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दिल्ली के गुमनाम ‘मालचा महल’ की दास्ताँ जहां अवध राजघराने के वंशज जी रहे वीरान जिंदगी

दिल्ली के गुमनाम ‘मालचा महल’ की दास्ताँ जहां अवध राजघराने के वंशज जी रहे वीरान जिंदगी
December 30
09:48 2018

अंकिता सोनी

दिल्ली के गर्व में वैसे तो अनगिनत इतिहास के पन्ने है | आज हम आपको दिल्ली के ऐसे गुमनाम बेबाक महल की दास्ताँ से रूबरू करवाना चाहेंगे जिसके बारे में अधिकतम लोग नहीं जानते है | यह है नई दिल्ली में स्थित दक्षिण रिज़ के बीहड़ों में छुपा ‘मालचा महल’ हैं | पिछले 28 सालों से यहां अवध राजघराने के वंशज राजकुमार ‘रियाज़’ और राजकुमारी ‘सकीना महल’ रहती| यह दोनों रिश्ते में भाई-बहन है परंतु दुनिया से इनका कोई वास्ता नहीं है इसलिये इनके बारे में किसी भी दिल्ली वासी या आम नागरिक को जानकारी नहीं है |

दिल्ली के गुमनाम ‘मालचा महल’ की दास्ताँ जहां अवध राजघराने के वंशज जी रहे वीरान जिंदगी

इस स्थान पर आमजन का जाना निषेध है | इस महल में इनके साथ इनकी माँ ‘विलायत महल’ भी रहती थी जिन्होंने 10 सितंबर 1993 को अपने ही राजमहल मालचा में खुदकुशी कर ली थी | यह महल तक जाने का रास्ता सरदार पटेल मार्ग से हो कर जाता है |

दिल्ली के गुमनाम ‘मालचा महल’ की दास्ताँ जहां अवध राजघराने के वंशज जी रहे वीरान जिंदगी

परंतु इस महल में कदम रखने की किसी को इज़ाजत नहीं हैं | यहां महल के बाहर की चौखट पर लोहे के ग्रिल का वच बना हुआ है जहां पर हल्की सी आहट होते ही कुते भौकना शुरू कर देते हैं | महल के चारों और कंटीली तार के बाड़ से घेरा बना हुआ है और महल के प्रवेश द्वार के पत्थर पर बड़ा बड़ा लिखा है कि “अवध के नियम: ‘प्रिंसेस विलायत महल’ |

दिल्ली के गुमनाम ‘मालचा महल’ की दास्ताँ जहां अवध राजघराने के वंशज जी रहे वीरान जिंदगी

शायद आप अचम्भे में पड़ जाये परंतु एक और तथ्य इस महल की वीरानी और गुमनामी की ओर दर्शाता है कि यहां बिजली,पानी कुछ नहीं है | लेकिन दूरसंचार का एक ही ज़रिया है टेलीफोन, और रही बात ट्रांसपोर्ट की तो इसके नाम पर सिर्फ एक दो-पहिये की साइकिल मौजूद है | 1985 में जब विलायत महल यहाँ रहने आयी थी तब उनके साथ 12 कुत्ते, पाँच नेपाली नौकर और उनके बच्चे थे |

दिल्ली के गुमनाम ‘मालचा महल’ की दास्ताँ जहां अवध राजघराने के वंशज जी रहे वीरान जिंदगी

लेकिन अब मालचा महल में राजकुमार, राजकुमारी और कुछ कुत्ते ही बचे हैं | कहते है न कि गुमनामी और अकेलेपन की जिंदगी किसी को पसंद नहीं होती | चूँकि रानी विलायत महल ने यह शर्त रखी थी कि कोई भी आम नागरिक उनकी निजी जिंदगी में दखल नहीं देगा | परंतु खुद ही रानी को यह वीरानापन रास नहीं आया और वह डिप्रेशन में चली गयी जिसके कारण उन्होंने अपने आप ही खुदखुशी कर ली |

मालचा महल का निर्माण फ़िरोज़ शाह तुगलक ने कराया था :

700 साल पूर्व फ़िरोज़ शाह तुगलक ने इस महल का निर्माण कराया था जो अब लगभग खंडहर की स्थिति में है | तुगलक यहां शिकार करता था | बीहड़ जंगलों की पहाड़ियों पर बने इस महल में करीब 10 खिड़की और दरवाज़े हैं परंतु इनमें किसी में भी किवाड़ नहीं है | यह महल चौकोर आकृति में निर्मित है पर कुल 24 मेहराब यानी आर्च बने हैं | चूँकि इसकी मरम्मत नहीं होती है इसलिये अब सिर्फ़ 3 आर्च ही सही सलामत बचे है जहाँ राजकुमार और राजकुमारी रह रहे हैं |

रहस्य भरी दास्ताँ विलायत महल के मालचा महल में रहने की :

दिल्ली के गुमनाम ‘मालचा महल’ की दास्ताँ जहां अवध राजघराने के वंशज जी रहे वीरान जिंदगी

सवाल तो अब यह उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ विलायत महल के साथ कि उन्हें अपनी रियासत एवं रियायत को छोड़कर ऐसे वीरान और खंडहर मालचा महल में आना पड़ा | इस कहानी कि शुरुआती दौर इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने से पूर्व और आज़ादी के बाद की है | जी हां, जब पूरे भारत के महाराजाओं और महारानियों को उनके जीवनयापन के लिये पेंशन दी जा रही थी तब तक सब सही चल रहा था लेकिन जब इंदिरा गाँधी हिंदुस्तान की प्रधानमंत्री बनी तो उन्होंने सभी राजघराने के महाराजाओं को दी जा रही पेंशन बंद करा दी |

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इस फ़ैसले से उन राजा-महाराजाओं को कुछ फ़र्क नहीं पड़ा जिनके पास या तो पुश्तैनी दौलत थी या फिर कमाई के अन्य स्रोत थे। लेकिन जिनके पास दोनों में से कुछ नहीं था उनके सामने संकटों का पहाड़ खड़ा हो गया। उन्ही में से ही एक थी विलायत महल, जिनके पति की मृत्यु हो चुकी थी और कमाई का कोई स्रोत नहीं था।

दिल्ली के गुमनाम ‘मालचा महल’ की दास्ताँ जहां अवध राजघराने के वंशज जी रहे वीरान जिंदगी
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर 1981 में फर्स्ट क्लास प्रतीक्षा कक्ष में आश्रय लेता राजघराने का परिवार : कोई उपाय न देखकर विलायत महल ने सन 1975 में अपने दोनों बच्चों रियाज व सकीना सहित , 12 कुत्तों और पांच नौकरों के साथ लखनऊ से दिल्ली की ओर रुख किया और यहां के नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के एक प्लेटफार्म पर डेरा डाल दिया । बाद में वह अपने कुनबे के साथ प्लेईटफॉर्म से उठकर वीआइपी वेटिंग लांज पहुंची और वहां कब्जा कर लिया ।

दिल्ली के गुमनाम ‘मालचा महल’ की दास्ताँ जहां अवध राजघराने के वंशज जी रहे वीरान जिंदगी

रानी विलायत महल के सामने जब सब रास्ते बंद हो गये तब उन्होंने सन 1975 में अपने दोनों बच्चों , नौकरों एवं कुत्तों को लेकर लखनऊ से दिल्ली की ओर रुख किया और नई दिल्ली के रेलवे प्लेटफार्म पर डेरा जमा लिया | तत्पश्चात् प्लेटफार्म के वीआईपी प्रतीक्षा कक्ष को कब्ज़ा कर लिया जहां वह अपने कुनबे के साथ 9 वर्षों तक अपने हक़ के लिये संघर्ष की लड़ाई लड़ी |

विलायत महल ने इंदिरा गाँधी के खिलाफ अपनी जंग जारी | रखी तब इंदिरा गाँधी उनसे मिलने वीआइपी कक्ष में आयी और उनके बच्चों और विलायत महल का जायज़ा लिया |परंतु विलायत महल इंदिरा गाँधी से इतनी ख़फा और नाराज़ थी कि देखते ही बरस पड़ी लेकिन किसी तरह उन्हें शांत किया गया | तब इंदिरा गाँधी ने उन्हें कहीं और जगह रहने का प्रबंध कराया जो थी यह मालचा महल जहां बताया जाता है नबाब वाजिद अली के वंसज रहते थे | इसी के साथ विलायत महल ने यह भी शर्त रखी कि उस जगह पर कोई भी वक्ती जाना वर्जित हो हमें दुनिया से दूर एकांत में रहना है जहां आम नागरिक उनकी निजी जिंदगी में कभी भी ताक-झांक ना कर सके |

गुमनाम रहस्यमय महल

दिल्ली के गुमनाम ‘मालचा महल’ की दास्ताँ जहां अवध राजघराने के वंशज जी रहे वीरान जिंदगी

सेंट्रल रिज एरिया में मालचा महल स्थित है, जो ऊंची पहाड़ी पर तो स्थित है ही, जंगल से भी घिरा है । यह एक अनजान सुनसान स्मारक है, जहां के बारे में आज भी दिल्ली के अधिकांश निवासी नहीं जानते हैं । जानकारी के मुताबिक इंदिरा गांधी की मौत के बाद वर्ष 1985 में उनके बेटे राजीव गाँधी ने विलायत महल को इस मालचा महल में रहने की स्वीकृति पत्र प्रदान कर दी थी |

बेगम विलायत महल की आत्महत्या

माना जाता है कि विलायत महल गुमनामी में जी रही थी इसलिये उन्होंने डिप्रेशन में अपने हीरे की अंगूठी को खा लिया था | लेकिन 1994 में खज़ाने के लिये उन्हें कब्र से बाहर निकाला फिर वापस उन्हें दफनाने की जगह जला दिया गया | आज भी उनकी राख को एक जार में बंद करके महल में ही रखा हुआ हैं | वर्तमान स्थिति क्या है, राजकुमार रियाज़ और राजकुमारी सकीना को कोई नहीं जानता है परंतु अनुमान है कि दोनों की अब उम्र 55 साल से ज़्यादा होगी | राजकुमार तो फिर भी दिखाई दे जाते हैं जब वो खुद के लिए राशन लाने और कुत्तो के लिए मीट लाने बाहर निकलते हैं। लेकिन वो लोगों की बातो का कम ही जवाब देते है और यदि कोई भी उनसे ज्यादा पूछ – ताछ करता है तो वो उस पर रिवाल्वर तान देते हैं।

दिल्ली के गुमनाम ‘मालचा महल’ की दास्ताँ जहां अवध राजघराने के वंशज जी रहे वीरान जिंदगी

राजकुमारी सकीना महल ने अपनी माँ विलायत महल पर लिखी किताब ‘प्रिंसेस विलायत महल : अनसीन प्रेजंस’ में उनके जीवन के कई पहलु को उकेरा हैं और यह किताब नीदरलैंड, फ्रांस और ब्रिटेन की लाइब्रेरी में तो मौजूद है, लेकिन भारत में नहीं।

दोनों भाई-बहन विलायत से पढ़े हुए हैं चूँकि उनकी अंग्रेजी भी बहुत उम्दा हैं | आजतक इनसे मिलने की हिमाकत किसी भी व्यक्ति ने नहीं की परंतु दोनों ने एक बार बीबीसी रिपोर्टर को अपने महल में बुलाकर इंटरव्यू दिया था|

दिल्ली के गुमनाम ‘मालचा महल’ की दास्ताँ जहां अवध राजघराने के वंशज जी रहे वीरान जिंदगी

जिसमें राजकुमार ने रिपोर्टर एलेक्स निनियन से कहा था कि मुझे विश्वास है कि वो अपनी बहन से पहले ही मर जायेगा और ऐसा नही हुआ तो वो आत्महत्या कर लेगा इस परंपरा को बनाये रखने के लिए | इसके विपरीत जब रिपोर्टर ने पूछा कि यदि आपकी बहन पहले मर जाये तो क्या आप इस परंपरा को बरक़रार रखेगे जिस पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी | साथ ही राजकुमार ने कहा कि वो अपना जीवन यापन अपनी पुश्तेनी ज्वेलरी को बेच कर करते हैं | उनके मुताबिक खानदानी तोप भी है जिसकी काफ़ी ऊँची बोली लग चुकी है लेकिन हम इन्हें बेचना नहीं चाहते क्योंकि यह हमारी अवध की खानदानी शान हैं |

दिल्ली के गुमनाम ‘मालचा महल’ की दास्ताँ जहां अवध राजघराने के वंशज जी रहे वीरान जिंदगी

हाल ही में 2017 के अक्टूबर माह में राजकुमार रियाज़ की भी मौत हो गयी | यह तो पुख्ता किसी को नहीं पता की अक्टूबर में हुई की नवम्बर में परंतु अब उनकी बहन बची है कुछ कुत्तों के साथ | साथ ही इस महल को अब भारत के 10 सबसे भूतिया महलों में भी माना जाता है |

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