दक्षिण एशिया में, समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने का संकल्प – ब्लॉग

प्लास्टिक के अनुमानतः 5.2 खरब टुकड़े पहले से ही महासागर को प्रदूषित कर रहे हैं, और इस मात्रा में प्रत्येक वर्ष, 80 लाख टन की बढ़ोत्तरी होती है. इस समस्या से निपटने के लिये दक्षिण एशियाई देशों ने साथ मिलकर इसका समाधान करने की ठानी है. इस बारे में विस्तृत जानकारी के लिये विश्व बैंक की क्षेत्रीय एकीकरण मामलों की निदेशिका सेसली फ्रूमेन, दक्षिण एशियाई सतत विकास के क्षेत्रीय निदेशक जॉन रूमे और पवन पाटिल का ब्लॉग.

सहयोग, सहभागिता, सर्वसम्मति – दक्षिण एशिया में आने वाले आठ सम्प्रभु देशों के सन्दर्भ में इन शब्दों का उपयोग शायद ही कभी किया जाता हो. दक्षिण एशिया को लोगों, वस्तुओं, सेवाओं व राजधानियों के बीच, अनेक कारणों से आवागमन के प्रतिबन्धों के कारण दुनिया का सबसे कम एकीकृत क्षेत्र माना जाता है.
फिर भी, अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका चुपचाप एक अद्वितीय यात्रा पर साथ निकल पड़े हैं – अपने देशों और क्षेत्र से समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण ख़त्म करने के लिये. जब इसके लिये विश्व बैंक से समर्थन मांगा गया तो विश्व बैंक ने उत्साह से हामी भर दी.
प्लास्टिक प्रदूषण हर जगह है – हवा, जिसमें हम साँस लेते हैं, एवरेस्ट पर्वत चोटी पर हिमनद बर्फ़ में, पीने के पानी में और उन मछलियों में, जो हमारे भोजन का हिस्सा बनती हैं. इसके पर्यावरण, जैव विविधता, आजीविका और यहाँ तक कि हमारे स्वास्थ्य के लिये भारी परिणाम होते हैं.
महामारी से पहले, हिन्द महासागर का औसतन एक वर्ग मील का इलाक़ा, 46 हज़ार से अधिक प्लास्टिक टुकड़ों (2 लाख 69 हज़ार टन) से प्रदूषित था. अनुमानतः 5.2 खरब प्लास्टिक के टुकड़े पहले से ही हमारे महासागर को प्रदूषित कर रहे हैं, जिसमें हर साल अतिरिक्त 80 लाख टन और मिल जाते हैं – यानि हर मिनट – प्लास्टिक के कचरे से भरे ट्रक के बराबर.
कोविड-19 ने प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या और बढ़ा दी है, जिसमें एकल उपयोग वाले प्लास्टिक की बढ़ती मांग और ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन प्रणालियों पर दबाव के साथ-साथ, स्वच्छता की चिन्ताओं और कच्चे प्लास्टिक माल की कम क़ीमतों के कारण, एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक में वृद्धि हुई है.
वैज्ञानिक जर्नल Environmental Sciences & Technology (‘पर्यावरण विज्ञान और प्रौद्योगिकी’) का अनुमान है कि विश्व स्तर पर, महामारी के दौरान हर महीने 1.29 खरब फ़ेस मास्क और 65 अरब  ‘इस्तेमाल करके फेंकने वाले-दस्तानों’ का उपयोग किया जा रहा है. अफ़सोस की बात यह है, इनमें से ज़्यादातर कूड़े में जाकर प्राकृतिक वातावरण प्रदूषित कर रहे हैं.
दक्षिण एशियाई एकजुटता
दक्षिण एशिया की नदियाँ प्लास्टिक प्रदूषण के लिये पहाड़ों से समुद्र तक प्रवाहित होने के मार्ग के रूप में कार्य करती हैं. इसी कारण दक्षिण एशिया की तीन पर्वतीय अर्थव्यवस्थाएँ और पाँच महासागरीय अर्थव्यवस्थाएँ, इसके निदान के लिये एकजुट हुए हैं. दक्षिण एशियाई देशों के लिये इस मुद्दे पर सहयोग करने के पाँच मुख्य कारक हैं:

UNDP/Deepak Malikकंचन नेसा, भारत के उत्तर प्रदेश में, ग़ाज़ियाबाद शहर में एक सफ़ाई कर्मचारी हैं. पर्यावरण प्रदूषण से बचने के लिये, प्लास्टिक का उचित भण्डारण व निपटान ज़रूरी है

सबसे पहले, पूरे दक्षिण एशिया में प्लास्टिक प्रदूषण ख़तरनाक स्तर पर पहुँच गया है और अब इसे नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता. खुले स्थानों में प्लास्टिक कचरा फेंकने के मामले में दक्षिण एशिया दुनिया में सबसे आगे है. दक्षिण एशिया में 33 करोड़ 40 लाख मीट्रिक टन में से, क़रीब 75% अपशिष्ट, खुले स्थानों में फेंक दिया जाता है. 
विश्व बैंक की ‘व्हाट ए वेस्ट 2.0’ रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक दक्षिण एशिया का कुप्रबन्धित कचरा दोगुना हो जाएगा. यह दुनिया के सभी क्षेत्रों की तुलना में, सबसे तेज़ी से अपशिष्ट और प्लास्टिक प्रदूषण बढ़ने का उदाहरण होगा. 
दूसरा, प्लास्टिक प्रदूषण, पूरे एशिया में और विश्व भर में पर्यावरणीय चिन्ता के शीर्ष तीन विषयों में से सबसे ऊपर है. प्लास्टिक, पैट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधन-आधारित पैट्रोकैमिकल से बना एक आधुनिक आविष्कार है, जो हमारी वायु को प्रदूषित कर रहा है, भूमि पर फैलता जा रहा है, शहरी नालों और प्रमुख नदियों में रुकावटें पैदा कर रहा है, और समुद्रों में फेंका जा रहा है.
प्लास्टिक प्रदूषण से मानव और महासागर दोनों के स्वास्थ्य को ख़तरा है, और इससे राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं पर प्रति वर्ष 2.5 खरब डॉलर का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. यह किसी भी सामाजिक-आर्थिक स्थिति के लोगों को, समान रूप से प्रभावित करता है, लेकिन ग़रीबों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव अधिक पड़ता है.
तीसरा, प्लास्टिक प्रदूषण एक राष्ट्रीय समस्या के साथ-साथ सीमाओं से भी परे की समस्या होने के कारण, पहाड़ी और महासागरीय अर्थव्यवस्थाओं को एक सूत्र में पिरोती है.  दक्षिण एशिया के बर्फ़ से ढके सबसे ऊँचे पहाड़ों  – एवरेस्ट पर्वत चोटी से लेकर हिन्द महासागर के सबसे गहरे हिस्सों तक, माइक्रोप्लास्टिक कण बहुतायत में पाए जाते हैं.
और, इस क्षेत्र की सीमाएँ पार करती नदी प्रणालियाँ- अफ़गानिस्तान, भारत और पाकिस्तान को जोड़ने वाली सिन्धु नदी प्रणाली और भूटान, नेपाल, भारत और बांग्लादेश को जोड़ने वाली गंगा-ब्रहमपुत्र-मेघना नदी प्रणाली -दुनिया में पाँच सबसे अधिक प्रदूषित नदियाँ हैं. वे भूमि से महासागर तक प्लास्टिक प्रदूषण पहुँचाने के राजमार्ग बन गए हैं.
चौथा, 1980 के दशक के शुरू से ही, अच्छे मक़सद से लागू एकल-उपयोग वाली प्लास्टिक को प्रतिबन्धित करने वाली नीतियाँ विफल रही हैं; इस समस्या के समाधान के लिये क़दम उठाए जा रहे हैं. दक्षिण एशियाई राष्ट्रों के राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय न्यायालय, एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध लगाने में विश्व स्तर पर अग्रणी रहे हैं: भारत के राज्य सिक्किम ने, एक वैश्विक पहल के तौर पर, सबसे पहले 1998 में प्रतिबन्ध लगाया, फिर 2002 में बांग्लादेश में, 2005 में भूटान में, 2011 में अफ़गानिस्तान, नेपाल और श्रीलंका में, 2013 में पाकिस्तान और 2016 में मालदीव में, एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध लगा. फिर भी इन प्रतिबन्धों के कार्यान्वयन से वांछित परिणाम हासिल नहीं हुए – यानि एकल उपयोग प्लास्टिक के उपयोग में कमी नहीं हुई. बल्कि असल में, यह ख़तरनाक रूप से बढ़ता ही जा रहा है.

Unsplash/Brian Yurasitsकोविड-19 महामारी से बचने के ऐहतियाती उपायों के तहत पहना जाने वाला फ़ेस मास्क भी अब प्लास्टिक प्रदषण बढ़ने का एक बड़ा कारण बन गया है क्योंकि लोग बिना सोचे-समझे इन्हें कहीं भी फेंक देते हैं.

पाँचवाँ, सभी आठ दक्षिण एशियाई देशों ने माना कि पर्यावरणीय मक़सद के साथ एक क्षेत्रीय संगठन का गठन पूरे क्षेत्र में सामंजस्य स्थापित कर सकता है.
दक्षिण एशिया सहकारी पर्यावरण कार्यक्रम (SACEP) – एक क्षेत्रीय संगठन है जिसकी स्थापना 1982 में अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका की सदस्यता के साथ की गई थी, और यह कोलम्बो में स्थित है. इस संगठन ने पर्यावरणीय मुद्दों पर सभी सदस्यों को को साथ लेकर एक सक्रिय कार्यक्रम शुरू किया है, जिसमें हाल ही में, इस क्षेत्र के समुद्रों में बहने वाले प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने पर कार्रवाई शामिल है.
पिछले कई वर्षों में, SACEP, ने अपने सदस्य-देशों के साथ सक्रिय रूप से परामर्श करके, विश्व की पहली क्षेत्रीय समुद्री कचरा कार्य योजना (जो सभी महासागरीय दक्षिण एशियाई देशों द्वारा समर्थित है) और एक क्षेत्रीय ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन कार्य योजना (क्षेत्र में पहाड़ और सागर, दोनों वाले देशों के समर्थन द्वारा) तैयार की है.
सभी को समाधान की ज़रूरत
समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण के समाधान के लिये कोई चमत्कारिक उपाय नहीं है. इसके लिये, प्लास्टिक के जीवन चक्र के प्रत्येक चरण में दख़ल की आवश्यकता होती है, उत्पादन से लेकर ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन में निवेश के माध्यम से, प्लास्टिक फैलाव को रोकने से लेकर, प्लास्टिक के लिये एक सर्कुलर अर्थव्यवस्था का दृष्टिकोण अपनाने तक.
सभी आठ दक्षिण एशियाई देशों ने समस्या की पहचान की है और समाधान चाहते हैं. यही कारण है कि विश्व बैंक ने दक्षिण एशिया के लिये प्लास्टिक प्रदूषण, प्लास्टिक मुक्त नदियों और समुद्र की समस्या को दूर करने के लिये बैंक की पहली क्षेत्रीय परियोजना शुरू करने के लिये SACEP और Parley for the oceans के साथ मिलकर काम किया है.
Plastic free Rivers and Seas for South Asia नामक यह परियोजना, समुद्री प्लास्टिक पर अंकुश लगाने के साथ-साथ, प्रदूषण और प्लास्टिक की री-सायकलिंग और उत्पादन को सुदृढ़ करने के लिये पर्यावरण अनुकूल नवाचार को बढ़ावा देगी.
अर्थव्यवस्था और आजीविका के लिये सभी देशों में व्याप्त इस ख़तरे से निपटने के लिये दक्षिण एशिया में सहयोग का माहौल इससे बेहतर नहीं रहा है. अब नई नीतियों, निवेश और नवाचारों व उपभोक्ताओं एवं उद्योगों, दोनों के व्यवहार परिवर्तन के लिये ज़ोर देने का समय है. यात्रा तो अब शुरू हुई है., प्लास्टिक के अनुमानतः 5.2 खरब टुकड़े पहले से ही महासागर को प्रदूषित कर रहे हैं, और इस मात्रा में प्रत्येक वर्ष, 80 लाख टन की बढ़ोत्तरी होती है. इस समस्या से निपटने के लिये दक्षिण एशियाई देशों ने साथ मिलकर इसका समाधान करने की ठानी है. इस बारे में विस्तृत जानकारी के लिये विश्व बैंक की क्षेत्रीय एकीकरण मामलों की निदेशिका सेसली फ्रूमेन, दक्षिण एशियाई सतत विकास के क्षेत्रीय निदेशक जॉन रूमे और पवन पाटिल का ब्लॉग.

सहयोग, सहभागिता, सर्वसम्मति – दक्षिण एशिया में आने वाले आठ सम्प्रभु देशों के सन्दर्भ में इन शब्दों का उपयोग शायद ही कभी किया जाता हो. दक्षिण एशिया को लोगों, वस्तुओं, सेवाओं व राजधानियों के बीच, अनेक कारणों से आवागमन के प्रतिबन्धों के कारण दुनिया का सबसे कम एकीकृत क्षेत्र माना जाता है.

फिर भी, अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका चुपचाप एक अद्वितीय यात्रा पर साथ निकल पड़े हैं – अपने देशों और क्षेत्र से समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण ख़त्म करने के लिये. जब इसके लिये विश्व बैंक से समर्थन मांगा गया तो विश्व बैंक ने उत्साह से हामी भर दी.

प्लास्टिक प्रदूषण हर जगह है – हवा, जिसमें हम साँस लेते हैं, एवरेस्ट पर्वत चोटी पर हिमनद बर्फ़ में, पीने के पानी में और उन मछलियों में, जो हमारे भोजन का हिस्सा बनती हैं. इसके पर्यावरण, जैव विविधता, आजीविका और यहाँ तक कि हमारे स्वास्थ्य के लिये भारी परिणाम होते हैं.

महामारी से पहले, हिन्द महासागर का औसतन एक वर्ग मील का इलाक़ा, 46 हज़ार से अधिक प्लास्टिक टुकड़ों (2 लाख 69 हज़ार टन) से प्रदूषित था. अनुमानतः 5.2 खरब प्लास्टिक के टुकड़े पहले से ही हमारे महासागर को प्रदूषित कर रहे हैं, जिसमें हर साल अतिरिक्त 80 लाख टन और मिल जाते हैं – यानि हर मिनट – प्लास्टिक के कचरे से भरे ट्रक के बराबर.

कोविड-19 ने प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या और बढ़ा दी है, जिसमें एकल उपयोग वाले प्लास्टिक की बढ़ती मांग और ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन प्रणालियों पर दबाव के साथ-साथ, स्वच्छता की चिन्ताओं और कच्चे प्लास्टिक माल की कम क़ीमतों के कारण, एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक में वृद्धि हुई है.

वैज्ञानिक जर्नल Environmental Sciences & Technology (‘पर्यावरण विज्ञान और प्रौद्योगिकी’) का अनुमान है कि विश्व स्तर पर, महामारी के दौरान हर महीने 1.29 खरब फ़ेस मास्क और 65 अरब  ‘इस्तेमाल करके फेंकने वाले-दस्तानों’ का उपयोग किया जा रहा है. अफ़सोस की बात यह है, इनमें से ज़्यादातर कूड़े में जाकर प्राकृतिक वातावरण प्रदूषित कर रहे हैं.

दक्षिण एशियाई एकजुटता

दक्षिण एशिया की नदियाँ प्लास्टिक प्रदूषण के लिये पहाड़ों से समुद्र तक प्रवाहित होने के मार्ग के रूप में कार्य करती हैं. इसी कारण दक्षिण एशिया की तीन पर्वतीय अर्थव्यवस्थाएँ और पाँच महासागरीय अर्थव्यवस्थाएँ, इसके निदान के लिये एकजुट हुए हैं. दक्षिण एशियाई देशों के लिये इस मुद्दे पर सहयोग करने के पाँच मुख्य कारक हैं:


UNDP/Deepak Malik
कंचन नेसा, भारत के उत्तर प्रदेश में, ग़ाज़ियाबाद शहर में एक सफ़ाई कर्मचारी हैं. पर्यावरण प्रदूषण से बचने के लिये, प्लास्टिक का उचित भण्डारण व निपटान ज़रूरी है

सबसे पहले, पूरे दक्षिण एशिया में प्लास्टिक प्रदूषण ख़तरनाक स्तर पर पहुँच गया है और अब इसे नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता. खुले स्थानों में प्लास्टिक कचरा फेंकने के मामले में दक्षिण एशिया दुनिया में सबसे आगे है. दक्षिण एशिया में 33 करोड़ 40 लाख मीट्रिक टन में से, क़रीब 75% अपशिष्ट, खुले स्थानों में फेंक दिया जाता है. 

विश्व बैंक की ‘व्हाट ए वेस्ट 2.0’ रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक दक्षिण एशिया का कुप्रबन्धित कचरा दोगुना हो जाएगा. यह दुनिया के सभी क्षेत्रों की तुलना में, सबसे तेज़ी से अपशिष्ट और प्लास्टिक प्रदूषण बढ़ने का उदाहरण होगा. 

दूसरा, प्लास्टिक प्रदूषण, पूरे एशिया में और विश्व भर में पर्यावरणीय चिन्ता के शीर्ष तीन विषयों में से सबसे ऊपर है. प्लास्टिक, पैट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधन-आधारित पैट्रोकैमिकल से बना एक आधुनिक आविष्कार है, जो हमारी वायु को प्रदूषित कर रहा है, भूमि पर फैलता जा रहा है, शहरी नालों और प्रमुख नदियों में रुकावटें पैदा कर रहा है, और समुद्रों में फेंका जा रहा है.

प्लास्टिक प्रदूषण से मानव और महासागर दोनों के स्वास्थ्य को ख़तरा है, और इससे राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं पर प्रति वर्ष 2.5 खरब डॉलर का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. यह किसी भी सामाजिक-आर्थिक स्थिति के लोगों को, समान रूप से प्रभावित करता है, लेकिन ग़रीबों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव अधिक पड़ता है.

तीसरा, प्लास्टिक प्रदूषण एक राष्ट्रीय समस्या के साथ-साथ सीमाओं से भी परे की समस्या होने के कारण, पहाड़ी और महासागरीय अर्थव्यवस्थाओं को एक सूत्र में पिरोती है.  दक्षिण एशिया के बर्फ़ से ढके सबसे ऊँचे पहाड़ों  – एवरेस्ट पर्वत चोटी से लेकर हिन्द महासागर के सबसे गहरे हिस्सों तक, माइक्रोप्लास्टिक कण बहुतायत में पाए जाते हैं.

और, इस क्षेत्र की सीमाएँ पार करती नदी प्रणालियाँ- अफ़गानिस्तान, भारत और पाकिस्तान को जोड़ने वाली सिन्धु नदी प्रणाली और भूटान, नेपाल, भारत और बांग्लादेश को जोड़ने वाली गंगा-ब्रहमपुत्र-मेघना नदी प्रणाली -दुनिया में पाँच सबसे अधिक प्रदूषित नदियाँ हैं. वे भूमि से महासागर तक प्लास्टिक प्रदूषण पहुँचाने के राजमार्ग बन गए हैं.

चौथा, 1980 के दशक के शुरू से ही, अच्छे मक़सद से लागू एकल-उपयोग वाली प्लास्टिक को प्रतिबन्धित करने वाली नीतियाँ विफल रही हैं; इस समस्या के समाधान के लिये क़दम उठाए जा रहे हैं. दक्षिण एशियाई राष्ट्रों के राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय न्यायालय, एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध लगाने में विश्व स्तर पर अग्रणी रहे हैं: भारत के राज्य सिक्किम ने, एक वैश्विक पहल के तौर पर, सबसे पहले 1998 में प्रतिबन्ध लगाया, फिर 2002 में बांग्लादेश में, 2005 में भूटान में, 2011 में अफ़गानिस्तान, नेपाल और श्रीलंका में, 2013 में पाकिस्तान और 2016 में मालदीव में, एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध लगा. फिर भी इन प्रतिबन्धों के कार्यान्वयन से वांछित परिणाम हासिल नहीं हुए – यानि एकल उपयोग प्लास्टिक के उपयोग में कमी नहीं हुई. बल्कि असल में, यह ख़तरनाक रूप से बढ़ता ही जा रहा है.


Unsplash/Brian Yurasits
कोविड-19 महामारी से बचने के ऐहतियाती उपायों के तहत पहना जाने वाला फ़ेस मास्क भी अब प्लास्टिक प्रदषण बढ़ने का एक बड़ा कारण बन गया है क्योंकि लोग बिना सोचे-समझे इन्हें कहीं भी फेंक देते हैं.

पाँचवाँ, सभी आठ दक्षिण एशियाई देशों ने माना कि पर्यावरणीय मक़सद के साथ एक क्षेत्रीय संगठन का गठन पूरे क्षेत्र में सामंजस्य स्थापित कर सकता है.

दक्षिण एशिया सहकारी पर्यावरण कार्यक्रम (SACEP) – एक क्षेत्रीय संगठन है जिसकी स्थापना 1982 में अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका की सदस्यता के साथ की गई थी, और यह कोलम्बो में स्थित है. इस संगठन ने पर्यावरणीय मुद्दों पर सभी सदस्यों को को साथ लेकर एक सक्रिय कार्यक्रम शुरू किया है, जिसमें हाल ही में, इस क्षेत्र के समुद्रों में बहने वाले प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने पर कार्रवाई शामिल है.

पिछले कई वर्षों में, SACEP, ने अपने सदस्य-देशों के साथ सक्रिय रूप से परामर्श करके, विश्व की पहली क्षेत्रीय समुद्री कचरा कार्य योजना (जो सभी महासागरीय दक्षिण एशियाई देशों द्वारा समर्थित है) और एक क्षेत्रीय ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन कार्य योजना (क्षेत्र में पहाड़ और सागर, दोनों वाले देशों के समर्थन द्वारा) तैयार की है.

सभी को समाधान की ज़रूरत

समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण के समाधान के लिये कोई चमत्कारिक उपाय नहीं है. इसके लिये, प्लास्टिक के जीवन चक्र के प्रत्येक चरण में दख़ल की आवश्यकता होती है, उत्पादन से लेकर ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन में निवेश के माध्यम से, प्लास्टिक फैलाव को रोकने से लेकर, प्लास्टिक के लिये एक सर्कुलर अर्थव्यवस्था का दृष्टिकोण अपनाने तक.

सभी आठ दक्षिण एशियाई देशों ने समस्या की पहचान की है और समाधान चाहते हैं. यही कारण है कि विश्व बैंक ने दक्षिण एशिया के लिये प्लास्टिक प्रदूषण, प्लास्टिक मुक्त नदियों और समुद्र की समस्या को दूर करने के लिये बैंक की पहली क्षेत्रीय परियोजना शुरू करने के लिये SACEP और Parley for the oceans के साथ मिलकर काम किया है.

Plastic free Rivers and Seas for South Asia नामक यह परियोजना, समुद्री प्लास्टिक पर अंकुश लगाने के साथ-साथ, प्रदूषण और प्लास्टिक की री-सायकलिंग और उत्पादन को सुदृढ़ करने के लिये पर्यावरण अनुकूल नवाचार को बढ़ावा देगी.

अर्थव्यवस्था और आजीविका के लिये सभी देशों में व्याप्त इस ख़तरे से निपटने के लिये दक्षिण एशिया में सहयोग का माहौल इससे बेहतर नहीं रहा है. अब नई नीतियों, निवेश और नवाचारों व उपभोक्ताओं एवं उद्योगों, दोनों के व्यवहार परिवर्तन के लिये ज़ोर देने का समय है. यात्रा तो अब शुरू हुई है.

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