Online News Channel

News

दूसरों का घर रोशन करने वाले के घरो में अंधेरा

दूसरों का घर रोशन करने वाले के घरो में अंधेरा
November 05
08:58 2018

प्रयागराज, 05 नवम्बर : दीपावली के अवसर पर लोगों के घर ज्ञान का दीपक और समृद्धी का प्रकाश फैलाने वाले कुम्हारों की विडम्बना है कि उनके घर अज्ञानता और विपन्नता का अंधेरा कायम रहता है।

दीपावली में घर-घर जगमगाने वाले दीप, कुलिया बनाने वाले कुम्हारों के रोजगार को मंहगाई की मार और सरकार की बेरूखी खत्म करती जा रहा है। बाजारीकरण ने आज कुम्हार के चाक की गति को थाम सा दिया है। भले ही मंहगाई की मार ग्राहकों पर इतनी नहीं पड़ी हो, लेकिन मशीनीकरण ने उनकी रोजी रोटी छीन ली है। कुम्हारों का यह पुश्तैनी धंधा अब पतन की ओर है। कुछ बुजुर्ग कुम्हार ही बचे हैं जिनकी कांपती उंगलियां आज भी पुश्तैनी धंधे के पहिये को गतिवान बनाये हुए हैं।

कुम्हारों का कहना है कि दीये और मिट्टी के अन्य सामानों के पर्याप्त मात्रा में बिक्री नहीं होने से आर्थिक रूप से जूझ रहे हैं और स्वयं अपने घरों को रोशन करने से वंचित रह जाते हैं। इसी कारण कुम्हारों की जिन्दगी में दिन प्रतिदिन अंधेरा घिरता जा रहा है। वह अपनी इस पुश्तैनी समृद्ध कला एवं व्यवसाय से विमुख हो रहे हैं। शहर के अलोपी बाग कोहराना बस्ती, बेरहाना, बलुआघाट, रसूलाबाद, तेलियरगंज, सूलुमसराय, पीपलगांव एवं राजपरूपपुर आदि विभिन्न क्षेत्रों में कुछ वर्षों पहले करीब 500 परिवार इस व्यवसाय से जुड़े थे जो घटकर करीब 150-200 परिवार ही कुम्हारी का काम करते हैं।

अलोपीबाग के सुख्खू प्रजापति का कहना है कि महंगाई के कारण बच्चों को तालीम नहीं दे पा रहे हैं। उन्होने बताया कि जो आय होती है उसमें परिवार का ही भरण नहीं हो पाता है तो इन्हे शिक्षा कहां से देंगे। शिक्षा भी अब केवल व्यवसाय बन कर रह गयी है। जितना अच्छा स्कूल उतनी मोटी फीस। तालीम के अभाव में ज्ञान का अंधेरा और आर्थिक मंदी से विपन्नता ने घेरा है।

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की संजीवनी यदि इस व्यवसाय को मिल जाये तो कुम्हारों को जीने का सहारा मिल जायेगा। मध्य प्रदेश की रह यदि यहां भी इलेक्ट्रानिक चाक की व्यवस्था करायी जाये और अन्य दूसरे सुविधा मुहैया कराई जाये तो नयी पीढी जो पैतृक व्यवसाय से दूरी बना रही है, एक बार फिर उसका झुकाव बढ़ेगा।

वर्ष 2005 में केन्द्र में यूपीए की सरकार बनने पर श्री लालू यादव रेल मंत्री बने थे। उनके दरियादिली से कुम्हारों में जीवन की किरण दिखलाई पड़ी थी। उन्होंने रेलवे स्टेशनों पर प्लास्टिक के कप के बदले मिट्टी के कुल्हड़ में चाय बेचना अनिवार्य कर दिया था जिससे बन्द कुम्हारों के चाक एक बार फिर दौड़ने लगे थे। घर में दोनो समय चूल्हा जलने और बच्चों को स्कूल जाने का एक मार्ग प्रशस्त हुआ था।

राजरूपपुर निवासी खेसारी प्रजापति (55) ने बताया कि कुम्हारों का पुश्तैनी धंधा महंगाई की आग में झुलसता जा रहा है। दीपावली त्यौहार आने के महीनों पहले कुम्हार पूरे परिवार समेत दियली, मिट्टी के जांत, घंटी, हाथी, घोडा,कलश, ढेड़िया, कसोरा, गणेश लक्ष्मी आदि बनाने में व्यस्त रहते थे। इस दौरान उन्हे आर्थिक रूप से अच्छी कमाई हो जाती थी लेकिन लागत और परिश्रम के अनुसार अब लाभ नहीं मिलने से पुश्तैनी धंधा छोड़कर जीविकोपार्जन के लिए अन्यत्र काम करने को मजबूर हैं। कुछ परिवार तो मिट्टी के दिये बनाने के बजाए खरीद कर ही बिक्री कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि मिट्टी के दीप अब लोगों की आंखों में चमक नहीं पैदा कर पाते। उन्हें चाइनीज सस्ती दीये, मोमबत्ती और बिजली के टिमटिमाते झालरों की रोशनी रास आ रही है। दीप पर्व के मद्देनजर चाक डोलाने वाले कुम्हार पूंजी डूबने की आशंका में भी अधिक तैयारी नहीं किये हैं।

मंहगाई ने हर चीजों के दाम बढ़ा दिये लेकिन उपभोक्ता सस्ते मूल्यों पर ही मिट्टी के बने सामानों को खरीदना चाहता है जो संभव नहीं होता। पिछले वर्ष मिट्टी जो 1000-1500 रूपये ट्राली थी बढ़कर 2000 से 2500 रूपये ट्राली हो गयी है। कुम्हार दिन-रात एक कर मिट्टी इकट्ठा करता है। फिर इसमें से ईंट, कंकरीट के टुकड़ों को अलग कर इसे चिकना बनाता है। तब इस मिट्टी से नाना प्रकार के खिलौने, दीपक, गुल्लक आदि बनाता है।

कच्चे माल को पकाने में उपयोग आने वाली लकड़ी, लकड़ी के बुरादे, उपले सभी के मूल्यों में भारी इजाफा होने के कारण कुम्हारों को उनकी लागत निकालनी मुश्किल पड़ रही है। उपभोक्ता शगुन के लिए मिट्टी के दीपक खरीदते हैं, शेष चाइनीज के सस्ते छालर, मोमबत्ती और दीपक से काम चलाते हैं।

एक अन्य मदन बाबू प्रजापति ने बताया कि शहर में कुम्हारों के सामने सबसे बड़ी समस्या जमीन की है। उन्हें मिट्टी के लिए भी भटकना पड़ता है। वे ग्रामीण क्षेत्र से मिट्टी मंगाते हैं। कुम्हारों को मिट्टी के लिए मोटी रकम चुकानी पड़ रही है।पिछले साल जो दिये 30 रूपये सैकड़ा थे वे बढ़कर 50 रूपये हो गये, बड़े दिये 60-70 रूपये से 100 रूपये सैकडा तक पहुंच गये। कुछ वर्षों पहले 10 रूपये सैकड़ा दिये बिकते थे, आमदनी होती थी। अब लोग रस्म अदायगी करते हैं।

वरिष्ठ वानिकी वैज्ञानिक कुमुद श्रेया दुबे ने बताया कि चाक के आविष्कार ने दुनिया को सभ्यता का पाठ पढ़ाया। यदि चाक का आविष्कार नहीं हुआ होता तो आज हमारे पास इतना समृद्ध भौतिक विज्ञान और न गणित तथा ज्यामिति नहीं होती ।

उन्होंने कहा कि मिट्टी का दिया मिट्टी से बने मनुष्य शरीर का प्रतीक है। उसमें रहने वाला तेल उसकी जीवन शैली का प्रतीक है। दीपक हमें अंधकार दूर कर समाज में प्रकाश फैलाने की सीख देता है। दीपक की लौ केवल रोशनी की प्रतीक नहीं है बल्कि वह अज्ञानता से अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश से जीवन को रोशन करने की प्रेरणा देता है।

वैज्ञानिक दुबे ने कहा कि यह विण्डबना नहीं तो और क्या है कि दीपावली के अवसर पर दूसरों के घर ज्ञान का दीपक और समृद्धी का प्रकाश फैलाने वाले कुम्हारों के घर अज्ञानता और विपन्नता का अंधेरा कायम रहता है। उन्होंने कबीर दास के दोहे “माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय। एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौदूंगी तोय” में जीवन की पूरी सच्चाई बयां कर दी।

(वार्ता)

सुमित्रा का उम्मीदवारों की सूची के बारे में जानकारी से इंकार

Home Essentials
Abhushan
Sri Alankar
Raymond

About Author

admin_news

admin_news

Related Articles

0 Comments

No Comments Yet!

There are no comments at the moment, do you want to add one?

Write a comment

Write a Comment

Subscribe to Our Newsletter

LATEST ARTICLES

    Golfer Shubhankar becomes first Indian to win European Tour Rookie of the Year award

Golfer Shubhankar becomes first Indian to win European Tour Rookie of the Year award

0 comment Read Full Article