली मीथेन गैस को कम करने के लिये रियायतें दी जाएंगी.”
तीव्र समाधान मौजूद
आकलन रिपोर्ट में आसानी से हासिल किये जा सकने वाले ऐसे समाधानों की पहचान की गई है जिनके ज़रिये, वर्ष 2030 तक, मीथेन उत्सर्जन में 30 प्रतिशत तक की कटौती की जा सकती है, मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन क्षेत्र में.
इसका अधिकांश या लगभग 60 प्रतिशत लक्ष्य हासिल करने में बहुत कम लागत आएगी, और लगभग आधे लक्ष्य में कोई लागत ही नहीं है, इसका मतलब है कि कम्पनियों को समुचित कार्रवाई करने के बदले, लाभ होगा.

World Bankकूड़े-कचरे व अपशिष्ट के भण्डार, मीथेन गैस के प्रमुक उत्सर्जक हैं. उचित प्रबन्धन से मीथेन गैस उत्सर्जन कम करने के साथ-साथ स्वास्थ्य जोखिम भी कम किये जा सकते हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, मीथेन गैस में कटौती करने की सम्भावनाएँ देशों और क्षेत्रों के अनुसार भिन्न हैं. मसलन, योरोप और भारत में, अधिकाँश सम्भावना अपशिष्ट क्षेत्र से उत्पन्न होती है, तो चीन में ये कोयला उत्पादन और मवेशियों से उत्पन्न होती है, उधर अफ्रीका में, मीथेन गैस उत्सर्जन मवेशियों, तेल और गैस के कारण उत्पन्न होती है.
मगर, साझीदारों ने आगाह करने के अन्दाज़ में कहा है, “केवल लक्षित उपाय भर ही काफ़ी नहीं हैं.
मीथेन पर प्रत्यक्ष रूप में निशाना नहीं साधने वाले – नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ़ रुख़, आवासीय और व्यावसायिक उर्जा कुशलता, और भोजन बर्बादी व अपशिष्ट को रोकने जैसे अतिरिक्त उपायों के ज़रिये भी, मीथेन उत्सर्जन में, वर्ष 2030 तक अतिरिक्त 15 प्रतिशत तक की कटौती सम्भव है.”
इस आकलन रिपोर्ट के अग्रणी लेखक और अमेरिका के ड्यूक विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर, ड्रयू शिण्डेल का कहना है कि इस दशक के दौरान मीथेन गैस का उत्सर्जन कम करने के लिये आपात क़दम उठाने की सख़्त ज़रूरत है.
उन्होंने कहा, “वैश्विक जलवायु लक्ष्य हासिल करने के लिये, हमें कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जन में कटौती के साथ-साथ, मीथेन उत्सर्जन में भी कमी करनी होगी.”
“अच्छी ख़बर ये है कि अधिकतर ज़रूरी कार्रवाइयों से ना केवल जलवायु लाभ होंगे, बल्कि स्वास्थ्य और वित्तीय फ़ायदे भी होंगे, और इन कार्रवाइयों के लिये जिस टैक्नॉलॉजी की आवश्यकता है, वो पहले से ही उपलब्ध है.”, संयुक्त राष्ट्र समर्थित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मानव गतिविधि द्वारा उत्पन्न मीथेन गैस का उत्सर्जन, इस दशक में 45 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है, जिससे पेरिस जलवायु समझौते की शर्तों के अनुरूप, वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने में मदद मिलेगी.

गुरूवार को प्रकाशित – वैश्विक मीथेन आकलन नामक इस रिपोर्ट में मीथेन गैस में कमी करने के फ़ायदे गिनाए गए हैं. कोहरे, धुन्ध और प्रदूषण में, मीथेन गैस मुख्य तत्व होती है.

रिपोर्ट कहती है कि मीथेन गैस उत्सर्जन में कमी करने से हर साल लगभग 2 लाख 60 हज़ार लोगों की मौतें रोकी जा सकती हैं और लगभग 7 लाख 75 हज़ार, अस्थमा मरीज़ों के अस्पताल इलाज से भी बचा जा सकता है. साथ ही, लगभग ढाई करोड़ टन फ़सलों के नुक़सान को भी टाला जा सकता है.

यह रिपोर्ट जलवायु और स्वच्छ वायु गठबन्धन (CCAC) ने तैयार की है जोकि सरकारों और ग़ैर-सरकारी साझीदारों का एक वैश्विक भागीदारी संगठन है, और इसे संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम का भी समर्थन हासिल है.

दमदार औज़ार

यूएन पर्यावरण कार्यक्रम की कार्यकारी निदेशक इन्गेर एण्डर्सन का कहना है, “अगले 25 वर्षों के दौरान, जलवायु परिवर्तन को धीमा करने और कार्बन डाइ ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी लाने के लिये आवश्यक प्रयासों को सहारा देने के लिये, मीथेन गैस उत्सर्जन को कम करने के रूप में, हमारे पास एक दमदार विकल्प मौजूद है.”

मीथेन, ग्रीनहाउस गैस समूह की एक शक्तिशाली गैस है, जोकि पूर्व – औद्योगिक काल से लेकर अब तक हुई तापमान वृद्धि में, 30 प्रतिशत हिस्से के लिये ज़िम्मेदार है.

मानव गतिविधि द्वारा उत्पन्न मीथेन गैस का बड़ा हिस्सा इन प्रमुख तीन क्षेत्रों से आता है: तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधन के प्रयोग से; विशाल कूड़ा घरों से जहाँ इनसानों द्वारा फेंका गया कूड़ा-कचरा इकट्ठा होता है; और खेतीबाड़ी से – मुख्य रूप से मवेशियों से सम्बन्धित.

उत्सर्जन में लगातार वृद्धि

रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया है कि 1980 के दौर में जब से रिकॉर्ड दर्ज करना शुरू किया गया, तब से देखा गया है कि मानव गतिविधियों के कराण, मीथेन गैस उत्सर्जन बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं, इसलिये अन्तरराष्ट्रीय कार्रवाई की तत्काल दरकार है.

जब वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण वर्ष, 2020 में आर्थिक गतिविधियाँ धीमी हुईं तो कार्बन डाइ ऑक्साइड के उत्सर्जन का एक अन्य रिकॉर्ड वर्ष दर्ज करने से बचा जा सका. मगर अमेरिका की समुद्री और वातावरणीय प्रशासन एजेंसी (NOAA) के आँकड़े दिखाते हैं कि वातावरण में पहुँचने वाली मीथेन गैस की मात्रा, वर्ष 2020 के दौरान रिकॉर्ड ऊँचाई के स्तर पर पहुँच गई.

अच्छी ख़बर

एक तरफ़ कार्बन डाइ ऑक्साइड जैसी गैस है जो वातावरण में सदियों तक ठहरती है, मगर मीथेन बहुत जल्दी बिखर जाती है और लगभग एक दशक के बाद लुप्त हो जाती है, इसका मतलब ये है कि सटीक कार्रवाई के ज़रिये, निकट भविष्य में , वैश्विक तापमान वृद्धि में तेज़ी से कमी लाई जा सकती है. 

जलवायु परिवर्तन पर अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष दूत जॉन कैरी के वरिष्ठ सलाहकार रिक ड्यूक का कहना है कि वैश्विक स्तर पर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में, मीथेन का हिस्सा लगभग 20 प्रतिशत है.

उन्होंने कहा, “अमेरिका अपने यहाँ और वैश्विक स्तर पर मीथेन गैस उत्सर्जन में कमी लाने के लिये प्रतिबद्ध है – इसके लिये शोध और विकास जैसे उपाय किये जाएंगे, जीवाश्म ईंधन के प्रयोग और कूड़ा घरों से निकलने वाली मीथेन गैस को नियंत्रित करने के लिये मानक तय किये जाएंगे, और कृषि क्षेत्र से निकलने वाली मीथेन गैस को कम करने के लिये रियायतें दी जाएंगी.”

तीव्र समाधान मौजूद

आकलन रिपोर्ट में आसानी से हासिल किये जा सकने वाले ऐसे समाधानों की पहचान की गई है जिनके ज़रिये, वर्ष 2030 तक, मीथेन उत्सर्जन में 30 प्रतिशत तक की कटौती की जा सकती है, मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन क्षेत्र में.

इसका अधिकांश या लगभग 60 प्रतिशत लक्ष्य हासिल करने में बहुत कम लागत आएगी, और लगभग आधे लक्ष्य में कोई लागत ही नहीं है, इसका मतलब है कि कम्पनियों को समुचित कार्रवाई करने के बदले, लाभ होगा.


World Bank
कूड़े-कचरे व अपशिष्ट के भण्डार, मीथेन गैस के प्रमुक उत्सर्जक हैं. उचित प्रबन्धन से मीथेन गैस उत्सर्जन कम करने के साथ-साथ स्वास्थ्य जोखिम भी कम किये जा सकते हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, मीथेन गैस में कटौती करने की सम्भावनाएँ देशों और क्षेत्रों के अनुसार भिन्न हैं. मसलन, योरोप और भारत में, अधिकाँश सम्भावना अपशिष्ट क्षेत्र से उत्पन्न होती है, तो चीन में ये कोयला उत्पादन और मवेशियों से उत्पन्न होती है, उधर अफ्रीका में, मीथेन गैस उत्सर्जन मवेशियों, तेल और गैस के कारण उत्पन्न होती है.

मगर, साझीदारों ने आगाह करने के अन्दाज़ में कहा है, “केवल लक्षित उपाय भर ही काफ़ी नहीं हैं.

मीथेन पर प्रत्यक्ष रूप में निशाना नहीं साधने वाले – नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ़ रुख़, आवासीय और व्यावसायिक उर्जा कुशलता, और भोजन बर्बादी व अपशिष्ट को रोकने जैसे अतिरिक्त उपायों के ज़रिये भी, मीथेन उत्सर्जन में, वर्ष 2030 तक अतिरिक्त 15 प्रतिशत तक की कटौती सम्भव है.”

इस आकलन रिपोर्ट के अग्रणी लेखक और अमेरिका के ड्यूक विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर, ड्रयू शिण्डेल का कहना है कि इस दशक के दौरान मीथेन गैस का उत्सर्जन कम करने के लिये आपात क़दम उठाने की सख़्त ज़रूरत है.

उन्होंने कहा, “वैश्विक जलवायु लक्ष्य हासिल करने के लिये, हमें कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जन में कटौती के साथ-साथ, मीथेन उत्सर्जन में भी कमी करनी होगी.”

“अच्छी ख़बर ये है कि अधिकतर ज़रूरी कार्रवाइयों से ना केवल जलवायु लाभ होंगे, बल्कि स्वास्थ्य और वित्तीय फ़ायदे भी होंगे, और इन कार्रवाइयों के लिये जिस टैक्नॉलॉजी की आवश्यकता है, वो पहले से ही उपलब्ध है.”

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